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Full text of "Kaya-chikitsa"

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पुनमद्रण का निवेदन 


काय-चिकित्सा का चिकित्सा-जगत्‌ के अध्येताओं ने जिस उत्साह एवं 
हार्दिकता से स्वागत किया है, वह लेखक के लिये परम ग्रसब्ता की 
कसतु है / इसके संस्कारित एवं परिवर्द्धित प्रकाशन की योजना बीच में रोक 
कर चिकित्सा-संस्थान के विद्यार्थियों के गुरुआग्रह के कारण प्रथम संस्करण 
का पुनमद्वित रूप आपके सम्मुख उपस्थित है | 


आशुतोष भगवान्‌ विश्वनाथ की अनुऋम्पा से निकट भविष्य में नवीन 
संस्करण भी आपकी सेवा में अ्स्तुत किया जा सकेगा । 


हिन्दी साहित्य सम्मेलन, ग्रयाग ने इस रचना पर मज़ला अपाद 
पारितोषिक तथा साहित्य अकादमी ने प्रथम श्रेणी की रचना के रूप में 
सम्मानित कर गौरव दिया है। यह सुधीजनों की सम्मान देने की शैली है । 
ऊपालु पाठकों के स्नेहोत्साह मिश्रित असंख्य पत्र लेखक की प्रकाशित एवं 
अग्रकाज्नित कृतियों के सम्बन्ध में जिज्नासाथ आते रहे, आभार ग्रदर्शन 
पूर्वक में उनकी रसआहकता का अभिनन्दन करता हूँ। विश्वास है, आगामी 
वसन्त तक इतर कृतियाँ मी आपकी सेवा में अस्तुत की जा सकेंगी। 


अन्त में कपालु पाठकों से, जिनको पिछले वर्ष पुस्तक के न ग्राप्त होने 
के कारण असुविधा हुई, क्षमाग्रार्थी है | 


महाशिवरात्रि | 


संवत्‌ २०३२ | गज्भासहाय पाण्डेय 


निवेदन 


चिकित्सा-विज्ञान की ज़िक्षा ग्राप्त करने के बाद भी प्रत्यक्ष कर्माभ्यास् 
के समय, नवीन चिकित्सकों को अप्रत्याशित कठिनाइयों का सामना 
करना पड़ता है। चिकित्सा-शात्र यें वर्णित व्याधियों के स्वरूप या उनमें 
निर्दिष्ट प्रतिकर्म-व्यवस्था से अभिन्न चिकित्सक भी आतुरोपक्रम में उपलब्ध 
विचित्र परिस्थितियों से किंकत्तव्य-विमढ़-सा हो जाता है। इसी परिस्थिति 
को स्पष्ट करने के लिए प्राचीन आचार्यों ने 'उत्पद्यते तु साउकस्था देशकाल- 
बल ग्रात | यस्यां कार्यमकार्य स्थात्‌-'” इस पत्र का निर्देश किया है। 
अस्तुत काय-चिकित्सा में चिकित्सा के सेद्धान्तिक पक्ष का स्पष्टीकरण: 
एवं चिकित्सा के विभिन्ष उपक्रमों का व्यावहारिक स्वरूप देने के: 
अतिरिक्त व्याधि की विभित्र अवस्थाओं के उपचार-कम का विशद विवेचनः 
किया गया है। रोगविनिश्रय के ग्राच्य एवं पाश्चात्त्य सिद्धान्त समन्वित- 
रूप में संग्रहीत किये गये हैं। पाश्चात्त्य चिकित्सा-विज्ञान में, पिछले कुछ 
दशकों में, अनेक विशाल-क्षेत्रक औषध-द्रग्यों का समावेश हुआ है | प्रायः 
उन समस्त व्यापक्ग्रभाववाली विशिष्ट ओषधियों का गुण-धर्म एवं उनके. 
ग्रयोगक्रम का आवश्यक स्पष्टीकरण किया गया है | 


इस पुस्तक में ग्राच्य एवं पाश्चात््य चिकित्सा का समन्वयात्मक निर्देश 
किया गया है। प्रत्यक्षकमाम्यास के समय ज़िस क्षेत्र की उपयोगिता का 
परिचय लेखक को मिला है, ईमानदारी के साथ उन आशु-फलग्रद' 
व्यवस्थाओं का संग्रह इसमें किया गया है। आयुर्वेदीय या ग्राच्य चिकित्सा- 


( ८ ) 


शासत्र की उपयोगिता, नवीन चिकित्सा-विज्ञान के अनेक चमत्कारिक 
आविष्कारों के बावजूद, घटी नहीं है | प्राच्यचिकित्सा का सुकर-निदान 
एवं व्यक्तिगत-विविधाओं के आधार पर निर्दिष्ट उपचार-क्रम, पथ्य तथा 
अनुपान आदि की व्यवस्था की विशिष्ट उपादेयता, सभी चिहक्नित्सक अन्तर्मन 
से अवश्य स्वीकार करते हैं। विश्वास है प्रगतिशील वर्त्तमान काल में, 
शनेः झनेः समस्त तथाकथितः विरोध तिरोहित हो जायँगे और 
आत्तमानव की सेवा में समन्वित जझक्ति का श्रद्धा एवं विश्वास के साथ 
प्रयोग किया जा सकेया, तभी क्रान्तदर्शी महाकवि का यह वाक्य पुराण- 
मित्येव ने साधु से, न चापि काव्य नयमित्यवद्यम्‌ | सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्‌ 
भजन्ते* '**? वास्तविक रूए में चरितार्थ होगा । 


कायचिकित्सा के अल्तृत संस्करण में विश्वि्ठ संक्रायक्र व्याधियों का 
विस्तृत क्रिया-क्रम दिया यय है। अविशज्विप्ट वर्य की तथा लाक्षणिक 
ग्रधानंतावाली शेष व्याधियों का अन्तमाव छाक्षणिकर चिकित्सा! 
नामक यन्य में किया यया है, जो शीज ही प्रक्मशित होगा | 'आपत्कालीन- 
चिकित्सा! ( 2#682०0८2 3464८॥४ ) नामक एक तीसरा ग्न्‍्ध भी 
छपने जा रहा हैं, जिसमें आकस्मिकरूप में उत्तत्र होनेवाली यंभीर अवस्थाओं 
एवं व्यापत्तियों का चिक्रित्सा-विधान विस्तारए्‌4क क्रियात्मक्न कठिनाइयों 
के समाधान के साथ वर्णित किया गया है। विश्वास हैं, भगवान्‌ 
विश्वनाथ की कृपा से उक्त अंथों को भी क्रमश: ग्रस्तुत कर सकने का 
सोभाग्य ग्राप्त होगा | 


वेज्ञानिक-विषयों पर हिन्दी भाषा में पुस्तकों का प्रणयन करते समय 
उपलब्ध होनेवाली कठिनाइयों का ज्ञान तद॒विद्य लेखक ही कर सकते 
हैं। विषय के स्पष्टीकरण में ज्ञेली की समस्या के अतिरिक्त पारिमाषिक 
शब्दों की जटिलता एवं बहुविघता भी लेखक की एक महती बाधा होती 
है। इस क्षेत्र में श्रद्धेय गुरुवर डा० भास्कर योविन्द घाणेकर एवं श्रद्ेय 
डा० मुकुन्दस्वरूप जी वर्मा के कारय से अस्तुत लेखक को पर्याप्त मार्ग- 
दर्मन मिला | लेखक इन गुरुजनों तथा इतर विद्वानों के प्रति, जिनकी 


(६) 


हचनाओं का अध्ययन कर इस चिकित्सा-भन्य को प्रस्तुत कर सका है, 
हादिक कतन्नता व्यक्त करता है | 


पूज्य गुरुवय चरक-चतुरानन आयुर्वेदावतार श्रद्ेय श्री पं० सत्यनारायण 
जी शात्री 'प्मभ्रूषण” एवं आदरणीय गुरुवर चिकरित्सक-सम्राद श्री पं० 
राजेश्वरदतत थी श्ञात्री की महती अनुकम्पा से लेखक ने रोय-निदान एवं 
चिकित्सा का परिज्ञान ग्राप्त किया है। यह उन्हीं की कपा-दष्टि का प्रसाद 
है। में साभार इन महानुभावों के प्रति कतज्ञता व्यक्त करता हूँ । 


इस पुस्तक का कुछ अंश सन्‌ 2९५० में लिपि-बद्ध हो चुका था 
तथा लगभग २०० पूष्ठो का मुद्रण भी सन्‌ ?९५४ में हा गया था । किन्तु 
लेखक की अध्यापन एवं चिकित्सा-काय की व्यस्तताओं के कारण इसके 
प्रकाशन में अत्यधिक विलम्ब होते रहने पर भी प्रकाशक ने अपना घैय॑ नहीं 
छोड़ा, एतदर्थ समस्त “चोखम्बाः परिवार के ग्रति तथा विशेषकर परम 
सनेही श्री बाबू कृष्णदास जी के ग्रति लेखक हार्दिक आथार अ्कट करता 
है। चोखम्बा विद्योभवन को पवनसुत की दीरष लांयूछ” में लपेटकर दसों 
दिज्ाओं में व्याप्त करने की चेशवाले श्री देवनारायण ञञा जी का स्नेह 
लेखन में सदा सह्ययक रहा है। पुस्तक के श्ञीत्र ग्रकाग्मन एवं उत्तके 
परिष्कार कम में कुशल आत्मीय बंधु पं० रामचन्द्र जी झा धन्यवाद के 
पात्र हैं, जिनकी सहायता के बिना लेखक को यह अवसर मिलना 
असंभव था | 


इस पुस्तक की आइद्यन्त पाण्डुलिपि तेयार करने में मेरे चिरन्तन 
'सहायक प्रिय जिष्य छा० श्रीधघर जी पाण्डेय की लगन एवं निष्ठा की 
'सराहना करना, उनको सेवा का अवमूल्यन होगा । सगवान्‌ विशथिन/थ 
की कृपा से वह उत्तरोच्र यशास्वी एवं कारुणिक सफल चिकित्सक बनें, 
यही कामना है। विषय-सूची, अनुक्रमणिका एवं पारिमाषिक श्ब्दकोष 
का संग्रह करके मेरे भार को हल्का करने में ग्रियवर डा० वीरेन्द्रकुमार 
पिंह जी, ए० बी० एम० एस० ने बड़ी सहायता दी है। चिकित्सा कार्य 


( १० ) 


के गुरुभार को पूर्णरूप से अपने ऊपर लेकर, लेखक को उत्त दायित्व से 
धुक्त रख, लेखन में सहायक अपने मित्र एवं पहयोगी डा० रामजी जेतली 
के ग्रति भी हार्दिक कृतज्ञता ग्रकट करता हुँ | 


अन्त में अपने झृप्ाहु पाठकों एवं स्नेही चिकित्सकों से क्षमा प्रार्थना 


करता हूँ, जिनके असंख्य पत्रों का मैं उत्तर न दे सका ओर उन्होंने इतने 
दीघंकाल तक धैरय॑पूर्वक पुस्तक के ग्रकाचित होने का विश्वास न टूटने दिया । 


पारिभाषिक शज्ब्दों की जाटिलता तथा अपनी व्यस्तता एवं अतावधानता" 
के कारण मुद्रण में अनेक त्रुटियाँ हो गई हैं | विधास है, अगले संस्करण में 
उनके परिष्कार का अवसर मिलेगा | 


आरोग्य निकेतन 
अस्सी, वाराणसी ५ हे 
गुरुपुणिमा, सं० २०२० वि. | गज्ञासहाय पाण्डफ 


विनयावनत 


विषय-प्रवेश 


प्रथम अध्याय 


रोगी परीक्षा : रोगविनिश्चय, आप्तोपदेश, प्रश्न, सामान्य, विशेष, अत्यक्ष:- 
अनुमान, रोगीपरीक्षण क्रम, प्रकति-वात-पित्त-कफ श्रक्ष ति, कुलज, जातिपग्रसक्ता, 
देशानुपातिनी, कालानुपातिनी, प्रत्यात्मनियता, सार, संहनन, श्रमाण, देंद्ड, 
सात्म्य, सत्व, आदह्वारशक्ति, व्यायाम, चय, विकृति, नाड़ी, मूत्र, मल, जिह्ा, 
शब्द, स्पशे, नेत्र, षडंग-परीक्षा, शिर, ग्रीवा, उद्र, शाखा, निदान, दोष- 
प्रकोपक कारण, रोगोत्पादक कारण, दोषविशेष-परीक्षा, दोष की विभिन्न परीक्षाएँ, 
दृष्यविशेष-परीक्षा, विकृति संग्रह, कारण, पू्वेरूप, लक्षण, सम्श्राप्ति, उपशय, 
उपद्रव, अरिष्ट, साध्यासाध्यता, श्रतिकर्म-विज्ञान, पथ्यापथ्य, ओषधयोजना, 
उपद्रव तथा प्रतिकार १-१ ९३: 


द्वितीय अध्याय 


स्वास्थ्य तथा रोग : दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या, व्याधि का स्वरूप, भेद, 
रोगोत्पत्ति के सामान्य कारण, उपसर्ग की परिभाषा, संक्रमण के माग, 
उपसर्भज शारोरिक विकार, ओऔपसगिक रोगों के प्रकार, रोगक्षमता, मसूरी- 
चिकित्सा, रसिका, परम स॒च्म वेदनता ( 79७9८ 5८787 ए८7८5$ ), 
अनूजता ( 52८29 ) १२४-१६४ 


तृतीय अध्याय 


चिकित्सा के सिद्धान्त : चिकित्सा का स्वरूप, बूंहण, लंघन, संशमन, शोधन/ स्नैहन/ 
स्वेदन, वमन, विरेचन, वस्तिकम के भेद, अनुवासन वस्ति, आस्थापन वस्ति, 
वस्ति के पाश्चात्य अयोग, उत्तरव॒स्ति, नस्यकम, सुखशुद्धि, नेत्रशोघन, अभ्यज्ञ, 
रूण-व्यायाम, स्नान, भौतिक चिकित्सा, शीत, सनन्‍्ताप, स्थानिक ताप, उष्ण 
सिक्‍थ, इन्फ्रारेड, अल्ट्रावायलेट, मेडिकल डायथर्मी १६४५-२५ ६: 


( १२ ) 


चतुर्थ अध्याय 

'चिकिध्सा के उपक्रम : सूचीवेध चिकित्सा, रक्तपूरण ( 900 (एा्याइपिश्ं 07 ), 
फुस्फुसावरण से तरल निकालने की विधि (॥/0780८7(८४ 5), पूय निहेरण 
( 4४ धा07 ० 905 ), उदर से तरल का निहरण ( रिक्रा३८८7- 
(९४8 3700077768 ), कटिवेध ( पा्राो380 एफाटांप्रा८ ), रक्ताव- 
सेचन, “बच्चन, अलाबु तथा घटो, जलोका विधि ( [,८८८पांए९ ), सिरावेधन, 
प्रतिक्षेमक-नियोग ( (+0फ्रांट' त्रा 908 ), आमाशय प्रक्षाऊन ( ७0- 
77807॥ छ8४) ), आमाशयिक आचृूषण ( एब्शए०८ 8४ए॥०07 ) 
श्वुसनिका प्रधमन, श्वसन-व्यायास, मूत्राशय शोधन, प्राणवायु प्रवेश विधि 
( (05४ए2८० 777०20००7 ), कृत्रिम श्वासोच्छास विधि ( तट 
7€8978007 ) २५७-२९५ 


स्वत अध्याय 

चथ्य एवं परिचर्यो : हिंतकर पथ्य, शिशुओं का आहार, बालकों का आहार, 
बृद्भावस्था का आहार, आहार के विभिन्न प्रमुख उपादानों की विशेषताये, 
विभिन्न व्याधियों में दूध के प्रयोग का कम, रुग्णावस्था के सामान्य पथ्य, 
रुण्णावत्या के आहार के कुछ विशिष्ट उदाहरण, परिचयों २६६-३३१ 








पष्ठ अध्याय 

विशिष्ट ओपधियों : रस या पारद के योग, ऋकजलो, पट, रप्तसिन्दूर, मकर ध्वज 
एवं चन्द्रोदय, मज्नसिन्दूर एवं मल्नचस्दोंदय, भस्में : स्वण, रजत, अम्र॒क, 
लौह, दंग, हीरक, मुक्ता, प्रवाल भस्म एव पिष्टि, श्ज्ष, हरताल भर्म, सगमद या 
कर्तूरी, शिल्ाजतु, गुग्गुल, जीवतिक्ति ः काये, अभावजन्य व्याधियाँ, शुल्वोषधियाँ, 
सल्फोन्स, पी० ए० एस० (६ 7. .5. 5. ) फायटेविन, एनाजिड, कटिजोन 
एसिटेट, ए० सो० टी० एच०, प्रेडनिसोन तथा प्रेडनिसोलोन, ट्रायम सिनालान, 
डेक्सामेयाजोन, प्रतिजीचक द्रव्य, पेनेसिलोन, आइलोटाइसिन, टायरो ध्राइसिन, 
पालिमिक्सिन, बेसिट्रेसिन, नियोमाइसिन, स्ट्रेप्टोमा इसिन, आरियोमाइसिन, एको- - 
माइसिन, मायस्टेक्लिन, लेडरमायसिन, टेरामाइसिन, क्लोरम्फेनिकॉल ३२२-४रे३ 

सप्तम अध्याय 

'दाक्षणिक चिकित्सा : अरोचक, हज्लास, वन, आध्मान, अतिसार, तृष्णा, दाह, 
निद्रानाश, प्रछाप, शिरः्शुरू, श्रम, अज्ेपक, हिंका, श्वासक्रच्छ, निपात, 
परिसरोय तथा केन्द्रीय, वसोत्रेयटण सिन्ड्रोम, मूत्रऊुच्छ, मृत्रनिरोध, मूत्राधात 


डरें४त-+४८४, 





( १३ ) 
अष्टम अध्याय 


प्रमुख संक्रामक व्याधियाँ : विषमज्वर, कालज्वर, श्लीपद, अआन्त्रिकज्वर, पैराटाय- 
फाएड ए तथा बी, तन्द्रिकज्वर, इन्फ्लुएज्ञा, प्रतिश्याय, दण्डकज्वर()272 ५८), 
भ्रन्थिकज्वर (?]०20८), मस्तिष्कावरण शोथ, शेशवीय अज्वघात, रोमाग्तिका 
( (८25८8 ), मसूरिका ( 079]]| 005 ), त्वल मसूरिका ( (४0६60 
00< ) 9 परिसप ॥ छ८0८5 2ट0व9र्गादटा' ) 4 पाषाणगदभ ( +४परा705 ); 
प्रसेकों कामलछा, कुकास (४५४॥॥00[778 ००ए१९॥), रोहिणी (>9॥८४०५), 
फुफ्फुसपाक तथा श्वसनी फुफ्फुसपाक ( 0047 बाते +70०ादा0- 
/7८प77079 ), फुफ्फुसावरण शोथ ( 7]60705 ०7 शि८णां5ए ), 
यक्ष्मा ( 3 पॉ०2८८परौ098 ), दण्डाण्वीय प्रवाहिका ( 342८]]979 ॥0952- 
7५८79 ), विसूचिका ( (7४0]679 ), शआआमप्रवाहिका ( 7027८ 
295८77(८9 ), जियारडिएसिस ( (०709&3 ), बिसप ( शिएओं- 
77०098 ) आमवात ( पिल्याश6 ८ए८ा ), पूयमेह ( (४00077- 
[0८8 ), फिरज्ञ ( ७५७7705 ), परक्नी ( ४3५४५ ) वंक्षणीय छूस कणि- 
काबंद ( 4,शाए70ए/गगपोणा4 प्र्रणंगट 0. एपवा0 
०पा०० ), चैक्षणीय कणिकाबुद ( (णर0प्र0ण73 स9पए096 0" 872- 


प्रप07798 एट7०८८पा7 ), कुष्ठ ( 7,0८777059 ), घनुवात ( 4 ८७7८७ ), 
जलसन्त्रास ( 3+9077077099 ०7 १०७०065 ) ४८६-६९ ४ 


“०0 >977040--- 


क्ताय ८9 (० के 
गंयाकत्स। 


प्रथम अध्याय 
रोगी परीक्षा 


प्रतिकरम विज्ञान का आरम्भ रोगचिज्ञान या रोगविनिश्वय से होता है) चिकित्सक जिस 
व्याधि का अतिकार करना चाहता है, जब तक भली अकार उस व्याधि की जानकारी आप्त 
न कर लेगा, चिकित्सा में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता। इसी दृष्टि से भहृषि पुनचेसु 
आश्रेय ने महर्षि अम्रिवेश को आरम्भ में रोग की सम्यक्‌ परीक्षा करने के बाद ही औषध 
एवं प्रतिकक का विनियोजन करना चाहिए” इस आशय का उपदेश दिया । रोग का ज्ञान 
किए विना चिकित्सा प्रारम्भ करने से, ओषधिवेत्ता चिकित्सकी को भी सफलता कंदाचितः 
ही मिलती है। अतः सफल चिकित्सक के लिए रोगचविशेषज्ञ, स्वषज्यकोबिंद तथा देश- 
काल श्रमाणांद का सम्यक ज्ञाता होना आवश्यक हैं ! 

रोगवितिश्वयं वास्तव में एक साधना है--योगाभ्यास है। जब तक चिकित्सक एकाञ- 
चित्त एवं शान्तबुद्धि से आपाद-मस्तक परीक्षा नहीं करता, ज्ञान, अनुभव एवं तक के 
प्रकाश में रोगी के अन्ततेम तक नहीं प्रविष्ठ हो जाता, तब -तक तत्त्वज्ञान-रोगविज्ञान-नहीं 
हो सकता । इस उद्देश्य की सिंड्धि के लिए रोगी का पूण विश्वास चिकित्सक को आष्त 
होना आवश्यक है, अन्यथा वह निर्मयतापूवंक अपनी सारी कथा, चिकित्सक के सामने, 
उसके प्रति एक नवागन्तुक सदश संकोच का भाव होने के कारण, स्पष्ट रूप मे न कह 
सकेगा । रोगी के साथ आत्मीयता अभिव्यक्त करना, बन्घुसदश उसका विश्वास आपघ्त करना 
आवश्यक है । इसी दृष्टि से महर्षि अप्निवेश ने चिकित्सक के बहुत से गुणों में स्वश्राणि्ु 
बन्घुभूत” इस गुण को विशेष महत्त्व देंते हुए निर्दिष्ट किया है । 

व्याधिविज्ञान. में आप्तोपदेश का मौलिक स्थान है । चिकित्सक की अ्रतिकर्म विज्ञान की 
सफलता में जिस अकार रोगविनिश्ववः सहायता देता है, उसी अकार रोगविनिश्वय में 
आप्तोपदेश सहायक होता है । जब तक रोग का सबंतोभावेन ज्ञाव चिकित्सक को न होगा, 
वह रोग-निणय कर हो कसे सकता है ? प्रत्येक विषय में आरम्भिक ज्ञान आप्तोपदेश के 
द्वारा ही हुआ करता है। आप्तोपदेश ( आप्त पुरुषों द्वारा रचित ग्रन्थ तथा आप्त गुरुजनों 





१. 'सोेगमादौ परीक्षेत ततोडनन्‍्तरमौषधस्‌ | ततः कर्म. मिषक्‌ पश्चांज्ञानपूर्व समाचरेत्‌ ॥? 
यस्तु रोगमविज्ञाय कर्माण्यारमते मिषक्‌। अध्योपधिविधयनश्वस्तस्य सिद्धिय॑द्रच्छया ॥ 
“थस्तु रोगविशेषज्ञः सर्वमेषज्यकीविदः । देशकालप्रमाणन्नस्तस्थ सिद्धिःसंशयम्‌ ।? 
है ( च. सू, अ. २० ) 
'ज्ञानपूत्रक हि करमणां समारम्मं प्रशंसन्ति कुझलाए ।? ( च. वि. अ. ४ ) 
२५ 'स्वथा सवेमालोच्य यथासम्मवमर्थवित्‌ । अथाध्यवस्येत्तत्वे च कार्य च तदनन्तरम्‌ ॥? 
'जशानबुद्धिअदीपेन यो नाविश्वति तत्तवित। आतुरस्यान्त रात्मानं न स रोगांश्विकित्सति ॥ 
(च. वि. अ. ४ ) _ 


कायचिकित्सा 


श्र 





शशमशा , रोग का 
जे लछड़ाण, उपद्रत तथा! रोग के घटने -बढने-नित्त्त होने का समय ओर चिकित्साविं षयक्र 









4 भ्र 
>मह४४ ज्ञान । शा बहन: 
॥ मे ऑस्नी | है 42 ॥| |] “| हि कि ॥ 
। | है | थे 
३५ न । 
गपि ॥ 
८ | । 
।, का ; पे ! 


तिरिक्त आतुरपरीक्षण में प्रश्नों द्वारा रोग का ज्ञान करना, इन्द्रियों 
भेगों की परीक्षा करना तथा प्रत्यक्ष न हो सकने योग्य विषयों का ज्ञान 
करना आवश्यक है? । आये इनका एथक्‌-प्रथक्‌ निर्देश किया जाता है। 
ऐ प्रकार के होते हें-सामास्य तथा विशेष । 


इसके अन्तर्गत रोगी का नाम, पता ( निवास स्थान, देश ) 
है वेबादित-अधविवाहित, अधान कष्ट, वत्तमान रोग की अवस्था तथा उसका 
प्म्मय, उपः अनुपशय, रोग की दद्धि का क्रम, चिकित्सा यदि इसके पूवे की गई 
हक हो उसका पार हे जाम, रोगो का सामान्य स्वास्थ्य, कोटम्बिक इतिबृत्त, रोगी की वयक्तिक 
बम्था, आाहार-विहार एवं मादक द्रज्यों का अभ्यास आदि चिंषय समावचिष्ट किए जाते 
गगी का जन्मस्यान, प्रवास एवं व्याधि से पीडित होने चाला स्थान, रोगी का चय 

पञ्ञ होने का समय ( ऋतु एवं काल ), रोगी की जाति तथा व्यवसाय, रोगी को 
था अनुकूल एच प्रतिकूल होता है, रोगी के अनुमान से किस मिथ्या आहार-विहार के 

शा रोग प्रार्भ्म छ््आा है चेदन! के घटने-बदले का समय, कीछ-भद-म ध्य अयथचा कऋर, 
दें को फ्रत्ति-अप्रव॒त्ति, निद्रा, स्वप्न आदि सभी-सचसामान्य 





































खेदमपदियान्लि माँ दमन्तः “रोगमैकेकमेवं प्रकोपणम्‌ , एवं योनिम्‌ , एव्सुत्थानम्‌ , 


हय क्‍ | +वभा-छावान्वतम , एवमुदकम्‌ , एवं नामानं विज्ञात, तस्मिन्नियं प्रतीकारार्था 
बथव! निजृत्तिस, इत्युपदेशाज्जायतेः। ( च. वि. आ. ४ ) 
जिगर पर तो डे यददृर्श शालइष्ट व वद्धवेत 4 समासतस्तदुमयं भूयों ज्ञानविवर््धनम ।? 
उ. “बैन ड़ रोग विश्वेष विज्ञानं भवति--आप्तोपदेशः, प्रत्यक्षम्‌, अनुमानब्ेति। 
हल उस्वपेन शानसमुदाबेन पूर्व रोग परीक्षय सवंथा सर्वमेवोत्तरकाल्मव्यवसान- 
हि जे आस नकल तले सदर अत्स्ने शेये शानमुत्पद्यते । जिविधे त्वस्मिन्‌ ज्ञानसमुदाये पू्व- 
कारक आए “लेड । नतः अलक्षानुमानाम्यां परीक्षोपपचते । कि झनुपदिष्टं पू्॑ यत्तत्‌ प्रत्यक्षानु- 
अाजएस्या परौक्षमाणों विद्यात्‌ ? ( च. वि. भ. ४ ) 
व! ई रोगा्णा विज्ञानोपायस, तथथा--पत्नमिः औजादिमि: प्रदनेन चेति | 

( सु. सू. अ. १० 











अकिओई 








कायचिकित्सा 


श्र 





शशमशा , रोग का 
जे लछड़ाण, उपद्रत तथा! रोग के घटने -बढने-नित्त्त होने का समय ओर चिकित्साविं षयक्र 









4 भ्र 
>मह४४ ज्ञान । शा बहन: 
॥ मे ऑस्नी | है 42 ॥| |] “| हि कि ॥ 
। | है | थे 
३५ न । 
गपि ॥ 
८ | । 
।, का ; पे ! 


तिरिक्त आतुरपरीक्षण में प्रश्नों द्वारा रोग का ज्ञान करना, इन्द्रियों 
भेगों की परीक्षा करना तथा प्रत्यक्ष न हो सकने योग्य विषयों का ज्ञान 
करना आवश्यक है? । आये इनका एथक्‌-प्रथक्‌ निर्देश किया जाता है। 
ऐ प्रकार के होते हें-सामास्य तथा विशेष । 


इसके अन्तर्गत रोगी का नाम, पता ( निवास स्थान, देश ) 
है वेबादित-अधविवाहित, अधान कष्ट, वत्तमान रोग की अवस्था तथा उसका 
प्म्मय, उपः अनुपशय, रोग की दद्धि का क्रम, चिकित्सा यदि इसके पूवे की गई 
हक हो उसका पार हे जाम, रोगो का सामान्य स्वास्थ्य, कोटम्बिक इतिबृत्त, रोगी की वयक्तिक 
बम्था, आाहार-विहार एवं मादक द्रज्यों का अभ्यास आदि चिंषय समावचिष्ट किए जाते 
गगी का जन्मस्यान, प्रवास एवं व्याधि से पीडित होने चाला स्थान, रोगी का चय 

पञ्ञ होने का समय ( ऋतु एवं काल ), रोगी की जाति तथा व्यवसाय, रोगी को 
था अनुकूल एच प्रतिकूल होता है, रोगी के अनुमान से किस मिथ्या आहार-विहार के 

शा रोग प्रार्भ्म छ््आा है चेदन! के घटने-बदले का समय, कीछ-भद-म ध्य अयथचा कऋर, 
दें को फ्रत्ति-अप्रव॒त्ति, निद्रा, स्वप्न आदि सभी-सचसामान्य 





































खेदमपदियान्लि माँ दमन्तः “रोगमैकेकमेवं प्रकोपणम्‌ , एवं योनिम्‌ , एव्सुत्थानम्‌ , 


33 7 ई अश-स्थान-क्यानवितन्‌ , एमुदकेस्‌ , एवं नामानं विज्ञात्‌, तस्मिन्नियं प्रतीकारार्था 
भव! नजृत्ति;, इत्युपदेशाज्य्ायते?। ( च. वि. अ. ४ ) 
॥ 'जिविय खड रो, अ8 हे न पेवेत । समासतस्तदुभयं भूयो शानविवद्धेनम्‌ ० 
| | । । बे खाल रोग विज्ञेष विज्ञान भवति--आप्तोपदेशः » अत्यक्षम , अनुमानब्चेति | 
विभेन_ न खबर मे शआनसझुदावैन पूर्व रोग परीक्षय सबंथा सर्वमेवोत्तरकालमध्यवसान- 
सेल सकल किक सेन इत्स्ने शेये शानसुत्पद्यते । जिविधे त्वस्मिन्‌ ज्ञानसमुदाये पुव- 
री ।॒ दिश्ष उत “अख । नतः अल्क्षानुमानाभ्यां परीक्षोपपच्चते । र्किं हनुपदिष्टं पूर्व यत्तत प्रत्यक्षानु- 
3७ । के ५ ।8 बतशगार्शा विज्ञानोपाय:, तवचथा--प ञ्नमभि: ओजादिमि: प्रश्नेन चेति ।? 

प्रुष हा “अंक 

लअञ्याणि परीक्ष्याणि परीक्षेत प्रकृतितः, विक्ृतितश्व? ॥ ( च. वि- अ. ४) 











अकिओई 





ु क्रायचिकित्स 


इन्द्रियों के द्वारा प्रत्यक्ष परीक्षण में स्वाभाविक तथा अस्वाभाविक दोनों प्रकार के 
परिणामों का समान महत्व होता है--भाव एवं अभाव मूलक चिह्ों का समान महत्व 
होता है | अतः परीक्षण के समय प्रकृति-विक्ृतिभाव, स्वस्थावस्था में उपलब्ध किन्तु रुग्णा- 
वस्था में अनुपलब्ध और इसके विपरीत रुग्णावस्था में उपलब्ध और स्वस्थावस्था में 
अनुपलब्ध विषयों का भली अकार अनुसंधान करना चाहिए। ग्रकृृति-विक्नतिभाव की 
यथेष्ट जानकारों के लिए अभ्यास की परम आवश्यकता होती है । जिस प्रकार रल्लॉ-मणियों 
आदि के असलो-नकली होने की पहचान बिना प्रत्यक्ष अभ्यास के नहीं आती, उसी प्रकार 
शरीर एवं अंग-प्त्यंग के स्वस्थ एवं रुग्ण होने का यथातथ्य ज्ञान प्रत्यक्ष क्रमाभ्यास के 
विना संभव नहीं! । इसी कारण आतुरपरीक्षण के पूष-चिकित्सक बनने के पूर्त-स्वरुथ 
शरीर की स्वाभाविक अवस्थाओं को सहस्ताधिक वार जानकारी करके, अपनी इन्द्रियों को 
प्राकृतिक विविधताओं से परिचित एवं अभ्यस्त कराना आवश्यक है। रोगी की प्राकृतिक 
या स्वाभाविक स्थिति की जानकारी विक्वृतिनिणेय के पूच आवश्यक मानी जाती है । क्योंकि 
जो लक्षण या चिह्न एक रोगी में रोगनिदरशंक माने जाते हैं, वही दूसरे व्यक्ति में सामान्य 
स्वास्थ्य के साथ उपस्थित रह सकते हें । 


स्पशेश्लेय विषय--स्वाभाविक स्वस्थ हाथ से रोगी के सर्वांग की परीक्षा मृदु 
स्पश, गम्भीर स्पर्श या परिमशे तथा अ्रपीडन या ताडन के द्वारा करनी चाहिए। एक 
जआबुली, तजनी का ४पछ्भाग या सम्पूर्ण पाणितल से स्पश किया जाता है। म्रद स्पशे 
के द्वारा त्वचा का शत्य या उष्णता, झद॒ता, काठिन्य, स्निग्धता, रुक्षता स्वाभाविक अवस्था 
में निरन्तर होने वाले स्पन्दनों की उपस्थिति या अनुपस्थिति अथवा व्याथि के प्रभाव से 
स्पन्दनों की उत्पत्ति, घनता-द्रवता, स्थिरता-अस्थिरता, प्थुता-अक्षिप्तता, स्पशज्ञान या 
स्पशासह्यता आदि का ज्ञान किया जाता है।परिसश से अन्ञ-प्रत्यज्ञ का आकार, शिथिलता- 
कठोरता, ग्रन्थियाँ तथा उनका विशिष्ट स्पश ( छरं के समान ग्रोल तथा कठोर, रबर के 
समान लचीली, सम्पृक्त या असम्पृक्त आदि ) बात नाडियों की स्पशलभ्यता, धमनी 
की कठोरता, यक्कत्‌, ब्लीह्म, इक्क्, पित्ताशय, अचटुका ग्रन्थि एवं रूसग्रन्थियों का सुपशो, 
पीडनाक्षमता आदि जाने जाते हैँं। ताडन के द्वारा अन्तरंगों की घनता, कणेरता, 
वायुपूणता, रिक्तता आदि का बोध होता है। प्रत्येक अन्न की ताडनघ्वनि प्राकृतिक 
अवस्था में कुछ निश्चित स्वरूप की होती है । इसमें परिचत्तन होने पर विक्ृोति का स्वरूप 
अनुमान के द्वारा निश्चित किया जाता है । 


दर्शन या नेत्र द्वारा श्ेय घिषय--नेत्रों के द्वारा सप्रकाशित स्थान पर भलो 
प्रकार आपादमस्तकपरीक्षण करना चाहिए। शरीर का उपचय या अपचय, वर्ण, 





परीक्षेत, अन्यत्र रसशानात्‌। »< >» %रसं तु खल्वातुरशरीरगतमिन्द्रियवैषयिकमप्यनुमानादेवाव 
गच्छेत्‌ । न श्वस्य प्रलक्षेण ग्रहणमुपपच्मते? । ( च. वि- भ. ४ ) 


“अमभ्यासात्मप्यते दृष्टि: कमसिद्धिप्रकाशिनी । रलादिसदसज्शानं न शाखादेव जायते ” 


६ ब> छा उ3> 9०5 


रोगीपरीज्ा श््‌ 


प्रमाण, आक्ृति, रुक्षता, स्निग्घता, छाया, अमभा, कान्ति, तेज, आसन एवं गति की 
विशेषताएँ आदि विषयों का ज्ञान दशन से ही होता है । 


रसज्ञान-- ऊपर रसना के द्वारा रसज्ञान का निषेध वताया गया है। रोगी के 
मुख का स्वाद उससे पूंछकर जानना चाहिए। शरीर में चींटी या मक्खियों के अधिक 
आक्ृष्ट होने से मधुरता का अनुमान और इनके अपसपण से कट, तिक्त आदि रसो का 
अनुमान किया जाता है । वमनादि में जीव रक्त होने पर काक-ध्ान आदि आपमिषभक्षी 
जीव उसे खा लेते हैं, उनके न खाने पर अशुद्ध रक्त या रक्तपित्त का निणय किया जाता 
है । क्षारीयता, अम्लता एवं मघुरता का असंदिग्ध ज्ञान विशिष्ट रासायनिक परीक्षाओं से 
भी किया जाता हैं । 


गन्धज्ञान या घाण के द्वारा फ्रीक्ष्य चियय--रुग्ण-शरीर की सभी श्रकार को 
गंधों की परीक्षा-स्वेद, मूत्र, मल, कफ, रक्त एवं वमन में निकले द्रव्य; ब्रण के खाव आदि 
की परीक्षा प्रारेन्द्रिय की सहायता से की जाती है। प्रमेहपिडिकोपद्रत मधुमेह में मधुर- 
गंधि श्वास; मूत्रविषमयता में मूत्रगंधि श्वास ; फुप्फुसकोथ में पूतिगंधि आदि विशिष्ट 
गन्धों का ज्ञान व्याधिनिणय में पर्याप्त सहायक होता है । 


आधुनिक काल में अनेक यन्‍न्त्रोपयन्त्र-उपकरणादिक आविष्कृत हो चुके हैं, जो 
सामान्यतया इन्द्रियों से प्रत्यक्ष न हो सकने योग्य विषयों को भी प्रत्यक्षवत परिलक्षित 
कराते हैं । इनका यथावश्यक ग्रयोग इन्द्रियों की सहायता के लिए किया जा सकता है। 
रोगीपरीक्षा में चिकित्सक को ऐन्द्रियक परीक्षण और बुद्धि के द्वारा ही काम लेने का 
अधिक अभ्यास रखना चाहिए, उपकरणों की सहायता अत्यन्त आवश्यक होने पर ही 
लेना चाहिए--अन्यथा इन्द्रियों की सूच्मवैदनशक्ति कुण्ठित हो जाती है, व्यक्ति पराश्रयी 
हो जाता है । 


अजनुमान--प्रत्यक्ष हो सकने योग्य विषय अल्प तथा अप्रत्यक्ष किन्तु अनुमान 
के द्वारा ज्ञेय विषय असंख्य और असीम होते हैं । यद्यपि अत्यक्ष की तुलना में अनुमान- 
प्रमाण बहुत महत्व का नहीं होता, किन्तु उसके अभाव में अनुमाव का ही सहारा लेना 
पड़ता है । गूढ़ छिंग व्याधि की परीक्षा उपशय या अलुपशय के द्वारा की जाती है, यह 
अनुमान ही है । आतुर की पाचकाप्िि का अनुमान आहार के जारण करने की शक्ति पर, 
बल का अनुमान व्यायामसामर्थ्य पर और श्रोत्रादि इन्द्रियों की काय्यक्षमता का अनुमान 
विषयग्रहण शक्ति से किया जाता है। ग्रातःकाल रोग बढ़ने पर कफ का. मध्याह में अकोप 
होने पर पित्त का तथा सायंकाल बढ़ने पर चायु के दोष का अनुमान किया जाता 
है। पूर्वरूपावस्था से रोग का आभास तथा उपद्रव एवं अरिप्ट उपस्थित होने 
पर असाध्यता कां ज्ञान अनुमान के द्वारा ही होता है। अनुमान के मुख्यतया 
२ आधार होते हैं--१ तक २ युक्ति । अनुमानझ्लेय विषयों का आगे यथास्थल उल्लेख 





६ कायचिकित्सा 


रोगीपरीक्षण का क्रम 


१. प्रकतिविज्ञान या बलप्रमाण विज्ञान-प्रारम्भ में सामान्य प्रश्नों के द्वारा 
रोगी का नाम, निवास स्थान, मुख्य व्यथा तथा उसक्रा अनुबन्धकाल, व्यक्तिगत 
विशेषताएं और पूचरोगवृत्त आदि का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए | सामान्य अकश्नो 
के द्वारा इन विषयों का ज्ञान हो जाता हैं । आतुरप्रकृति, सार-संहनन-प्रमाण- 
आहारशक्ति-सत्व-व्यायामशक्ति-आयु एवं कोष्ठ आदि का ज्ञान भी इसौ सीमा में आता है । 
इन सबसे रोगी की स्वाभाविक स्थिति, बलाबल, सहनशक्ति आदि का ज्ञान होता है । 
रोगी रोगग्रस्त होने के वाद से कितना क्षीण या दुबल हो गया है, इसका ज्ञान प्राकृतिक 
या स्वस्थावस्था का परिचय प्राप्त किए बिना नहीं हो सकता । रोग की गम्भीरता, रोगी को 
जीवनक्षमता तथा सात्म्य-असात्म्यता का ज्ञान निदान एवं चिकित्सा, दोनों में आवश्यक है। 


२. विक्ृतिविज्ञान--विशिष्ट प्रश्न, प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा व्याधि के कारण 
उत्पन्न वेदनाओं एवं विकृतियों का, अज्न-प्रत्यज्ञ परीक्षण करके, विधिवत व्यचस्थित ज्ञान 


'किया जाता है। निदान-दोष-दृष्य-व्याधि आदि का भली प्रकार निरीक्षण करके विकृृति का 
यथातथ्य लेखा-जोखा संग्रहीत किया जाता है । 


३. व्याधिविज्ञान, रोगधिनिश्चय या रोगनिदान--प्रथम खण्ड के अन्तगंत 
रोगी के बलाबल का तथा दूसरे से व्याधि के बडाबल और तज्जन्य विक्रति का ज्ञान हो 
जानें के बाद रोगविनिश्चय सुकर होता हे। उक्त परीक्षणों से प्राप्त तथ्यों को निदान, 
'पूर्वूप, रूप, उपशय एवं सम्प्राप्ति के शीर्षकों में विभक्त करके, आप्तोपदेश से आप्त ज्ञान 
एवं अनुभव के आधार पर सम्भाव्य व्याधि से समीकरण किया जाता है। भाव एवं 
अभाव मूलक लक्षणों के आधार पर सदश व्याधियों से पार्थक्य करते हुए, दोषों की 
क्षय-त्रद्धि-स्थानान्तरगति आदि का विश्लेषण करके, क्चित्‌ संदेह रह जानें पर उपशय के 
द्वारा चिनिश्चय करना चाहिए 4 रोगों के उत्तरकालीन उपद्रव और व्याधि को गंभीरता के 
निदर्शक अरिष्ट आदि का पर्यालोचन करके साध्यासाध्यता का निणय किया जाता है । 


आप्तोपदेश या शाज््रों में व्याधियों का समष्टि में वणन मिलता है। रोगी में 
विशिष्ट व्याधि के सभी लक्षण सदा नहीं मिल सकते तथा आतुर प्रकृति, देश, काल एवं 
परिस्थितियों के आधार पर रोग के लक्षणों में पर्याप्त भिज्ञता भी मिल सकती है । अर्थात्‌ 
व्याधित एवं व्याधि में एकरूपता न मिलने पर तारतम्य क्रम से रोग निंणय करना पड़ता 
है । अनेक बार व्याधि का नामकरण सम्भव नहीं होता, केचल दोषांश कल्पना करके ही 
चिकित्सा आरम्भ करने की राय आचार्यों ने इस परिस्थिति में दी है । दोष, दोषाचस्था, 


१६ विकारनामांकुशलो न जिहीयात्‌ कदाचन । न हि सवविकाराशां नामतो5स्ति श्रुवा स्थितिई ॥ 
स एव कुपितो दोषः समुत्थान विशेषतः । स्थानान्तरगतश्वेव जनयत्यामयान्‌ बहून्‌॥ 
तस्माद्विकार प्रकृती रधिष्ठानान्तराणि च । समुत्थानविशेषांश्व बुदृध्वा कमें समाचरेत्‌ |” 





शेगीपरीक्षा 


& 


व्याधि तथा उसका अधिष्ठान आदि एवं उल्वणता अनुल्वणता का विश्लेषण करने के 
बाद चिकित्सा-प्रयोग से अधिक सटीक लाभ होता हे । 


४. बतिकर्म विज्ञान--वास्‍्तव में रोगी की दृष्टि सें अब. तक का सारा घटाटोप 
हितावह नहीं होता, उसे कोई लाभ नहीं होता । क्चित्‌ निदान में अधिक संमय छूने पर 
रोगी घबड़ाने सा लगता है । अतः उसे प्रारंभ से ही भलो प्रकार आश्वस्त करना चाहिए । 

अब रोगी के विकार का चित्र हस्तामलकवत्‌ चिकित्सक के सामने रहता है। उसकी 
सभी अवस्थाओं-लक्षणों आदि पर विचार करते हुए अ्रतिकम विज्ञान के सिद्धान्त स्थिर 
किए जातें हैं । उसी आधार पर सामान्य उपक्रम, पथ्य, आहार-विहार-शयनासन आदि 
और हेतु-व्याधि विपरीतकारी ओषधियों की व्यवस्था की जाती है। यदि रोगी को कोई 
विशिष्ट लक्षण अधिक कष्ट देता हो तो लाक्षणिक या संशामक ओपषधियों कौ योजना भी 
आवश्यक हो जाती है | रोगी को दनिके अग॒ति के आधार पर आवश्यकतानुसार उचित 
सहपान-अनुपान या इतर ओषधियों का प्रयोग करना पड़ता हैं। रोग की सामता नष्ट हो 
जाने पर बृहण ओऔषधाज्न-चिहार तथा दूसरे पोषण योगों का सेवन कराया जाता है । 
रोगमुक्ति के बाद बलसंजनन तथा पुनरावत्तननिरोध के लिए उपचार आवश्यक होता हे । 
इसी के साथ संक्रामक व्याधि होने पर दूसरे स्वस्थ व्यक्तियों में व्याधि का संक्रमण न हो 
जाय, इसकी देखभाल भी करनी पडती हे । 


रोगीपरीक्षण एवं प्रतिकम विज्ञान का प्रारूप 
(अ ) प्ररृति चिज्ञान या आत्रबलप्रमाण विज्ञन३-- 


१. सामान्य अश्ष-- 
अप्तुर नाम * **** जल बज 
आयु“ **** जन्मस्थान' ' **** ग्राम|जनपद' * 
प्रवास स्थान या वत्तमान पता' “**** व्यवसाय * “*** 

२. मुख्य व्यथा तथा कालअकषे-- 

२. प्रक्रति--- 

( क ) गर्भशरीरपक्ृति-- 
(१) दोषज--वातल.. पित्तल हक 


लेष्मल.. वात-पित्तल (- विषम प्रकृति 
वात-छेष्मल पित्त-छेष्मल ] 
चात-पित्त-कफज » सम श्रकृति 
( २) पांचमौतिक--पार्थिव,, आप्य, तेजस, वचायब्य, नाभस-। 
( ३ ) मानस प्रकृति--सात्विक--ब्ाह्म, ऐन्द्र, वारुण, कोबेर, गांधव, याम्य, 
आ फषंसत्वप्रकृति । | 
राजस--आसुर, साप, शाकुन, राक्षस, पिशाच, प्रेत सत्व । 


कार्यचिकित्सा 


( ख ) जातशरीरप्रकरृति-- 


सामान्य ( १ ) कुलज--मातृज तथा मातृकुलज । पितृज तथा पितृकुलज । 
( २ ) जाति असक्ता । 
( ३ ) देशानुपातिनी--आनूप-जाह्ुल-सम । 
( ४ ) कालानुपातिनी---ऋतु-अयन-मास । 
विशेष--पत्यात्मनियता या वयक्तिक अकृति । 


४. सार--त्वक्सार रक्तसार मांससार ) सर्वेसारसमन्वित 
मेदसार अस्थिसार मज्सार / . या 
शुक्रसार  सतवसार ] अचर-मध्य-हीनसार 

५. संहनन या शरीरसंगठन--सुसंगठित-मध्यम संगठित तथा हींन संगठित । 

६. पमाण या शरीरावयर्वों का मान--सम प्रमाण-अति प्रमाण या हीन अमाण । 

७. देह--स्थूल-मध्य-कृश देह ! 


८. सात्म्य--झ्लिग्घ सात्म्य ) सात्म्य 
मिश्र सात्म्य अभ्यास सात्म्य या ओकसात्म्य 
रक्त सात्म्य ] व्याधिसात्म्य 


९. आहारशक्ति--( १ ) अभ्यहरणशक्ति 
( २ ) जारणशक्ति 
१०. व्यायामशक्ति या शारिरिक बल--प्रवर-मध्य-अल्प बल । 
सहज बल 
कालज बल 
युक्तिकृत बल 
११. सत्वबल---अवरसत्व-मध्यसत्व-हीनसत्व । 
१२. वय या आवस्थिक बल४--- 


ऐप आअधिक-मध्यम-अल्प 


| क्षीरपायी ( १ वध ) 
बाल्यावस्था ( जन्म से १६ वर्ष तक )- क्षीराज्ञाद ( २ वै्ष ) 
| अज्ञाद ( केशोर ) (१६ चर्ष ) 


| वद्धमानावस्था ( २० ) 


५ ए््ः । युवावस्था ( ३७० ) 
मध्यमावस्था ( १६ के बाद ६० वर्ष तक ) "२ है अलिलिलीर ( ली ) हि 
[ परिहाणि (६० ) 
जीर्णावस्था ( ६० के बाद १०० वर्ष तक.) 
( आ ) विकृतथिज्ञान --- 


सामान्य परीक्षण--रोगोत्पत्ति का अद्यावधि पुण इतिहास, अनुक्रम से उत्पन्न 


रोगीपरीज्षा ५, 


तथा आसन, गति, त्वचा, श्वासोच्छास, शरीरभार आदि एवं नाड़ी, मूत्र, 
मल, जिहा, शब्द, स्पशे, इक और आकृति का परीक्षण 
विशेष परीक्षण--१. षड्ंग परीक्षण :--परिप्रश्नप्रत्यक्ष-अनुमान द्वारा 
शिरो-प्रोवा--शिर--केश, तालु, ललाट, शंख, हनु, आर, पक्ष्म, नत्र, 
नासाकोटर, नासिका, कणपाली, कर्ण, कपोल, ओष्ठ, 
दन्तवेष्ठ, जिह्ला, तालु, गलविचर, गलशुण्डी, 
तुण्डिकरी, स्वस्यन्त्र, ग्रसनिका । 
ग्रीवा--लालाग्रंथियोँ, लसग्रथियाँ, श्वासप्रणाली, अवठु॒काग्रांथ, 
मन्याधमनी तथा नीलौसिरा, ग्रीवापाब तथा इृष्ठ । 
मध्य शरोर :- 
वक्षकोष्टू--चक्ष का सामान्य परीक्षण, पशुंकाए, पशुकान्तराल- 
उरःफलक, हृदय और फुफ्फुस । 
उदर--उदर का सामान्य परीक्षण, यक्कत्‌, लीहा, आमाशय» 
पक्काशय, ग्रहणी, वाताशय, मलाशय, बृक्क तथा बस्ति, 
शुक्राशय, गर्भाशय, ब्रषण, अजननेन्द्रिय । 
पृष्ठ--प्रीचामूल, पएष्ठतश, त्रिकप्रदेश, कटि तथा निंतम्ब । 
शाखा ( चार शाखाएंँ ):-- 
[ दक्षिण ) अंस या बहुमूल एवं स्कनन्‍्ध, बाहु, । शाखाओं को 
ऊध्बशाखा + कृर्पर, अकोष्ठ, मणिवंध, हस्त, | सम झविभक्तता, 


|| त्वचा पेशी, 
चाम हस्ततल, अद्भजुलपव तथा नख ० 
६ ) हदृस्‍्ततड, अड कर शिरा, घमनों, 


स्‍्नायु, कण्डरा, 
| सन्धि, अस्थि 
॥ का परीक्षण । 


[ दक्षिण ) वंक्षण, उरु, जानु,जंघा, गुल्फ, पाद, 
अधोशाखा ह|क्‍ नल पादतल, पादांगुलियाँ तथा नख। 
२. रोगोत्पादक निदान की विशेष परीक्षा --लक्षणात्मक एवं स्थूल तथा सूच्म परीक्षण । 
३. रोगजनक दोष की विशेष परीक्षा-- 
वबात--ग्राण, उदान, समान, अपान तथा व्यान ! 
पित्त--पाचक, रंजक, साधक, आलोचक तथा अ्राजक । 
'ेष्मा--बोधक, तपक, क्लेदक, अचलम्बक तथा शछेष॒क । 
४. दृष्य की विशेष परीक्षा--दृष्यावयव, दृष्यधातु एवं मर आदि का लाक्षणिक, 
क्‍ स्थूल तथा सूक्ष्म परीक्षण । 
दृष्याधिष्ठान-कोष्ठ या मध्य शरीर, शाखा, सवौग, मम, आशय, 
| स्नोत, अधोग, एकांग, अवयव, त्वचा । 
दृष्यधातु- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मब्जा, शुक्र । 
दृष्य उपधातु--स्तन्य, रज, वसा, स्वेद, दन्‍्त, रोम, ओज । 


कह... पा. 


३० कायचिकिस्सा 
५. चिकृति संग्रह--- 
( इ ) व्याधिघिन्नान या रोगंविनिश्चय $-- 


१. निदान--सामान्य निदान ] आसात्म्येन्द्रियाथंसंयोग, अज्ञापराध तथा 
विशिष्ट निदान ] परिणाम । 


२. पूवरूप--सामान्य पूर्वरूप तथा विशिष्ट पूथरूप । 

२३. रूप---चातक़त , पित्तकृत्‌ > कैफकरत , द्विदोषक़ृत > त्रिदोषकृत्‌ तथा विशिष्ट रूप । 

४. सम्प्राप्ति--संख्या, प्राधान्य या अपग्राधान्य, विकल्प, बल तथा काल, दोषों की 

अंशांश कल्पना, संचय तथा अकोप की मीमांसा और विकृत शरीर 
का वणणन । 

५. उपशय या अजुंपशय--हेतुविपरीत औषधान्नविहार, व्याधिविपरीत औषधाज्न 
विहार, देतु-व्याधिविपरीत ओषधान्नविहार तथा इसी 
कम से विपरीतार्थंकारी औषधान्नविहार ! 

- सहश व्याधियों से सापेक्ष निदान । 

. रोगविनिश्वय--विशिष्ट दोष एवं व्याधि का निर्देश, व्याधि के भेद । - 

. उपद्रव॒ तथा अरिए । 

. साध्यासाध्यता--छुखसाध्य, क्ृच्छुसाध्य, 


अताष्य  सप् 


प्रत्याख्येय । 
( है) पतिकर्म विज्ञान +-- 


१. चिकित्सासूत्र--दोषपाचन, दोषसंशोधन या दोष-व्याधिशमन एवं विशिष्ट उपक्रमों 
का निर्देश । 


बगरि ७५ ७ +,7] 


२. पथ्यापथ्य एवं आहार-चिहार सम्बन्धी सामान्य निर्देश । 


२. ओऔषधयोजना-- मुख्य व्याधि तथा अधान व्यथाकारक लक्षणों को ध्यान में 
रखते हुए विशिष्ट एवं सहायक ओषधों की योजना, मात्रा, 
सहपान-अनुपान, सेचन-काल आदि । 


४. सम्भाव्य उपद्रवों को ग्रतिबन्धन एवं परिचारक्तो को निर्देश । 


देनिक क रच 
५. दनिक प्रगति तथा तदनुरूप व्यवस्था और आवश्यकतानुसार बंहण या कृषेण 
ओषधाज्नचिहारों की योजना । 


६. रोगमुक्ति या परिणाम । 


७. व्याधि का प्रसार एवं पुनरावत्तेन निरोध तथा बलसंजनन की दृष्टि से रोगी को 
ओषधाज्न-विंहार सम्बन्धी स्पष्ट निर्देश | पुनः परीक्षण की आवश्यकता होने पर 


रोगीपरीक्षा क्‍ ११ 


८. विमश--निदान एवं चिकित्साविषयक विशेषताओं, कठिनाइयों एवं विशिष्ट 
मान्यताओं का सम्यंक्र विमशे तथा संक्षिप्त निर्देश के साथ आप्तत्थ्यों 
का संग्रह । 


[4० नी 3 


ऊपर रोगीपरीक्षण तथा ग्रतिकमविषयक 2 या 
आवश्यक स्थला का स्पष्टीकरण आगे किया जाता है 


(अ ) प्ररृतिविज्ञान के अन्तगत सामान्य अश्ों द्वार रनाम-लिज्ञ जाति आदि की 
जानकारी करने के बाद रोगी की मुख्य व्यथा पूंछना चाहिए । यहाँ व्याधि का वणन 
सममने की आवश्यकता नहीं, यथाशक्ति रोगी के अपने शब्दों में उसका चत्तमान 
में कश्टदायक विशिष्ट छक्षण तथा उसके अनुबन्ध की अवधि समझ लेना चाहिए । 
कभी २ एक नहीं अनेक लक्षण समानतया कष्टकारक होते हैं, ऐसी स्थिति में 


4, के, हक 


उनकी उत्पत्ति का काल-निर्देश करते हुए पए्थक-श्थक्‌ उल्लेख करना होगा । 


प्रकतिविज्ञान का सूक्रम विवेचन प्राचीन आचार्यों ने किया हे । यद्यपि कालक्रम से 
उसका रोगिपरीक्षण में व्यावहारिक उपयोग बहुत कम हो गया हे, किन्तु रोग एवं रोगी, दोनों 
का सही ज्ञान करने के लिए उसकी चास्तविक उपयोगिता इस यांत्रिक युग में भी असन्दिग्ध 
है । इस कारण प्रकृति का विस्तृत वणन किया जायगा । 

गर्भ हरीर प्रकृति--शुक्र व रज की शुद्धता-अशुद्धता एवं तत्सम्बन्धी व्याधियोँ 
मूल अकृति-निर्माण में प्रमुख भाग लेती हैं। गर्भ-धारण के समय शुक्र-शोणित को 
दोषोत्कटता के अतिरिक्त काल की विशेषताओं का प्रमाच्र भी गर्भस्थ शिशु की अकृृति 
का निर्माण करने में सहायक होता है। गर्भ-धारणा के बाद गर्भाशय का स्वास्थ्य 
और. माता का आहार-विहार प्रकृति-निर्माण में अन्तिम सहायता देता है । संक्षेप में 
शुक्र-शोणित-संयोग के समय जिस दोष की ग्रबलता होती है, गर्भाशय का स्वास्थ्य, काल 
का प्रभाव और माता का आहर-विहार उस दोष को अनुकूल होने पर .प्रवर तथा 

प्रतिकूल होने पर निबल बना सकते हें । 

माता-पिता के आहार- विहार, मानसिक स्वास्थ्य और आकांक्षा के आधार पर बच्चे 
की अकृति में परिवतन होता है । आज के बेज्ञानिक भी माता-पिता की इच्छाओं, चिशिष्ट 
रुचियों और गुण-दोषों का सन्‍्तति में संचहन संवाहक सूत्रों ( ७४७077080768 ) 
के द्वारा मानते हैं। जिस अकार उत्कर अभिलाषाओं और इच्छा शक्तियों का संचहन 
होता है, उसी अकार सुस्वास्थ्य, सुगठित शरीर, दीघ-जीवन आदि मानव-सम्पत्तियों का 
भी संचहन होता है । 


०... रे 
सृत्ररूप में किया गया हैं। 







माता-पिता की जीर्ण व्याधियाँ, विशेषकर कुछ, मधुमेह, क्षय, उन्‍्माद, अशे, उपदंश, 
रक्तस्लावी व्याधियाँ, पक्षाघात आदि एवं सतत रोगशीलता, मानसिक असहिष्णुता, क्रोध, 
दृष्यों, द्ेष आदि द्रत्तियों का भी सन्तति में संक्रमण होता है । शुक्र-शोणित के संयोग के 
समय माता-पिता के सम्पक से जायमान गभ में जिस दोष की प्रधानता होती हे, उसी 


थे रे कायचिकित्सा 


मानसिक भावों की ग्रधानता के आधार पर शरीर की सभी क्रियाओं का नियमन, 
संचालन, जीवनसंधारण आदि दोषों के द्वारा होता है | इसी लिये प्रकरतिगत विषमताओं 
का वर्गीकरण भी दोष-ग्राधान्य आधार पर ही किया गया है। कुछ व्यक्ति सौभाग्य से 
सम प्रक्ृतिक होते हैं । वे निदुंष्ट माने जाते हैं । विषम प्रकृति के व्यक्तियों में जिस दोष 
की अ्रधानता होती है, उसी के आधार पर उनकी अकृति का नामकरण किया जाता है । 
प्रकृतिगत विषमता के कारण उनमें, समदोष की तुलना में स्वास्थ्य की पूणता नहीं 
होती । कुछ न कुछ रोग का अनुबन्ध बना रहता है। जिस दोष की अधानता होती है, 
उस दोष को बढ़ाने वाले आहार विहार का सेंवचन करने से, विंषमग्रकृृति होने के कारण 
पहले से वर्तमान विष्रमता बढ़कर रोग का रूप आसानी से ग्रहण कर लेती है । इसी 
लिये कहा जाता है वातलाद्ाः सदातुरा? अर्थात्‌ वात ग्रकृतिक आदि विषंम दोष प्रकृतिक 
व्यक्ति सदा रोगी रहते हैं। इसी प्रकार वातप्रकृति वार्लो को वर्षा में, पित्त वालों को 
शरद में और श्लेष्मा वा्ों को वसन्‍्त में कालकृत रोग अधिक आसानी से होते हें । 
क्योंकि उनका प्रकृतिगत दोषाधिक्य, ऋतुकालजन्य दोष प्रकोप से वहुत आसानी से, 
धृद्धिसमान: सर्वेषाम! इस सिद्धान्त के आधार पर, बढ़ कर व्याधि रुपता गआप्त करता 
है। इसी प्रकार स्व प्रकृति समगुण आहार विहार भी शीघ्र दोष प्रकोपक होकर विकारो- 
त्पत्ति करता है । इसी लिए बहुत से व्यक्तियों को, साधारण मनुष्यों के दनिक आहार 
विहार के द्रव्य भी, अनुपशयकारक हो जाते हैं । 


संज्ेप में इन विषमग्रकृतिक प्रृरुषों में ऋतु-काछज, आहार-विहारज एवं समान 
जातीय दोष प्रधान व्याधियों का आक्रमण आसानी से हो जाता है । 


इन्द्रज प्रकति---एक साथ दो दोषों का संसग होने पर प्रकृति में भी दोनों का 
समान या हीनाधिक्य प्रभाव होता है । इन इन्द्रज अकृतियों का ज्ञान प्रथक्‌-पथक्‌ दो श्रेणी 
के दोषों के उपस्थित होने पर जाना जाता है । 


पाञ्चभोतिक एवं सात्विकादि प्रकृति के भेद*--वास्तव में इन सबका अनन्‍्तर्भाव 

उक्त दोष भूलक अक्ृतियों में ही हो जाता है। केवल पार्थिव ( शारीरिक ) विशेषताओं 
को प्रधान मानकर पाँचभोतिक भेद ओर सत्व, रज एवं तमोशुण की प्रधानता के आधार 

पर मानसिक भावों की विशेषताओं का संग्रह ब्राह्मय, ऐन्द्र, वारुण आदि भेदों में किया 
गया है । स्थूल परिपुष्ठ शरीर वाले पाथिव, चंचल तथा सूक्ष्म शरीर वाले वातल होते 
हैं । केवल शरीर की भौतिक विशेषताओं को समझने के लिए यह चवणन अपेक्षित है । 
स्वाभाविक स्थिति में अमुक व्यक्ति का शरीर एवं मन किस श्रेणी का है तथा विक्ृति 


से उसमें क्या परिवत्तन हुए हैं, यह सतुलन करने के लिए इस श्रकार का वर्णन 
आवश्यक है । 





१. इस विषय का विस्तृत वर्णन सुशुत शारीर ४ अध्याय और चरंक शारीर ४ अध्याय में 


रोगीपरीक्षा १३ 


वात-प्रकृति 

शारीरिक चिह--क्रृष्ण-श्याम वर्ण, क्रश, रूक्ष, ढुवल तथा असन्तुलित परिमाण 
वाला शरीर तथा सम्पूर्ण शरीर में नीले वण की शिराओं का जाल व्याप्त दिखाई पडता 
है । मांसपेशियाँ कठोर व रज्ज के समान ऐंठी हुई होती हैं । आक्वति स्थाणुब॒त्‌ आरोह 
अचरोह से शल्य होती हैं अर्थात्‌ पुरुषों में वक्ष की पृष्टता, स्त्रियों में नितम्वों की स्थूलता 
का अभाव होता है । शरीर ऊपर से नीचे की ओर दो सरल समानान्तर रेखाओं के 
बीच नापा जा सकता है । त्वचा रूक्ष, स्वेदहीन, स्परश में शीतल होती है । केश व रोम 
संख्या में अल्प, स्पश में कठोर व रुश्न होते हैं । अंगुलियाँ असम्प्क्त, पर लम्बे व फटे 
हुये, उदर अपुष्ट या घेंसा हुआ होता है।दनन्‍त छोटे व विरछ, तथा नख धूसर चण के छोटे 
ओर कम बढ़ने वाले होते हैं । अंगों की गति चपल तथा सन्धियाँ गतियुक्त होने पर 
शब्द करती हैं । शरीर का भार अल्प तथा तापक्रम भी कम होता है । नेत्र चंचछ; छोटे, 
रुत्त और सोने पर कुछ उन्मीलित रहते हें । स्वर रुक्ष और अगम्भीर होता है। आहार 
की मात्रा अल्प, किन्तु अनेक बार खाने की अभिरुचि वातल प्रकृति वाले व्यक्तियों 
में होती हे । 

मानसिक लक्षण--मन अस्थिर एवं कत्पनाशीर होता हैं। अधिक ऊहापोह 
के बिना किसी कार्य को त्वरा से प्रारम्भ करना और शीघ्र ही असन्तुष्ट होकर उसको 
छोड़ देना यह वात ग्रकृति वालो की विशेषता होती हैं । बुद्धि तीत्र, किसी विषय को 
मुनने मात्र से हृदयह््म करने की शक्ति, किन्तु मेधा अल्प होती है। मन में अनेक 
भावों की व्याप्ति या इन्द्र वना रहता है| किसी कार्य को प्रारम्भ से समाप्ति प्यन्त लगन 
के साथ पूरा करने की शक्ति का अभाव होता है। अल्प कारणों से ही शक्षुब्ध-अनुरक्त- 
विरक्त-त्रस्त और असहिष्णु होने की पत्ृत्ति होती है। मन में क्षुद्र भावों का आधान्य 
होता है । चौरयं-व्यभिचार-कलह- क्रतप्नता-हत्या-आत्महत्या इत्यादि अधिवेक के भाव 
अधिक होते हैं। गम्भीर निद्रा का अभाव और स्वप्निल निद्रा की ग्रधानता होती है । 
स्वप्न असम्बद्ध होते हैं। आकाश में उडना, अज्ञात देशों की यात्रा, भयानक स्वप्न 
प्रधानतया दिखाई पड़ते हैं । हास्य-विनोंद-गान में रुचि, वासना की प्रवलता किन्तु 
व्यवाय शक्ति की कमी, संयम का अभाव, अल्प मित्र एवं अल्प वित्त होने के कारण ऐसा 
व्यक्ति जीवन भर सुखी नहीं रहता । वायु रूक्ष, लूघु, चंचल, शीत, विशद, परुष ओर 
खर तथा आशुकारी गुण वाला होता है । वायु की रूक्षता के कारण वातल मनुष्य रूक्ष, क्ृश 
तथा अल्प शरीर वाले; रूक्ष, क्षीण, भग्न, अवरुद्ध और जजर रुवर वाले तथा अल्प निद्रा 





१. महर्षि अभिवेश ने वात प्रकृति, पित्त प्रकृति तथा कफ प्रकृति शब्दों को समीचीन न 
मानकर उनके स्थान में वातल, पित्तल और इलेष्मलरू शब्द प्रकृति के लिए उपयुक्त बतलाया हे । 
आयुर्वेद की पटिभाषा में प्रकृति आरोग्य को कहते हैं। वातादि एक या दो दोषों की प्रंधानता 
( विषमता ) के कारण मनुष्य स्फुरित करचरणादि-विकारों से जीवन भर आक्रान्त रहते हैं-- 
अथात्‌ रुग्ण रहते हैं । इसलिए स्वस्थ अवस्था. का परिचायक प्रकृति शब्द उनके लिए अनुपयुक्त है। 


( च. वि. अ, ६ ) 


१४ कायचिकित्सा 


वाले होते हैं| वायुकी लघुता के कारण त्वरित, चपल या अस्थिर ग तियुक्त और बकवचादी होते 
हैं । चलत्व गुण के कारण वातल मनुष्य अस्थिर संधि-नेत्र-धू-ओछ्ठ-जिह्ा-सिर-रकन्ध-हाथ 
और पर वाले होते हैं । वायु के आशुकारी होने के कारण वातल व्यक्ति श्रुतग्राही किन्तु 
अल्प स्मरण शक्ति वाले और शोप्र समारम्भक्षोभ-त्रास-राग-विराग वाले होते है 
शेत्य गुण के कारण ठण्ड को न सहन कर सकने वाले तथा अल्प शेत्य से ही कॉपने 
या स्तब्ध हो जाने वाले होते हैं। वायुकी परुषता के कारण बातल पुरुषों के केश, श्मश्रु, 
नख, दांत, मुख, हाथ और पर खुरदरे होते है । पायु के विशद होने से चातल मनुष्यों के 
पर और हाथ आदि अचयच फटे हुये तथा चलते समय उनको सन्धियों में स्फोटन होते हैं । 
अन्य विशेषताएँ--अव्यचस्थित कार्य व्यापार, निश्चित उ ददेश्य,, विधान एवं 
परम्परा के अनुकूल काय न करने की अश्रवृत्ति, निरथक मिथ्या बकवाद करने की प्रत्ृत्ति 
ओर किसी एक स्थान पर स्थिर होंकर कार्य करने का अभाव होने के कारण श्रमण- 
शौलता आदि विशेषतायें चातल पुरुषों में होती हैं । चातल व्यक्तियों के एक ही समय 
अनेक अंग कार्य करते रहते हैं । बात करते हुये कलम तोडते रहना, अंगूठे से जमीन 
कुरेदना अथवा जो कुछ हाथों को उपलब्ध हो सके-कमीज का कोना, कागज़ का टुकड़ा, 
घड़ी या फाउन्टेनपेन-इनका सदुपयोग या दुरुपयोग करना और कुछ न मिलने पर बात 
करते हुये हिंलना-डुलना, वाणी के अतिरिक्त अनेक शरीर-सुद्राओं और अच्जप्रत्यक्ष की 
क्रियाओं के द्वारा मनोभारषों को व्यक्त करना आदि इनमें बहुत होता है। उनकी सारी इन्द्रियां एक 
साथ काम करती हुई ज्ञात होती हैं। ऐसे व्यक्ति स्वयं बोलने में इतने प्रवीण होते हैं कि 
उनके श्रोताओं को भी कुछ कहने की इच्छा हो सकती है, इसका उन्हें ध्यान ही नहीं 
रहता । इनका सम्भाषण विस्तृत, असम्बद्ध ओर ऐकान्तिक होता है। एक ही भाव अनेक 
रूपों में अनेक बार कहने की अ्र्ृत्ति होती है । उन्हें ग्रायः अपने सम्भाषण का उ द्देश्य 
भूल जाता है और श्रोता से पूछना पड़ता है कि 'हम क्या कह रहे थे ७ जीचन 
भर किसी न किसी व्याथि से पीडित रहते हैं और एक रोग से शारीरिक रुष्य्या मुक्त 
होने के बाद भी मन से रुग्ण ही बने रहते हैं। वातछू मनुष्य आयः अल्प बल-आयुष्य- 
सनन्‍्तान-साधन और धम वाले होते हें। 
 डपशय--मधुर-अम्ल-लवण रस अघान तथा स्निग्ध-उष्ण गुण प्रधान आहार 
से लाभ होता है। इसके अतिरिक्त आगे दोष-प्रकोपक-शामक द्वव्यों का वर्णन 
किया गया है। उससे यथादोष उपशय एवं अनुपशय का विस्तृत ज्ञान किया जा 
सकता है । 


पित्त-प्रकृति 


शारोरिक चिह्न--वर्ण गौर, पीत या पिंगल तथा शरीर मृदु और मध्य बल वाला 
होता है । शरीरस्वना शिथिल व अयथोप्रचित होती है । हाथ-पर व नख ताम्र या रक्त 
व्ण के होते हैं । त्वचा में तिल, व्यंग, मशक, पिडिकाओं एवं स्वेद की अधिकता होती 


2 


>। स्वेद प्रायः दुर्गन्धित होता है। नेत्र तेजस्वी, ताम्र वर्ण के, लाल, रक्तवर्णी धमनी 


शेगीपरीक्षा ... दृणजू 


तन्तुओं से व्याप्त, तारा कृष्ण वर्ण का, कपोल-ओष्ठ रक्ताभ शुष्क, मुख सुकुमार, दन्तवेष्ठ 
रक्तवर्ण के, दांत स्वच्छ और चमकीले, जिहा रक्तवर्ण की, आ्रयः विस्फोट युक्त होती है । 
लोम-केश श्मश्रु अल्प, कोमल और कपिल वर्ण के होते हैं। अकाल में ही खालित्य- 
पालित्य का कष्ट होता है। मूत्र मात्रा में कम और तृष्णा-क्षुधा शारीरिक ऊध्मा तथा पुरीष 
की अधिकता रहती है। शरीर के खाबों में विशेष प्रकार की दुर्गन्‍्ध रहती है । निः्चवास, 
मुख और त्वचा उष्ण स्पश युक्त होती है | पित्तल व्यक्ति भी क्लेश सहिष्णु नहीं होता है । 


मानसिक लक्षण--अल्प कारणों से ही शीघ्र कोघित हो जाना, अनुनय-विनय 
करने पर शीघ्र असन्न हो जाना, अपने अनुचरों की सता करने में प्रदत्त आत्माभिमानी 
व्यक्ति पित्त प्रकृति का होता है। बुद्धि तीव्र, ज्ञान साधारण, शौय-चीरता- दर्ष-क्रोध इत्यादि 
भावों से युक्त होता है। पित्त प्रकृति का व्यक्ति वभव, उद्यामसाहस, शुद्ध आचरण, 
पवित्र व्यवहार वाला और ख्रियों का प्रिय होता है । पित्तल व्यक्तियों का स्वभाव कर किन्तु 
अनुव- तियों के लिये दयालुता युक्त, तेजस्वी, सभा-समितियों में अचण्ड चीय॑ चाला, 
सम्भाषण में प्रवीण-तार्किक और निषुणमति होता है; निद्रा साधारण, स्वप्न में सुवण 
या सुवर्ण वर्ण के पृष्प-अग्नि-विद्युत्‌-उल्कापात एवं अख्न-श््र-युद्ध इत्यादि के दृश्य 
देखता है। पित्त उष्ण-तीच्ण-द्रव-विस्तगन्धी-अम्ल और कट होता है। पित्त की उष्णता 
के कारण पित्तल मनुष्य गरमीन सहन करने वाले; शुष्क व पीत आकृति वाले; माई, तिल 
मशक और फुन्सियों वाले; अधिक छुधा-पिपासा युक्त; अकाल में ही चल्ली-पलित युक्त; 
खालित्य दोष वाले; रझदु-अल्प और ताम्र चण के श्मश्रु-लोम-केश वाले होते. हैं। पित्त को 
तीच्रणता से पित्तल मनुष्य बढ़े पराक्रमी, तीचणामरियुक्त, खूब खाने पीने वाले होते हैं । द्रचता 
के कारण पित्तल मनुष्य शिथिल और भदु सन्धि वनृधन तथा ऋूदु मांस वाले और स्वेद 
मूत्र पुरीष की मात्रांधिक्यतायुक्त होते हैं । पित्त को विस्तगन्धि के कारण कक्षा-मुख-सिर 
आदि अज्ञें में विशेष प्रकार की दुगन्धि होती हैं। पित्त के कद और अम्ल होने से 
मनुष्य अल्प वीये, अल्प मेथुन शक्ति व अल्प सन्तान वाले होते हें । 


अन्य लक्षण--पित्तप्रकृतिक पुरुषों में सामान्यतया विवेक पूवेककाय करने की प्रदृत्ति, 
किन्तु रुष्ट या तुष्ट हो जाने पर अविवेक पूर्ण व्यवहार कौ भी सम्भावना रहती है। 
साथ ही पित्तल व्यक्ति दृढ़, परिश्रमी एवं अपने आश्रितों के पालन में दत्त चित्त रहने वाला 
होता है। दूसरे व्यक्तियों की उन्नति से ईैष्या, अननुगत व्यक्तियों के ग्रति क्रोध तथा 
अभिमान और दर्प के कारण आत्मप्रशंसा सुनने को अवृत्ति और पर निन्‍्दे में रस लेने 
वाला भी होता है। सामाजिक आचार-विचार अपने सन्‍्मान के अनुरूप करने को अभिलाषा 
रखता है। पाण्डित्य, बुद्धि और श्रम को विशेष शक्ति के कारण जीवन को सफलता- 
सम्पन्नता आदि. विशेषतायें होती हैं। पित्तल व्यक्ति मध्यम बल, मध्यम आउु तया मत 
ज्ञान-विज्ञान एवं सांधनवाला होता है । 

उपशय---रन्ध-माल्य-शीत अलेप और मधुर-तिक्त-शीत प्रधान द्रव्यों के प्रयोग से 
सात्म्यता का अनुभव करता है । क्‍ 


१६ कायचिकित्सा 
कफ-प्रक्ृति 


शारीरिक चिह्--त्वचा स्निग्ध, स्वेदसिक्त, शीत स्पश युक्त; गात्र मद, परिपृष् 
सुन्दर शरीर; मांसल, सुविभक्त, उज्वल गौर वण एवं अबल साखान व्यक्ति कफ़ गकृति 
का होता है । मदु-स्निग्ध-श्ल््ण-नील वण के कुश्चित घनकेश तथा लोम भृदु एवं 
दीघ होते हैं । नेत्र विशाल, श्वेत च्ण के; अपाह़ रक्त वर्ण का; दीध-धन-पक्म युक्त 
वत्त्मं; दृष्टि स्निग्व, उन्मेष-निमेष अल्प एवं मन्द होते हैं । दन्त श्वेत चर्ण के, लम्बे 
धने; नख मदु, स्निग्ध व दीघ होते हैं । वाणी असन्न, गम्भीर निर्धोष वाली और दृढ़ 
होती है। दीघ बाहु, द्यीध ललाट एवं उरू वाला व्यक्ति उत्तम बली, क्लेशसहिष्णु एवं 
प्रचुर धन सम्पत्ति वाल्य होता है । 

मानसिक लक्षण--श्लेष्मल व्यक्ति घेये, कृतज्ञता, निर्लोम, सहिष्णुता, क्लेश- 
क्षमता और शान्त विचार, स्थिर मित्रता एवं हृढ़ बर वाल्ग होंता है। विवेक पूर्वक किया 
करने वाला; परिस्थितियों के अनुरूप अपनी प्रकृति में व्यावहारिक परिवर्तन करने वाला; 
किसी विषय पर वहुत विलम्ब से निर्णायक भाव पर पहुँच कर अनुष्ठान करने वाला श्लेष्मल 
पुरुष सत्त्व गुण अधान होता हैं। निद्रा-तन्द्रा का आधिक्य, स्वप्न में आकाश में उड़ते 
हुए पक्षी, हंस, कमल, जलाशय तथा मेघों के दृश्य दिखाई पढ़ते हैं । 

अन्य विशेषताएँ:---श्लेष्मल व्यक्ति दूरदर्शी, श्रद्धावान , दीघसूत्री, आस्तिक भावना 
युक्त, मितभाषी, मधुरभाषी, सत्यवादी एवं विनीत होता है। स्वभाव में सिंह-गज-गरुड़ का 
अजुकरण करते हुये दृढ़ निश्चयी होता है । दानशील स्वभाव वाला और सवदा प्रसन्न रहने 
चाला होता है । कठिन से कठिन विपत्तियों में भी न घबड़ाना, बड़ी हानि हो जाने पर भी 
शोक न करना एवं मन्द-गम्मीर-स्वर वाला व्यक्ति श्लेष्म प्रधान होता है तथा अधिक 
निद्रा; अल्प क्षुतं -पिपांसा, अल्प क्रोघ-इष्या-द्व ष चाला; दीधोयष्मान्‌ व परिषष्ट निरोग शरीर 
वाला: जरिया का प्रिय एवं बहु संताते युक्त एवं निश्चिन्त प्रकृतिं का होता है। 

श्लेष्मा स्निग्धू-चिक्कण-म्रढु-मधुर-स्थिर-सान्द्र-मन्द-आदं-गुरु-शीत-पिच्छिल और अच्छ 
गुण वाला होता है । श्लेप्मल मनुष्य कफ की स्निग्घता के कारण स्निग्ध अज्ञ वाले; 
श्लक्ष्णता के कारण चिकने शरीर वाले; मदु गुण के कारण सुकुमार, प्रियदर्शी और गौर 
वर्ण के; मघुर भुण के कारण वहुशुक और बहु सन्‍्ताति वाले तथा अक्ृष्ट मथुन शक्ति 
सम्पन्न हीते हे । स्थिरता के कारण सुसंहत एवं दृढ़ शरीर चाले; सान्द्र गुण के कारण 
पारंपूर्ण सचाग वाले; मन्द गुण के कारण मन्द चेश-आहार-चिहार-सम्भाषण चाले; आदर 
गुण के कारण दीवसूत्री तथा शीघ्र क्षुब्ध न होने वाले; गुरुता के कारण हाथी के समान 

मन्द गति वाले; शीत गुण के कारण अल्प क्षुधा-पिपासा-सन्ताप व स्वेद वाले; पिच्छिल 

गुण के कारण सुसम्दृक्त और दृढ़ सन्धि बन्धन वाले तथा अच्छ गुण के कारण प्रसन्न 
मुख और नेत्रवाले तथा ग्रसन्ष और स्निज्ध चण एवं स्वर वाले होते हैं ! श्लेष्मल मनुष्य 
वल्वान्‌, धनवान, विद्याचान, ओजस्वी, शान्त और दीर्घायु होते हें। 

उपशय--कट्ु तिक्त कषाय एवं रुक्ष आहार प्रधान रूप से अनुकूल होता है । 


रोगीपरीक्षा १७ 


विशेष--दो दोषों की प्रधानता के लक्षणों का संतुलन करके दंद्रज तथा तीनों दोषों 
की समस्थिति होने पर समदोषज अक्ृृति का ज्ञान किया जाता है। चास्तव में शुद्ध चात, पित्त 
या कफ प्रधान व्यक्ति मिलना कठिन है! मिंश्रित रूप के ही उदाहरण अधिक मिलते हैं । 
एक ही दोष का अधिक अभाव लक्षित. होने पर एक दोषज तथा दो द्वोषों कां समबरू 
प्रभाव होने पर-हृंद़्ज भेद किया जा सकता है । प्रकृति की विशेषताओं के कारण व्याधियों 
के रूप परिवर्तित हो जाते हैं, औषध-निर्धारण में भी इसकी उपयोगिता होती है, इसीलिए 
मूल प्रकृति की जानकारी रोगी परीक्षा प्रारंभ करते ही की जाती हे । 
विषम लक्षणों का अभाव तथा स्वास्थ्य का अनुबन्ध होने पर सम प्रकृति का अनुमान 
किया जाता है । इस श्रकार के रोगियों में चिकित्सा सुकर होती हे, क्योंकि इन्हें बहुत से 
रस-गुण-द्रव्य आदि सात्म्य होते हें। 
रुग्णावस्था में इस प्रकार का ग्रकृतिज्ञान आसानी से नहीं हो पाता । पुराना इतिहास 
पूछकर तथा परिजनों से तत्सम्बन्धी ज्ञान ग्राप्त करना चाहिए । अभ्यास होने पर इसमें 
अधिक समय नहीं लगता । 
कुलज प्रकृति--माता, पिता तथा उनके पूवर्जों के शारीरिक, मानसिक, नतिक गुणों, 
विशिष्ट रोगों तथा अन्य विशेषताओं का उनके वंशजों में जो संचार होता है, उसे कुलज 
प्रकृति कहते हैं।.। 
बहुत से कुट॒म्जों में आहार विहार की एक निश्चित परिपाटी होती है, जिसमें देश- 
काल के अनुरूप अधिक परिवतंन नहीं होता । गरिष्ठ भोजन, नियमित मांसाहार, मद्य या 
दूसरे मादक द्रव्यों का प्रयोग बाल्यावस्था से अभ्यस्त होने के कारण जीवनभर वह सात्म्य 
बना रहता है और रोगावस्था में भी उसके त्याग में असुविधा होती है, तथा देंशकाल 
के अनुरूप आहार-विंहार में परिवर्तन न होने के. कारण कभी-कभी केवल परमपराग्राप्त 
इस आहार के सतत अभ्यास से ही रोगोत्पत्ति होती है । मेदोरोग, मधुमेह, ग्रहणी, 
आमवात, वातरक्त, प्रमेह, अशे एवं श्वास से पीडित माता की सन्ततियों में, इन व्याधियों 
के संक्रमित होने में, इस प्रकार का आहार-विहार भी प्रमुख कारण होता हैं । जब कुटम्बी 
गुरु-अभिष्यन्दि-मधुररसग्रधान आहार, दिवास्वप्र-अव्यायाम आदि ,के कारण मेदोश्द्धि व 
प्रमेह से पीड़ित हों, तो उसी आहार-विहार का सेवन करने वाला शिशु भी आगे चल 
कर इन्हीं रोगों से क्यों न पीड़ित होगा . कुछ कुलज व्याधियों हैं, जो घनिष्ठ सम्पक- 
जनित उपसग एवं शुक्र-रज की दुष्टि से सन्ततियों में संक्रमित होती हैं । इसलिये इस 
प्रकार की अमुख कुलज व्याधियों के बारे में रोगी से अश्न पूछना चाहिये-उन्माद, अपस्मार, 
चात-व्याधि, बातरक्त, उपदंश, कुष्ठ, मधुमेह, अश, श्वास, रक्तज्ञावी व्याधियाँ, हृद्रोग, 
राजयक्ष्मा आदि कौटुम्बिक व्याधियाँ मानी जाती हैं । कुछ कुठम्ब अक्ृत्या द्रीघेजीवी, 
निरोगी एवं सबल तथा कुछ इसके बिल्कुल विपरीत होते हैं । अनूजताजनित व्याधियों के 
लिये कौठुम्बिक अनुबन्ध बहुत महत्वपूर्ण होता है। प्रौढ़ रोगी से उसकी ज्ली-बच्चों के 


बारे में पूछना चाहिए। गर्भस्नाव, गर्भपात का अकारण उपद्रव, वंध्यात्व आदि में माता- 
चित्रा ना फलाऋच्त क्रीड्थिज >ोोनक्‍ा साजिड, जाया व्याजााा ओोज्या 2 ॥ मंदी पाजा साच्सा मप्र सनामक्ण रोखश 


१८ ..._ कायचिकित्सा 


जीवनीशक्ति आदि से कभी-कभी पिता के रोंग का अनुमान किया जाता है । कुछ व्याधियों 
ह हीमोफिलिया-एक प्रकार का रक्तपित्त ) माता के द्वारा सम्वाहित होकर केवल पुरुंष- 
संतति में व्यक्त होती हैं, त्लीसंतति केवल वाहक का काय करती है, रोगाकान्त नहीं होती । 
इसलिए मातृ एवं पितृकुल तथा भाई-बहिन आदि रक्तसम्बंधियों के बारे में इस शीषक के 
अन्तगत जानना चाहिए क्‍ 

कुछ व्याधियों में कुलज प्रवृत्ति देखी जाती है । सम्पन्नता-दरिदरता के आधार पर भी 
रोगों का क्रम परिचित होता रहता है।इस प्रकार कुलज ग्रकृनति के द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य, 
अहार-विहार, अमुख व्याधियाँ एवं सम्पन्नता विपज्ञता का ज्ञान होता है। पितृ कुछ एवं 
मातृकुल की २,३ पीढ़ियां का इतिहास जानना चाहिए । 

ज्ञाति प्रसक्ता प्रद्ति-शारीरिक एवं मानसिक सबलता-निबलता की दृष्टि से 
जातिंगत विशेषताओं का ज्ञान आवश्यक है। आहार-विहार में भी जातिगत भेद होता है। 
कुछ व्याधियाँ एक जाति में होती हैं, दूसरे में नहीं । जाति का प्रकृति पर अभाव, दीधकाल 
से देश-काल आहार-विहार का शरीर पर होने वाला अभाव है। एक देश के निवासी 
या विशिष्ट जाति के व्यक्ति विरुद्ध देश काल में रहने पर भी पर्याप्त समय तक अपनी 
जातिगत विशेषता अक्षुण्ण रखते हें । 


देशानुपातिनों प्रकृति--मानव प्रकृति पर देश का प्रभाव बहुत व्यापक पड़ता 
है । सामान्यतया जलवायु की दृष्टि से देश के तीन विभाग किये जाते हैं। पहला आनूप 
. देश जिसके जलवायु में वायु व कफ की अधांनता होती है, वहां के निवासी भदु, सुकुमार 
ओर स्थूल शरीर के होते हैं। वर्षा का आधिक्य, छोटी-बड़ी अनेक नदियों, स्वल्प वनस्पतियों, 
घने जंगलों, बड़े बड़े वृक्षों, पवतों से आन्त आच्छादित रहता है। आनूप देश के 
निवासी अम्लपित्त, प्लीहाइद्धि, गछगण्ड तथा श्लीपदादि रोगों से आक्रान्त रहा 
करते हैं। दूसरा जांगल देश-जिसमें वर्षा को अल्पता, वायु की तीत्रता व उष्णता के 
कारण वहां के जलवायु में वात और पित्त को अधानता होती है। पौने के लिये तोलाब, 
सरोवर, निकेर आदि का जल व्यवहार में लाने से वात-पित्तबहुल व्याधियोँ पेदा होती 
हैं। जांगल देश के निवासी स्थिर-कठोर शरीर वाले, परिश्रमी होते हैं। वनस्पतियाँ अल्प, 
कंटक युक्त, कूर्पों में जल की कमी, भूमि आकाश के समान समतल एवं रुक्ष होती हैं। देश 
का तीसरा भेद साधारण है--जिसमें पुरुष सामान्य दोष वाले, स्थिर, सुकुमार, बलवान 
सुसंगठित और निरोगी होते हैं। आरोग्य के लिए साधारण देश उत्तम, जांगल मध्यम, तथा 
आनूप निक्ृष्ट माना गया हे। चरक ने जांगल देश की मरुभूमिको आरोग्य भूमि बताया 
है। 'मरुरारोग्यभूमीनाम! ( च. सू . अ. २५ ) 

देशसम्बन्धी- इतिद्ृत्त पूछते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिये । 

१. देश के साथ रोगी का सम्बन्ध, २. देशगत विशेषलयें । 

१. पहले के श्न्तयंत रोगी का जन्म, परिपालन तथा व्याधि की उत्पत्ति किस देश में 
हुई है, यह जानना चाहिये । रोगी की सहनशीलता पर उसकी मातृभूमि का अभाव 


'रोगीपरीज्ञा १९ 


होतीं। यदि रोगी प्रवास कर रहा हो तो व्याधि के आक्रमण का स्थान जान लेने से 
निदान में संभाव्य व्याधियों की उपेक्षा न हो सकेगी। संक्रामक व्याधियों में यह ज्ञान बहुत 
आवश्यक होता है । 

२. देशगत विशेषताओं में आहार, विहार, आचार, बलाबल, शील, सात्म्यासात्म्य, 
अमुख व्याधियों, हिताहित आदि सभी जानपदीय विशेषताओं कौ जानकारी करनी चाहिये । 
पूर्चीय भारत में कठु तेल का, महाराष्ट्र में मूगफली के तेल का और सौराष्ट में तिल तैछ 
का प्रयोग एवं दक्षिण में इमली का प्रयोग, गुजरात में गुड़ का प्रयोग और राजस्थान में 
लालमिय और घी का प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाता है । आनूप देश में पित्त की 
मन्दता तथा वात श्लेष्म की अ्रधानता और अल्प शारीरिक श्रम के कारण अप्रिमांय 

सम्बन्धी विकार अधिक होते हैं । जांगल देशों में, जहाँ जीविकोपाजन में अधिक श्रम 
करना पड़ता है, व्यक्ति सुदढ, बलवान और अल्प रोगी होते हैं । 


कुछ व्याधियाँ एक जनपद में, कुछ दूसरे में प्रधानतया होती हैं। आनूप देश में 
संग्रहणी, विषम ज्वर, चात बलासक, प्रमेह और उदर रोग का आधिक्य होता है | जांगल 
प्रदेश में रक्तदुष्टि, त्वक्‌ रोग तथा दूसरे वात पित्त प्रधान रोग अधिक होते हें । स्थानान्तर 
या जल-वायु-देश परिवत्तन का महत्व देशज रोगों में बहुत होता है । विशिष्ट जलवायु 
वाले देश में उत्पन्न रोग भिन्न देश-काल में प्रवास करने से ग्रकृत्या शान्त हो जाते हैं ।१ 
सहज अकृति के ऊपर देशगंत विशेषताओं का अभाव आवरण के रूप में रहता है । 
पित्तल व्यक्ति आनूप देश का हो तो उसकी अकृृति में कुछ परिष्कार अवश्य हो जायगा । 
संक्षेप में देशगत आहार-विहार, जल-वायु और स्थानीय अधान व्याधियों कौ जानकारी 
इस शीषक के अन्तगंत करनी चाहिये । 
कालानुपातिनी प्रकृति---शीत, उष्ण तथा वर्षा के आधार पर वर्ष के प्रमुख 
रे भाग किए जाते हैं। दोषों के संचय-प्रकोप-प्रशम कौ दृष्टि से ६ ऋतुएं एक 
वष में मानी गई हैं। नित्यग एवंआवस्थिक काल के अनुरूप रोगी का जीवन 
व्यापार किस रूप का रहता है, यह जानने से काल की अनुनूलेता-अ्रतिकूलता का ज्ञान हो 
जाता है। काल के अन्तगत सभी ऋतुओं में रोगी के बलाबल का ज्ञान, दोषों का संचय- 
प्रकोप, व्याधियों का अनुबन्ध और आहार-विहार सम्बन्धी सारी जानकारी रोगी को 
अनुकूलता और अननुकूलता पर विचार करते हुए करनी चाहिये। कुछ रोगी ऋतु 
परिवतन के समय अकस्मात्‌ रोगाक्रान्त हो जाते हैं। कुछ को अतिश्याय, ज्वर, अतिसार 
आदि व्याधियों का कष्ट हो जाता है। इस अकार ऋतुओं के साथ रोगी का सन्तुलन, 
स्वभावतः उत्पन्न होने वाली व्याधियों का उस पर प्रभाव, ऋतुओं के अनुरूप आहार-विहार 
में परिचतंन करने का उसका इतिहास जान कर रोगी के बलाबल का, अतिकारक शक्ति 
और अनूजता आदि का निणय किया जा सकता है। 


१, “न तथा बलवत्तः स्यृः जलूजा वा स्थला हृताः । 


कायचिकित्सां 


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रोगीपरीक्षा 


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२२ कायचिकित्सा 


वेयक्तिक प्रकृति या प्रत्यात्मनियतां प्रकति--इसके अन्तर्गत वैयक्तिक 
विविधताओं, शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, व्यावसायिक, सामाजिक एवं बौद्धिक 
व्यक्तिनिष्ठ भावों का चिंवेचन करना होता है। शयनोत्यथान का समय, आहारमात्रा, 
उसकी रोचकता-पोषकता-सुपाच्यता, विश्राम, श्रम-शक्ति के साथ श्रम का 
संतुलन, श्रम का स्वरूप, श्रम एवं आहार का संतुलन, काये व्यापार के प्रति संतोष, 
कौठुम्बिक सुख-शान्ति-कलह-हेष, सामाजिक सम्मान इत्यादि का प्रभाव व्यक्ति की 
प्रकृति पर महत्वपूण होता है। कौटुम्बिक कलह एवं देनिक विषमताओं के कारण 
व्यक्ति का स्वभाव चिड़चिड़ा, चित्त अस्थिर और मन में निराशा का भाव रहता है । बहुत 
सी व्याधियोँ हीन-पोषण और अधिक श्रम तथा अनियमित भोजन एवं कुछ विरुद्ध 
भोजन और शुरु भोजन से पेदा होती हैं। मद्य, विजया, अहिफेन, धूम्रपान एवं नस्य 
इत्यादिक मादक द्वव्यों का उपयोग कुछ विशिष्ट व्याधियों की उत्पत्ति में सहायक होता है । 
बहुत से रोग रोगी की शांरीरिक शक्ति को इतना क्षीण कर देते हैं, जिससे उनकी निवृत्ति के 
बाद भी शरीर अनेक रोगों के लिये उचरक्षेत्र बन जाता है। जीण अतिश्याय होने पर 
धास-कास व क्षय का अनुबन्ध, चिंबन्ध तथा अतिसार आदि कष्ट होने पर संग्रहणी एवं 
अशे की सम्भावना और यक्ृत-प्लीहा तथा गुल्म के उपरान्त उदररोग की सम्भावना 
अधिक होती है । बहुत सी व्यांधियों प्रारम्भिक स्थलों में शान्त- होकर स्थायी विधातक 
परिणाम शरीर के दूसरे अज्ञों पर छोड़ जाती हैं यथा स्थूल रूप में व्याधि का उपशम हो 
जाने पर आमचात, उपदंश, आमातिसार के द्वारा हृदय, रक्तवाहिनी एवं यक्नत की 
विक्ृतियाँ उत्पन्न होती हें-। इसलिये रोगी के चेयक्तिक इतिहास को निम्न वर्गों में विभाजित 
कर संग्रहीत करना चाहिये । 


( के ) आहार--मात्रा, पोषकत्व, स॒पाच्यता, सांत्म्यता, नियमित प्रयोग, अभ्यास 
सात्म्यता, मादक द्वव्योपयोग, आहार को मात्रा, काल, देशकालानुरूपिता । 


( ख ) विहार--दिनचयों, निद्रा, व्यायाम, कार्यव्यापार, आजीविका, बल एवं 
आहार के अजुपात में श्रम का संतुलन । कुछ व्याधियाँ विशेषप्रकार के कार्य करने से 
उत्पन्न होती हैं, जेसें---शीशे, कांच, स्वण, कोयला की खान में काम करने वाले विशिष्ट 
व्याधि से पीडित होते हैं । 

( ग ) बल--सहज, ऋतुजन्य और युक्ति कृत बल । 

सहजबलर---शरीर और मन का जो स्वाभाविक-आकृत-बल होता. है, वह सहज है । 
ऋंतु विभाग से--यथा हेमनत और वसन्त में प्रकृष्ट बछ--और आयु के कारण यथा- 
युवावस्था में विशेष बल--जो बलवत्ता होती है, वह कालज है । सम्यक आहार. व्यायाम 

एवं इतर बलवधंक उपायों से अर्जित बल युक्ति कृत कहा जाता है । 

( घ ) अभि---. सम, विषम, तौचण, मंद । 


समाप्िि--जो जाठराग्नि योग्यकाल और उचित मात्रा में भुक्त अन्न का यथा काल 
सम्यक्‌ पचन करती है, वह समामि हे । 


रोगीपरीक्षा २३ 


विषमापि--जो पाचकाप्मि कदाचित अज्ञ का सम्यक पाचन करती है और कदाचित 
आध्मान, शूछ, अलसक, विचंध, अतिसार या गुड़गुडाहट और अचाहण आदि लक्षण 
उत्पन्न करके समुचित पाचन नहीं करती, वह विषमाप्मि है । 


तीचणापि---अति मात्रा में भी खाए हुए अन्न का शीघ्र पाचन कर देने वाली अप्क्‍नि 
तीदण कही जाती है । 

मन्दाउशि--यथा विधि, यथा काल, अल्प मात्रा में खाए हुए अन्न को भी, आध्मान, 
शिर का गोरव, कास, श्वास, हल्लास, अम्लोद्गार, चमन एवं क्लान्ति आदि लक्षण उत्पन्न 
करके विलम्ब से पचाती है, वह मंद अम्नि कही जाती है । 


( ढ ) कोष्च--मदु, मध्यम और कर । 


रुदुको8--जिसके कोष्ठ में पित्त की अधिकता होती है, उसे दूध या भृदु स्ंसक 
ओपषधियों से भी विरेचन हो जाता है । 


मध्यको४--कफ को प्रधानता या तीनों दोषों की समानता के कारण मध्यम कोष्ठ 
होता है। इनमें विरेचन योगों का सामान्य मात्रा में समुचित परिणाम होता है । 


क्रर कोष्ठ--वायु की अधिकता से कोष्ठ क्र होता है। विरेचन द्वव्यों की पर्याप्त मात्रा 
से भी कठिनाई से दस्त होता है--प्रायः विंचंध का कष्ट बना ही रहता है। 


( वे ) मानसिक स्थिति--रूपृति, मेधा, आचार, सुख-शान्ति, शौल, ज्ञानेन्द्रियों 
के कम, निद्रा, स्वप्न 


(७ ) मलप्रवृत्ति--मूत्र, पुरीष, स्वेद, अपानचायु, उद्वार, कफ और नासामल 
का नियमित एवं मात्रावत्‌ उत्सग । 


(ज ) विवाहित या अविवाहित--वयक्तिक जीवन की सुख-शान्ति तथा 
वेवाहिक जीवन, धुत्रादिकों की संख्या: स्वास्थ्य एवं विशिष्रोग--राजयक्ष्मा, अ्रतिश्याय, 
कास, वृक्करोग, रक्‍तनिपीड, ह॒द्गरोग, पयमेह, अमेह, मधुमेह, इनफ्लुएजा, अभिघात, 
मानसिक रोग, वातव्याधि आदि का इतिबृत्त । 


( के ) पूव रोगानुबंध--उपदंश, आमवात, उरस्तोय, शोफ; वातरक्‍्त, रोमान्तिका, 
तुण्डिकेरी शोथ, शूल, कामला, विधष्रसज्वर, आन्त्रिकज्वर एवं अनूजता जनित व्याधियाँ- 
शीतपिंत्त, तमकश्वास, विचर्चिका इत्यादि । वतमान्‌ व्याधि से पीड़ित होने के पू्च ऊपर 
निर्दिष्ट व्याधियों से पीड़ित होने का इतिबृत्त सावधानी से पूछना चाहिये । 


२. सार--शरीर के बल एचं आयुष्य को विशेष जानकारी के लिये त्वकू-रक्तादि घातुओं 
की शरीर में प्रधानता समझना आवश्यक होता है। सब सार विशेषताओं से युक्त पुरुष 
अधिक बलवाले, क्लेश-सहिष्णु, चिरक्नीवी, निरोगी और स्थिर बल वाले होते हैं। हीन- 
सार वाले व्यक्ति इन सब विशेषताओं से रहित और मध्यसार वाले व्यक्तियों में श्षध्य- 


२४ कायचिकित्सा 


स्थिति होती है। केवल विशाल शरीर देखने मात्र से, यह व्यक्ति अधिक बलवान होगा 
ओर क्षीण काय व्यक्ति निर्वेछ होगा, यह अयथार्थ ज्ञान न होने पावे, इसीलिये सार 
परीक्षण करना आवश्यक है। पहाड़ी मनुष्य और महाराष्ट्र अदेशी शरीर से महाबल न दिखायी 
पड़ने पर भी कार्य व्यापार में दूसरे सुपुष्ट व्यक्तियों से अधिक प्रबल होते हैं। शारीरिक- 
धातुओं और मन को आधार मान कर सार के आठ भेद किये जाते हैं। किसी एक ही 
व्यक्ति में सभी सार उत्तम रूप में हो सकते हैं । कुछ उत्तम रूप में, कुछ मध्य स्थिति में 
तथा कुछ हीन भी हो सकते हैं या सभी की न्यूनता हो सकती है ! इसलिये सार परीक्षा 
करते समय अत्येक सार का निणय प्रवर-मध्य-हीन शब्दों के द्वारा करना चाहिये । 


व्वक्‌ सार--रढु-खिग्ध-कान्तिमान्‌ , रऋदु-अल्प रोम युक्त त्वचा, त्वक सार की 
चिशेषता होती है । इस अकार की त्वचा से ऐश्वय, आरामतलब जीवन, सुख, सौभाग्य, 
उपभोग, बुद्धि, विद्या, आरोग्य, हष तथा आयुष्य कौ अभिव्यक्ति होती है । ऐसे व्यक्ति 
क्लेशसहिष्णु नहीं होते । 


रक्त सार--नेत्र, कणपाली, ओष्ठ, कपोल, जिहा, ललाट, हस्त-पाद तल और नख 
का व स्निग्ध एवं रक्तिम; तथा शरीर के शोभा-कान्ति-दीप्तिमत्‌ होने पर रक्त सारता का 
निणय किया जाता है। इसे विशेषता से सम्पन्न व्यक्ति सुखी, सुकुमार, मनस्वी, उद्धत 
स्वभाव वाले, अल्प बल, अपरिश्रमी और उष्णद्वेषी होते हैं । 


माँस सार--शंख, -ललाट, कृकाटिका, कपोल, स्कन्ध, उदर, कक्षा, वक्ष और हस्त- 
पाद को सन्धियों में मांस का भली अकार उपचय, मांस की ग्रधानता को द्योतित 
करता है। मांस सार व्यक्ति क्षमा, थेये, निर्लेभ, विद्या, धन, सुख, सरलता, आरोग्य 
एवं बल से युक्त होने के साथ ही दीर्घायु और उत्तम श्रमशक्ति का भी अधिकारी 
होता हे । 


मेद सार--वर्ण, स्वर और नेत्नों की स्निग्धता, केश-लोम-दन्त-ओषछ्ठ-नख॑- मूत्र 
और पुरीष इनकी चिकणता, मेदस्वी शरौर, मेद के ग्राधान्य को बताता है। मेदस्वी 
व्यक्ति हद, अल्प परिश्रमी, सुखी, तथा इच्छित उपभोगव न्‌ होते हैं । 


अस्थिसार--जिन व्यक्तियों के नख, दन्‍त और अस्थियाँ स्थूल हों और सन्धियों 
भी, विशेषकर गुल्फ, जानु, मणिबन्ध की मोटी हों, वे व्यक्ति अस्थिसार कहे 


जाते हैं। करियाक्षमता, क्लेशसहिष्ण॒ता, दीघोयुत्व, कार्य के श्रति उत्साह, इनकी 
विशेषताये हैं । 


भज् सार--स्थूछ-'ेघे और गोल सन्धियों वाले व्यक्ति भदु गात्र होने पर भी 
भचसार होने के कारण बलवान्‌ होते हैं । उनका स्वर गम्भौर-स्निर्ध और 
नेत्र विशाल होते हैं । मजसार व्यक्ति स्वस्थ, दीघोयु, बलवान, बुद्धिमान्‌ और पृत्रवान्‌ 


रोगीपरीक्षा क्‍ २५७ 


शुक्र सार--स्निग्ध दृष्टि, सौम्य आकृति, कान्तिमान्‌ मुख और प्रतिभाशाली, निरोगी 
व्यक्ति शुक्र सार कहे जाते हैं । स्निग्ध, गोल, दृढ़, सम, संहत और उच्नताग्न दन्त, प्रसन्न 
एवं स्निग्धवण तथा स्वर; कान्तिमान्‌ , सुगठित, श्वेतवर्ण के नख, अस्थि तथा दांत; बढ़े-बड़े 
नितम्ब वाले व्यक्ति वलवान्‌ , प्रवल मंथुन शक्ति वाले, ब्ियों के प्रिय, सुखी, ऐश्वय-आरोग्य- 
चान्‌ और बहु सन्‍्तति वाले होते हैं । 


सत्व सार--श्रद्धा-कृतज्ञता-उत्साह-धेय-मेधा-प्रतिभा इत्यादि शुद्ध सालिक विशेषताओं 
से युक्त व्यक्ति सत््वसार कहे जाते हैं । विवेकपूण काय व्यापार, गम्भीर बुद्धि, उव्यवस्थित 
योजना, इनकी विशेषता होती है । 


२. संहनन--अस्थि-संधि-मांस इत्यादि धातुओं का आनुपातिक, सुविभक्त संघात 
या संयोजन उत्तम बल का निदश्शक माना जाता है। इसलिये शरीर की गठन के आधार 
पर इसे सुसंगठित, असंगठित और मध्यसंगठित इन तीन शीषकों में वांटना चाहिये। 
हाथ-पर क्षीण, उदर स्थूल अथवा पेर मोटे, वक्ष पतला, सिर बहुत बड़ा, ग्रीवा 
पतली इत्यादि विषम संगठन के प्रकार शरीर की दुबंलता का तथा परिपृष्ट सुगठित शरीर 
उत्तम बल का आधार होता है । जिस मनुष्य की अस्थियाँ समप्रमाण में अच्छी तरह 
सुविभक्त हों, सन्धियोँ सुबद्ध हों, मांसपेशियों सुनिहित तथा रक्तामिंसरण सभी अगों में 
समप्रमाण में हो, उसे सुसंहत कहते हैं । सुसंहत व्यक्ति उत्तम बलवाला, मध्यसंगठन का 
का मध्यम बलवाला. तथा हीनगठन का हीन बल वाला होता है । 


४. प्रमाण परीक्षा--शरीर के प्रत्येक अंग-उपांग का आयाम-विस्तार-उत्सेष 
आओसत मानदण्ड के अनुरूप होने पर, शरीर उत्तम अमाण वाला माना जाता हैं। आयु- 
बल-ओज-सुख-ऐश्वय और वित्त प्रमाणयुक्त शरीर की विशेष सम्पत्ति माने जाते हें । 
शरीर का यह प्रमाण आयु-देश-काल और आहार पर निभर करता हैं। अमाण परि- 
मापन के लिये प्राचीन आचार्यों ने व्यक्तिनिष्ठ अंगों को आधार माना है। प्रत्येक अंग के 
आयाम, विस्तार, उत्सेध आदि का परिमापन स्वकोय अंग्रुल, हरुत, व्याम आदि के द्वारा 
करने का निर्देश किया है। यदि रोगी अपने अंगुलों से नापने पर आदर्श मान से कम 
या अधिक होता है, तभी उसे विकार निदशक मानेंगे । शरीर को लम्बाई- चौड़ाई कम 
होने पर अंगुलादि की लम्बाई चौड़ाई भी उसी अनुपात में कम हो जाती है । यदि कोई 
व्यक्ति नाटा और मोटा हो तो मोटाई के अनुरूप अंगुलों की मोटाई होगी तथा ऊंचाई- 
लम्बाई हस्त या व्याम से होगी, जो स्वभावतः छोटे होंगे । परीक्षण-सुविधा की दैष्टि 
सें प्रत्येक अंग का प्ृथक्‌ ए्रथक्‌ औसत परिमाण अच्ुुल मान के आधार पर साथ के कोष्ठक 
में दिया गया है । 


पच्चीस वर्ष की अवस्था में पुरुष और १६ वर्ष की अवस्था में स्री परिपूणं सब 
धातु वाली मानी जाती हैं । मान परिमाण स्वस्थ शरीर वाले जञ्लरी पुरुषो का ही लिखा गया 
हे । जिस पुरुष के शरीर के अक्न-प्रत्यज्ञों का माप लेना हो, उसकी अच्जुलियों के मान से 
फंचादे. विम्तार या परिणार्र' लथा रूम्बा्-जोडाडे जाननी चाहिए । 


--.__तततन७..वनलनत_२३-3२०००.... ००... जवां अमाााकिका 


६ कायचिकित्सा 


प्रमाण-परीक्षा ५ कोष्ठक पघंख्या-२ 











अंग-प्रत्यंग ल. या अन्त.। चौड़ाई ।ै परि. या घेरा 
पुरुष की लम्बाई या ऊँचाई १२० आअआं० प- न 
पादांगुष्ठ तथा प्रदेशिनी अंगुली : २ शअआं० न अदा 
मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठिका एप कमसे।.. -- लत 
अपाद (अद्डुलियों के नीचे का पॉच का अग्रभाग) | ४ अ० | ५ अंगुल हट 
पादतल | ४ ओ० ४ आ० हक 
पा४ष्णि ( एडी ) ४. आ० ४ आं० न“ 
पार्ण्णि से अद्डुछ्ठ पर्यन्त पर १४ आ० ना पा 
पादमध्य, गुल्फमध्य, जंघामष्य तथा जानुम॒ष्प | 7: | -- १४ अंगुल 
जंघा क्‍ १८ गण | ध्यड कल 
कटि संधि से जानुसंधि तक अन्तर २३२ अआं० न बन 
कटि संधि से जंघा पयन्त ५० श्रं० कि न 
वृषण, हनु, दन्‍्त, वाह्मनासापुट, कणमूल हे ु 
तथा दोनों नेत्रों के बीच का अन्तर के ः पु 
उच्छायरहित शिश्न, खुला हुआ मुख, 
नासा वंश, कण, छलाटठ, ग्रीवा तथा | ४ झं० हक से 
दोनों दृष्टि मण्डलों के बीच का अन्तर “| 
योनि का विस्तार, शिश्न और नाभि.) 
का अन्तर, नाभि और हृदय का अन्तर | 
हृदय और भओवामूल का अन्तर, | १२ आं० | __ | __ 
दोनों स्तनों का बीच, चिब्ुक से | दर 
ललाट पयन्त लम्बाई... | 
सणिवंध तथा प्रकोष्ठ कक शक १२ आअं० 
उस | नकन्‍-++ अल रे२ अ० 
जंघा क्‍ ब्य् जा १६ आ० 
स्कंध से कूपर संघि तथा कृपर से 9 
मणि चंघ का अन्तर ऐ कक मदन बज 
कूपर से मध्यमांगुलि पर्यन्त . २४ अओं० __ वत 
कक्षा से मध्यमांयुलि तक भुजा २ आं० दि नि 
हस्ततल ५ ६ अझ० को आओ जीप 
अह्ुुष्ठ मूल से तजनो का अमन्तर, क्‍ 
मध्यमांगुलिकी ल्स्बाई, नेत्र के वाद्य. || ४५ आऔं० | __ न 


कोणं से कान तक का अन्तर है 


रोगीपरीक्षा २७ 


अंग-प्रत्यंग ल. या अन्त... चौड़ाई | परि. या घेरा- 
प्रदेशिनी तथा अनामिका ४ आं० -- का 
अक्लुष्ठ तथा कनिष्टिका ३२ आं० कक का 
थ्रीवा परिधि बा ल-- २० आ० 
नासापुट का विस्तार १३ आअ० मी अल 
कृष्णमण्डल नेत्रकाई भाग). ->- मकर 
दृष्टि म कृष्णमण्डल की 
का हे भाग 

केशान्त ( शंख प्रदेश में केशों की अन्तिम ु 

सीमा ) से मध्य सिर है की कर हज गण 
ग्रीवा के पश्चिस केशान्त से मध्यसिर १० पअआं० बज टी क 
पीछे से दोनों कानों के बीच का अन्तर १४ आं० बल मल 
पुरुषों का चक्ष तथा स्रियो की श्रोणि न २४ अआ० डरने 
लियों का वक्ष तथा पुरुषों कीश्रेणि_| -- ८० | 7 








आयु भार ऊँचाई वक्त शिर 
जन्म के समय | ६-७ पौ० २० इच्च॒ | १३-१४ इच्च १४ इच्च 
२ सप्ताह ८ पौं० २१" १४ १ 
४ सप्ताह ९्‌ पौ० २३ १५ ५ प्‌ 
२ मास ११-१२ पौ० २४ गे १४ 
६ मास १५-१७ पौ० २७” १६-१७" १६-१७ 
१ वर्ष. | २०-२२ पौ० २९ १८ हू 
पे २६-२७ पौ० | रे२३' हब १८ 
रे ३०-३२ पौ० ३५. २० १९ 
४ ३४-३५ पौ० ३८ २०-२१ १९-२० 
प्‌ ४० पौ० | ४१-४२ २१-२२ १९-२० 
्उ ४४-४५ पौ० ४४ २३-२४ २० 
६ ४८-५० पौ० ४६" २३-२४ २०-२१ 
८ ५४-५५ पौ० ड८ २४-२५ 22 
रु ६ ० पौ० पूछ हे 99 
१० ६६-६८ पौ५ ५२ २६" २२ 
3२ ७०-७२ पौ० प्हब्पप २७ ' हा 
१६ ७८--८५८ & ७-०६ २ ३९-३6 [ 


२८ कायचिकित्स। 


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२९ 


रो गीपरीक्षा 


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३० कायचिकित्सा 








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रोगीपरीज्षा क्‍ ३१ 


प्रमाण ज्ञान की उपयोगिता रोग निणय की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होती है । किसी 
पाँश्वे या अवयव के शोथयुक्त या क्षीह हो जाने पर, संधि विच्युति या अस्थि भप्त आदि 
के कारण अचन्नों की लम्बाई-चौडाई-परिणाह आदि में जो अन्तर मिलता है, उसी के 
आधार पर मुख्यतया रोग निणय किया जाता है। इस विषय का विशेष वर्णन सुश्रुत 
सूत्रर्थान २५ वें अध्याय तथा चरक विमान स्थान के आठवें अध्याय में आया है । 


यह औसत प्रमाण है, थोड़ा बहुत इसमें परिचर्तन होने पर स्वास्थ्य में कोई अन्तर 
नहीं माना जाता है। यदि शरौर अधिक लम्बा हो, भार कम हो, नाटा हो और स्थूल 
हो, बहुत लम्बा और बहुत स्थूल हो तो इस प्रकार के पुरुष रोगप्रतिकारक शक्ति की 
दृष्टि से हीन बल वाले माने जाते हैं और सम परिमाण युक्त शरीर वाले व्यक्ति आयुष्मान 
और बलवान होते हें । 

५. देह परीक्षा--स्थूल-मध्य तथा क़ृश, इन भेदों से देह ३ ग्रकार का माना 
जाता है। स्थूल तथा क्ृश दोनों प्रकार के शरीर स्वास्थ्य की दृष्टि से निन्दित हैं, परन्तु 
स्थुल की तुलना में कृश शरीर कुछ अच्छा माना जाता हे। मध्यम शरीर वाला व्यक्ति 
श्रेष्ठ माना जाता है? । 

स्थूल देह---अधिक भोजन, गुरु-मधुर-स्निग्धशशीत एवं कफ कारक पदार्थों का 
' अधिक सेवन, अध्यशन, अव्यायाम, दिवा शयन, सुख एवं हष का आधिक्य तथा चिन्ता 
का अभाव और मेदसर्ची एवं स्थूल माता-पिता से जात पुरुष आ्रायः स्थूल होते हैं । मेद 
और मांस की अतिबृद्धि होने के कारण स्थूल व्यक्तियों के नितम्ब, उर--चविशेषकर 
स्तन अदेश-तथा उदर चलने-फिरने में हिलते रहते हैं ( 'भेदोमांसातिबद्धत्वाचलस्फि 
गुद्रस्तनः च० सू० ० २१ )। शरीर के समप्रमाण एवं सुसंगठित न होने के कारण 
बलवत्ता नहीं होती । इस अकार के व्यक्तियों में आलस्य, मन्दगति, मथुन में अशक्ति, 
दुबलता, थोड़े से श्रम से ही श्वासक्ृच्छ एवं अत्यधिक थकान, निद्राधिक्य, दुगन्धयुक्त 
स्वेद की अधिकता, क्षुघा तथा पिपासा का आधिक्य, अकाल में ही वाधक्य का आगमन 
तथा आयुष्य का हास आदि कष्ट यावव्बीवन रहते हैं। अमेह, मधुमेह, फोड़ा-फुंसियाँ: 
भगन्द्र, चिंद्रधि, ज्वर तथा वातवबिकारों की संभावना स्थूलदेंही पुरुषों को अधिक रहती 
है । स्थूल मनुष्यों को जो भी विकार होते हैं, दूसरों की तुलना में अधिक गंभीर होते हें । 


मध्य देह :---ज्ञो व्यक्ति उमय साधारण ( स्थौल्स-काश्यकर आहार-पिहारों के बीच 
का ) आहार-विहार का सेवन करता हे, उसके घातुओं की समृद्धि होती हे । इस प्रकार 
का व्यक्ति मध्य शरीर वाला, सम मांस अमाण युक्त, सुसंगठित, दृढ़ इन्द्रियों वाला, सभी 
कार्यो के करने में समथ, समाभियुक्त, क्षुघा-पिपासा-शीत-उष्ण-वर्षा-धूप एवं व्यायाम 
की सहन करने वाला तथा बलवान होता हे । ऐसे व्यक्ति सहसा रोगग्रस्त नहीं होते । 
९ देह: स्थूल:, कृशो, मध्य इति प्रागुपदिष्टः ( सु० सू० अ० ३५) 


अत्यंत गद्दितावेतो सदा स्थूल-कशौ नरौ ।... 
श्रेष्नो मध्यकारीरस्त. कठा* स्थल्वान्‍्त पज़ित* ।! ( स० स० ० १५ ) 


३२ द कायचिकित्सा 


कृश देह :--रुक्ष अन्न, अल्प आहार, लद्वन-वमन-विरेचन-कर्षण का अतियोग, 
अधिक स्नान, मल-मूत्र के वेगों का अवरोध, जोण रोगों से आक्रान्त, व्यायाम-मेथुने- 
अध्ययन-भय-विन्ता-शोक-जागरण आदि वातकर आहार-विहार का अधिक सेवन तथा 
क्ृश माता-पिता से जात व्यक्ति आयः क्ृश शरीर वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति क्षुधा- 
पिपासा-शीत-उष्ण-चायु-वर्षा-व्यायाम-मेधुन कर्म-अधिक भोजन तथा बलवान औषघ आदि 
को सह नहीं सकते और अल्पबल होते हैं । क्ृश देह वाले व्यक्तियों को वात व्याधि, 
शधास, कास, राजयच्मा, प्लीहा वृद्धि, उदर रोग, अप्रिमान्य, गुल्म, रक्तपित्त, अश 
ओर ग्रहणी रोग होने की अधिक संभावना होती हे । 


कृश व्यक्ति के नितम्ब-उदर तथा ग्रीचा शुष्क एवं क्षीण, संधियाँ स्थूल, शरीर 
में नीले वण को सिराओं की स्पष्टता और शरीर अस्थि-वर्मावशेष सा ज्ञात 
होता है । 

९. सात्म्य परीक्ता--शरौर के लिए अनुकूल आहार-विहार-ओऔषघ साधारणतः 
सात्म्य कहे जाते हैं। जिन लोगों को सभी रस, आहार-विहारादिक सात्म्य होते 
है वे बलवान , चिरंजीवी और क्लेश सहिष्णु होते हैं। जो छोग केवल एक ही प्रकार 
का आहार, केचल एक ही प्रकार का रस सहन कर सकते हैं वे अल्प बठ और अल्पा- 
युष होते हें। आहार-विहार में पर्याप्त समय तक बहुत परहेज करने से शरौर की 
सहनशक्ति क्षीण हो जाती है । यदि कोई विशेष व्याधि न हो तो सभी प्रकार के आहार- 
द्रव्यों का उपयोग करना चाहिये । 

सात्म्यता का ज्ञान निम्न क्रम से करना चाहिये:--- 

अभ्यास सात्म्य--जो आहार-विहार-देश-काल-रोग-ऋतुजन्य दोषावस्था, और व्यायाम 
आदि जब शरौर के लिए, सतत अभ्यास के कारण, अनुकूल या प्रतिकूल अथवा ग्रक्ृतिविरुद्ध 
होने पर भी, बाधा कर नहीं रह जाते तब उसे सात्म्य कहते हैं । सात्म्य के ३ वर्ग 
किये जा सकते हैं:-- 

( क ) निरन्तर अभ्यास के द्वारा सात्म्य--अतिकूल या हानिकर द्रव्य भी सतत 


अभ्यास के कारण सात्म्य हो जाते हैं, यथा--दिवाशयन, व्यायाम, रात्रिजागरण, 
गुरुभीजन आदि । 


( ख ) अवस्था सात्म्य--देश एवं कार की अवस्था के अनुरूप सात्म्यता में परि- 
वत्तन होते रहते हैं । शिशिर एवं हेमन्त में तथा जाइल एवं साधारण देश सें गुरु-मधुर- 
उष्ण-स्निग्ध द्रव्य सात्म्य होते हैं, वही ग्रीष्म या वर्षा में असात्म्य हो जाते हैं । इसी 
अकार वहुत से द्रव्य चाल्यावस्था में असात्म्य होते हैं किन्तु युवावस्था में सात्म्य हो 
जाते हैं। सात्म्यासात्म्य निणय करते समय इन सभी पर ध्यान देना चाहिये। अहिफेन 
के योग शिशुओं के लिए विषाक्त होते हैं, किन्तु रसपुष्प की पूर्ण मात्रा से भी 
उन्हें कोई हानि नहीं होती, अतः ओषधियोजना करते समय अवस्थासात्म्य का विचार 


रोगीपरीज्षा झ३ 


( ग ) व्यायाम सात्म्य--व्यायाम करने से विरुद्धाह्वर-विहार भी सात्क हो जाता 
है। नित्य व्यायाम करने वाले व्यक्ति को देश-काल ज॑ंन्य व्याधियों से पीडा नहीं होती । 

घृत-क्षीर-तल-मांसरस और कदध-तिक्त-कषाय-मघुराम्ल-लवण आदि सभी रसों 
का उपयोग करने वाले स्रससात्म्य और रुक्ष पदाव तथा एक ही रस का सेवन 
करने वाले व्यक्ति एकरससात्म्य तथा शेष व्याम्रिश्न॒ सात्म्य होते हें। स्रससात्म्य 
बलवान्‌ एकरससात्म्य हीन बल और व्याम्रिश्र॒ सात्म्य मष्यबल्ल होते हैं। स्वरस 
सात्म्य व्यक्तियों की ग्रतिकारक शक्ति ढ़, आयु दीघ और उत्साह-बलश्रेष्ठ होता है तथा 
अनूजता का नाश होकर ओंजबद्धि होती है । 





७. सक््यपरीक्षा--सत्त्वपरीक्षा से तात्यय मानसिक सहिष्णुता या मनोबल से है। बहुत 
से व्यक्ति थोडे कष्ट और अल्प रोग में ही बहुत घबड़ां कर गम्भीर व्याधि द्वारा पीड़ित 
हुये से दिखाई पड़ते हैं । दूसरी तरफ गम्भीर व्याधियों से आक्रान्त होने पर भी दृढ़ 
सहन शक्ति के कारण रोगी बाहर से वहुत साधारण व्याधि द्वारा ग्रसित मालूम पड़ते हें । 
रोगियों के बाहरी लक्षण, उनकी घबड़ाहट और बेचनी के आधार पर ही यदि गम्भीर 
व्याधि का निंणय कर दिया जाय और ओषधि का अधिक उपयोग हो जाय तो कदाचित्‌ 
हानि भी हो सकती है। उसी प्रकार सहनशील रोगी में बाहरी छक्षणों के अल्प व्यक्त 
होने के कारण गम्भीर व्याधि भी उपेक्षित न हो जाय, इसलिये सत्व परीक्षा के द्वारा 
स्वाभाविक अवस्था में रोगी की स्थिति का ज्ञान कुटम्बियों से पुछ कर करना चाहिये । 
व्यावहारिक दृष्टि से सत्त्व की प्बलता के आधार पर तीन भेद किये जाते हैं १. प्रवर 
सस्व-सत्वगुण की विशेषता के कारण महान्‌ व्याधियों में भी शान्त स्थिर से दिखाई 
पड़ते हैं । २. मध्यसत्व--मनोबल की मध्यस्थिति के कारण व्याधियों के अनुरूप लक्षण 
पंदा होते हैं । आश्वस्त करने पर सम्तुष्ट होकर मानंसिक दुबता का नियमन कर सकते 
हैं । २. हीनसत्व वाले व्यक्ति अल्प व्याधि से ग्रसित होने पर भी बहुत घबड़ाते हैं. और 
दूसरों के समाश्वासन का उनके ऊपर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता । 


८. आहार शक्ति की परीक्षा-आहार शक्ति की जानकारी के लिये भोजन 
और पाचन के बारे में ए्थक एथक्‌ प्रश्न पूछने चाहिये । भोजन की मात्रा-गरुरुता-लघुता- 
के आधार पर अधिक-मध्य-अल्प वर्गों में आहरण शक्ति को विभाजित किया जा सकता 
है । उसी अकार गुरु पदार्थ तथा अधिक मात्रा वाले भोजन को सुपचित करने के आधार 
पर उत्तम-सध्यम और अल्प पाचनशक्ति कही जायगी | उत्तम आहरण शक्ति, उत्तम पाचन- 
शक्ति तथा प्रवर व्यायाम शक्ति का आलुपातिक सम्बन्ध होता है । यदि उत्तम आहार 
के सेवन तथा उसके परिपाक के बाद भी शारीरिक शक्ति की बृद्धि नहीं होती तो विकार 
ही समझना चाहिए। आहार एवं पाचन की सासध्य देश-काल-अवस्था-श्रम एवं 
अभ्यास आदि पर निभर करती है । शारीरिक तथा मानसिक्र श्रम करने वाले व्यक्तियों 


के आहार की मात्रा तथा उसकी गुरुता-लघुता आदि समान नहीं हो सकती ! भस्मक 


8३४ कायचिकित्सा 


होती तेथा मेंल भी सूखा हुआ निःसत्व होता है। मधुमेह, संग्रहणी में रोगी की आहार 
की रुचि एवं मात्रा बहुत बढ़ जाती है, किन्तु बल वृद्धि नहीं होती । थम में मूत्र द्वारा 
ओजक्षय होते रहने से तथा द्वितीय में रस का अचूषण न होने से ऐसा होता है। अतः 
अभ्यवहरण शक्ति एवं जारण शक्ति का प्रथक्‌ २ ज्ञान करके ऊपर निर्दिष्ट क्रम से मूल्यांकन 
करना चाहिए । क्‍ 


९. व्यायाम शक्ति--कार्य करने की सामथ्ये के आधार पर व्यायाम शक्ति का 
ज्ञान किया जाता है! वास्तव में व्यायाम-शक्ति का निर्णय करते समय अवस्था-आहार 
शक्तिः'शरीर का संगठन, इन सब पर भी ध्यान रखना चाहिये । शरीर से पृष्, प्रौढ आयु 
वाला, उत्तम भोजन-पाचनशक्ति का व्यक्ति यदि अपने शरीर के अजुरूप पूरा परिश्रम 
न कर सके तो हीन व्यायाम शक्ति वाछा माना जायगा। उसी प्रकार अपने शरीर की 
तुलना में अधिक श्रम करने वाला क्षीण व्यक्ति उत्तम व्यायाम शक्तिका माना जायगा। अवर 
मध्य और हीन भेद से व्यायाम शक्ति के तीन वर्ग बनाये जा सकते हैं । 


निम्न कारणों से शरीर के बल की वृद्धि होती है :-- 


बलवान देश में जन्म लेने से--यथा पश्चिमोत्तर ग्रान्त, अफगानिस्तान के 
निवासी प्रकृत्या बलवान होते हैं--बलवान माता-पिता से जन्म होने पर, उचित पोषक 
तत्त्वों से युक्त आहार का सेंचन करने से, बलवान पुरुषों के अनुरूप शरौर का संगठन 
होने से, युवावस्था, उचित व्यायाम का विधिवत प्रयोग और मनोबल के द्वारा शरीर बल की 
वृद्धि होती है। अभ्यास के द्वारा शक्ति वृद्धि होना स्वंविदित है। शक्ति होने पर भी 
अभ्यास न होने के कारण व्यक्ति व्यवहार में दुब सा दौखता है। अतः व्यायाम शक्ति 
का निणय रोगी के पूर्व जीवन की शक्ति से तुलना द्वारा करना चाहिए । पहले रोगी को 
जिस कार्य में-सीढ़ी चढ़ना, दौड़ना, चलना, खेलना आदि-श्रम का अनुभव नहीं होता था, 
उसमें थकावट या श्वासकृच्छू आदि होने पर होन व्यायाम शक्ति कह सकते हैं । 
इसका परिज्ञान रोग निदान तथा चिकित्सा में लूंघन-ब्रंहण आदि के उद्देश्य से 
आवश्यक होता है । 


)०. धय परीक्षा--अवस्था के अनुसार शरीर बल तथा दोषों की प्रधानता, 
व्याधियों कौ सम्भवनीयता और धातुओं की वृद्धि या अपकर्ष, सभी में परिवर्तन होता 
है। वय परीक्षा में रोगी को शारीरिक अवस्था के साथ उसकी आयु का समीकरण 
करना याहिये। यदि तीस वर्ष की आयु की दृष्टि से युवा कहा जाने वाला 
पुरुष खालित्य-पालित्य-दाँतों की दुबंलता-ऊुर्रियोंदारचमड़ा-कान्तिहीन मुख और 
निस्तेज वाणी तथा भुकी हुई कमर का हो तो दोषों की दृष्टि से उसे ब्रद्ध समझ कर 
ही व्यवस्था करनी चाहिये । उसी श्रकार चौदह वर्ष की आयु में अस्थियों की हृढ़ता, 
मांस-मेद आदि का उपचय, शरीर के श्मश्लु और लोम से आच्छादित होने पर 
उस किशोर को भी पू्ण यूवा समझ कर हो निदान करना चाहिये। इस अकार वय 


रोशीपरीक्षा ८ कह 


पर आलुमानिक आयु का ज्ञान करने के बाद दोनों का संतुलन करके निणय करना चाहिए । 
कुछ व्याधियाँ चाल्याचस्था में, कुछ युंचावस्था में तथा कुछ ब्ृद्धावस्था में मुख्यतया होती हें । 
इसी गकार वाल्यावस्था में कफ की, युवाचस्था में पित्त कौ और जीर्णावस्था में वायु की 
वृद्धि होती है। अचस्थानुरूप दोष एवं व्याधियों का अरथम परिज्ञान करने के बाद इतर 
व्याधियों के सम्बन्ध का ज्ञान करना चाहिए। ओपषधियोजना, मात्रा निधोरण तथा पशथ्या- 
यथ्य व्येवस्था में वय परीक्षा का महत्व होता है । 


वय के अनुसार ३ वर्ग किए जाते हैं :--- 

चाल्यावस्था--सामान्यतया १६ चर्ष तक वाल्यावस्था मानी जाती है । इसमें धातु 
अंग-प्रत्यंग अपरिपक्क होते हैं, मानसिक विकास पूर्ण नहीं होता । इनमें १ वर्ष तक क्षीर 
पायी, ३ वर्ष की अवस्था तक क्षीराज्नाद तथा उसके बाद १२ वर्ष तक अन्नाद होते हें । 
१२ से १६ तक की अवस्था वयःसंधि या किशोरावस्था मानी जाती है । 


मध्यम वय--इसमें धातुओं की पुणता और बल की ब्ृद्धि होती है । २० वर्ष तक 
वर्द्ममानावस्था, ३० तक यौवनावस्था, ४०-तक ग्रौढ या स्थिरता की अवस्था तथा बाद में 
६० तक कुछ हास का आरभ हो जाता हैं । 


जीर्णावस्था--शनेःशनेः धातुएं क्षीण होने लगती हैं और अंग-अत्यंगः ढीले 
पडने लगते हैं । ६० से १०० वर्ष तक इसकी मर्यादा है । 


विकृति परीक्षा! 


रोग का इतिहास--प्श्न के द्वारा रोगी से रोग का अद्यावधि इतिहास, अकृति- 
पविक्रति भाव आदि की जानकारी करनी चाहिये । विक्ृति के लक्षणों का वणन उत्पत्ति के 
अनुक्रम से लिखना चाहिये । रोग के आरम्भ का समय, आलनुषगी लक्षण यथाः--ज्वर म॑ 
शीत-वेदना-तृष्णा-हल्लास एवं वमन पूव॑कता, कास में ज्वर-छीवन-पाशखशलरू-श्वास 
आदि का अनुबंध, प्रातः-सायं-मध्याह् में व्याधि के बलाबल की स्थिति, शीतोष्ण का उपशय 
इत्यादि सभी विशेषताओं की जानकारी विवेकपूचक करनी चाहिये । सभी व्याधियों में 
तृष्णा-क्षुधा, निद्रा, अरुचि, आध्मान, शूछ, मधुर-कद्ध-तित्तास्यता, विवन्ध, अवाहिका 
इत्यादि लक्षण, चिकित्सा अयुक्त ओषधियाँ, व्याधि प्रशम और पुनरावतेन में कारणभूत 
आहार-विहार का ज्ञान करना चाहिये। अम्त में परिप्रश्न के द्वारा विकृृतिसम्वन्धी 
जितना ज्ञान उपलब्ध हुआ हो उसका सूत्ररूप में संग्रह करना चाहिये । 


सामान्‍य प्रत्यक्ष परीक्षा--सभी व्याधियों में शरीर का आपाद मस्तक परीक्षण 
करना चाहिये | केवल नाडी देख कर या प्रश्न पूछ कर रोग का पूरा ज्ञान नहीं किया 
जा सकता । बहुत अनुभव होने के वाद चिकित्सक में संश्लिष्ट ज्ञान का जो अकाश होता 
है उससे वह रोगी की अल्प परीक्षा करके ही व्याधि का निदान कर सकता है। फिर भी 


३६ कायचिकित्सा 


नीचे लिखे हुए अंगों की परीक्षा सामान्यतया सभी व्याधियों में उपयोगी होती हैः--- 


दारीर--स्थूल, मध्य, कृश, समसुविभक्तगात्रतां, दक्षिण एवं वामांग का प्रथक्‌ 
परीक्षण एवं तुलना । 

त्वचा--दाह, कण्ड , विस्फोट, शोफ, उत्सेघ, ताप, अस्वेद, रुक्षता, स्निग्धता 
शिराभिनद्धता, ता का वण-नील-श्याम-ताम्र-हरित-पाण्डर-गौर या शुक्ल, लोभों की स्थिति, 
'शुल्यता, हषे, शीतोष्ण-स्पशेज्ञान, शिरा-धमनी स्पन्दन, पीडनाक्षमता, त्रंण, विदार, ग्रंथियाँ 
अधःसत्वचीय रकतस्लाव, किलास, सिध्म, कुष्ठ । 


मांस पेशियाॉँ--ओऑंकुब्नन, प्रसारण आक्षेपक, अन्तरायाम, वाह्यायाम, शिथिलुता, 
स्तब्धता, पुथ्ता, क्षीणता, रज्जुवत स्थिति । 


सन्ध्यस्थि-शिरा-स्नायु--प्रत्येक के बारे में रचना-पुथ्ता-क्षीणता “और स्वाभाविक 
क्रियाक्षमता की जानकारी करना चाहिये । 

नखं-दचन्‍्त--वर्ण-आकृति आदि की स्वाभाविक या चेकृतिक स्थिति । द 

आझासन--कफज विकारों में शान्त, निश्वेष्ट, अल्पभाषी, निद्रालु: पेत्तिक में अरति, तृष्णा, 
एवं दाह के कारण अस्थिर, बेचन एवं निद्रा नाश से पीड़ित; वातिक में अस्थिर-चित्तता, 
अनिद्रता, आसन परिवतन की बार-बार रुचि, रोगी की अनियमित, असम्बद्ध गति होती है। 

ओदरिक व्याधियों में पेर मोड़कर उत्तान शयन की अदृत्ति, यक्कत्‌ विद्रधि में विपरीत 
पाश्च-शयन, फुफ्फुसावरण शोथ की प्रारम्भिक स्थिति में रुग्ण पाश्चशयन, उरस्तोय होने पर 
विकृत पाश्वशयन, श्वास-उद्र रोग-हृद्रोग में उत्कटुकासन, अभिन्‍्यास में शिरोविलोठन- 
शिरोग्रीवा. का स्तम्भ या पश्चात्‌ आयाम, धनुर्वात में घनुत वाह्मायाम, पक्षवध में 
आक़ान्त पाश्व शयन इत्यादि आंसन को विशेषताएँ होती हैं । ज्वरा क्रमण से क्षीण होने 
पर रोगी तकिया से नीचे फिसला सा बिल्कुल शिथिल तथा निश्चेष्ट सा पड़ा रहता है । 

गति--पक्षवध में चलते समय रोगी को विकृत पेर का अंगूठा भूमि में रगड़ृता हुआ 
तथा विक्ृत हाथ लटका हुआ होता हे। जीण पक्षवध में विकृत हाथ गति के साथ असम्बद्ध; 
सन्धिवात, अस्थिभम्त, अस्थिशूल इत्यादि में विक्ृत पाश्व की ओर रुककर चलने की भवृत्ति 
और पादशज्यंता तथा लिड्ननाश में पर को ऊँचे उठाकर चलने की प्वृत्ति होती है । 


नाठी परीक्षा 


नाडी परीक्षा की उपयोगिताः--यद्यपि प्राचौन चिकित्सा ग्रन्थों में नाडीविज्ञान- 
विषयक विस्तृत चवणन नहीं मिलता; जिसके आधार पर मध्यवर्त्ती नाडीविज्ञान सम्बन्धी उपलब्ध 
साहित्य के साथ परम्परा का पालन हो सके, किन्तु कुछ स्वतन्त्र अ्न्थों में--रावंणक्त 
नाडीपरीक्षा” तथा कणादकुत नाडीविज्ञान' एवं कुछ संहिता ग्रन्थों में--भाव प्रकाश, 
शाब्नधरसंहिता, योगरज्ञाकर आदि में, नाडीविषयक वर्णन पर्याप्त विस्तार से किया गया है, 

_ जिससे इसकी महत्ता स्पष्ट है। प्राचीन संहिताओं में भी धमनी स्पन्दन को जीवन का साक्षी 


रोगीपरीक्षा न 


है| 

जाता है? । महायान सम्प्रदाय एवं सिद्ध सम्प्रदाय का चिकित्सा में बहुत प्रमाव पड़ दे 
संभवतः रसोषधियों का चिकित्सा में अधिक प्रयोग एवं नाडीपरीक्षण क! 

में विशेष महत्व इन्हीं मध्ययुगीन समृद्धियों का अभाव हो ! 





नाडी-विज्ञानविषयक अनेक किम्बदन्तियों प्रचलित हैं । संभव है, उनमें अतिशयोक्ति 
ही किन्तु ग्राज भी अनुभवी वृद्ध वद्यो के द्वारा नाडीपरीक्षण से, रोग एव दटौध चनिशधय 
प्रभावोत्पादक परिणाम देखने में आते हैं । अतः इसका विशेष अध्ययन एवं इृढ लग 
युक्त कर्माभ्यास अपेक्षित है । 











नाडीपरीक्षण में प्रत्यक्त कर्मास्यास का महत्व ४ चाप! एवं वाणी के 
की पूण अभिव्यक्ति नहीं हो सकती । एक शब्द, ध्यनिर्भेद से अने 
करता है। किन्तु उन सभी भाषों को आखश्वर्यसूचक, अश्वसूचक या 

















सकता है, किन्तु अपनी अनुभूति को सही रूप में दूसरे तक नहीं पहुंचा सकता ! इस 
ग्रकार सृष्टि में वणं-विविधता के जो उदाहरण उपलब्ध हैं, उनका स्पष्ट परिचयात्म 
वर्णन दर्शक नहीं कैर सकता । अशोकपत्र का हरापन, शुक पक्ष का हरापन, हइाड। 
हुए घाम के खेत का हरापन तथा कमल-पत्र का हरापन--स भी का वण हरा होते हुए भी 
केवल हरा नहीं है । निर्णायक यही कह सकता है कि असक अधिक गहरा हे 
चमकोला हरा है ओर तीसरा हल्का हरा हैं। क्या इस चणन से, चिना वस्तस्थिति का अत्यक 
ज्ञान किए, कोई अध्येता वस्तु स्थिति का परिचय आप्त कर सकत: है? यह ते 
स्थूल उदाहरण हैं, तितलियों का चरण, प्रात+साय ड्िमसयों के अतिफलन 
पहाडियों का रंग और निरन्तर परिवर्तित की रहे श्षिति 
सममा सकता है? अन्त में छाचार होकर आचाय को भाव व्यक्त कर 

घानी, प्याजी, करंजई, वंगनी आदि शब्दा को प्रकृति से उधार लेकर वण क शभिव्य क्ति 
करनी पडती है। किन्तु इन शब्दा का आशय हार करने के पहले प्रकृशते 
धान-प्याज-करंज आदि के वण को समझना होता हे, तभी तुलन 


ज्ञान ग्राप्त किया जा सकता हैं ! 


यही स्थिति गति के बारे में है। त्वरित, शांप्र, तंज मे 3 इत्यादि गा 
विशेषताएँ सापेक्ष होती हैं । इनमें कहने में तो चहुत अन्तर बात है 
अनुभव करने पर निर्णय करना कठिन हो जाता है कि यह मन्द हे या गुरे। 
गति को समझाने के लिए प्रकृति से गति के उदाहरण सतु ह के लिए दिए जाते 
असुक नाडी को गति सपें के समान, हंस, मयूर एवं वत्तस के समान, केचुआ' 
मेंढक के समान उछलती हुई या कपोंत के समान याद हक है। किन्तु इस वशन 























40 

रा हा 
पा ह 
4| ८ सडक | ८ 





२. ध्तस्य चेन्मन्ये परिसश्यमाने न स्पन्देयाताम्‌ + पराश्ुरिति 7८77 क्षय गत्कतकिव एल एक 7४ (च. इ- भू, ई , 


३८ कायचिकित्सा 


ज्ञान तब तक नहीं हो सकता जब तक सर्प की गति का अनुभव हाथ से न हुआ हो, 
केचुए का रेंगना न देखा हो और मयूर-तित्तिर-कबूतर को मस्ती से चलते हुए--छातो 
निकाल कर और हिलड़ुल कर--तथा मेंढक को उछलते हुए न देखा हो। प्राचीनों के 
वर्णन से पू्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए अक्ृति के साथ समरसता तथा पग्रक्ृतिपय्यवेक्षण की 
अपेक्षा है, केवल ग्रन्थाध्ययन एवं संभाषण से कणतृप्तिद्वारा विषयोपछब्धि नहीं हो सकती। 
रल्लो की पस्ख विना उनकी ग्त्यक्ष परीक्षा के नहीं आती, उसकी आब तथा खोट 
का ज्ञान पुस्तक से नहीं होता, उसी अकार नाडीपरीक्षण भी प्रत्यक्ष कर्माभ्यास से ही 
साथंक होता है। जिस व्यक्ति ने जितने अधिक स्वस्थ व्यक्तियों की परीक्षा को होगी, उतने 
ही कौशल से वह रोगी के नाडीज्ञान का उपयोग निदान में कर सकता है। क्योंकि नाडी के 
प्राकृतिक स्पन्द एवं गति की कोई निश्चित मर्यादा नहीं होती । नाडी की जो गति 
एक व्यक्ति में स्वस्थावस्था को परिचायिका होती है, चही दूसरे व्यक्ति में रोगनिंदशंक 
हो जाती है । यही सिद्धान्त हृदयघ्वनि, श्वसनध्वनि एवं स्पशपरीक्षा के साथ भी लागू 
होता है । इसलिए इन सब का परिज्ञान करने के लिए अधिक से अधिक स्वस्थ व्यक्तियों 
का परीक्षण करने के उपरान्त ही रोगीपरिक्षण में अवृत्त होना चाहिए 


नाडी परीक्षा विधिः--नाडीपरीक्षण करते समय चिकित्सक तथा रोगी दोनों को 
पू्ण निश्विन्त, शान्त तथा सुखासन पर बठना आवश्यक है। खड़े-खड़े मार्म में या 
_अन्यमनस्क स्थिति में नाडीपरीक्षण से कोई लाभ नहीं होता । चिकित्सक को अपने वाएं 
हाथ से रोगी का दाहिना हाथ पकड़ कर, कूपर संधि के पास हाथ को आधा मोडकर, 
कूपर मध्यमा धमनी को थोडा दबा कर, रोगी का हाथ अपने वाएं हाथ के सहारे 
अन्तर्जानु स्थिति में रख कर दाहिने हाथ से अंगरुष्ठमूछ के एक अंगुल नीचे, 
मणिबन्ध संधि के पास, मणिबन्ध को उत्तान कर परीक्षा करनी चाहिए। चिकित्सक की तीन 
अंगुलियाँ, तजनी, मध्यमा तथा अनामिका क्रम से अंगरुष्ठमूल से मणिबन्ध तक रहती हैं । 
तीनों अंगुलियोँ आपस में बहुत चिपकी हुईं न हों और बहुत प्थक भी न हों । अँगुलियों 
से पहले सामान्यत्तया नाडी की गति का अनुभव कर, थोड़ा आगे पोछे स्पश कर, थीक 
नाडी के ऊपर रखना चाहिए । कभी-कभी अहृत्या नाडी का स्थान कुछ बाहर या भीतर 
की तरफ हट कर होता है| अतः परीक्षण प्रारम्भ करने के पूव साधारण स्पश से स्थान 
निणय कर लेना चाहिए | पुरुषों के दक्षिण हस्त तथा स्लियों के वाम हस्त के परीक्षण को 


मुख्य मानने का विधान है। किन्तु दोनों हाथों की नाडी की परीक्षा करके तब निर्णय 
ररने से त्रुटियों की संभावना कम हो जाती है । 


अत्येक अंगुलि से अपने-अपने स्थलों पर झदु स्पश, गंम्भीर स्पशे तथा वेणुवादनचत 
आुली को उठा-उठा कर परीक्षण करना चाहिएं। अनामिका से बलपूवंक दवा कर तजनो 
पे स्पन्दनानुभव, इसी प्रकार मध्यमा से अनुभव एवं मच्यमा से दबाकर तजनी तथा अना- 
मिंका से अनुभव करना चाहिए। प्रत्येक अंगुलि से नाडी के रुपन्द का रूप मदु-कठिन, लघु- 
“रु, नियमित-त्रुटित, त्वरित-मंद आदि तथा गति, पूणता या रिक्तता और तीज्ता 


रोगीपरीछा! ३५९ 


आदि विशेषताओं का अनुभव करना चाहिए । एक बार छोड़ कर पुनः पूचे परीक्षण को 
पुष्टि करनी चाहिए । 


समयः--प्रात>सार्य मल-मूत्र त्याग के बाद, थोड़ा विश्राम॑ करने के उपरान्त, 
नाड़ी देशकाल के प्रभाव से मुक्त और स्वाभाविक रहती है। उसी समय का परीक्षण 
उत्तम माना जाता है । 


नाडी में स्वाभाविक परिवत्तन/--- 

१. स्वभावतः प्रातःकाल नाडी स्निग्ब, मध्याह में उष्ण तथा सायकाल वेगवती होती 
है । मध्याह में तीव्रता की अधिकता, वेग की न्‍्यूनता तथा अपराह् में आहार का पाचन 
होने पर वेग की वृद्धि तथा शत्रि में पुनः व्रेग में कमी हो जाती है । 

२. सुखी एवं निश्चिन्त व्यक्ति में तथा चिश्राम के बाद नाडी स्थिर तथा सबल, दीपामि 
पुरुष को नाडी म्रदु तथा तेजयुक्त, छ्ुघातुर की नाडी चंचर एवं भोजन के बाद स्थिर 
हो जाती है । ड़ 

३. दुबल व्यक्तियों में देश-काल-आहार-विहार के-अनुरूप नाडी में परिवत्तेन 
अधिक हो जाता है। जो उनकी असहनशीलता का द्रोतन करता है । 

४. सोते समय या सोने के तुरन्त बाद, तृषा-छुधा से आकान्त होने पर, भोजन 
के तुरन्त बाद, शारीरिक या मानसिक श्रम, व्यायाम, तंलाभ्यंग, स्नान, धूप तथा ताप 
के निकट रहने के बाद, ग्राम्य धर्म के बाद, मादक द्वव्यों का सेवन करने के बाद तथा 
मानसिक क्षोभ, भय, शोक एवं मूर्छा के बाद नाडी का क्रम परिवत्तित हो जाता है। अतः 
परीक्षण करते समय इन बातों पर ध्यान रखना चाहिए । 

५. बालक की नाडी त्वरित-स्निग्व तथा झदु, युवा की तीज-तेजयुक्त तथा पूर्ण एच 
वृद्ध की नाडी मन्द-स्थिर-रूक्ष-त्रुटित-शीत तथा गुरु होती है। श्वास-प्रश्वास के साथ 
स्वाभाविक रूप में कभी-कभी बच्चों की नाडी का वेग घटता या बढ़ता रहता है । 

६. गर्मिणी स्री की नाडी गुरु, मन्‍्द तथा ऊध्वमुखी होती है । 

नाडी के द्वारा दोषों का ज्ञान :--- 

१. वायु का मुख्य प्रभाव गति पर, पित्त का नाडीस्पन्द को तीव्रता पर तथा कफ 
का नाडी की पूणता एवं गुरुता पर पड़ता है। अतः गति की तीव्रता, चपलता, चक्रता से 
वायु की वृद्धि; स्पन्द की तीव्रता, ऊष्मा तथा वेग से पित्तवृद्धि तथा नाडी की पूर्णता, 
मन्दता, गुरुता से कफ की इृद्धि का अनुमान किया जाता है । 

२. त्जनी के नीचे नाडी का जो रुपन्दन होता है, वह चातनिदशकः मध्यम से 
अनुभूत होने वाला पित्त एवं अनामिका के नीचे का स्पन्दन कफनिदर्शक होता है। चात 
प्रधान स्पन्द थोड़े दबाव से लुप्त हो जाता है, पित्त अधान बहुत दबाव से और श्लेष्म- 
प्रधान लुप्त होने पर भी हाथ के नीचे कुछ सरकता सा श्रतीत होता है। यदि तीनों 
अंगलियों से समान दबाव नाडी पर दिया जाय तो तजनी से दबाव की तीव्रता स्वभावत 





सबसे कम तथा मध्यमा के द्वारा दबाव सर्वाधिक और अनामिका के द्वारा मध्यम श्रेणी का 
होगा। अत्तः परीक्षा करते समय समान बल. से दबाने पर भी सपन्दों की तीआरता-झदुता या 
मन्दता का ठीक ज्ञान हो जाता है । 


३. वायु की अधिकता से नाडो की गति वक्क तथा पित्त से चपला सदश और 
श्लेष्मा से स्थिर तथा स्तब्ध होती है । 


४. वायु की विशेषता से नाडी की गति सपे की गति के समान टेढ़ी-मेढ़ी, पित्त की 
विशेषता से मेढक की उछाल के समान तीज स्पन्दन युक्त तथा श्लेष्मा की अधिकता होने 
पर नाडी की गति वतख तथा हंस के समान मन्द-स्थिर गतिक होती है । 


५. तजनी तथा मध्यमा के मध्य में वात-पित्त का आधिक्य होने पर, तज्जनी और 
अनामिका के मध्य में वात-कफ का आधिक्य होने पर, मध्यमा तथा अनामिका के मध्य में 
पित्त-कफ का आधिक्य होने पर नाडी अधिक स्पष्ट होती है । त्रिदोष की अधिकता होने 
पर तीनों अंगुलियों के नीचे सम-विषम अनुभव होता है और नाडी की गति तित्तिर के 
समान टिक्‌ू-टिक्‌ चलने की सी होती है । 

नाडी की स्वाभाविक गति--- 


स्वस्थ व्यक्ति को नाडी केचुए की गति के समान झदु-पबल स्पन्द युक्त तथा सम- 
भाव से अंगूठे के ऊपर की ओर गतियुक्त रहती है । आरोह-अवरोध, ताल तथा वाह 
एक सा रहता है । 


नाडीपरीक्षण के स्थान--सामान्यतया मणिबन्ध की नाडी का ही परीक्षण किया जाता 
है । यदि किसी कारण से वहाँ की नाडी का स्पश न किया जा सके, वहाँ स्पर्शलभ्य न 
हो, या वहाँ के परीक्षण से सन्देह हो रहा हो तो कण्ठ के. दोनों तरफ मात॒का घमनी, 
पेर में मध्य को ओर ग्रुल्फ के निकट -पादातुगा धमनी तथा शंख प्रदेश में शंखान॒ुगा घमनी 
की परीक्षा पूर्वोक्त बताई हुईं विधि से करनी चाहिए । 
विशिष्ट व्याधिग्रों में नाड़ी की स्थिति--१. धातुक्षय, अम्मिमांद्र, मानसिक उद्देग, 
चिन्ता, भय तथाबेचेनी होने पर नाडी क्षीण और झदु होती है । 
.._ २. गुरभोजन, अतिमात्र भोजन तथा ग्राम्यधम के उपरान्त नाडी सनन्‍्द तथा उष्ण 
होती दै । 
३. राजयक्मा, जीणकास, हिका तथा उरस्तोय में नाडी क्षीण, तन्तुसम, अस्थिर 
तथा त्वरित होती है । 


४. विबन्ध में नाडी में गुरुता तथा गति में चक्रता और अजीण में स्पश में कठोरता 
तथा गति में मन्दता होती हे । 


४- श्वास में नाडी त्वरित और जोक के समान गति वाली और संग्रहणी में उछलती 
हुई मण्ड्क गति के समान होती है । 


_. ६. उन्माद में नाडी प्रबल, वेगयुक्त तथा वक्रगतिक होती है। 


रोगीपरीक्षा.. ३१ 


. ७. आमवात में नाडी गुरु, मदु तथा तीव्र गति वाली होती है । 


८. पाण्ड में नाडी मन्द, झदु तथा क्षीण और रक्तक्षय में चंचल, तीत्र तथा 

सूत्रचत्‌ होती है १ 
मन्थर ज्वर, अभिन्‍यास ज्वर;ः कोथ ( 28777'00/ ) में नाडी मनन्‍्दः तथा 
गुरु होती है । 

१०. ज्वर में अवेगयुक्त, स्पशे में उष्ण, वातज्वर में त्वरित एवं कठिन, पित्तज्वर 
में तीच्णता तथा वेग का आधिक्य, श्लेष्मज्वर में वेग तथा ऊष्मा कौ मन्देंता, वातपित्त- 
ज्वर में चच्चछ, स्थूल एवं कठिन, वातकफज्वर -में मनन्‍द एवं उष्ण, कफपि 
मदु, मंद तथा शत्ययुक्त रहती हैँ । 


११. व्याधियों की सामाचस्था में नाडी मन्दगुरु तथा कठोर, निरामावस्था में लघु, 
तीव्र तथा चंचल होती है । क्‍ 
१२. साज्निपातिक ज्वर में नाडी को गति अनियमित, मन्द, तीव्र, शिथिल, त्रुटित 
एच चिलुप्त होती है । कभी प्रबल, कभी क्षीण, कभी गुरु, कभी मनन्‍्द इत्यादि विषमताओं 
से युक्त, शरीर में उष्णता तथा नाडो में शत्य और नाडी में उष्णता तथा शरीर में शैत्य, 
इस अरकार की विषम स्थितियाँ सन्निपात की गम्भीर स्थिति का निर्देश करती हैं । 
१३२. शरीर में कफ का क्षय होने पर नाडी में वायु की गति के लक्षण और वायु 
का क्षय होने पर कफ-ब्द्धि के लक्षण मिल सकते हैं । ऐसी स्थिति में कफस्थान में बात- 
निदर्शंक नाडी तथा वातस्थान में कफव॒त्‌ होने से निणय करना चाहिये । 
१४. त्ुटित, अनियमित, सूत्रवत्‌ , क्षीण नाडी जीवशक्ति का क्षय होने पर होती है। 
१४. शरीर के ताप की बृद्धि होने पर अति अंश ८ से १० संख्या में अति मिनट 
नाडी की गंति-इद्धि होती हें । बलवान्‌ रोगियों एवं सन्द ज्वर में आ्रायः कम परिवतन 
होता हैं। किसी भी स्थिति में नाडी की गति संख्या १४० से अधिक होने पर गम्भीर 
स्थिति सममी जाती है । 
नाडी के द्वारा साध्यासाध्यता का ज्ञान--- 
१. सन्निपात ज्वर में यदि नाडी कभी शीत, उष्ण, सूछ्म, वेगवती और रुक-रुक कर 
चलने चाली तथा अत्यन्त तीचण तथा शौतस्पश हो तो मारक होती है ! 
3३. सद्यः प्रछाप शान्त होने पर नाडी की गति बहुत वढ़ जाय तो रोगी का जीवन 
केचछ १ दिन शेष माना जाता है। 
३. सन्निपात ज्वर में अकस्मात्‌ रोगी के चेहरे में वहुत कान्ति उत्पन्न हो जाय, 
अंगुष्ठमूल में स्थिर, चलने वाली नाडी बीच-वीच में विद्युत्‌ के समान स्पन्दित होने लगे 
तो रोगी दूसरे दिन शान्त हो जाता है। 
४- सन्निपात ज्वर में नाडी-स्पन्द का क्रम परिवर्तित हो जाय--पहले तीत्र, मध्य में 
चक्र और अन्त में मन्द-गुरु नाडी चले, बीच-बीच में इस क्रम में चिषमता होती रहे» _ 








४२ .. कायचिकित्सा 


कभी-कभी अंगुष्ठ मूल से खिंसक कर कृपर की तरफ नाडी की गति का अनुभव हो तो 
शीघ्र ही मृत्यु की सम्भावना समझी जाती है। 


५. स्पश में तन्तु सहश, कम्पयुक्त और बीच-बीच में लुप्त होकर पुनः स्पन्दित 
होने वाली नाडी झत्युसूचक होती है। 


६. तजनी के नीचे तीव्रगति नाडी और शेत्य का अनुभव तथा शरीर के पिच्छिल 
स्वेद से आच्छादित होने पर सप्ताह के भीतर रोगी की मृत्यु होती है । 


७. नाडी में वेग और पूणता का बिलकुल अभाव हो, सूत्र के समान स्पन्दन का 


अनुभव हो, थोड़ा दबा कर देखने पर नाडी लुप्त हो जाय तो रोगी चौबीस घण्टे में 
मर जाता है। 


८- यदि रोगी की नाडी नियमित रूप से कम से कम ३० स्पन्दन तक चले और 
एक मिनट में कम से कम ५० और अधिक से अधिक १६० सुपन्दन हों तो भी रोगी की 
आण-रक्षा का उद्योग करना चाहिये । 


मृत्र-परीक्षा 


प्रश्न--मूत्राल्पता, मूत्राधात, मूत्रावरोध, मूत्रकूच्छ, मूत्रातिसार, मूत्र कौ धनता, . 
द्रवता इत्यादि के बारे में रोगी से पूछ कर ज्ञान करना चाहिये । 


अत्यक्च--मृत्र का वण, अचक्षेप, फेन-पूय-रक्त-शकरा की उपस्थिति, मात्रा, सान्द्रता, 
पिच्छिलता, द्रवता, आपेक्षिक गुरुत्व । 


स्पश--शौत, उष्ण और दाहयुक्त, ल्लिग्ध, रुक्ष या क्षोमकारक । 
गन्घ---साधारण मूत्रगन्ध, दुगन्ध, पूतिगन्ध, मत्त्यगन्ध, रक्तगन्ध, मधुर गन्धयुक्त। 
रस--मधघुरता अम्लता के ज्ञान के लिये चींटी-मक्खी के अपसपंण या अधिसपंण से 


७ 


शानजआप्त करना चाहिय । 


मूत्र से दोषों का ज्ञान--वातप्रघान व्याधियों में मूत्र का रंग धुंआसा मटम् 
ओर हल्का पीला होता हे। बार-बार मूत्र की प्रवृत्ति, मूत्र स्पश में शीत व रुक्ष होता 
है। मूत्रत्याग के समय रोमाश्च, फेन तथा द्रवता की विशेषता होती हे । 


पित्ताधिक्य में मूत्र का वर्ण ला अथचा गहरा पोला, दुगन्ध युक्त, स्पर्श में बहुत 
उष्ण और मात्रा में अल्प होता हे । 


कफप्रधान रोगों में मूत्र पानी के रंग का, चावल के मांड के समान बहुत फेन 
बा ( चल ड कफ, पिच्छिल हि 
वाला, मात्रा में अधिक, स्पश में शीत, पिच्छिल और मधुराम्ल गन्ध वाला होता है । 


कु 


चातकफ ग्रधान व्याधियों में मूत्र कांजी के समान, बातपित्तज में गंदला-पीलछा 
ओर कफपित्तज में थोड़ा पीला ओर चिपचिपा होता हे । 


सान्निपातिक रोगों में मूत्र का वर्ण रक्तिम, कृष्ण या नीला होता है । 


रोगीपरीक्षा क्‍ क्‍ छेद . 


मूत्र की विशेष परीक्षा-ररात्रि के अन्तिम अहर में रोगी का जगाकर मूत्रत्याग 
कराना चाहिये । मूत्र की प्रारंभिक धारा को छोड़कर केवल मध्यधारा का संग्रह साफ 
कांच की शीशी में परीक्षण के लिये करना चाहिये । 

तेलबिन्दु परीक्षा-विधि--पतली तृण शलाका में एक बूंद तिलतेल लगाकर धीरे से 
मूत्र के ऊपर डालना चाहिये । यदि तेल मूत्र के ऊपर फल जाय तो रोग साध्य, एक ही 
स्थान पर स्थिर रहे तो कष्टंसाध्य और नीचे बेठ जाय तो असाध्य माना जाता है । यदि 
तलबिन्दु के अनेक ठुकड़ें होकर फल जायें, और देखने पर श्याम या रक्तवर्ण के दिखाई 
पड़ें तो वायु की विशेषता और यदि तलबिन्दु पानी के बुलबुले के समान हो जाय तो पित्त 
का प्रकोष और बिना फेले हुए कुछ और गाढ़ा सा दिखाई दे तो कफ का अ्रकोप समझना 
चाहिये । 


त्रिपान्न परीक्षा--शोणितमेह में मूत्र किस अंग से आता है, इसका अनुमान करने 
के लिए यह परीक्षा की जाती है। मूत्र की राशि कांच के साफ शंक्काकार ३ पात्रों में रखी 
जाती है। प्रारंभिक मूत्र पहले पात्र में, मध्य की घार दूसरे पात्र में तथा शेष तीसरे 
पात्र में रखते हैं मुत्र में रक्त को राशि अधिक होने पर उसका रंग क्रम से लाल, गहरा 
लाल या आलक्तक वण का होता है। मूत्र में रक्त की साधारण राशि होने पर उसका चर्ण 
धुंआ के समान या अगुरु के सह्श होता हैं। अत्यल्प राशि होने पर रक्त की उपस्थिति 
से आयः मूत्र के वण में कोई परिवत्तन नहीं होता, सूच््मदशंक या रासायनिक परीक्षाओं 
से ही उसकी उपस्थिति का ज्ञान किया जा सकता है । 

त्रिपात्र परीक्षा के द्वारा, रक्त की अधिक मात्रा मूत्र के साथ मिले रहने पर, 
वर्ण परिवत्तेन के आधार पर शोणित मेह के उद्धवस्थल का निणय किया जाता है। 
जब थम पात्र में मूत्र के वण से शोणित मेह का अनुमान हो रहा हो और दूसरे तथा 
तीसरे पात्रों का मूत्र स्चच्छवर्ण का हो तो मूत्रस्तोत से रक्त निगेमन सममाा जाता है । 

प्रथम तथा तूतीय पात्र में शोणित मेह का अनुमान हो और दूसरे पात्र का मूत्र 
अपेक्षाकृत स्वच्छ हो तो अष्लीछा विक्ृतिजन्य रक्त निर्गंमन समझना चाहिए । जब 
रक्त तीसरे पात्र में अधिक हो और प्रथम दो पात्रों में मूत्र बहुत कुछ स्वाभाविक वण 
का हो तो बस्तिविकारजन्य विक्ृति का अनुमान करना चाहिए 

. तीनों पात्रों में शोणित मेहजन्य मूत्र का वर्ण-परिचत्तेन एक ससान होने पर रक्त- 

स्राव वृक् से हुआ है, ऐसा सममना चाहिए क 

विशिष्ट व्याधियों में मूत्रगत परिव्तंन--सन्निपात ज्वर में मूत्र धूम्रचुण, रक्तवण, 
कृष्णवण का और फेनिल तथा कभी-कभी चित्र-विचित्र वण का हो जाता हैं । 

चातपित्त ज्वर में मूत्र का वण श्वेत या रक्तिम, वातकफ ज्वर में मूत्र पिच्छिल, 


घन तथा श्वेत चणं का और पित्तकफ ज्चर में मूत्र कट्ठ तू के समान होता है, 
पाण्ड-कामछा और पेत्तिक व्याधियों में मूत्र हरा, पीला तथा हरिद्वरा के अण का 


४४ कायचिकित्सा क्‍ 


क्षयरोग में मूत्र के वर्ण का श्याम या कदाचित्‌ दूध के समान सफेद हो जाना 
असाध्य अवस्था का द्रोतन करता है । 

बस्तिविकार, इृक्कविकार तथा हृदय के विकारों में मूत्र मांस के धोवन के समान 
रूप-रस-गन्ध वाला होता है। 


मूत्र में रक्त होने पर इसका चण धुंआ के समान, पित्त होने पर गहरा पीछा और 
रक्त में अम्लता बढ़ने पर पीछा छार, तेलाक्त सा होता है। 


सूतिकां रोग में मूत्र का निचछा अंश काला और ऊपर का बुद-बुदयुक्त पीला 
होता हे । 

सामज्वर में मूत्र अम्ल गन्धवाला, चिकना, मात्रा में अधिक और निराम ज्वर में 
ड्ख है रस के समान गाढ़ा तथा जोणज्वर में बकरी के मूत्र के समान तीद्र गन्ध वाला 
हीता है । क्‍ 


पुयमयता की जी्णावस्था में मूत्र में पतले सूत्र से दिखाई पढ़ते हैं। शुक्रमेह में 
शौच के उपरान्त मूत्र मांगे से पिच्छिल ख्नाव होता है। आम रस का अधिक निर्माण 
होने पर अथवा शछीपद रोग की कुछ अवस्थाओं में मूत्र का रंग दूध के समान होता 
है। अश्मरी, अष्ठोला और बस्तिदाह में मूत्र कष्ट के साथ, बूंद-बूंद, प्रायः रक्तमिश्रित 
होता हे । द 
.. अजीण में मुत्र अल्पमात्रा में दुर्गधियुक्त, पीले रंग का होता हे। आहार में ध्त 
का अधिक उपयोग करने के कारण अजीण उत्पन्न होने पर मूत्र ते के समान चिकना- 
यादढ़ा तथा दुरगंधयुक्त और नोला होता हे । 


मूत्राशय शोथ या वृकशोथ, गचीनी मुखशोथ आदि विक्ृतियों के कारण मूत्र में पूय 
को उपस्थिति होने पर मूत्र दुगंधित होगा तथा उसमें तागे के समान सूत्र से विकीण रहेंगे। 
मृत्राशय या मलाशय में अन्तविद्रधि होकर गाडीव्रण बन गया हो या आधात आदि के 
कारण बस्ति और मलाशय के भीतर आरपार छेद हो गया हो तो मूत्र में मल की गंध 
तथा क्वचित्‌ मल का कुछ अंश भी मूत्र के साथ घुलकर निकल सकता हे। मूत्रातिसार से 
मृत्र पानी के समान स्वच्छ तथा विशेष परिमाण में बार-बार होता हे । 

मूत्रनिदान में सावधानी--पश्रीष्म में मूत्राल्पता, हेमन्त में मूत्रराशि और वर्षा मैं 
मूत्र की द्रवता बढ़ जाती है। इसलिये भूत्र परीक्षण करते समय ऋतु-देश-काल का ध्यान 


४7%, 


रखना चाहिये। आतःकाल मूत्र का वर्ण सफेद, मध्याह में पीत, सायंकाल धूमिल या 
मटमेला स्वभावतः होता है । 
मांसाहार, गुरु, लवण ओर ससालेदार भोजन करने से मूत्र में दाह, मात्रा में कमी 
आदि लक्षण हो सकते हैं । कुछ ओषधियों का उत्सग मूत्र के द्वारा होने के कारण मूत्र 
में उनका वण या यन्ध उपस्थित होने पर व्याधि का सन्देह न करना चाहिये । 
विशिष्ट रासायनिक परीक्षाओं द्वारा मूत्र में शुक्ति ( 80077४7 ) भास्वीय 
“7 छिज्ञ नथा तसके लवण (006 79शा०।४ & 9]6 88). 


रोगीपरीज्षा रथ 


शकरा, पूय, प्रथम शुक्त ( 8060076 ), अम्ल, लवण, क्षार तथा स्वास्थ्य एवं व्याधि 
की अवस्था में प्राप्य सभी धातुविषों का परीक्षण करना चाहिए। सूक्ष्मदशंक यंत्र की 
सहायता से मूत्रशकरा, सृक्ष्मकण, धातुकोष एवं जीवाणुओं आदि का परीक्षण किया 
जाता है । आवश्यकता एवं साधन होने पर जीवाणुओं की विशेष परीक्षा के लिए सम्बद्धंन 
एवं प्राणिच्षेषण ( ०प्र0076 & 8079] १70०ए४8५४४07 ) आदि किया जा सकता हू ! 


पल परीक्षा 


प्रश्न--मलोत्सजेन का समय, संख्या, मात्रा, कुंथन, अवाहण या वेदनायुक्त उत्सगे, 
अपानवायु का निकलना, मलत्याग के समय फट-फट की आवाज, थोड़ा निकलछ कर पुनः रुक 
जाने का कष्ट, मलोत्सजन की इच्छा होने के बाद शौच जाने पर गुदा की स्तब्धता, 
कण्डू, जलन, विदार इत्यादि मलोत्सजन सम्बन्धी प्रश्नों कों रोगी से पूछ कर जानना चाहिये । 


दर्शन--चायु की विशेषता होने पर मछ का वण काला और रुक्ष होता है । 
पित्ताधिक्य होने पर गहरा पीछा और पित्त का अभाव होने पर धूसर वण का होता है। 
कफाधिक्य में मल पिच्छिल और वण्ण कफ के सद्श होता है । 


मल का वर्ण पित्त की मात्रा पर निभर करता हैं। यक्ृत्‌ की दुबंलता या पित्तवाहिनी 
के अवरोध के कारण पित्त का ज्ञाव महाल्तोत में कम परिमाण में पहुंचने पर मल का वण 
हल्का पीला, पित्त का अभाव होने पर मिद्दी के रंग का पाण्डर तथा पित्त की मात्रा अधिक 
होने पर मल का वर्ण गहरा पीला होता हे । आहार के अनुसार भी मछ का व्रण बदलता 
रहता है। दुग्धाहार में मल का वर्ण हल्का पीछा, मटमेला या सफेद सा होता हे । 
मांसाहार से मल गहरा पीला या लाल रंग का तथा आहार में पत्ती-शाक आदि की मात्रा 
अधिक होने पर हरा-काला होता है । ओषधि रूप में लोह-मण्ड्र आदि का सेचन करते 
रहने पर मल काले रंग का तथा रस पृष्प लेने पर हरे रंग का होता हे । 

स्वरूप--गांठदार, बंधा हुआ, पतला, आमयुक्त, श्लेष्मायुक्त, रक्तयुक्त, क्रिमियुक्त, 
पूययुक्त, पानी के समान द्रव, फटे दूध के समान और चावल के पानी के समान आदि 
अनेक रूपों का मल हो सकता है। इनका प्रत्यक्ष परीक्षा द्वारा निगय करना चाहिये । 

गन्ध--मल को साधारण गन्ध, डगन्ध, पूतिगन्ध आदि का ज्ञान रोगी से पूछ कर 
करना चाहिये । अजीण, मांसाहार और पित्त की न्‍्यूनता के कारण मल में दुगन्ध 
होती हैं। अतिसार, स्लेष्म प्रवाहिका ओर उदर में अपानवायु का संचय होने पर मल 
में दुगन्ध बढ़ जाती है । 

साम-निरास मर की परीक्षा--मल में आमदोष की अधिकता होने पर पानी में 
डालने पर मल डूब जाता हैं । निराम मल पानी के ऊपर तेरता रहता है। कभी-कभी 
मल अधिक मात्रा में होने के कारण, निराम होने पर भी, पानी में हब सकता है । 
अतिद्रव होने पर आम मल भी जल में तेरता है, शीत एवं श्ललेष्म दूषित होने पर 


४६ कायचिकित्सा 


मल के द्वारा दोर्षों का ज्ञान--वातप्रकोष के कारण मल श्याम-अरुण वण का, 
रूक्ष, फागदार, सूखा, गांठदार और छुये के रंग का होता हैं । 
पित्ताधिक्य से हरा-पीला, पतला और उष्ण तथा डुगन्धित होता हे। 

धिकय से सरल सफेद रंग का ढोला-+॑चैकना और मात्रा में अधिक होता हे ! 
पान्निपातिक स्थिति में मल अतिदुर्गन्‍्धयुक्त और मयूरचन्द्रिका के समान कृष्ण वर्ण 

हो तो आंत्रगत रक्तत्नाव सममना चाहिये । 

विशेष व्याधियों में मर की स्थिति---आमातिसार में मल आमांशयुक्त, पिच्छिल 
बदबुदार, किश्वित्‌ रक्त से युक्त तथा थोड़ा-थोड़ा बार-बार अवाहण एवं कुन्थन के साथ । 

अतिसार में मल पतला, ग्रायः रक्त मिश्रित अथवा पीले रंग का बदबूदार । 

ग्रदणी में मल अपक, मात्रा में अधिक, विशिष्ट वातिक-पत्तिक एवं कफज लक्षणों से 
युक्त, प्रायः पिच्छिल, फेनिल और ब्लिग्य होता हे। अश में मल पतला, त्रिधारा स्न॒ुही के समान 
तीन धारियों वाला या अशाक्रों की संख्या के अनुपात में पतला या धारीदार होता है । 
रक्ताश के कारण रक्त मल के ऊपर चिपका हुआ या मल के अन्त में आता है । 
पिन्तावरोधजन्य कासला में मसल तिछू की खली के समान सफेद रंग का होता हे । 


अजाण भ॑ मसल दु्गन्बयुक्त, कागदार, पतला तथा आहार के अनुरूप हरा-पीलछा या 
सके धोवन के समान होता हूं । 
आता से अण ही जाने के बाद कोथ हो जाने पर मल में सड़े हुए मांस की सी 































.. अदीक्त अग्नि वाल्मे का मल पीले रंग का बँंधा हुआ, मन्दारिन वालों का पतला- 
चिकना तथा बदबूदार और मल्यवरोध होने पर शुष्क-गांठदार तथा काले रंग का होता है । 


जिह्ा परीक्षा 
_अत्यक्ष- जड़ा को आकृति और शथुलता, क्षीणता, वर्ण, ब्रण, शुष्कता, आद््रता, 
४ अकेमता, क्षत, विस्फोट इत्यादि की परीक्षा करने के लिए जिह्ा को मुख से बाहर 
| अरानी नकल सकती है, निकलवा कर सुग्रकाशित स्थान में देखना चाहिये । 
जिड्डा रूक्ष, फटी-फटी सी और हरिताभ होती हे । 
जिह्ला आएं, श्वेतवण कौ, मललिप्त और पिच्छिल स्लाव से आच्छादित 


| खुर॒दरी, जली हुईं सी काठी और गाय की जिह्ला के समान 


7 है गत साज्वर, मचरज्वर, चातज्वर, सान्निपातिक ज्वर तथा दूसरे 
प् केसो दर ) इसरे शहे अत 5” जिहा शुष्क हो जातो है। परम ज्वर अथवा 
| है| हापद रारोर में जलीयांश की कमी होने के कारण जिह्मा शुष्क और 


रोगीपरीक्षा ४७ 


और गम्भीर उदर व्याधियों में जिहा बहुत सूखी होती हे। मद्य-पान और धरे का 
सेवन करने के बाद जिह्दा की शुध्कता-रूक्षता बहुत बढ़ जाती हे। संक्षेप में जिह्ला की 
शुष्कता एक गम्भीर लक्षण ह जो शरीर में दृषी विषों का या औपसर्गिक विषों का अधिक 
मात्रा में संचय होने पर, जीवनीय शक्ति का हास होने पर और रक्त में अम्लता की 
वृद्धि तथा जलीयांश कम होने पर होता हे । कभी-कभी गम्भीर व्याधि के बिना भी 
नासावरोध या अन्य किसी कारण से नाक से सांस न ले सकने के कारण मुंह से श्वास- 
प्रश्तास लेने पर जिह्ना शुष्क हो जाती ह । 

लिप्तता--कोष्ठ बद्धता, आमाशय-प्रदाह, कामला, श्छेष्मोल्वण सजन्निपात, मंथर 
ज्वर, विषम ज्वर तथा अजीणमूलक व्याधियों में जिह्वा का ऊपरी पते मर से आदव्ृत्त 
रहता है । मंथर ज्वर में जिहा का आन्त भाग रक्तवर्ण का दानेदार होता हे । बहुत दिन 
लब्बन करने पर भी, जब तक आमदोष का पाचन नहीं होता, जिड्ला मललिप्त रहती हे। 
दुग्धाहार में भी जिह्या के ऊपर मल की तह जमी रहती हे। धूम्रपान व मद्यपान के बाद 
भी जिहा सलाइत हो सकती है । कुछ लोगों की जिह्ा स्वभावतः मललिप्त तथा कुछ में 
ऊपर लिखित व्याधिया में भी निमंल रहती ह । 


विवर्णता--रक्ताल्पता में जिह्न का वण श्रेत और अंकुश कृमिजन्य पाण्डुता में वर्ण 
मटमेला और काले घधव्वों से युक्त होता हे । कामला में जिह्य का वर्ण हल्के पोले रंग का 
तथा आमाशयग्रदाह, अशीताद व मुखपाक में जिह्ा रक्तवण की त्रणयुक्त होती है । सन्नि- 
पात ज्वर, राजयचुमा, मंथर ज्वर व शछेष्मोल्वण सन्निपात की गम्भीर स्थिति में, दुष्ट 
कामला और रु्तस्नाचवी व्याधियों में, जिह्ला नीली-काली इत्यादि अस्वाभाविक वर्णों की 
हो जाती है । विषेल्ले द्रव्यों का सेवन करने के वाद भी जिहा का वर्ण नीला या काला 
हो जाता हे । 

जिद्वा-कम्प--तीत्र ज्वर, अन्तक्षत व कम्पचात तथा शरीर का बल क्षय करने वाली 
जीण व्याधियों में जिड्ठा का कम्प होने लगता हे । पुराने मद्रपी रोगियों में भी जिह्ा- 
कम्प मिलता है । 


ज्षत, विस्फोट एवं विदार--अपस्मार में जिह्ा में क्षत के चिह्न मिल सकते हैं । 
मुखपाक, अशीताद, आमाशय जदाह, कामला तथा यकृतदर्शि, अम्लपित्त, 
उपदंश, मदात्यय, मधुमेह, शुष्ककास इत्यादि व्याथियों में जिहा में त्रण और विस्फोट 
हो जाते हैं । संग्रहणी में जिहा के ऊपर बहुत सी आडी-तिरछी रेखायें बनकर जिह्ना में 
विदार पेदा करती हैं । जीण यक्वत्‌ विक्ृतियों में भी यह स्थिति देखो जाती है । घातक 
पाण्डु, संग्रहणी या पित्तक्षयजन्य व्याधियों में जिहा चिकनी, मांसाकुरहीन तथा पतली 
हो जाती हे । 

जिद्ठा की आकृति--पक्षवध में जिहा वाहर निकालने पर विकृत पाश्वे की ओर 
तिरछी रहती हे । अंगधात को कुछ व्याधियों में रोगी जिहा ओछ के बाहर नहीं 


८ कायचिकित्स 
शब्द-परीक्षा 


हि. 


रोगी के स्वाभाविक शब्द के वारे में कुटुम्बियों से पूछकर ज्ञान प्राप्त करना 
चाहिये । वाताधिक्य में शब्द क्षीण, अस्पष्ट, असम्बद्ध तथा त्रुटेत या निरन्तर 
होता रहता है अथवा अधिक बोलने की यब्ृत्ति होती हे। पित्ताधिक्य में शब्द 
एप, तीत्र तथा कठु होते हैं। कफाधिक्य में शब्द रतब्ध तथा घर्धराहट युक्त 
होता है। तालु-निपात तथा नासा एवं गले में ग्रन्थियुक्त विक्ृति हो जाने पर 
ओऔर उपदंश में ताल्ु विदार हो जाने पर मिन-मिन स्वर होता है । उरस्तोय, 'छेप्मोल्वण 
सन्निपात, पाश्वृशल, श्वास और औदरिक तीव्र व्याधियों में रोगी व्यथापूर्वक या करा- 
हते हुए बोलता हे । कण्ठशोथ, रंवरयन्त्रशोथ, प्रतिश्याय, क्षय, उपदंश आदि के द्वारा 
स्वस्यन्त्र को विकृति होने पर शब्द जकड़ा हुआ सा निकलता है। पक्षवध और आर्दित में 
शब्द-विकृृति होती है अथवा उसका निनाद बहुत क्षीण हो जाता हे । जिह्नागत अंगघात में 
स्पष्ट शब्दोचारण नहीं होता । जीण व्याधियों के कारण अथवा अधिक रक्तस्राव हो 
जाने पर स्वर ॒वहुत क्षीण हो जाता हे! रोहिणी और तुण्डिकेरीशोथ में शब्द कठिनाई 
से निकलता हैे। अभिन्‍्यास, तन्द्रिक ज्वर और सन्निपात ज्वरों की विषम स्थिति में 
रोगी अस्पष्ट और अपू्ण ध्वनि करता हे। औपदंशिक वातिक विकृति में ध्वनि भारी 
तथा जिह्वामूलीय व तालब्य ध्वनियों से रहित होती हे । 


बहुत बेचनी होने पर रोगी का स्वर आर्त-दीन-क्षीण और अस्त या जकड़ा हुआ 
होता हे । स्वरों में सहसा परिवर्तन होना अशुम लक्षण माना जाता है । 





स्प्द् परीक्ष 


स्पश के द्वारा मृदुता, कठोरता, रुक्षता, स्निग्धता, खरता, छक्षणता, स्पन्दता, 
शीतोष्णभाव इत्यादि की परीक्षा की जाती है।. 

वाताधिक्य होने पर शरीर शुष्क-रुक्ष और शीतल, पत्तिक में खर स्पर्श और उष्ण, 
कफाधिक्य में स्निग्धशीतल और क्षण ज्ञात होता है। शरीर में कहीं शेत्य, कहीं 
उष्णता, कहीँ रुक्षता, कहीं स्निम्धता इत्यादि विषम र्पश होने पर त्रिदोषज व्याधथि का 
अनुमान करना चाहिये । बे 


विधि--स्पश करने के पूर्व चिकित्सक को अपने हाथ का परीक्षण करके स्पशः 
ग्रहणशक्ति, दाह, शेत्य इत्यादि का ज्ञान कर लेना चाहिये अर्थात्‌ चिकित्सक का स्पर्श- 
ज्ञान नि्दष्ठ और हस्तादिक अंग दाह से रहित होने चाहिये । रोगी के शरीर का परीक्षण 
मस्तक से लेकर पादतलऊ तक क्रम से करना चाहिये। स्पर्श करते समय आगे निर्दिष्ट 
परिवतेनों पर ध्यान देना चाहियेः--वक्ष-निःश्वास-जिहा ओर दूसरे हमेशा उष्ण रहने 
वाले अंगों को शीतता, स्पन्दनयुक्त अंगों की अस्पन्दता, सदु अंगों को कठोरता, ःक्षण 
अंगों की खरता, स्वाभाविक अत्यज्ञे की उपस्थिति-विक्रति या ब्रद्धि, संधिभभ, संघिभ्रंश, 


रोगीपरीक्षा._ .. ४५ 


और दूसरे ्राकृतिक भाव जिनमें कुछ भी विकृति हो गई हो, उनका सूच्म निरीक्षण 
करते हुये, रोगी के सारे शरीर की स्पशग्रहण शक्ति की परीक्षा करनी चाहिये । 

रूच्षता वधक व्याधिया--पाण्डु, कामला, वातिक ज्वर, श्लीपद, अवटुका की हीन 
- किया से उत्पन्न श्लपष्मिक शोफ (77ए75080५०॥708 ), जीवतिक्ति ए की कमी तथा ग्रहणी । 

त्वचा के रोग--यथा गजचम, विचचिका, कण्डू, कुष्ठ इत्यादि । 

सख्रिर्धता--मेदोबद्धि, मधुमेह, पौष्टिक भोजन,/आमवात, कफज शोफ, वृक्करोग । 

शेत्य--स्वेदाधिक्य, शीताह्ञ संज्निपात, अन्तर्वेगज्वर, वातवलासक, वृक्कजन्य शोफ, 
पाण्डुता, रक्तक्षय और. निपात, मद्यसेचन के बाद, पित्तक्षयजन्य व्यापधियाँ: ग्रहणी, 
कंमिरोग, भेदोवद्धि । 

उष्णस्पश---ज्वर, दाह, कामला, यक्ूँत को व्याधियों, राजयच्मा, गुरु भोजन, 
व्यायाम, उष्णामिताप । 

कठोरता--प्रंथि, अबुद, वातिक शोथ, धनुर्चात, अभिन्‍यास, आक्षेपक, स्तब्धतायुक्त 
अंगधात ( '08800 (474७8 ) | 

शिथिलता--मूर्च्छा, निपात, पक्षवघ, क्षीणता, सर्वाज्ञशोफ, मेदोबृद्धि, तन्द्रा । 


नेत्र-परीक्षा 
यहाँ पर नेत्र के रचतंत्र रोगों एवं उनकी परीक्षा-प्रणाल्ियों का वणन नहीं होगा । 
केवल सावेदेहीय व्याधियों का नेत्र पर अभाव और तह्विषयक नेत्रपरीक्षण ही बताया जायगा। 
दोषानुसार नेन्रगत विशेषताएं--वाताधिक्य से नेत्र धूम्रवणण, अरुणवर्ण, रूस, 
शुष्क और कण्डू एवं वेदनायुक्त, जलखावी, भीतर बँसे हुए और स्तब्ध से ज्ञात होते हैं । 
पित्ताधिक्य से रक्त-हरित या हारिदर वण के, दाह युक्त, उष्ण नेत्रस्नाव युक्त तथा 


प्रकाशद्वेषी होते हैं । 
कफाधिक्य से नेत्रों का वण धवल, उनमें अश्रओ्ओों को अधिकता तथा स्निग्ध, तैजहीन, 
कण्डूयुक्त और शोफ्युक्त होते हैं । 


त्रिदोषज विकृनति में नेत्र आयः नेत्रकोटर में धंसे हुए, तीनों दोषों को विशेषता से युक्त- 
खाव वाले और कनीनक ग्रान्त से निरन्तर अश्रत्नाव होता रहे, इस श्रकार की स्थिति 
वाले होते हैं । इसके अतिरिक्त नेत्रों का वण प्रायः काला या आरक्त तथा पलकें भारी ओर 
तन्द्रिल सी रहती हैं । 

सामान्यतया नेत्रों की निम्नलिखित विक्रति गम्भीरता निदशेक मानी जाती है :--- 

बहुत बाहर की ओर निकले हुए, भीतर की तरफ धंसे हुए, अतिकुटिल, अति- 
विषम, निरन्तर अव्यवस्थित गति युक्त, अत्यधिक खाबव युक्त, निरन्तर बन्द या खुल हुए 
अथवा उन्समेष-निर्मेष युक्त, विश्रान्त दृष्टि युक्त, मिथ्या दृष्टि युक्त, अकस्मात्‌ दृष्टि-क्षय 
युक्त, केचल शुक्ल या कृष्ण वण ही देखने वाले साव॑देहीय गम्भीर व्यांविया म हा होते 
हैं। सारे नेन्रमण्डल में कृष्ण, पीत, नील, श्याव, ताम्र, हरित, हारिद्र और शुक्ल वर्णा की 
अतिव्याप्ति सद्मःघाती व्याधियों में ही होती हैँ । ः 

नेत्रपक्षम जटावद्ध हों, यह स्थिति भी अरिश्ट संज्ञक मानी जाती हू । 


कायचिकित्सा 


सावेदहिक व्याधियों के द्वारा नेत्र में व्यक्त होने वाले प्रमुख लक्षण निम्र कोष्ठक + 


62५५. जप 


व्याधिनिरदेश के साथ संग्रहीत हैं:--- 


इनाम ३ मापा अाााआााआऋामााााभभााााााणााणणणााणाशभनाणणननणणणाभा७७ल्‍७७ााणाणाणणणणणणणणणणनणणणणणननणााआआभााभामाााणऋऋऋआ ८३३३9 कक ३ कंकाल लक 


ल्च्षण 





चत्मेघात 


नेच्रगो लकः--- 
गति या नेत्रचलन 


नेत्रगोलक का 
बाह्योत्कष :--- 


नेत्रगोलक  कोट- 
रान्तर अचिष्ट 


द्वितय-इंष्टि 


कनीनक ६-- 


स्तीणता 


२. कनीनकसंकोच 


३. विषमकनीनक 


४. अनियन्श्रित 
कनीनक 


खा |... दरलमममयुचा प्यमतनामाकरयाःनरू- ३ अर +ऋ»>०--ा- सम >.ल्‍ 


स्वरूप 








सरभाव्य व्याधियाँ 





नेत्रवत्म पूरी तरह बन्द | अर्दित, पक्षवध, रोहिणीजन्य अंगधात । 


नहों होता, नेत्र से 


| निरन्तर अश्रुख्ताव होता 


रहता हे । अथवा नेत्र 


| बन्द रहता हे, वर्तत्मो- 
| नूमीलून नहीं होता। | 


एकाग्र होकर किसी वस्तु 


को देखने पर नेत्रगोलक 


चंचल या आन्दोंलित 


| बना रहता हे । 

 नेत्रगोलक बाहर उभड़े 
| हुए होते हैं, नेत्रवत्मे 

| नेत्र बन्द रहने पर भी 


आपस में नहीं मिलते। 
नेत्रगोलक नेत्रकोटर में 


भीतर घंसे और निस्तेज 
हो जाते हैं । 


रोगी को एक ही वस्त 


| दो प्रथक्‌ प्रथक्‌ दिखाई 
| पड़ती हे 

कनौनक अस्वाभाविक 
१. कनीनकामि- 


रूप में विस्फारित हो 


| जाता है। 

कनीनक का आकार 
| संकुचित । 
दोनों ओर की कनी- 


| निका के आकार में 


विषमता । 
कनीनक का आकार 


8 प्रानियन्त्रित हर 


हे । 


तन बन जन 


१. धम्िल्लकीय, तुम्बिकाधारीय, उष्णीष- 
कीय तथा सुघुम्ना एवं सुघुम्नाशीष के रोग। 
२. नेत्रचालक नाडी का अंगघात । 


१. अनन्तवात, सर्चांगशोफ, करोव्य- 
न्तरीय द्रवनिपीड की अधिकता । 
२. परमावटुकग्रन्थिकता । 


शरीर में जलीयांश की कमी, धातुक्षय, 
रक्तस्नाव, तीव्र चिषमयता । 


नेत्रवालक नाड़ी का अंगधात होने पर 
अन्तर्तियंग्‌ दृष्टि तथा द्वितय दृष्टि होते हैं । 


तारामण्डल के अमभिलाग, अत्यधिक 
चिन्ता, परमावद्धक ग्रंथिकता, एट्रोपीन 
का नेत्र में स्थानीय प्रयोग । 

मस्तिष्क सुधुम्ना फिरंग, अहिफेनी विषा- 


क्तता, धमनी जरठता, इसेरीन ( 6886- 


7]76 ) का नेत्र में स्थानीय प्रयोग । 


फिरंग, वातनाड़ी चिक्ृति, तारामण्डल 
शोथ, मस्तिष्कगत अबुद, सुघुम्ना कुल्या- 
भिस्तीणता । 
तारामण्डल अभिलाग, फिरंग, मष्तिष्क 
शोथ । 





रोगीपरीषा ११ 


देष्टिविभ्रम के उदाहरण--अआरकाश को पृथ्वी के समान ठोस और पृथ्वी को 
आकाश के समान शत््यवत्‌ देखने.वाला, रूपहीन वायु के श्रवाह का क्षिजित में दशेन 
करने वाला, अज्वलित अप्नि को न देख सकने वाला व्यक्ति शीघ्र श्त हो जाता हे । जो 
रोगी प्रकृतिस्थ अभिशिखा को निष्प्रभ, कृष्ण या श्वेतवतवण की देखे अथवा रात्रि में 
सूये, दिन में चन्द्रमा या बिना अभि के धूमोत्पत्ति देखे या रात्रि में उसे अभि को ज्वाला 
निष्प्रभ दिखाई पड़े, वह व्यक्ति शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होता है । 

नेत्रटष्टि जिस व्यक्ति की अकस्मात नष्ट हो गई हो वह भी गतवत माना जाता है । 

जो व्यक्ति तीतर दृष्टि से केवल एक ही ओर निर्निमेष निरीक्षण करे, वह तीन दिन 
में मर जाता हे । 

आकृति--घनुवात में आकृति विकट हास्ययुक्त, अभिन्‍यास, मन्थर एवं तन्द्रिक 
ज्वर में आकृति से वेदना, क्लान्ति, श्ररति और क्षीणता की अभिव्यक्ति; पाण्ड में 
पाण्डर गौरवर्ण किश्वित स्वास्थ्यकर आक्रृति; उच्च रक्त निपीड में कपोल एवं कणपाली की 
रक्तिमा; मंदात्यय में गुलाबी कपोल; सच्निपात में नेत्र भुभम, उन्‍्मीलित या निर्मौलित, 
अधरोष्ठ लटके हुये; पक्षचध व अदित में विकृृत पाश्वे का ओठ निःश्वास के साथ दूर तक 
खिच जाता है तथा पुनः भीतर की ओर मिंच जाता है, एक तरफ के नेत्र उन्‍्मीलित 
दूसरी ओर के निमौलित रहते हैं । श्लेष्मोल्वंण सन्निपात में नेत्र कान्तिमान, कपोल 
अरुणाभ तथा ओछ पर विसप॑ के से विस्फोट होते हैं । विसूचिका, अतिसार एवं अवाहिका 
में जलीयांश का अधिक नाश हो जाने पर नेत्र अन्दर की ओर घेसे हुए, निमीलित 
अवस्था में भी नेत्रवर्त्म असम्पृक्त, दृष्टि तेजहीन, शंखग्रदेश गतेयुक्त, अधरोष्ठ खुल 
तथा लटका हुआ होता है । 

अनुमान-परीक्षा 

अगि का परीक्षण जारण शक्ति के आधार पर, बल का व्यायाम शक्ति 
के आधार पर, सात्म्यासात्म्य-प्रकोप-पअशम के द्वारा दोष-दुष्य का अनुमान, 
विषयोपलब्धि के द्वारा इन्द्रियों का परीक्षण, सद्न्‍असत्‌ विवेक, क्रोघ, शोक, 
हे, प्रीति, भय, घेये, श्रद्धा, मेघा, स्मृति, छज्जा, शौल, द्वेष इत्यादि मनों- 
भावों के द्वारा मन की स्वस्थावस्था का अनुमान करना चाहिये । पूण आहार लेने पर 
भी शरीर का उपचय न हो रहा हो तो धात्वमि की दुबलता का, अल्प आहार लेने पर 
अधिक मलप्रवृत्ति हो तो आमदोष के संचय का, क्षुधा-तृष्णा-बहुमूत्रता और बलक्षय 
के द्वारा मधुमेह एवं ओजक्षय का अनुमान करना चाहिये । 

पडग-परीक्षा 


'शिरोप्रीया 
शिर--- 


प्रश्न--शिरोवेदना, भ्रम, स्वप्त, निद्रा, तन्द्रा, श्रम, आवत्ते, स्मृति, बुद्धि, 
मनोव्यथा, मिथ्यान्ञान, प्रलप, मूर्च्छा, तेज, कान्ति, हर्ष, विषाद इत्यादि भावों की अभि- 
व्यक्ति, अपस्मार, उन्माद, गदोद्देग तथा श्वानेद्रियों के विषयों की सामान्य उपलब्धि । 


'ज२ ..क्वायचिकित्सा 


अत्यक्ष---दशन--मस्तक, केश, ललाट, नासा, कणे, नेन्न, मुख आदि सभी गत्यज्ञों 
की परीक्षा बहुत सावधानी से करते हुए निम्न विषयों का निरीक्षण करना चाहिये:--- 

अभिषात के चिह्न, विवर्णता, अन्थि, अबुद, शिर की आकृति, केशों की स्निग्धता- 
'ह्सता-निबद्धता, खालित्य, पालित्य, लछाट का उभाड़-निम्नता, शिराधमनीविस्फार आदि । 

नासा---हुगन्ध, क्षवशु एवं गन्धग्रहण शक्ति की जानकारी प्रश्न और म्रदु॒ गन्ध 
वाले पदार्थों को सुंधा कर करनी चाहिये । ग्रतिश्याम, नासाशें, नासावुद, नासामभ्रंश, 
अपीनस आदि अमुख नासागत व्याधियों की विशेष परीक्षा ऋरनी चाहिये । निःश्वास- 
अश्वास के समय नासापुटक विस्तार श्वासकृच्छता का द्योतन करता है । 

कर्ण---क्नाद, कर्णशूल, श्रवण शक्ति की परीक्षा-- दूर, निकट तथा अतिसानि ध्य 

से ध्वनि उत्पन्न कर रोगी की श्रवणशक्ति की परीक्षा करनी चाहिये । 
कर्णश्राव, कर्णमूलिक शोथ तथा कर्णविद्रधि आदि विक्नृतियों की परीक्षा, कणपाली की 
विक्ृतियों और कर्ण की आक्वति की परीक्षा करनी चाहिये । 
द नेच्न--नेत्रवेदना, दृष्टि-शक्ति, तिमिर, लिल्लननाश, अनन्तवात, 'लेष्मविदग्ध-दृष्टि, 
पित्तविदरध-दृष्टि, चातहतव॒त्म, अलजी, वर्त्मशौफ, कामला, कण्ह आदि के का रण नेत्रों में 

परिवत्तन तथा नेत्रों का बाहर निकलना, भीतर धसना, मललिप्तता, उन मीलन-निरमीलन 
को शक्ति, नेत्रगत रक्तत्नाव का परिज्ञान । 

झुख्त---विदार, ब्रण, विस्फोट, वण॑विपयेय और चिक्रत भावों की अशिव्यक्ति । 

ओछ--परिसप, शुष्कता, विदार, त्रण, श्यावता, पाण्डता, शोथ और पुथुलता, 
खण्डीछ तथा विस्फोट आदि । क्‍ 

दुन्‍त तथा दुन्तवेष्च--दन्तशूलू, कृमिदन्त, पूयदन्त, प्रशीताद, रक्तस्ताव, विद्रधि, 
दन्तद्षय, स्थायी-अस्थायी दन्‍त तथा उनकी संख्या, दन्‍्तशकरा, चिचर्णता, दन्तरचना । 

जिह्ला--स्वादअहण शक्ति, स्वाद, रूक्षता, खरता, शुष्कता, आता, वर्ण, शरण, 
विदार, जिह्ना की गति और पुष्ठता आदि । 

तारु---चर्ण, त्रण, छिद्र, विस्फोट, शोथ, पयस्ताव । 

ररू-विचर--स्वरभंग, निगलने की क्रिया, खराश का अनुभव, विस्फोट, शोथ, विद्रधि 
का परिज्ञान तथा असनिका, तोरणिका, गलशुण्डिका, कण्ठशालूक, स्वरयंत्र इत्यादि गल- 
विचरगत अंगों की विशेष परीक्षा, आकार, शोथ, पूयोत्पत्ति इत्यादि दृष्टियों से करनी चाहिये। 

गीवा---निगलने की क्रिया के समय ग्रीवा की स्थिति, विवर्णता, ग्रीवा पाश्चंगत 
स्पन्दन (मन्या और मातृकागत स्पन्दन), उत्सेथ, पुष्ठता, ग्रीवा की चारों तरफ घूमने की 
गति, ल्त्ल्ञञंथियों की वृद्धि, लसग्रंथियों की शृद्धि, गण्डमाला, अपची, गलगण्ड ओऔरकणमूल 
शोथ, अचडुका अंथि, कृकाटिका, श्वासनलिका आदि की विशेष परीक्षा करनी चाहिए । 


कोष्ठ-परीक्षा 


कि त> आास-शुध्क, छीवनयुक्त, रक्तयुक्त, पूतियुक्त, पूययुक्त, वेगयुक्त, ज्वरानुबन्धित, 
ला कलल्‍्कतल लक सिसानत आर विशिष्ठ ध्वनियक्त या उसके घगने-बहले का सायाण च्याज़ि । 


पा व्क छा मी 002 हु 
पा 2 हो 22600 | 20.९, ॥ 





रोगीपरीक्षा ९५३ 


भास--संख्या, नियमत, उत्तान-गम्भीर या साधारण श्वास, श्वास-कृच्छु, श्रम और 
आसन के साथ सम्बन्ध, गुरु भोजन, वातल भीजन, अम्ल भोजन, आध्मान, उद्वार आदि 
के साथ कृच्छुश्वास का सम्बन्ध, श्वास के भेद, शौतोष्ण सम्बन्ध से श्वास में परिचतन । 

पाश्च-शूछ--श्वास, कास, जुम्भा, हिका के साथ वेदना का सम्बन्ध, वेदना का 
स्वरूप, मन्द-तोद्ण-भेदनवत्‌ , दाहयुक्त, स्तब्धतायुक्त; वेदना स्थानसंश्रित-चल या 
व्यापक, वेदनाइड्ि एवं उपशम के कारण । 

हृत्स्पन्द और हच्छूछ का अनुभव--समय, स्थान, कारण, तीव्रता, स्वरूप, स्थायित्व, 
चलत्व इत्यादि विशेषताओं का ज्ञान | 

प्रत्यक्च--दशन-आकृति, अचनत या उन्नत वक्ष, ग्रंथियों, उत्सेध-निम्नता, समता- 
चिषमता, चय-अपचय, पशुकारयें तथा पशुकान्तरीय स्थान, शिराविस्तृति, वर्णविषयय, 
प्रमाण, श्वासोन्ठास के समय दोनों पाश्वों का समान संकोच-विकास आदि | 

स्पश--ल्लिग्धता, रुक्षता, उत्ताप, भदुता, कणोरता, स्पन्दन, पीडन-ताडन वा 
स्फालन के द्वारा अन्तघनता और बातपूर्णता यां द्रव का ज्ञान करना। स्पर्शासह्मता, 
वेदना का स्थानीय अनुभव भी स्पश से ही प्रमाणित होता है। 

श्रवण--श्वसन ध्वनि, घघरयुक्त कूजन और वंशीरवयुक्त ध्वनि तथा उरःश्रवण यंत्र के 
द्वारा सूच््म विविध ध्वनियों का ज्ञान । 

गन्ध--निश्वास एवं वक्ष के निकट दुगन्ध, पूतिगन्ध इत्यादि का ज्ञान । 


उद्र 

परिप्रश्न--- 

रुचि--विशिष्ट रस एवं स्वादयुक्त पदार्थों के श्रति रुचि या अरुचि का ज्ञान, मुख का 
स्वाद, मुख की मललिप्यता आदि । 

छुधा-तृष्णा--खाद्पेयों के द्वारा क्षुबा-तृष्ण की शान्ति, ऋतु ओर बल-काल के 
अनुरूप क्षुधा व तृष्णा की स्थिति । 

उदर शूल--रथान, समय-निरन्तर या कदाचित्‌, दिवा या रात्रि में; आहार के 
साथ सम्बन्ध-आरम्म में, मध्य में, पाचन के समय या पाचन के उपरान्त: मधुराम्ल- 
लवण-कठ-तिक्त-कषाय में से किस प्रकार के आहार से शूल को ब्द्धि या उपशय; वेदना 
के साथ वमन, हज्लास, प्रवाहिका, उंद्गार व वातानुलोमन का सम्बन्ध; उपशय-उष्ण, 
शीत, मधुर, स्निग्ध इत्यादि के प्रयोग से शान्ति मिलती है या नहीं ? 

उद्वार--साम्ऊ, धूमायित या विदाहयुक्त, भोजन के सद्यः बाद या परिपाचन के बाद, 
उपशय या अनुपशय । 

हिका--समय, यमला या क्षुद्रा आदि और उपशय । 

अधिजठरदाह--समय, तीव्रता और निवृत्ति--शीतरू जल, क्षारीय जल या दीपन- 
पाचन ओऔषधि प्रयोग से । 
वमन--समय ग्रात+-सायं, दिवा-रात्रि, संख्या, तीव्रता, दमन काल में मुख का 





जुछ 


भोजन से वंमन का सम्बन्ध, हक्लास-अधिजठर दाह एवं वेदना के साथ वस्नन का सम्बन्ध, 
वमन उत्क्रेश युक्त या साधारण । 
वमरित द्रव्य की साधारण परीक्षा--मात्रा, स्वरूप-पिच्छिल, आहास्युक्त, पित्तयुक्त, 
द्रवभूयिष्ठ; चणं-हरित, पीत, कृष्ण, रक्तिम; वमित द्रव्य में भुक्तान्न की स्थिति-अर्धपाधित- 
अपाचित, चमन में कितने समय पूर्व का भुक्तांश निकला; चमित द्रव्य का संगठन-रक्त, 
पित्त, कृषि को उपस्थिति की विशेष जानकारी, मासांकुरों की उपस्थिति आदि । 
आध्मान--समय-शौच या भोजन के उपरान्त अथवा पहले, उपशय-उष्णोदक 


पान, उष्णसेक या वातानुलोमक द्र॒व्यों का प्रयोग और विशेष आहार-विहार के साथ 
आध्मान का सम्बन्ध । 


आल्त्रध्वनि--स्थान, समय और वेदना, आन्त्र की गड़गड़ाहट के बाद वायु या 
सल का अनुलोमन, आसन के साथ ध्वनि का सम्बन्ध । 
..._ वायु या मल का जंजुल्वेमेन--स्वाभाविक या कठिनाई से, संख्या, समय, आहार 
के साथ सम्बन्ध, अनुलोमन से सुख या दुःख का अनुबन्ध, अवाहण कुंथन, वेदनायुक्त मल 
की अबृत्ति, मलपरीक्षा (मलपरीक्षा का व्यावहारिक वर्णन पहले पृष्ठ ४५ में किया गया है)। 
..._ विबन्ध--पुराण या आकंस्मिक, देश- काल-ज़ल-वायु-आहार के साथ सम्बन्ध, 
मल की स्थिति-गांठदार, बंधा हुआ या साधारण । 
अश--वात्ताशे या रक्ताश का अनुबन्ध, आहार-विहार के साथ/सम्बन्ध, कुलजवृत्त । 
सत्र--संख्या, मात्र, समय, वेदना, दाह इत्यादि का सम्बन्ध तथा मूत्र की स्थूल 
. एवं सूक्षम परीक्षा । 
प्र्यक्ष--... ४ 
 इशन--उदर का वर्ण, शिराजाल, नाभि की स्थिति-स्वाभाविक, उन्नत या 
सम, अधिजठर स्पन्द, मेदोइद्धि, उदर की आकृति-बस्तिवत्‌, तुम्बीवत, मशकवत, 
नौकाकृतिक, श्वाशोच्छुबास में उदर की गति-केन्द्र या पार्श्व का विस्फार, पार्श्व एवं उत्तान 
शयन-आसन की स्थिति में उदर का स्वरूप, आध्मान, अरूसक एवं उदर की निर्तब्घता, 
स्वाभाविक या अस्वीभाचिक आंत्रगति । 
स्पश--रूक्षता, स्निग्धता, उत्ताप, चेदनासह्मता, कठोरता, झदुता, ताडन के द्वारा 
मंदता, वायुपूणता या घनता का ज्ञान, जलोदर में रफालन तरंगों का अनुभव, उदर के 
अत्यंगों का विधिवत्‌ स्पशे के द्वारा अनुभव, आध्मान तथा उदर और गुल्म की चिशेष 
परीक्षा के लिये भी अंगुलिताडन व स्फालन से निणय करना चाहिये । 
अवण---आन्त्रकूजन-समय, स्थान, तीज़ता; अंथि, अबुंद और स्पन्दन का अनुभव 
उत्तान एवं गंभीर स्पशे से करना चाहिए । 
ओदरिक अचयचों को परीक्ता 
यकृत्परीक्षां--स्पशेलभ्यता तथा स्पर्श, स्थिति, आकार, वृद्धि, मदुता, कण्रेरंता, 
प्रंथियुक्तता, वेदना, श्वासोच्छवास के समय निर्बाघ गति, यक्ृत्कायंशक्ति की विशेष परीक्षा । 
पीह्धा--बश्द्धि, परिमाण, कठोरता, झदुता, वेदना । 





रोगीपरीक्षा जज 


आमाशय, पक्काशय, ग्रहणी, उण्डुक, मूआदशय, दुकक, मलाशय, शछुक्राशय या 
गर्भाशय का परीक्षण--रिक्तता, पूर्णता, मदुता, कठोरता, विशिष्ट वेदना तथा अंत्रोपयंत्रो 
द्वारा परीक्षा, क्षकिरण परीक्षा, कार्यशक्ति की प्रायोगिक एवं रासायनिक परीक्षा । 

मलद्वार की परीक्षा--भगन्दर, गुदद्वार में विदार, त्रण तथा अंथियों, शुदा को 
तीन वलियाँ, बाह्य अश, आशभ्यन्तरिक अशे, रक्ताशं, अबुुद, पौरुष अंथि आदि तथा 
मलाशय की विशेष परीक्षा अंगुलि या विशिष्ट यंत्रोपयंत्रों द्वारा करनी चाहिए । 

ुरुषअजननेन्द्रिय तथा मूत्रमार्ग--निरुद्ध प्रकश, शिश्न तथा मूत्र मार्ग की 
परीक्षा, ब्रण, विस्फोट या चिवणता, आकार, चयापचय, शिराओं की स्पशष्टता, शिश्नोत्थान 
तथा पौरुषशक्ति आदि का ज्ञान । 

वृषणपरीक्षा--त्वचागत विकार, झूदु तथा गंभीर स्पशे में विशेष अकार की पीडा 
का अनुभव, बृषण ग्रंथि का आकार तथा पीडा, इृषणशीष और इषणरज्जु को परीक्षा, 
पद, अंत्रविंकार (0709), जलबृषण या दृषणबद्धि के इतर कारणों की सम्यक्‌ समीक्षा । 

ख्रीमजननेन्द्विय की परीक्षा--पूय, त्रण या चिदार के चिह्न, योनिमाग में अदाह 
या प्रदर के लक्षण, गर्भाशय ग्रीवा में त्रण, खाव या मांसाकुर्रों की उपस्थिति, गर्भाशय का 
अचस्थान, आकार एवं विकृतिनिदशक दूसरे लक्षण । 

पृष्ठ की परीक्षा--ग्रीवामूल से कटिपयन्त सम्यक परीक्षण--वरणविपयय, उत्सेध 
एवं स्थानीय वेदना आदि का ज्ञान, पृष्ठवंश के कशेरुकों का क्रमिक परीक्षण, अन्तरायाम, 
बाह्यायाम, कुब्जता, पा4श्चैस्तंब्धता, त्रिक तथा कटियप्रदेश का परीक्षण--वेदना, पौडनाक्षमता, 
मांस का चयापचय, दोनों पाश्वों की आकृति को समानता, शद्धसी नाडी के परीक्षण के 
लिए गुदास्थि के निकट गंभीर रपशन । 

ऊध्चे-अधः शाखाओं के परीक्षण में प्रायः समान सिद्धान्तों का उपयोग होता है । 

परिप्रश्न---शक्ति, कार्यक्षमता, देनिककाय, स्पशेज्ञान--झदठु, गम्भीर या शौतोष्ण स्पशे, 
स्पर्शासह्मता, दाह, कण्ड, शूल्यता, पीडा, शाखाओं की मुक्त गति, शब्द युक्त गति, 
गुरुगात्रता, चेष्ठ--स्वाभाविक, अस्वाभाविक, अनायास, श्रमयुक्त, सन्तुल्ति, या कम्पयुक्त । 

दर्शन--शाखाओं की समरूपता, वर्ण, शिराविस्तृति, शोथ, उत्सेघ, समोपचित 
गात्रता, रूक्षता, उत्ताप, अस्वेद, विस्फोट, ज्रण, लसग्ंथि, शिरा-धमनीस्पन्द, पेशी 
समूहों की प्रथक्‌-प्थक्‌ कार्यक्षमता, चयापचय, आक्षेप, कम्प, हषे, आकुद्चबन, असारण, 
.. रुतब्धता, जड़ता, शिथिलता, कठोरता, गंतिं, आसन पं भ्रमण के समय विशिष्ट आकृति । 
..._ नखस्वरूप--धारीयुक्त, अंवनत, शुक्तियुक्त, श्योमवणता, पाण्ड्डता, रक्तिमा । 

अंगुलिपव--पुष्ठता, क्षीणता, मुद्ृरवत्‌ रचना, शोफयुक्त, त्रण या विदार युक्त, 
अंथियुक्त और विकलाइता तथा गति । 

स्पश--शीतोष्ण वेदनात्मक स्थान, स्पशनाक्षमता, रूक्षता, स्निग्धता, ग्रंथि-स्नायु- 
अस्थि-संधि इनका स्परशज्ञान, नाडीस्पन्दन, सिरा, घमनी, स्नायु, कंण्डरा, संधियों, 
ध्यम्थियों तथा हम्त-पाठटतल की विजशिष्र परीक्षा । 








कायचिकित्सा 


९९ हे 
प्रव्यावत्तन क्रियाएँ--जानु-पांष्ण तथा पादतल-प्रत्यावत्तन; पेशी समूहों की स्तब्धता- 
उत्तेजनशीलता आदि के ज्ञान के लिए विशिष्ट परीक्षाएँ। . 
श्रवण--अंगुलिपव और संधियों का स्फोटन, अस्थिभंग तथा संधिविच्युति में 
घषण शब्द ( 0/8[75प78 ) या. निस्तब्धता । शाखाओं की परीक्षा में दक्षिण व चास 
की प्थक-पथक्‌ परीक्षा करके सन्तुलित निणय करना चाहिये। 
निदान की विशेष परीक्षा 
असात्म्येन्द्रियाथ, अज्ञापराध आदि के कारण तथा मिथ्या ( अहित एवं अनुचित » 
आहार-विहार आदि वाह्य निमित्त कारण से धातुओं, उपधातुओं, मो एवं 
मानस घातुओं--रज और तम का वेषम्य होकर रोगोत्पत्ति हो अथवा विष-शस्र-अमनि- 
भिघात आदि प्रधान कारणों से आरम्भ में धातुवेषम्य किए बिना ही साक्षात्‌ रोगोत्पत्ति 











:+॥ 24 
हो, यह सब निदान या रोगोत्पादक कारण कहे जाते हैं । 

उपयोगेता--चिकित्सा की दृष्टि से रोगोत्पादक मूलकारणों की भली अकार जानकारी 
करना बहुत आवश्यक माना जाता है। इससे रोग की उचित चिकित्सा व्यचस्था, रोग 
पतिषेध के लिए रोगोत्पादक निदान से बचाव की चिशेष व्यवस्था और आपसर्गिक 
या जानपदिक रोग होने पर उसके प्रसार के रोकने की व्यवस्था हो सकती है। 
सामान्यतया निदान परीक्षण में दो अश्न महत्वपूर्ण होते हैं। १. रोग का बाह्य निदान 
अर्थात्‌ बाह्य निदान से दूषित हुए दोष के द्वारा व्याधि उत्पन्न हुई है अथवा २. असा- 
प्म्येन्द्रिय यरसंयोग एवं अज्ञापराघ क्रे कारण आन्तरिक दोषों में विक्वति होने से रोगोत्पत्ति 
हुईं है । इसी विषय को अधिक विस्तार से स्पष्ट किया जाता है । 

































निदान 
! 
गोत्पादक उभय प्रकोपक दोष प्रकोपक 
“दारक या विभ्रकृष्ट वज्यज्षक या सब्निकृष्ट उत्पादक ह की अ 
की बी | 
न बाह्य आशभ्यन्तरिक 
अपसर्णिक अनोपसर्गिक ऑऔपसर्गिक  अनौपसर्गिक 
_ः | | 
कस 
। | | 


प्ज्ञापराध परिणाम 





सवा 2८ कर. ७७... हक 


रोगीपरीक्षा 


बाह्य निदान--आहार-विहार सम्बंधी नियमों का पालन देश-काल के 
करने से, अभिघात लगने या चिषले जन्तुओं का दंश होने से, अप्रि-चि द्वि 
हारा दाह होने से और विषेले द्रव्यों का सेवन करने से रोगोत्पत्ति हो सकती है। इस 
वर में रोगोत्पत्ति के कारणों का प्राधान्य हैँं। कारणों का सटोक निर्णय हो 









जाने पर 


उसका प्रतिकार सद्यः लाभदायक होता हैं। विषप्रयोग-विषदंष्ट में कारण विज्ञान का 


महत्व ओर बढ़ जाता हे | यद्यपि इन बाह्य कारणों के द्वारा रोगोत्पन्ति ग्रायः दोषदष्रि 


हि 


के द्वारा ही होती है, कदाचित्‌ अभिषात एवं चविषप्रयोग आदि समोधातक स्थिति 
में दोषानुबंध कुछ काल उपरान्त होता हो, फिर भी सामान्यतया दोयोग्पत्तिपूवक 
रोगोत्पत्ति के साथ इनका सम्बंध होने के कारण नीचे संग्रह किया जाता है । 

वातादिप्रकोपक कारणों का वणन साथ के कोष्ठंक में किया गया हैं। उससे रोगी 
में दोषप्रकोपक कारणों को समझने में सुचिधा होगी । 































दोषप्रकोपक कारण 
 अकोपक रस- | 
दोष प्रकोपक आहार प्रकोषक विहार, गुण तथा | 
क्‍ मानसिक भाव 
वात | हीन-अल्प-शुष्क-रूक्ष की शरीर के वर को | कठु-तिक्त- 


(५-७ +---अंड- 4 री कनश्रप-ैन नानी 7 +अन्‍के न 


अति भोजन, तृषातुर होने में अधिक श्रम, | कषाय, रूक्ष- 
पर आहार तथा छ्ुधातुर | ढुःसाहस, प्रबल व्यक्ति : लघु-शीत- 
होने पर जल का प्रयोग, | के साथ युद्ध, अति 
लंघन,. अपतपपण, विषम | व्यायाम, अमण, तीत्र- 
क समय में भोजन, द्विदल | यान को सचारी-हाथी, 
| द्रव्यों काआहार में विशेष | घोड़ा, ऊँट, रथ) मोटर 
प्रयोग-विशेषकर नीचार, | आदि पर लम्बी यात्रा, 
मुह, मसूर, चना. और | भारी वस्त को फेंकना, 
कलाय ( खेसारी ), तृण- | अधिक बोलना, उछे 
। धान्य-श्यामाक, कोद्रव, | लना-ऋदना/ जल में | 
| कूद आदि का अयोग, तैरना, मल-मूत्र-हिका- 
शुष्क शाक तथा चातछ | वसन-जूम्भा आदि वेगों 
शार्की का अयोगं, करीर | का अवरोध, मल-मूतर- क्‍ 
बेर .तथा कटु-तिक्त-कषाय | स्वेद आदि मल। का अति| 
रसप्रधान फ्लो का विशेष | शोधन, रक्त का अति 
प्रयोग । द स्राव, घातुक्षय, अत्य- 
घिंक अध्ययन, 
| शब्या में शयन और रात्रि 





प्शु८ 


हा आहार 








विंदाही, अम्ल, लव॒ण- 
रसपअधान उष्ण भोजन, 
तल से बने पदार्थों का 


अधिक प्रयोग, हरी शाक- | 


सब्जी, इमलो, आम्रातक, 


कांजी, शुक्त तथा अम्ल 
रसप्रधान फल एवं शाक, 
तक 


मदग्यसेचन, दही, 


| श्रयोग । 


अिकापयानलरईक. 





गेहूँ, माष, तिल के पदा्थ, 
पिष्टमय पदार्थ, दही-दूध- 
छेना-खोआ, लड्ड-जलेबी- 
 हलुआ आदि मिष्ठान्न, 
| श्रीखण्ड, इख का रस-गुड़- 
मिश्री-चीनी, गुरु भोजन, 
आहार में धी का अधिक 
प्रयोग, अधिक संतपक एचं 


| तथा जलचरों का मांस, 


जलपान, पयुषित जल 
का अधिक सेवन || 





तथा गोमूत्रादि का अधिक 
| सेचन, मछली, बकरा तथा 
भेड़ का मांस, कुलथी तथा 
| माष की दाल का विशेष | 


कायचिकित्सा 





प्रकोपक विहार गुण तथा 
मानसिक भाव 

तश्रसे, उपंचास, घुघा कठु-अम्ल- 

| एवं तृषा का अवरोध, | कषाय रस, 








| पोषक भोजन, आनूप-जीचों | 


| नया अन्न, केला-खजूर, 
| नारियर आदि मघुर फल, 
जल के शाक तथा फल, 
लताओं के फल, अधिक | 


धूम-धूम्र-अमि तथा 
धूल में अधिक रहना, 

विदग्धाजीण में ग्राम्य | य, उष्ण एवं 
घ॒र्मे का अयोग । लघु द्वव्य, 
अम्लविपाक, 

क्रोध-शोक 

भय-हर्ष्या । 

| भोजन के बाद दिचा- | मधुर, अम्ल, 
| शयन, अति निद्रा- | लवण, शीत, 
आल्स्य-तन्द्रा, शारी- | स्निग्ध, गुरु, 

| रिंक-मानसिक तथा | पिच्छिल, 
चावचिक सभी कार्यों से | अभिष्यन्दी 

निश्वत्ति, अधिक आराम, | रस-गुण 

चमन-विरेचन का अनु- | अधान द्रव्यों 
| पयोग, अजी'णं-मंदाप्रि | का प्रयोग, 

| आदि पित्तन्यूनता | मधुर-गुरु 
| चालो स्थितियों का | विपाक, हे, 
| अनुबंध । शान्ति, संतोष 
आललस्य तथा 

निश्चिन्त जीवन 





२. ५-+००-+-पाकनाननया “पु -सनान-- “सका न. 





| प्रकोषक रस | पक देश- 


काल 


जांगल देश, ' 


शरद-वर्षा, 


तीछ्ण, उष्ण,| ऋतु, मध्याह- 
विदाही, क्षारी-| अद्धरात्र तथा 


भोजन को 
पच्यसाना- 
वस्था और 
युवाचरुथा 


आनुप देश, 
हेमन्त-वसन्त 


ऋतु, अति: 


काल, अदोष 
के समय और 
भोजन के 
तरन्त बाद 
तथा बाल्या- 
चस्था में । 


आज्तरिक रोगोत्पादक निदान में दोष-दष्य और सर्को का एगियाशन मिजर कततान 


रोगीपरीज्षा ९१९, 


रोगोत्पादक निदान--दोषविशेषता निरपेक्ष व्याधि के उत्पादक कारणों का संग्रह 
इस शीषक के अन्तर्गत किया जाता है। दोषों की चविशिष्टता, रोगी की प्रकृति एवं 
देशकाल के ग्रभाव से व्याधि के लक्षणों में परिवत्तन हो सकता हैं। किन्तु विशिष्ट 
रोगोत्पादक निदान से नियमपूवक एक ही श्रेणी की व्याधि की उत्पत्ति होने से इस 
वर्ग का स्वतंत्र महत्त्व है । प्तत्तिका भक्षणरूप निदान से पाण्डु की उत्पत्ति, कुष्ठी-क्षयी 
आदि रोगियों की सेवा सुश्रूषाजनित घनिष्ट सम्पक से कुछ एवं क्षय की उत्पत्ति, 
रोमान्तिका, मसूरिका, कुकास, रोहिणी तथा दूसरी औपस्िक व्याधियों से पीडित व्यक्तियों 
के सम्पक से तत्तद्‌ व्याधियों की उत्पत्ति, प्रधान रूप से औपसर्गिक व्याधियों के संक्रमण 
एवं प्रसार में सहायक कीटठाणु-मशक-मूषक-श्टगाल-कुत्ता एवं शुक आदि के साथ सम्पक 
से सवंदा समान जातीय व्याधियों की उत्पत्ति होती हें। इस अकार के कारणों 
का महत्व साक्षात्‌ रोगोत्पत्ति से होता है , इसी लिए इसे रोगोत्पादक निदान कहते हें । 

दोषमूलक हेतु--दोषोत्पादक तथा दोषप्रकोपक हेतु ही दोष हेतु माने जाते हें । 
इनमें से प्रायः सभी का संग्रह उक्त कोष्ठक में किया गया हैं। शिशिर तथा हेमन्त मैं 
स्वभावतः मधुर रस की वृद्धि होती है, जिससे शरीर में शछेष्मा का संचय होता है। वही 
क्ेष्मा वसन्‍्त में सूयकिरणों की ऊष्मा से अकुपित होकर रोगोत्पत्ति करता है। इसी को 
कम से विग्रकृष्ट निदान या उत्पादक निदान तथा व्यंजक निदान भी कहते हैं । पूव 
परीक्षण के द्वारा रोगी में रोग निदानविषयक जो ज्ञान हुआ हो, उसे इन वर्गों के अन्तर्गत 
चिंभाजित करना चाहिए। .._ 

उभयहेतु--विशिष्ट दोष को अ्रकुपित करते हुए नियमित रूप से एक ही व्याधि 
को उत्पन्न करने वाला हेतु इस श्रेणी में आता है। हाथी-ऊँट-धोड़ा आदि की अधिक 
. सवारी, विदाही अज्नसेवन आदि कारणों से चायु-पित्त तथा रक्त की दुष्टि होती है। आरोहण 
में अंगों के लंटके रहने के कारण दूषित चायु-पित्त-रक्त नियमतः चातरक्त को ही उत्पन्न 
करते हैं। इसीलिए उभयहेतु प्रकोप से उत्पन्न व्याधियों में दोनों प्रकार की औषधों--- 
दोषशामक और रोगशामक--के प्रयोग की आवश्यकता होती है । इस प्रकार के निदान 
का महत्व चिकित्सासिद्धान्त स्थिर करने में है। सभी व्याधियां त्रिदोषजन्य होती हैं 
किन्तु सबके उपक्रम एवं ओषधियों एकसी नहीं होतीं । 

सन्निकृष्ट कारण--स्वाभाविक रूप से दोषों में क्षयत्रद्धि होती रहती है । ऋतु एवं 
दिन-रात में बढ़ने वाले दोषों का संग्रह कोष्ठक में है। इस दोषप्रकोप के लिए दोष- 
संचय आदि अचस्थाओं की आवश्यकता नहीं होती । इस प्रकार के. कारण व्याधि की 
तीव्रता को अभावित कर साधारण न्यूनाधिक्य कर सकते हैं और विग्रकृष्ट निदान से शरीर 
में रोग का वीज वत्तमान रहने पर रोगोपत्ति भी कर सकते हें । 

प्रधान कारण---अंपने उप्र प्रभाव के कारण शीघ्र ही दोष को प्रकुपित करके 
या चिना दोष प्रकोप के ही रोगोत्पत्ति करने वाले कारण इस व में आते हें । तोन्न विष 


तथा अबल आगजन्तुक कारणों द्वारा त्वरित विकारोत्पत्ति होती हैं। इनमें प्रधान कारण का 
निणय किए बिना चिक्िज्सा छग्से से सफ्लल्‍ना नरीं सिलझनसमी । 


६० कायचिकित्सा 


परिणाम--देश-काल-ऋतु में जो स्वाभाविक गुण होना चाहिए, उसमें विपरीतता 
हो जाने से शरीर पर कुप्रभाव होकर विकारोत्पत्ति होती है। शिशिर में शेत्य का अभाव 
या बहुत आधिक्य और कदाचयित्‌ शीत कदाचित उष्ण होना, इसी प्रकार भ्रीष्म और 
वर्षा का विपयय होना दोषप्रकोपक होता है। इस प्रकार के रोग कालपरिणामज माने 
जाते हैं । इनकी चिकित्सा भी साधारण निज दोषदुष्टिजन्य व्याधियों से प्रथक्‌ होती है । 

असात्म्यसंयोग--नेत्र-श्रोत्र-नासा-रसना एवं स्पशनेन्द्रिय-मन-वाणी आदि का 
हीनयोग या अयोग, अतियोग और मिथ्यायोग सामान्यतया सभी व्याधियों का कारण 
माना जाता है। पुरुष अपने अनुभव एचं आप्तोपदेश से हितकर तथा अहितकर भावों 
को जानता है, किन्तु संकोच, लौल्य, बुद्धिनाश एवं अयथाथ ज्ञान से श्रेरित होकर उन 
कार्यों को करता है। शअसात्म्यसंयोग में ग्रज्ञापराध या बुद्धिनाश का भी व्यावहारिक 
रूप में अन्तभाव कर लिया जाता है । 

इस विषय को संलम कोष्ठक में सोदाहरण स्पष्ट किया जायगा:ः-- 


इन्द्रियाथ| १. अयोग २. अतियोग ३. सिथ्यायोग. | परिणामज विकार 


_2हयरकय७ऋ++वायाहा5 ४ पारा १-२० पारा का उस; प5७-+>क आा>-माह वामभयरआ * सु: डकपापन बट कारन कप -माधाा डा ८ ७ ०५८ **-*4+ाल्‍ा-+ ८ 'अटारक नाए"-" कस» सए (परशा+ ४१.९ +ार.>* पा. «>>. -रबककल. अं 582 28 सका. मचा २. रानी: न ंब<-ा ०: पशाकन+ > १३० मामा कु जज अरमान अह: स्‍ रत "रात पक; नामक "डार्क आना ++मम भा कर... २९;:वक:प४--० हक 


घ्वनि | ध्वनि से | तीव्र ध्वनि वाले, | कठोरशब्द, अप्रिय | १- कण-पटह- 
दूर रहते हुए।| ग्जन-तर्जन युक्त | शब्द, इष्ट विनाश | विघात, षाधिये। 
श्रवण न | विस्फोट तथा भयंकर| के सूचक शब्द, | ३- उन्‍्माद, अप- 
करना । | ध्वनियों का श्रवण। | तिरस्कार एवं भीषण स्मार, निपात । 
| शब्दों का श्रवण । | रे. गदोद्वेंग, मूच्छो, 
अतिसार आदि । 


स्पशे स्पशेनेन्दरिय अतिशीत, अति | अतिशौत एवं अति | १- रुपशनघात । 
का सपरों | कष्ण आदि रुपशो 


आधा उष्ण का विषम | २. ब्रण, विस्फोट, 
े विशेषताओं का अ- 


प्रयोग, शीत में ज्वर । 
मे | प्रयोग | त्यधिक अनुभव । | उष्ण एवं ठष्ण में | ३.निपात,अभिषात। 
न करना | 


क शीत का अतियोग, 
| अशुद्ध एवं दूषित 
| स्पश । 





रूपद्शन। स्वशःअ-| चमकदार, अति | अतिसूक्षम, बहुत | १. दृष्टिविधात, 
| योग-नेत्र प्रकाशित, तेजःपिण्ड- विशाल, नेत्र के | अकाश संत्रास । 

रखना । | सूय-दीपशिखा- | बहुत निकट, बहुत | २. इष्टिनाडी का 

| संतप्त भट्ठी को | दूर की चस्तु को | अंगघात, मूच्छो। 

देखना । | बलपूर्वेक देखना, | ३. तिमिर, लिंग- 

; रौद्र, बीमत्स, भया- | नाश, अपस्मार, उ- 


रॉोगॉपरातक्षा प्बू्स् 


 इन्द्रियार्थ| १. अयोग | ३. भतियोग ३. मिथ्यायोग | परिणासज विकार_ परिणामज विकार 


रसस्वाद | रसहीन. | तीच्ुण, मधुर, कट | अव्यचस्थित, विषम,|१. स्वादविधात, 
या रस के आदि द्र॒व्यों का | परस्पर विरुद्ध रसों । अरुचि, अभिमांदय 
स्वाद का | अतिमात्र प्रयोग । | का सेवन, देंश-का- (३. मुखपाक, छाल- 








ग्रहण न करते  लादि विरुद्ध द्रव्यों |. स्राव । 
हुए द्व॒व्यों | का सेचन । ३. अभिमांय, 
/ 
का सेवन । अजीण आदि । 





गंध गंधग्रहण | अतितीदृण,अति | दुर्गघ, पूति-पूय- [१- प्राणशक्ति का 
क्‍ न करना। | उष्ण, अभिष्यंदी, | रक्तगंध, शवरगंघ, नाश । 
असात्म्य गन्धो का विषयुक्त गंध एच [*-ऑंतरयाय, नेत्रा- 


आपध्राण । विषम गधों का भिष्यन्द, श्वास, ज्वर! 
आपध्राण । ३. मृच्छों, उन्माद, 
'निपात । 
वाणी | मौन रहना।| बहुत बोलना, वाग्युद्ध, असत्य [१-चाक्‌शक्तिकानाश 


चिल्नलाना, निरन्तर 
बोलना । 


भाषण, अप्रिय एवं ३: स्वरभंग, उरःक्षत 


विषम संभाषण । ** राजयच्मा, 
चधास, कास । 


वेगावरोध, विना |१. मेदोवद्धि, अमेह । 
बेग के वेग अबृत्ति (२, क्षय, अशे। 





शरीर | कुछ कार्य | अत्यधिक श्रम, 
न करना, विं- | निरन्तर श्रम । 


2० तर पाानाान.. रमन 233 -साननम»>म>ममम«मममं>ममननत3 निनानन38खीीमा॥ »..रवमममम>मम>मम«>«>मममम तन. सम अमन. “पम "अम»«न--पीन्‍मी 3१०... 


श्राम की अति। की चेष्टा, चिषम ३. भम्न, विश्लेषादि। 
क्रिया करना । 
मन | मानसिक कार्य, चिन्ता, विचार, | भय, शोक, कोघ, |)- मूढ़ता, झता 
न करना। | ऊहापोह, कल्पना | मोह, लोभ, मान, त्वाभिनिवेश । 
अधिक करना । टेष्या, मिथ्याज्ञान। | *- उन्‍्माद> मूच्छो 


घआआदि । 


काल | ऋतु के अनु- | अत्यधिक गर्मी, | कभी गर्मी, कभी जानपदिक व्याधियों | 
रूप शीत- | चर्षा तथा शीत । | चर्षा, कभी अतिशीतः 
उष्ण-वर्षा न विषम परिणाम । 
_ | होना। | _  _ _ ७ [ __॒_॒॒न्न्न््न्-ए । 
विशेष वर्णन से उसके अवान्तर भेद स्पष्ट होगये होंगे। परीक्ष्य श्रेणी 
उक्त निदान के विशेष वर्णन से उ न्तर भेद र 


बी. 


में यथाशक्ति रोगोत्पादक कारणों की भली प्रकार जानकारी की चेश करनी चाहिए । जीण 
गेगियों तथा रोग के प्रति विशेष ध्यान न रखने वाले और अपद व्यक्तियों में असात्म्य 
: निदान का विस्तृत परीक्षण बहुत कठिन होता है क्येंकि.इसका अधिकांश अश्न एच 
पुरातन इतिद्त्त से ही ज्ञात होता है। रोगविनिश्वय में श्रान्ति उपस्थित होने पर इसको 


सिफोक्त प्याजिय्ान्ट्सा पडनजली ले । 


<२ कायचिकित्सा 
दोषविशेष-परीक्षा 


दोष की परीक्षा केरते समय दोषदुष्टि का ज्ञान रोग के लक्षणों और उपशय- अनुप- 
_ शय के द्वारा किया जाता है। अछग कोष्ठको में दोषों के भेद, उनके स्थान एवं स्वाभा- 
विक कम और प्रकुपित-इद्ध-क्षीण-साम-निराम दोषों के रक्षण संग्रहीत है जिनसे 
उक्त अवस्थाओं का परिचय मिलेगा । 
दोष का प्रकोप-क्षय-ब्ृद्धि इत्यादि का निणय करते समय दोषों की अवस्थाओं का 
विधिवत्‌ विचार अवश्य कर लेना चाहिये । नीचे कुछ अ्मुख दोष की गतियों का उल्लेख 
किया जाता है । द 
ज्य-स्थान एवं बृद्धि--दोष का क्षय हुआ है, साधारण स्थिति है या उसकी बृद्धि 
हुईं है अथवा विपरीत दोष की बृद्धि-क्षय के कारण कहीं क्षय-इद्धि का मिथ्याभास तो नहीं 
हो रहा है १ क्योंकि वायु की ब्रृद्धि और कफ का क्षय होने पर आयः अ्रमोत्पादक समान 
लक्षण उत्पन्न होते हैं । किन्तु कफक्षय में वातशामक चिकित्सा और चातबृद्धि में कफवर्धक 
चिकित्सा पूरी तरह से उपकारक नहीं होती, अतः क्षय-ब्ृद्धि का उचित निर्णय अपेक्षित है । 
उध्व-अधः-तियंक्‌ गति--दोषों की वृद्धि होने पर अपने अधिष्ठान से सारे शरीर 
में उनका असार होता है। कभी उनकी गति ऊपर की तरफ, कभी नीचे की तरफ, कभी 
'तिरछी होती है । दोष की गति जिस अंग में होती है, वहां दोषाधिक्य के लक्षण अधिक 
स्पष्ट होते हैं । दूसरे अंगों में प्रायः दोषदुष्टि का प्रसार अल्प होने के कारण निदुष्ट या 
अल्पदुश्स्थिति रहती है। पित्त का उषध्वंगमन होने पर शिरःशूल, मस्तकन-नेत्रदाह, 
तृष्णा, वमन इत्यादि लक्षण होते हैं , साथ ही नीचे के अंगों में 'शेत्य आदि स्वाभाविक 
स्थिति के लक्षण रहते हैं । यह विषमंता कभी-कभी अआ्रामक होती है, अतः दोष की गति 
का स्मरण रखना चाहिये । 
कोष्ठ-शाखा-ममंगति--दोषों में विक्ृति या ब्रद्धि होने पर उनका अधिष्ठान कोष्ठ 
( महाल्लोत, आमाशय, पक्काशय ), शाखा अथवा हृदय-बस्ति-सिर इत्यादि मर्म एवं अस्थि 
संधियों में होता है। इसमें शाखागत व्याधियोँ झदु, कोष्ठगत व्याधियाँ मध्य और 
ममास्थि-संधि की व्याधियाँ अक्वृत्या तीत्र होती हैं । तीनों ही विशिष्ट अधिष्ठानों में दोषों 
की दुष्टि समान है। किन्तु व्याधि की तीव्रता में बहुत अन्तर होता है। इस गति का 
ज्ञान न रहने से ममस्थ व्याधियों में तीत्र दोषशामक ओषधियों का प्रयोग और शाखास्थ 
व्याधियों में सु दोषशामक ओषधियों का अ्रयोग करने से भी पूर्ण सफलता नहीं मिलती । 
प्राकृती और बेकृती गति--पित्त स्वाभाविक रूप में आहार पाचन, रस शोषण 
रन आदि काये करता है। उसी अरकार आक्ृतिक शेष्मा शरीर का बल माना जाता 
है। यह इनकी प्राकृतिक गति या स्वाभाविक क्रिया है। इसमें विक्ृति होने पर पित्त 
कफादि के द्वारा अनेक विक्ृतियां पेदा होती हैं । इसका मुख्य तात्पर्य यह है कि-- 
किस दोष का, कौन अंश, कितनी मात्रा में, स्वाभाविक स्थिति में है और कौनसा 
अंश विकारोत्पादक है। ऋतु-देश-काल के अनुरूप दोषों में स्वतः संचय-प्रकोप 
-अस्लैजः कथाएं कछोता हे । 





रोगीपरीज्षा ६३ 


कफजन्य, वर्षा में वातजन्य और शरद में पित्तजन्य प्राकृतिक व्याधियों; इसके 
विपरीत वसन्‍्त में पित्त या वायु का, वर्षा में छेष्मा एवं पित्त का तथा शरद में 
वायु और श्छेष्मा का प्रकोष और तज्जनित व्याधियाँ चेकृतिक मानी जाती हैं । अनेक 
विद्वान इनको व्याधि ने मान कर स्वास्थ्य की ही देशकालानुरूप परिवर्तित अवस्था मानते 
हैं। रोगोत्पत्ति होने पर आक्ृतीं और बेकृती गति का निणय ऋतुओं के अनुरूप 
स्वाभाविक संचय-पअकोप-प्रशम के आधार पर करना चाहिये । 


दोष की स्थानाकृश्टि एवं बृद्धि--अनेक व्याधियों में दोष कौ इद्धि न होकर स्थाना- 
. क्ृष्टि होने पर भी दोषबृद्धि के से लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं । पक्ाशय, हृदय अथवा 
यक्ृत-श्लीहा में स्थित पित्त को, यदि वायु खींचकर त्वचा-हस्त-पादादि अंगों में ले जाय, 
तो एक विचित्र स्वरूप पेदा होता है । जिन स्थलों से पित्त का अपकर्षण हुआ है उनमें 
पित्तक्षय के लक्षण और जहां शआआक्ृष्ट पित्त का संचय हुआ है, वहां पहले से विद्यमान 
पित्त में इस आक्रष्ट पित्त का योग हो जाने के कारण, पित्तब्ंद्धि के लक्षण पेदा हो जाते 
हैं। ऐसी स्थिति में केवल पेत्तिक कष्ट को व्यक्त करने वाले हस्त-पादादि अंगों को 
परीक्षा करके, यहां पर. पित्तइंद्धि है, ऐसा निदान कर पित्तशामक ओषधियों के अयोग 

से चिकित्सक को सफलता नहीं मिल सकती । यहां स्थानाकृष्ट दोषों का स्वस्थाननयन 
. और प्रेरक दोष की शान्ति की चेष्टा से ही छाभ होता हैं। इसलिये स्थानाकृष्टि 
और वृद्धि का सम्यक् निर्णयपू्वेक पूर्ण परीक्षण करके उचित व्यवस्था की जानी 
चाहिये । 


आवरक और आबृत--एक दोष या धातु से दूसरे दोष या घातु का आच्छादन 

हो जाने पर, बाहर से अच्छादक या आवरक दोष के लक्षण और मूल में आच्छादित 
या केन्द्रित दोष के लक्षण ज्ञात होते हैं। इसग्रकार पित्ताइत वात, कमाइत वात या 
रक्तमांसादि, आबृत वात के प्रथक-प्थक लक्षण होते हैं। आमवात में वेदनाकारक 
मुख्य दोष चात है, किन्तु आवरण और सामता-गुरुता आदि बाह्य लक्षणों को व्यक्त 
करने वाछा आवरक *हेष्मा होता है। शेष्मा के द्वारा शलेष्मस्थानों में चायु का अचरोध 
हो जाने के कारण छछंष्मस्थानों में ही आमवात को अधानता होती है। उसीश्रकार 
वातरक्त में रक्त और चात के विशिष्ट कारणों से स्वतन्त्र रूप में दूषित होने पर भी, 
रक्त के द्वारा वायु आब्त किया जाता है, अतः व्याधि में अधिक चश्चलता नहीं रहती । 
स्पर्श द्वेष-निस्तोद आदि मुख्य दक्षणों के साथ ही रंक्त-बिस्फोट, रक्ततण का शोथ इत्यादि 
रक्तावरण के लक्षण अधिक व्यक्त होते हैं। इस विवेचन का चिकित्सा में महत्व हे । 
जबतक आचरक दोष का भेदन न हो, आबृत दोष के शोधन या संशमन से व्याधि का 
उपशम नहीं हो सकता । इसीलिये आमवात में लब्बंन, पाचन, हरुकषेन्उष्ण प्रयोगो के द्वारा 
'छेष्मा का विलयन करने के उपरान्त ही चातशमन का उद्योग किया जाता है और 
वातरक्त में गइच्यादि पित्तशामक, रक्तःसंशोधक द्रब्यों के प्रयोग से रक्तशुद्धि होने के 


. कायचिकित्सा 


अधान-अग्रधान दोष -- बहुत से रोग सामान्यदृष्टि से एक दोषज ज्ञात होने पर 
भी सूछम विवेचन करने प॑र दो दोषों से उत्पन्न ज्ञात होते हें। एक दोष प्रधान और 
दूसरा अग्रधान होने के कारण सामान्य दृष्टि से केवल प्रधान के लक्षणों का ही ज्ञान होता 
 है। शरद ऋतु में पत्तिक प्रकोप से होने वाले ज्वर में अल्प मात्रा में कफ का अनुबन्ध 
रहता है ( कुर्यात्‌ पित्त च शरदि तस्य चानुगतः कफः ) और चसन्‍्त ऋतु में मुख्य 
रोगोत्पादक दोष श्छेष्मा होने पर भी वात-पित्त का अनुगमन विकारोत्पत्ति में रहता 
ही है। चिकित्सा के सिद्धान्त स्थिर करते समय दोषों का यह क्रम ध्यान में रहने से, 
व्याधि-निमूलन में कठिनाई नहीं होती । शारदौय ज्वर में पित्तशामक अयोगों के साथ 
ही ेष्मा की वृद्धि न हो जाय; इसके लिये भी व्यवस्था करनी पड़ती है । 


एकदो षज-संसगंज एवं सन्निषातज आदि भेद---कुछ व्याधियों एकदोषज, कुछ द्वरंदज 
या संसगज तथा कुछ त्रिदोषज होती हैं । उनमें भी समबल-विषमवल अथवा हीनवल- 
मध्यबलारब्ध भेद से अनेक भेद होते हैं । लक्षण एवं सम्प्राप्ति के द्वारा इनका निर्णय 
होता है। कुछ व्याधियों' अक्ृत्या सन्निपातंज होती हैं यथा क्षय, कुष्ठ, प्रमेह आदि । 
कुछ एकदोषज या संसगज होती हैं, बाद में दूसरे दोषों का अनुवन्ध होता है । 
अशांशचिकल्पन के द्वारा होने वाले भेदों की कोई सीमा नहीं । इसग्रकार का विवेचन 
पत्येक रोगों में करना चाहिए, यह कोई रोग का भेद नहीं--रोगी को भेद माना जाता 
है, यहां दिग्देशनमात्र किया गया है। सभी व्याधियों में यह स्थिति संभव है। आगे 
सम्प्राप्ति के श्रकरण में इस विषय का कुछ चिवेचन किया जायगा । 


दोष की विभिन्न अवस्थाएँ--दोष के द्वारा शारीरिक द्वव्यों की दुष्टि एवं उससे 
व्याधि की उत्पत्ति तक दोष की अनेक अवस्थाएँ होती हैं । ऋतुओं के अज॒रूप दोषों के 
संचय-अकोप-अशम का वणन पहले किया जा चुका है। यहां.विक्ृति समारब्ध दोष की 
अवस्थाओं का वणन किया जायगा । 


१. संचय :--दोषों का. स्वस्थानों में अतिमात्र संचय रोगारंभ की पहली अचस्था 
है। वातादि दोषों की अपने समान ग॒ण-कर्म वाले आहार-विहार के सेवन से अपने- 
अपने स्थानों में जो त्रद्धि होती है तथा शरीर में बाहर से ग्रविष्ट विष-जीव णु आदि की 
शरौर में अनुकूल अवस्था आने पर जो वृद्धि होती है, उसे संचय कहते हैं । जिन 
कारणों से वातादि दोषों का संचय हुआ हो उनके अ्रति द्वेष तथा उनके विपरीत गुण- 
धम वाले आहार-चिहार के सेवन की इच्छा होना, यह सभी दोषों को संचयावस्था का 
सामान्य लक्षण है। संचयकाल में ही दोषों का निहरण करने पर अकोपादि उत्तर 
अचस्थाएं नहीं उत्पन्न होने पातीं। वायु का संचय होने पर पेट वायु से भरा हुआ, 
: जकड़ा सा- तथा- पित्त -का -संचय होने-पर शरीर में कुछ पीलापन तथा उष्णता 

ओर श्ेष्सा का संचय होने पर शरीर में भारीपन तथा आलूस्य का अनुभव 
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२. प्रकोप :---अपने मूल स्थानों से दोषाधिक्य के कारण दोष में विविध गतियों 
से उन्मागे गामिता होना अ्रकोप है। अकोपावस्था में मु स्यतया कोष्ठ में वेदना, अम्लता, 
तृष्णा, दाह, अन्नद्वेष तथा हृदयोत्क्रेश के लक्षण होते हैं । प्रकोप के कारणों का वर्णन 
आगे कोष्ठक में विस्तार से किया गया है।' 


२. प्रसार ः--प्रकोप के उपरान्त दोष सारे शरीर में फैल जाते हैं। किन्तु इस 
स्थिति में भी रोगी को रोग का अनुभव नहीं होता । थोड़ी बेचेनी, अरुचि, कण्ठ में 


धूम्राम्ल दाह, अंगमद, उदर में आध्मान, गशुड़गुड़ाहट तथा छर्दि आदि साधारण 
अस्वास्थ्यकर लक्षण पंदा होते हैं--विशिष्ट व्याधि की स्थिति का ज्ञान नहीं हो सकता ५ 


४. स्थानसंश्रय :--असरावस्था में यदि दोषों की चिकित्सा न की जाय तो श्रकुपित 
दोष रसवाहिनियों के द्वारा सारे शरीर में फेलते हुए, ख्लौतो बेगुण्य के कारण शरीर के 
किसी अवयवच में जहां रुकते हैं, वहां एक या एक से अधिक दृष्यों को दूषित कर तथा 
उनके साथ मिलकर स्थानानुरूप चिकार उत्पन्न करते हें। शरीर की जो धातु या अंग 
अक्षम या दुबल हो, दोष-निदान की अकृृति से जिस धातु या अंग की समता हो, 
वहीं दोष केन्द्री भूत हो जाता है--उसी को दोष का स्थानसंश्रय कहते है । 
इस अचस्था में व्याधि की पूवरूपावस्था के लक्षण पेदा होते हैं। दोष-दृष्य एकता होने 
पर भी गति-अचस्था आदि में भिन्नता तथा दोषों के स्थानसंश्रय में भिन्नावयवता 
होने के कारण व्याधियों में भेद होते हें । 


५. अभिव्यक्ति :---इस अ्रव॒स्था में रोग के सारे लक्षण व्यक्त होते हैं-। दोषों का 
बलाबल तथा व्याधि की तीव्रता आदि का ज्ञान होता है। संचय-प्रकोप एवं प्रसार में 
दोषविनिश्चय करके हेतुविपरीत चिकित्सा की जाती है। स्थानसंश्रय के उपरान्त 
व्याधि को प्रकृति के अनुरूप हेतु-व्याधि उभय विपरीत व्यवस्था करनी होती है । 


निम्न कोष्ठक में वातादि की संचय-ग्रकोप-प्रसरस्यिति के लक्षण संग्रहीत हैं । 


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संचय॒ | कोष्ठ की स्तब्धता या | मन्दोष्मता, पोताब- | आल्स्य, अन्न- 
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अ्रकोष | कोष्ठ में वेदना तथा बायु | अम्लोह्ार, पिपासा | अच्द्वेष, हक्लास। 
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प्रसार आटोप, विरुद्ध गति ।. | ओष-चोषादि बेदना, | अरोचक, अवि- 
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७२ कायचिकित्सा 
दृष्य विशेषपरीक्षा 


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दन्त-रोम तथा ओज ) , धातुमल ( लाला-अश्रु-रंजकपित्त-कणमल-जिह्ना-दन्त-कक्षा तथा 
शिक्ष का मल-नख-लोम-ेत्र का कीचड़-मुख का ज्लेह-युवा पिडिका तथा श्मश्रु ) 
और मल तथा मूत्र को दुष्य कहा जाता है। दोषों के द्वारा दूषित होकर विकृत 
होना--व्याधि का रूप धारण कर लेना, इस कार्य की धातुएँ समवायिकारण होती हें । 
दोष-दृष्य सम्मूछेना के बाद ही व्याधि का जन्म होता है। त्वचा-मेद-अस्थि आदि की 
सामान्यदुष्टि का वर्णन पहले सामान्य परीक्षण शौषक के अन्तगत किया जा चुका है । 
धातुओं में वातादि के द्वारा दृष्टि होने या उनकी वृद्धि-क्षय होने पर जो विशिष्ट लक्षण 
उत्पन्न होते हैं, उनका संग्रह साथ के कोष्ठक ( कोष्ठक संख्या ८ ) में किया गया है । 
दोषों के द्वारा अथवा औपसर्गिक जीवाणुओं के द्वारा दृष्यों में होने वाले विशिष्ट परि- 
वत्तनों तथा स्वाभाविक अवस्था की उनकी मर्यादाओं आदि का आगे यथास्थल उल्लेख 
किया जायगा । धातुओं की दुष्टि का प्रभाव उपधातुओं तथा धातुओं के मलों पर भी 
पड़ता है । इसलिए दृष्यपरीक्षण में धातुओं की दुष्टि का अनुसंधान करते समय उप- 
घातुओं तथा धातुसलर की विकृृतियों का भी परीक्षण और उल्लेख करना चाहिए । 
बहुत बार दुष्टि का अनुमान धातुओं के कार्यों के द्वारा लगाया जाता है-स्वाभाविक अवस्था 
में घातृपधातुओं के द्वारा सम्पादित होने चाले कार्यो का अभाव या अस्वाभाविक अथवा 
विपरीत काय-लक्षणों की उत्पत्ति आदि के द्वारा दृष्यता का परिमापन किया जाता है। दोषों 
के समान धातुओं की दुष्टि का अनुमान भी उनके अधिष्ठानों या केन्द्री में अधिक स्पष्ट 
होने वाली विक्ृति से किया जाता हे ( अधिष्ठानगत विकृतियों के परीक्षण की विशेष 
पद्धतियाँ आगे परिशिष्ट में संग्रहीत हैं )। रस दुष्टि के कारण आमाशय, हृदय तथा 
त्वचा में विकृति के लक्षण उत्पन्न होते हैं तथा लालाग्रसेक के द्वारा रस-मल ( छाला- 
स्ताव त॑या अश्नु ) की दुष्टि भी अभिव्यक्त होती है। रक्तदुष्टि के कारण रक्तवाहिनियों के 
माध्यम से सवशरीरब्यापी लक्षण उत्पन्न होने के अतिरिक्त, रक्त के मुख्य अधिष्ठान- 
यकृत और प्लीहा में प्रधान चिक्ृति होती है। इसी कारण रक्तदुष्टि जन्य सभी जीण 
व्याधियों में यकृत तथा प्लीहा की दृद्धि-क्षय-कार्यनाश आदि अनेक विक्ृतियों उत्पन्न हो 
जाती हैं । इसी क्रम से माँस-मेदादि की दृष्यता का भी परिज्ञान करना चाहिए | शनिदेव 
की गति के समान एक धातुगत दुष्टि का प्रभाव अनुलोस तथा प्रतिलोम गति के द्वारा 
पूर्वापर धातु पर पड़ता है। रक्तदुष्टि का अभाव मांस तथा रस दोनों पर पढ़ता है । 
इसी कारण जीण व्याधियों में प्रायः सभी धातुएँ विक्ृत हो जाती हैं । दूषित धात के 
द्वारा सम्बधित होने वाली धातु दूषित हुए विना केसे रह सकती है ! किसी एक धातु 
की उप्र दुष्टि या अत्यधिक क्षय-जृद्धि का अभाव साहचये सिद्धान्त के अनुसार समीपचर्त्ती 
धातु पर भी पड़ते लगता है । फलस्वरूप कुछ समय बाद चह धातु भी विक्ृत हो जाती 
है। इसी क्रम से सभी घातुएं आक्रान्त होती हैं । अत्यधिक शुक्रक्षय के कारण मत्जा 
का क्षय होता है और घौरे-घीरे मन्जा का क्षय हो जाने पर अल्थि का नम्बर आता है । 


रोगीपरीक्षा दे 


इसी क्रम से अन्त में रक्त-रसक्षय के लक्षण उत्पन्न होते हैं। यह अतिलोम क्षय हैं। 
इस श्रेणी की विकृति में सभी घातुओं का संतपंण करने के अतिरिक्त शुक्रक्षय का विशेष 
उपचार किया जाता है, क्योंकि जब तक व्याधि के मूल का नाश न होगा--स्थायी 
निवृत्ति न होगी । धातु का क्षय होने पर उपधातु तथा बातुमल का भी क्षय हो जाता 
है। इन्हीं कारणों से दृष्यपरीक्षा को मूल्यांकन समष्टि में ही किया जाता है । किसी 
एक धातु या एक अंग के सुख्यरूप में विक्रत होने पर दूसरें धातु तथा अंग भी विकार 
ग्रस्त हो जाते हैं। इसी कारण प्राचीन चिकित्साविज्ञान में अंग-प्रत्यंगों या अवयवी को 
विकृति का वर्णन कम है, अवयवी की--सर्वशरीर की--विक्ृतियों का वर्णन अधिक 
है। अतिकर्म की दृष्टि से अवयर्ों की विकृृति का रुचतंत्र महत्व होने पर ही हृदयरोग, 
वस्तिरोग, अहणी, उदर आदि का प्रथक वणन किया गया हैं । आमाशय- 
प्रदाह, बृहदंत्रशोथ, अग्न्याशय विकार आदि का स्वतंत्र क्रियाक्रम न होने के 
कारण प्रथक्‌ उल्लेख न करके अम्लपित्त एवं अतिसार-प्रवाहिका आदि में अन्तर्भाव 
किया गया है । 


ऊपर अनुलोम तथा अतिलोम दोनों प्रकार की विक्ृतियों में कुछ काल बाद सारी 
धातृपधातुओं को विक्ृृति का उल्लेख किया जा चुका है। किन्तु शरीर में व्याधियों का 
सर्वाधिक प्रभाव रक्त तथा मूत्र पर पड़ता है। रक्त दोष-घातु तथा मलों का वाहक है, 
अतः चाहे रक्तगत॑ विक्ृति हो या न हो, विकृति का कुछ न कुछ परिणाम रक्त पर 
अचश्य पड़ता है। विक्रति के कारण उत्पन्न विजातीय द्रव्यों को शरीर से निकालने के 
लिए सर्वसाधारण मार्ग मूत्र है, अतः सावदेही व्याधियों के परिज्ञान का रक्त के बाद 
दूसरा साधन मूत्र होता है। स्थानीय विकारों का शोधन स्थानीय मर्लों से होता रहता 
है--यथा श्वसनसंस्थान की विकृतियों का शोधन पछ्लीवन के द्वारा, महाल्लीत या पचन- 
संस्थान की विक्ृतियों का मल के द्वारा तथा त्वचागत विक्वृंतियों का शोधन स्वेद आदि 
के माध्यम से होतां रहता है। प्लीवन-सल-नासास्ताव-कीचडू आदि को परीक्षा से 
केवल स्थानगत विक्वतियों का परिज्ञान होता है, किन्तु रक्त तथा मूत्र के परीक्षण से 
सभो व्याधियों के बारे में कुछ न कुछ जानकारी अवश्य आप्त होती है। अतः रक्त और 
मूत्र को परीक्षा से आप्त तथ्यों का आगे विस्तृत वणन किया जारहा हैं । 


यहाँ पर रक्त एवं मृत्र की स्वाभाविक मर्यादाओं के उल्लेख के साथ, उनमें होने 
वाले परिचर्चनों के आधार पर व्याधि निर्देश भी बताया गया है। विशिष्ट व्याधियों 
के परिणाम स्वरूप होने वाले परिवत्तनों एवं विशिष्ट परीक्षाओं का उल्लेख उनके प्रकरण 
में स्वतंत्र रूप से किया जायगा, यहाँ केवल प्राकृतिक मर्यादागत सामान्य परिवत्तेनों 
का निर्देश किया गया है, क्योंकि अविशिष्ट स्वरूप के इस परीक्षण से भी कभी कभी 
विशिष्ट रोगों के निर्णय एवं दृष्यता का सही निर्धारण करने में पर्याप्त सहायता 
मिलता है। 


कायचिकित्स| 


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८३ 


रोगीपरीक्षा 


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कायचिकित्सा 


< 3 


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३१ किडिए कै ॥ेलैटप 


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रोगीपरीज्षा 


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कायचिकित्सा 


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८७ 


रोगीपरीक्षा 


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काय चिकित्स! 





८८ 


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/श है 0952 ५०३॥|२2॥॥8 2(& १8 ५०३)॥६ [६ ।8/90 ५६७४ (॥६ 
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७९०२१॥)०।५९।७|५: म व॥छ#एछड४.. कडेछ. ॥#कतछ३ | कधां8&४ है. फिबट ४ 
॥० ;(० ४ ४५०२ ॥॥२७७७ 


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७. च्यार्व्य ७ (अक.आ  -34. हा अहम ७७.० "भा. पीयुनन.. "मनमगाकु 


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ब्ब 
सम मिस क कफ म मम अभि फल अफकककककअक न अचल नुनुु/ईलबलबलइ_ललबंबलइाााअअारंााााा७एएांशा _>-+«>+-भूनन- आरसाहाल" ।ामात "नाम" ज मूल एस पश-कयमू मकर पकमत८ ०००५ मूक नानक नम डन्‍क+«-_ ०. गएणमुहुबक मजाक उमा एह भूजइइुगूएल्‍-- "उर्फ पहतका...६८०-ममताकान समा पालक". टिपाधाानबनभमकह 
बा 
हि 
3.-७-७83-38..-0 कर. कक »-- १-० ३७.५० या >>. गा. -न्‍प, 





(89१/०0ए[र7प्प८"] ) 
9॥2%)३४७ '॥2 


हक, 


हो, 


कायचिकित्सा 


्टेछ 





प |६४।७४४७ | ॥%१०४ ५ श॒शणप् 
'पूछ ) ७७४ ५७ !९ >2%8)/ “+२२)३८॥ ॥0॥2/))३]क 
(६ हाप्प०ध्ज्राणभ्‌ एणफ्र ) ॥ै७४७६४ ४७४७ 
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-0प०"७ ) ॥४/०४७६३ ५॥/७॥॥२४७ +६०७ (९४१ए०7७००प७ 
[छाय०१०४१ ०१४० ४47०७ ) #॥858/220& . 200]॥॥2 
४226. ॥82 ४3५] ॥]६ ॥%०१%|७)३ 0०० ५%८]|॥६ 
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रोगीपरीक्षा 


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5३ 


रोगीपरीक्षा 


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कायचिकित्सा 


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रोगीपरीक्षा 


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कायचिकित्सः 


५९६ 


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५९७ 


रोगीपरीक्षा 


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४६ (एाण&णफ्त ) ४४००४ ६ ( श0००/१7७] ) »8॥9४ ( श8०7प००]ए ) 
॥%%%& < छग्पव ०] ) अफकद 8 25४ (७४ ४३४४६ %ऐे 
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है. 2) >फकरा8 ७8 ५%)है&. ०९२ 2%॥4 १2४१०७ ४2 (४३४3 


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सकी, 


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५०।२)। ९2२ --#शुछफ 


8 ६ ॥ -॥४२ ५४8७ $ ५४०23 ३)॥:५७>२४६ के ५. 


कल 


कायचिकित्स! 


८ 


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((७४9०78006[8 [४ए०प्त) 28४%४ ॥.४४६ (शाक्षा[०प्र ४०३०१शत) ३एव४ (0%।द |॥ ६१ [३ #थे ॥॥203 


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॥2:8 4028॥% ।0%४ ६ ॥&7 ॥ ॥।टादे] ३) रहफ ॥80२ 2॥2 % ६२५ #६ ५३१॥|३॥४2 
उस है व्परे)॥2 कट ७॥ >िशिल. ६ पथ०३॥४ 8/ ॥00  ४2॥% ( जु००प० ) 
॥28223 ५ 9वराए897व [शुप्रध्व०७४१ पा ) बम #8॥ 0२ 2॥3॥ (222]8|#% 
209%3/2200 “१ ॥॥7९॥/7० /23%]व809,६ ॥ 2063 '[॥ ॥6॥30॥& 88% ४. 598॥2% [५ 
श आर2॥5 7%0७४ १%९७॥६ १५ ७॥४ २28) है 82५ ५१६॥90 [॥& ४] २|॥६ 


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कि॥5 % [7०४ +2॥22% ४ | 3। “2% ९] ५४०08)॥2॥8 .२२॥४|३-20९-)|२०/2.] /2%।3 ६ ४7 | ४४ [[2॥3॥६ 3 


| है ॥०७४७ शशातद 36 | ४ ॥2५९॥०2 2७ 202॥५५)७ %£४, ॥&)> 
(छपा0०7४४०पृवंग4तु ) >शि७॥४४७ (४ ४७ +4958 “0॥2/808४ ( घा०ए[एफ 
0०१४0) ) ॥72४७७३|७ “(8०४०५ ०प१ पा 8[88१88१ 9४ ) /६७3७७ 9॥0७३॥& 
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रोगीपरीज्षा 


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कायचिकित्सा 


१4७७ 


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रोगीपरीक्षा 


१0०3 


दुष्य विकृति निदर्शक कोष्ठक : कोष्ठक संख्या-१२ क. 


त्वचा ( रस ) 


दोष 


चात 





रुक्ष, स्फुटित, सुप्त, कृश, शीण, 
रफुरण, तोद तथा चुमचुमायन- 
युक्त त्वच ॥ 


पित्त विस्फोटक, मसूरिका ! 





कफ स्तनच्धता, श्वेतांगता । 





च्य रस क्षय होने पर हृदय प्रदेश में 
पीडा, कम्प, शुज्ञ्यता, तीत्र तृष्णा, 
| ऊंचे शब्द न सहन होना, हृदय 
के रुपन्दनों का बढ़ना तथा हृदय 
में शुल, शरीर में रुक्षता तथा 
रूलानि और अल्पश्रम से ही 


अधिक थकावट का अनुभव । 





वृद्धि लाला असेंक, हृदयोत्क्रैदः तथा 


'लष्मवृद्धि के लक्षण । 


सिम >----+-+मप पाए. एप का. अऑिशशकन-न+न- जनफन->ऋनध्कणशणण75. 
शकमआ+------ा "मम "सामान. 


कृष्णारंण वर्ण या विव्णतायुक्त 


रत्त 





संतापयुक्त तीव्र वेदना, विचर्णता: 
ब्रण, सुप्ति एवं रक्त वणता, अरुचि, 
भुक्तान्न का स्तंभ, भ्रम, कृशता । 





| 


विस पे, दाह । 
पाण्डुरोग । 


त्वचा की परुषता, ककशता, 
हक्षता एवं. विदार, अम्ल-शीत 
पदार्थों की अभिलाषा, सिराओं 
की शियिलुता । 


सिराओं की पू्णता तथा ननेत्रों 
एवं शरीर की आरतक्तता, विसपे, 
कुष्ठ, चिद्रधि, वातरक्त, रक्तपित्त, 
रक्तगुल्म, ज्ञीहा की व्याधियों, 
कामला, व्यंग, अ्रप्निमांथ, मूच्छों 
त्वचाननेत्र तथा मूत्र में ललाई 
आदि विकार । 


१०२ कायचिकित्सा 

__ दृष्य विक्ृति निदशक कोष्ठक : कोइक ख, 

दोष |... मांस हे मेद अस्थि 

बात | अंग गौरव-सतब्धता-तीद् अंग गौरव, तीत्रतोद- | अस्थिपव भेदनवतपीडा, 
पीडा-क्लान्ति, शूल एवं | भेदनवत पीडा, श्रम एवं | अस्थिशूल-शोष एवं भेद, 











वेदना युक्त ककश ग्रंथियाँ, | श्रम, मन्द वेदना युक्त | बल-मांसक्षय, संधि-सक्थि 
भ्रम । ब्रणहीन ग्रथियाँ - तथा | शुरू, अनिद्रता एवं सतत 


। 
| 
। 


तोदयुक्त ककेश ग्रंथियाँ । | बेदना । 
पित्त | मांसगत पाक, मांसकोथ । | दाहयुक्त ग्रंथि, तृषा एवं | अत्यधिक दाह । 
स्वेद की अधिक प्रद्त्ति । 








कफ अपची, गुरुता | अमेह, मेदोरोग । 
एवं आदइंचर्मावनद्धता का 
अनुभव । 


अस्थि स्तव्घता / 


क्षय | मांसल स्थलों की शुष्कता, | प्लीहाभिद्ृद्धि, संधिशुल्यता, | रुक्षता, श्मश्रु-केश-रोम- 
रूक्षता, तोद, अंगमद, >> स्निग्ध मांसाहार | दन्‍त-नख-अस्थि का भम्न, 
घमनी-शिथिलता, संधियों | क्षी आकांक्षा। नेत्रों में | संधियों तथा अस्थियों में 
में वेदना । थकावट,उदर का अ्रपचय, | शेल, शिथिलता तथा 
शरौर की कृशता, संधियों | जलता का अनुभव ! 
में फूटन, कटि में स्पशे- 
शज्यता । 





ऋचा 3ऋऋबबबक घर क्‍++ नमक 5. नम. सम+-+ «नह म७७+ मम  पन-नपनन-. हनन मम 


वृद्धि | मांसल स्थंछो--नितम्ब 





अति ल्लिग्धता, उदर-पाश्व | अध्यस्थि तथा अधिदन्तों 
कपोल-वक्ष-जंघा आदि में । की वृद्धि, कास-छिन्नश्वासो | की उत्पत्ति, दांतों तथा 
मांसोपचय, गुरु गात्रता त्पत्ति, शरीर में डुगंधि, | अस्थियों की वृद्धि । 

तथा गलगण्ड, अबुद, | झ्थूछता, थोडा चलने से 

ग्रंथि, कण्ठ-जिह्ा-तालु में | थक्रावट, स्तन एवं नितम्बों 


मांस की बृद्धि आदि | क्वा लटकना ( चलत्‌ स्फि 
विकारों को उत्पत्ति । गुदरस्तनः ) | 


रोगीपरीक्षा १०३३ 


दोष मजा शुक्र 









वात अस्थि सुषिरता तथा रुतब्धता | शीघ्र रुखलन, वासनाधिक्य, गर्भे- 
शेष लक्षण अस्थिगत वातवत | | पात तथा शीघ्र गर्भ धारणा, शुक्र 
क्षीणता-तारल्य-अग्रवृत्ति-फेनिल- 
रूक्ष और अवसादि दोषयुक्त तथा 

श्याव-अरुण वण का । 








विचर्ण या पीत चण का पूर्ति 
युक्त, रक्त मिश्रित, उष्ण तथा 
निकलते समय शिश्न में दाह 
पंदा करने वाला, दुगन्धि-पिच्छि- 
लता रहित, निकलते समय मूत्र- 


| मार्ग में रुकने वाला, कचित 
| अतिपिच्छिल । 


शुक्र का शुक्राशय में अति संचय 
तथा जल में डालने पर कुछ नीचे 
डूबने की प्रवृत्ति । 


पित्त नख और नेन्न हारिद्र वण के । 











कफ श॒क्ष नेत्रता 


आम 
शिश्न एवं बृषण में वेदनां, मेथुन 


क्ञ्य अल्प शुक्रता, पव भेद, अस्थियों 
में अशक्ति, शुक्र का अल्प असेक 


में निस्तोद-क्षीणताःशून्यता-डुब- 


वृद्धि 


लता-लघुता का अनुभव, शुक्र 
की अल्पता, वात रोग का बार- 
बार आक्रमण, चक्कर आना तथा 
आंखों के सामने अंधेरा होना । 


ली छा 
नेत्र गौरच, सर्वोग गौरव तथा 


तथा अस्थि-संन्धियों में स्थूल 
मूल वाली कश्साध्य पिडि- 
काओं की उत्पत्ति । 


अथवा शुक्र रक्त युक्त, दुबलता, 
मुख का सूख़ना, पाण्डता, थकावट 
काम करने में अशक्ति, नपुसकता, 
प्रजनन-अशक्ति । 





शुक्ातिवृद्धि, अतिमात्र श्रसेक, 
शुक्ाश्मरी, मैथुन की अधिक इच्छा। 


१०४ क्रायचिकित्स 
दृष्य विक्ृति निद्शक कोष्ठक ४ को ४क-घ. 
दोष मृत्र पुरीपष 


नल बार आकर 


बात मटमंल्य या धुर्वें का रंग, बार-वार | मल श्याव-अरुण चण का हूक्ष- 
! अल्प मात्रा में मूत्र प्रवृत्ति, मूत्र | शुष्क, गांठदार, अल्प मात्रा मे । 
| सपश में शीत एवं रुक्ष, मूत्रत्याग 
| के समय रोमाझ का अनुभव । 


कराकंमकर मनन रनामकान--पिपये 8: 7: ::मोतस्‍जॉकीओ 











टर++म-्ाा०+ क्रम. नक्‍य्र--ोधाएक्‍ ९ ५०७...“ >७००७०७७५ ५3७०६. ०००००ऑिला सनक ना एममााआ ३०००. ए4४«+-+3-»शमा्रकयाआ.--4३४०> मरना» >+>+33++अनप-+++७७६ 4» 3५.०० “अक. 


पत्र लाल, गहरा पीला या हारिद हरे-पीले रंग का पतला, अधिक 


पक्का टुगन न्प्यू युत्त, रूुपरा ० ब | मात्रा में मल, णपाय उष्ण एच 
उष्ण और मात्रा में अल्प! | दुर्गन्धित । 
| 























' जल के समान निमल एवं पतला | मल सफेद रंग का गीला, चिकना 
मूत्र, चावल के धोवचन के समान | और मात्रा में अधिक । 

| तथा फेंन युक्त, मात्रा में अधिक, 

स्पश में शीत-पिच्छिल और 
मधुर-अम्ल गन्ध वाला 








'बककमाप) ता 


पेट में रूक्षता तथा वायु के प्रकोप 


से आंतों में ऐंठन, हृदय और 


दल का विवर्णता, चस्तिस्थान में 
डा, मूत्रके साथ रक्तद्चाव, मुख 
पचना तथ 


क््य मूत्र अल्प, मृत्रत्याग़ के समय कष्ट, 
। 
। 


९ ७० 
पाश्वच में पीडा, गुड़गुड़ाहट के 


साथ वायु का ऊपर कुक्षि में 
संचार, हृदयावरोध । 








(मम मम जम शिल डलिलीनिनिदिशमिनिशिशिभ मिमी 
आटोप, कुक्षिशुछ, गुड़गुडाहट, 
उदर में भारीपन । 









शि का बढ़ना, मूत्रत्याग की 
न्‍च्छा, चस्तिदेश (पेड़) 

पर भारोपन या चेदना, मूत्राशय 
सूची चुभने की सी पींडा, 
त्रत्याम के बाद भी मूत्र नहीं | 


आ हैं, इस अकार की भावना 
नो रहना । 





। 
ह् 





| # 


_ 55 ७७०३२-६६:७:८७नत “20% 92 स आ 


रोगीपरीक्षा थू ७५. 
विक्रतिसंग्रह 
पूर्वोक्त विधि से विस्तार पूचक रोगी का परीक्षण करने के उपराम्त प्राप्त 
संग्रह करना चाहिये । यहां पर प्रकृत-बिक्षत भाव अर्थात्‌ रोगा के 
क््याप रिवितेन हुआ, यह विवेक पूवंक सन्‍्तुहित निणय करना होता है! इस शापक के 
 अ्रन्तगेत रोगी में व्याधि के कारण उत्पन्न नत्रीन लक्षण तथा स्वाभाविक 
होने के कारण उत्पन्न छक्षण और हेतु-दोष-दृष्य परीक्षण में बताये गए विशेष प्ररोश्नणो 
से ग्राप्त परिणाम, इन तीनों का चर्माक्वत संग्रह करना चाहिये। 


३ | की 4 
वानश्रय 

ऊपर विक्ृतिनिदर्शंक संग्रहीत लक्षणों की आगे लिखे हुए वर्गों में कि 
सभाव्य व्याथि से तुलना करते हुए रोग का निणय किया जाता हैं। बहुत से रोगियों 


में रोग का पूरा इतिशत्त जान सकना कठिन होता हैं। यह कठिनाई जीण रोगेयो 
ख्लरियों, बालकों, ग्रामीण एवं अशिक्षित व्यक्तियों में अधिक सामने आतो हैँ । इसलिये 





न््म्म ७५ (था के 
कल मे च्रदयाता 








पडता है । उक्त परीक्षण से दोष-दृष्य की विशेषता और व्याधि का कुछ न कुछ अनुमान 
अचश्य हो जाता है। चिकित्साग्रन्थों में वर्णित व्याधिलक्षणों से याप्रछृक्षणों को 
नलना कर दोष और व्याथि का निणय किया जा सकता हैं। कदाचित्‌ डस विशेष व्यय 


००. 


के लक्षण रोगी में उपलब्ध न हो तो उनके बारे में पुनः रोगी या कुद्ठम्बबा से भला 





प्रकार पूछ कर संशय मिटाया जा सकता है। इन सव अयला। के बाद भी बहत से 
रोगों का निर्णय नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में निगूढ़ व्याधि का निणय 
अजुपशय के द्वारा करना पड़ता हैं। आगे इस विषय का अजुक्रम से चणन किय 
जा रहा है । 

१. सोगोत्पादक कारण--रोगोतत्ति में दूसरे कार्यों की उत्पत्ति के समः 
कारण--समवायी, असमचायी तथा निमित्तकारण होते हैं। व्याधि की उत् 
समवायी कारण ओर निदाना दूषित एच स्थानसंश्रित दोष का दृष्य के साथ संयार 
जिससे रोगोत्पत्ति होती ह ---असमवचायों कारण हेँ। असात्म गन्द्रियायसयोग, सध्य 
आहार-विहार आदि निमित्त कारण माने जाते हैं । रोगोत्पादक कारणों के पराकत 
समय इन सबका अलग-अलग परीक्षण और उल्लेख करना चाहिए ' 






















बुद्धिमान तथा शंकाशील रोगियों में रोगोत्पादक कारण को जान सकना कठिन 
है। किन्तु जीण व्याधियां से पीडित और अशिक्षित एवं ग्रामीण व्यक्तियों में निंदा $* 
तो दूर, 'रूप' के रूप का ही पता यश्ा के द्वारा नहीं चलते । सनिदान विशेष पर 
आ्राप्त तथ्यों का संग्रह इस शीर्षक के अन्तर्गत किया जा सकता है ' ओऔपस गिक व्या' 
निदान में उपसष्ट व्यक्तियों के सम्पक मे रहने या आने का इतिहास बहुत भहत्र सा 


। विरुद्ध आहार-विहार जन्य व्याधियों को सड्या भी कम नहीं हांठा ' हे ६ क्‍ हक हू " क्‍ 











१ ७ दे कायचिकित्स 


होने के वाद, उनसे मुक्त होकर भी, दौबल्य और हीन ग्रतिकारशक्ति के कारण, पुनः 
नवीन व्याधि से आक्रान्त होने के उदाहरण भी पर्याप्त मिलते हैं । इनमें पूर्व व्याधिजन्य 
टुबलता रोगोत्पादक कारण होती है। अब तक के परीक्षण से संभाव्य व्याथिं का 
कुछ अनुमान हो जाता है। उसके विशिष्ट कारणों को रोगी से पुनः पूछ कर संदेह 
निश्ृत्त किया जा सकता हैं 


२ पूर्वेरूप “->रोगोत्पादक कारणों का शरीर में प्रवेश या तज्न्य दोषप्रकोप के 
तुरन्त वाद ही व्याधि नहीं उत्पन्न हो जाती ( केवड आधानिक कारण--विष प्रयोग, 
अंशुधात ओर आगन्तुक कारणों में तुरन्त व्याधि उत्पन्न होती हैं), कुछ समय तक 
शरीर में उनका संचय-सचद्धन होता है, इसके बाद संचित और ग्रकुपित बातादि दोष 
शरीर में प्रसरण करते हुए शरीर के किसी स्थान चिशेष में आश्रय प्रहण करते हैं, 
तब मुख्य व्याधि-निदशक लक्षणों की उत्पत्ति के पूच ही--भविष्य में उत्पन्न होने वाले 
रोग के सूचक--जो लक्षण उतन्न होते हें, उन्हें पूवरूप कहते हैं । व्याधि के पूर्व उत्पन्न 
होने वाले यह अस्वास्थ्यकर लक्षण रोगनिणय में बहुत सहायता करते हैं। पेत्तिक ज्वर में 
हारिदर चण आदि मूत्र में पित्त की उपस्थिति के लक्षण व्याधिजन्म के बाद होते हैं, किन्तु 
क्रामला में व्याधि जन्म के'वहुत पंहले से हारिद्र-पीत या तेल वण का मूत्र होता है।आंजिक 
ज्वर में ज्वराक्रमण के पूथे ४-६ दिन तक अवसाद-अम्रिमांय-अरुचि आदि का अलुबन्ध 
सापेक्ष्य निदान में बहुत सहायक होता है। प्रायः सभी व्याधियों में पूचरूपावस्था के 
लक्षण नियत होते हैं। कभी-कभी पूचरूपों से ही भावीव्याधि के दोष का ज्ञान भी हो 
जाता है। ज्वराक्रमण के पूर्व जंभाई अधिक आने पर वातिक दोष का, नेत्रों में जलन 
होने पर पित्तज्वर का तथा अरुचि होने पर कफज्वर का अनुमान पूर्ेरूपावस्था में ही 
हो जाता हैं। इस प्रकार सामान्य तथा विशिष्ट पू्वरूपों का अन्वेषण करके इस शीर्षक 
के अन्तगंत उल्लेख करना चाहिए । 


२. लक्षण या लिज्ञ--दोषों का स्थानसंश्रय होने के बाद व्याधि के झुख्य लक्षण 
उत्पन्न होते हैं । व्याधि का बोधक जो एक विशिष्ट लक्षण होता है, उसको ग्रत्यात्मलक्षण, 
अव्यभिचारि लक्षण या रोगप्रतिनियत लक्षण कहते -हैं । प्रायः इसी लक्षण के आधार 
पर व्याधि का नामकरण किया जाता है। ज्वर का संताप, अतिसार का अतिसरण या 
पतले दस्त होना, कास का कसन तथा प्रमेह का अभूत और आविल मूत्रता रोगप्रति- 
नियत लक्षण होता हैं। अतः व्याधिप्रत्यात्म लक्षण या रोग के विशिष्ट छत्तर्णों को 
सप्रथम संग्रहीत करना चाहिए । उसके बाद शेष लक्षणों का वातिक-पेत्तिक-कफज या 
सान्निपातक वर्गों में संग्रह करना चाहिए। लक्षणों का प्रथक-प्रथक निर्देश होने से 
रोगविनिश्चय तथा प्रतिकम में अनवधानता नहीं होनेप येगी। 


. ४. सम्पाध्ति--रोग का सम्यक्‌ निणय हो जाने के उपरान्त उसकी उत्पत्ति के क्रम 
पूण विवेचन अथोत्‌ कौन दोष, किस निदान के सेवन से, किउदने अंशो में और 
धकीर मुकापेत होकर शरोर में घूमता हुआ, किन घातओं और अवयचों को दचित 


रोगीपरीज्षा १७७ 


करता हुआ, स्थान संश्रय करके, रोग को उत्पन्न कर रहा है। अर्थात दोष और व्याधि 
के द्वारा शरीर के अंग-प्रत्यंग-धातु-मल की जो विकृति हुईं है, उसकी अंशांश कल्पना 
करते हुये सूक्ष्म निणय करना चाहिये। इस ग्रकार का नि्णय रोग ग्रतिषेध तथा उसके 
समूलोच्छेद एवं सुनियोजित आशुगुणकारी चिकित्सा के लिये उपयोगी होता हैं । 


सामान्यतया व्याधि में समवेत एवं परस्पर सम्बद्ध दोषो* की अंशांश कल्पना- 
प्र्यात्‌ दूषित वायु का रुक्ष, शीत, लघु, सूच्तम, चल, विशद, खर अंश में से कोन सा 
अंश दूषित हैं, इसका निर्णय करने के वाद कौन अधान दोष है, कौन अग्रथान है, 
मूलतः कौन दोष विकृृत है और परिणाम में कौन विकृत हुआ है, केखद्रीय दोष, आवरक 
दोष इत्यादि सूछूम विविधताओं को जानने से रोग सम्बन्धी पूणे जानकारी हो सकती 
है। सान्निपातिक दोषों में प्रधान, मध्य और अवर, दो अ्रधान . ओर एक अचर और 
तीनों प्रधान दोषों का ज्ञान इसी अंशांश विंकल्पन से होता है । 


दोषों के संचय से लेकर प्रकोप-प्रसर-स्थानसश्रय ( दोष-दृष्य संमुच्छन ) और 
अभिव्यक्ति या व्याधिजन्म पय॑न्त रोगोत्पत्तिक्रम को सम्ग्राप्ति कहा जाता है । संचय- 
ग्रकोपादि का चर्णन पहले दोष-चिशेष परोक्षा के प्रकरण में किया जा चुका है। सम्प्राप्ति 
के अवान्तर शीषका का वर्णन यहां क्रिया जाता हैं । 

संख्या और विधि--क्विसी व्याधि का विवेचन करते समय वातिक-पत्तिक-क्फज 
आदि दोष भेदों का प्रमुख सहारा लिया जाता है। इसे दोपमेद संख्या का उदाहरण 





दोष* 
| 
| | 
शारीरिक मानसिक 
हे | 
[ [|] 
वात पित्त कफ रज तम 
| | 
लितीमप लि वििनिलिए अल भर 
जय आए कं 
आक्ृत-चक्ृत अनुबंध्य प्रकृतिसेम प्रकोप _ गति साम- | 
या ; या. या । ] 
अनुबंध प्रकृति-विकृतिजन्य आशयापकर्ष दोषावस्था 
आइत और आचरक | संचय-अ्रकोप- 
| । प्रसर-स्थान 


क्षय-स्थान- ऊध्चें-अघः कोष्ट-शाखा- स॑श्रय-व्यक्ति- 
त्राद्धि नैय ५ 










१०८ कायचिकित्सा 


कह सकते हैं यथा--आठ ज्वर, पांच शुल्म, वीस प्रमेह आदि । दोष के अतिरिक्त 
व्याधि के स्वरूप-जाति में भिन्नता होने पर जातिभेद संख्या के अन्तगंत निवेश किया 
जाता है यथा-महा-ऊष्व-छिन्न-तमक-क्षुद्र भेद से ५ श्वास; शराबिका, कच्छपिका आदि 
भेद से आठ प्रमेहपिडिकाएँ आदि । विधि का तात्पय एक ही व्याधि के धर्मान्तरक्नत 
भेद से हें। निज ओर आगन्तुक, वात-पित्त-कफज, साध्य-असाध्य-मदु और दारुण, 
उचध्चे तथा अधोग रक्त-पित्त और ओऔपसर्गिक-अनौपसर्गिक आदि व्याधियों का अनेक 
विधि भेदों के अन्तगंत विश्छेषण किया जाता है । 


विकल्प--एकदोषज-द्विदोषज-त्रिदोषज व्याधि में, दोषों के अंशांश बल की जो 
विशेष कल्पना की जाती है, वह विकल्प सम्प्राप्ति का उदाहरण है। जो दोष थोड़े अंशों 
से कुपित हो वह निबंठ तथा जो सभी या अधिक अंशों से कुपित हो वह प्रबल होता 
हैं। अंशांश विकल्पना का महत्व चिकित्सा की दृष्टि से बहुत होता है । यदि वायु अपने 
रूक्षणुण से अकुपित हुआ हो तो खिग्धगुण वाले द्रव्यों से, यदि शीत्तगुण से कुपित 
हुआ है तो उष्णगुण चाले द्रव्यों से, यदि लघुगुण से कुपित हुआ है तो गशुरूगुण वाले 
द्रव्यों से, विशद गुणज दोष प्च्छिल गुणयुक्त द्वव्यों से, रुक्ष एवं शीत दो गुणों से.प्रकुपित 
होने पर ख्लिग्व और उंष्ण द्रव्यों से, रुक्षःशीत और छरूघु इन तीन गुणों से प्रकुपित 
होने पर ल्लिग्य-उप्ण और गुरु गुण वाले द्वव्या से यदि रुक्ष-शीत-लघु-विशद्‌ इन चार 
मुणो से वायु प्रकुपित हुआ है तो लिग्ध-उष्ण-गुरु और पिच्छिछ गुण चाले द्वव्यों से 
उसकी चिकित्सा करनी चाहिए ! इसी क्रम से पित्त एवं छ्लेष्मा के गअ्रकोपक गुणों का 
ध्यान रखकर तद्विपरीत गुण-धम वाले द्वव्यों का उपयोग करना चाहिए । 


प्रधान--जो व्याधि स्वतंत्र दोष से उत्पन्न, स्पष्ट लक्षणों से युक्त, स्वप्रकोपक 
कारणों से आरादुभूत एवं अपनी विशिष्ट चिकित्सा से शान्त हों, उसको अनुबन्ध्य या 
प्रधान व्याधि कहा जाता हैं। इससे विपरीत जो रोग परतंत्र, अस्पष्ट लक्षण वाला, 
अन्य रोग के निदान से उत्पन्न तथा अन्य रोग की चिकित्सा से शान्त होने चाला हो 
उसे अनुबन्ध या अप्रधान कहते हैं । हंद्ज एवं त्रिदोषज व्याधियों में भी एक दोष के 
प्रबल तथा दूसरों के अल्पबल होने पर अधान-अप्रधान का विवेचन किया जाता है । 
इसी प्रकार एक दोष का क्षय होने पर भी दूसरों की तुलना से सापेचद््य विवेचन करके 
क्षीण-क्षीणतर-क्षीणतम आदि शब्दों में दोषस्थिति स्पष्ट की जाती है । 


बल-कारकू--व्याधि की उत्पत्ति या उत्पन्न व्याधि की वृद्धि का काछ, बल-काल रूप 
सम्प्राप्ति का उदाहरण हैं। अहोरात्र-ऋतु-देश-वय तथा थआआहार की भुक्तमात्रावस्था-पच्य- 
मानावस्था और जोर्णांचस्था आदि में किस-किस दोष का ग्रकोप-प्रशम होता है, यह 
नियत है। व्याधि की उत्पत्ति या वृद्धि का काल समझ कर, उसके दोष का अनुमान 
आसानी से किया जा सकता है। आडट ऋतु, दिन एवं रात्रि का अन्तिम भाग, आहार 
की जीर्णावस्था एवं चाथक्य में वायु कौ इद्धि होती हैं। इन कार्छों मे रोग की उत्पत्ति 
(284 पी लिना विशेष वृद्धि हो. तो चाय की वन जा न्पशाक्ति जे 





रोगीपरीक्षा १०९ 


वातज होने का ज्ञान होता है। इसी प्रकार शरदऋतु, मध्य दिन, मध्य रात्रि आहारं की 
पच्यमानावस्था एवं मध्यवय या युवावस्था में पित्त की इद्धि और वसन्‍्त ऋतु, पूर्वाह, 
प्रदोष या पूर्व रात्रि, भुक्तमान्रावस्था एवं बाल्यकाल में श्लेष्मा की अकृत्या इद्धि होने के 
कारण, इन काला से व्याधि की उत्पत्ति एवं ब्ृद्धि का सम्बन्ध होने पर पित्तज या कफज 
निणय किया जाता है । 


यदि शाञ्रों में वर्णित रोगोत्पादक कारण समन्वित रूप से किसो व्याधित के 
निदान में मिले या प्रबल निदान से रोगोत्पत्ति हुई हो तो व्याधि प्रबल या बलवान 
होती है। इसी अकार पूचेरूप एवं रूपावस्था के सभी या अधिक लक्षणों का युगपत 
मिलना भी व्याधि के बलवान होने का द्रोतक हैं। इसके विपरीत कम या अल्पबलू 
निदान से उत्पन्न, अल्प पूर्वरूप रूप वाली व्याधि अल्पबल या दुबल कही जाती है| 
बलवान व्याधि कष्टसाध्य और अल्पबल सुखसाध्य होती है । 


चक्र 


संचय-प्रकोपादिरूप सम्प्राप्ति--सम्प्राप्ति के संचय-अकोप-प्रसर-स्थांनसंश्रय-व्यक्ति 
तथा भेद रूपों का उल्लेख पहले ( एपछ ९४ ) दोष विशेष परीक्षण में किया जा 
चुका है। यहां पर उक्त परीक्षण से आ्राप्त तथ्यों का संकलन कर लेना चाहिए, जिससे 
व्याधि का एक स्पष्ट चित्र चिकित्सा प्रारम्भ करने के पूर्व उपस्थित हो जाय । 


५. उपशय--बहुत सी व्याधियों में व्याधि के मूल कारण नष्ट कर देने से अपने 
आप रोग में लाभ हो जाता है। यथा पूय दन्‍त ( +ए०777069 ), अस्थिकोटरशोथ 
( 5770४ ), आंत्रपुच्छविद्रधि ( “-[ण०श07्0०प७४ 8/080888 ) इत्यादि स्थान- 
संश्रित पूययुक्त व्याधियों में पूथ का निहरण कर देने मात्र से ज्वर, वेदना और 
विषमयता के सभी लक्षण स्वतः शान्त हो जाते हैं। अतः इस अकार की स्थानसंश्रित 
किन्तु सावंदेही प्रभावकारी व्याधियों का अनुमान होने पर, हेतुविपरीत चिकित्सा 
करने से लाभ हो जाने के बाद व्याधि का निर्णय हो जाता है। कुछ ओषधियों अपने 
प्रभाव से बिना रोग निदान पर प्रभाव किए ही व्यांधि का उपशम करती हैं। मृन्नाघात 
होने पर मूत्र विरेचनीय ओषधियाँ, अतिसार में स्तम्भनाथ पाठाऔर कुटज, कुष्ठ में खदिर 
तथा प्रमेह में हरिद्वा का अयोग व्याधियों की लाक्षणिक शान्ति करते हुए अपने विशेष 
प्रभाव से रोग का भी उपशम करता है। वहुत सी ओषधियों' व्याधि के दोष 
और लक्षणों का एक साथ शमन करके शीघ्र प्रभाव दिखाती हैं, उनके प्रयोग से लाभ 
होने पर दोष और व्याधि दोनों का निर्णय हो जाता है। कभी-कभी व्याधि शमन करने 
वाले योगों का प्रयोग करने से शरीर में दोषों का अतिमात्र संचय होने के कारण लाभ 
नहीं होता। आम मल की अधिकता से उत्पन्न हुये अतिसार में स्तम्भनाथ प्रयुक्त 
ओषधियाँ निष्फल हो जाती हैं और दोषाधिक्य से उत्पन्न छर्दि में भी चमनशामक 
योग उपकारक नहीं होते । अतः अतिसार में एरण्ड तेल के द्वारा चिरेचन करा 
कर अर्थात्‌ व्याधि के मूल लक्षण को और बढ़ाकर तथा चमन में मदनफल के द्वारा 


११० 


कायचिकित्स! 


कुछ समय के लिये व्याधि की लाक्षणिक वृद्धि हो जाती हैं । किन्तु परिणाम में व्याथि का 
उपशम होने के कारण इन्हें विपरीताथकारी उपशय कहते हैं। उपशय के भेदों का 
सोदाहरण संग्रह साथ के कोष्ठक में किया गया है। उपशय के द्वारा पहले दोष का 
निश्चय और उसके बाद व्याधि का निश्चय करना चाहिये । 


वििनीीनीणनीणणती: स्‍क्‍फ खत तन ततन>- 5०3०... 


उपशय का स्वरूप 





हेतु-विपरीत 


व्याधि-चिपरीत 


हेतु-व्याधि उमय- 
ा 


 क०. 4पालकाम जनक... हाधवपमा: च-2ट 7 पा -प्रकडरानम-ी-फपनन्‍त--ना. 77 “पाल पल “पुन” जन्नत कर * कया काठ अत -3०-+धाई 7 + नकन+्य नमन नन न कर्क ----7** 7 पका: पर न्‍न्‍मटापाक शाफनननतककर+ बा 














व्याधि में श्रमहर द्राक्षादि 
दशक महाक्रषाय । 


व्याधि. की छाश्षणिक 











निदशंक 
डपशय-मभेद निद्शंक कोष्टक 
आओपषध अन्न 
१. शीत-कफज्वर में | १. श्रमजन्य तथा 
शुण्ठी आदि उष्ण रस- | वातज ज्वर में 
चीय॑ वाली औषध । | पोषक ख्विग्ध एवं 
| चातशामकर्मांसरस 
तथा शाल्योदन 
का ग्रयोग । 
२. औपसर्गिक व्या- | २ सभी संतर्पक 
धियों में विशिष्ट उपसगे- | आहार ! 
नाशक रामवाण औषध। 
२. श्रम से उत्पन्न 


अतिसार में स्तंभ- 


शान्ति करने वाली | नाथ मसूर का यूष, 
ओऔपषधें--अतिसार में | केला-गूलर का शाक 
पाठा-कुटज,कुष्ठ में खदिरः, तथा बेल का फल 
प्रमेह में हरिद्रा, विष- | के रूप में प्रयोग, 
शमन के लिए शिरीष, | रौच्ष्यगुण से उत्पन्न 
तमकर श्वास में सोम । | वातविद्तति में घृत 

आदि खिरधघ द्रव्य । 


१. वातिक शोथ में 


वातशामक एवं शोथ- 


शामक दशमूल क्वाथ 


का' प्रयोग । 





वात-कफज ग्रहणी 
में तक्र, पित्तज में 
दुग्ध तथा शीत- 


वातज्वर में उष्ण 


एवं ज्वर्शामक 


विहार 





दिवास्वाप से 
उत्पन्न कफ में राज्ि- 
जागरण, चंक्रमण 
या व्यायाम । 


है 


१. उदावतें 
प्रवाहण । 

२. आमवात 
रुक्ष स्वेद । 
२. व्याधिविपरीत 
युक्ति व्यपाश्रय 


“१ 


चिकित्सा होम-पाठ 


आदि । 


ल्िग्ध पंदार्थों के 
अतियोग से या 
दिवास्वप्र से उत्पन्न 
तन्द्रा में रुक्षताकारक 
रात्रिजागरण । 


उपशबय का स्वरूप । 


हेतु-विपरीताथ कारी 


«्याधि-विपरीताथे- 


कारी 


हेत-व्याधिडभय 
विपरीताथकारी 


रोगीपरीजा 


में उष्ण उपनाद ! 

२. कटु रस के अधिक 
उपयोग से उत्पन्न 
शुक्रक्षय में पिप्पली, 
शुण्ठी आदि दृष्य 
कट द्रव्य । 


अमर >नल परन्‍रोजम०+ऊ्नमन्‍. 
'व ॑-...नमम-.>०+मऑ अरममममआन»«मनम-म-म-मा. झा. 2मम निकल आज कक असल ाएएणणााणाा 


१. अमग्निरगग्ध में 
अरुरु सदश उष्ण द्॒व्यों 
का लेप, विषजन्य 
रोग में प्रति विष का 
शमनाथे प्रयोग । 

२. -वमनसाध्य छदि 
में वामक द्वव्य-मदत्त 
फल आदि का प्रयोग। 
कटु-अम्ल एवं उष्ण 
आहार से उत्पन्न पित्त- 
वृद्धि में, पित्तदर, अम्ल 


+..............अ्>------+ ">> कननन.->मा- +आा-..>ननामिा-2० पानी पाकनमान पाना. ">५ फाककन+-+3+++-२ कमा ५ ऑन जाखिलते 7 ज्यानक॑ मा जन जन बन- 
2०७... सम 9333..." मम “मम: ता पान मूह गी-+ग मा धा+ हर ७-3५++झ3>++म 


रस वाले आमलो का 
प्रयोग । 


६. सदश व्याधियों से रोग का सापेक्य निदान--प्राचीन 
साहित्य में व्याधियों के विशिष्ट स्वरूपों की संख्या अधिक नहीं हैं । 


ओषध 





१. पित्तप्रधान विद्रधि 


अन्न 

१. पेत्तिक विद्रधि 
में बिंदाही अन्न । 
२. क़ृमिरोग में 
मधुर द्वव्यां के साथ 


श्षीर-भक्त का प्रयोग ! । 


२. रुक्ष आद्दार के 
अधिक सेचन से 
उत्पन्न शुक्रक्षय में 

रूक्ष-बृष्य पुराना 

जौ व गेहूँ। 

१. अतिसार में 





। 6 ५ #३ 
पिरेचनाथ क्षीर का 


प्रयोग । 


२. कफज प्रमेह्टा 


गेहूँ आदि तथा मधु । 
मद्रपानजन्य मदा- 
त्यय में उत्पादक 
मग्र का सेचन । 








विहार 


१. वातजोंन्माद में 
वातप्रकोपक त्रासन 
२. कामजज्वर में 
क्रोध या शोककर 
उपचार । 


छदि में वन कराने 
के लिए प्रवाहण 
अथवा आमाशय 


अच्छालन | 


में प्राण अन्न-्जो- |. 


व्यायामजन्य वात- 
प्रधान उरुस्तंभ में 
जलसंतरण | शीतल 
जल तथा व्यायाम 
दोनों ही वातबधक 
हैं, किन्तु उरुस्तंभ 
में जलसंतरण से 
हेतु-व्याधि दोनो 
की शास्ति होती है। 





शा नी आन 


चाकत्सा 
आय: 


प्रधान लक्षण के आधार पर ज्वर, अतिसार, रक्तपित्त, कास, श्वासादि व्याधिया 


के नाम बताए गए हैं । पाश्चात्य 


| 4 पी 28" 


चिकित्सा विज्ञान में व्याधियाँ असंख्य हैं, इस कारण 


१६२ कायचिकित्सा 


व्याधियों से पार्थक्य कर लेना सदा हितकर होता है! प्रत्येक रोगी में एक ही व्याधि के 
सभी रुक्षण न मिलकर, अनेक वार बहुत से शेगों का मिश्रित रूप आप्त होता हैं। ऐसी 
अवस्था में सापेक्ष्य निदान बहुत आवश्यक हो जाता है। आमवात, संधिवात, वातरक्त 
एच्रंक्रोष्टुक शी५ तथा उरुस्तंभ में दृष्याधिष्ठान जानुसंधि होने पर रोगविनिश्चवय करने 
में कठिनाई होती है । इसी प्रकार स्पष्ट ज्वर के अभाव में रक्तड्रीवन होने पर राजयच्ष्मा 
एवं रक्तपित्त में श्रम हो सकता है । इसलिए उपलब्ध विशिष्ट लक्षणों का शीषक बनाकर 
वह लक्षण क्रिन-किन व्याधियों में मिल सकता है, यह निर्देश करना चाहिए। इसके वाद उक्त 
निर्दिष्ट व्याधियों के कौन-कौन लक्षण अस्तुत रोगी में मिलते हैं तथा कौन विशिष्ट लक्षण 
नहीं मिलते और कौम-कौन उस व्याधि के विरोधी लक्षण मिलते हैं, इनका स्पष्ट प्रथक्‌ 
पृथक उल्लेख करना चाहिए। इससे मिथ्या निदान की संभावना नहीं रहती । जिस 
व्याधि के छक्षण अधिक संख्या में या अम्ुख रूप से कष्टकारक हों, प्रायः उसी को प्रधान 
तथा शेष को अनुबंध या अप्रधान कहा जायगा। 


व्याधियों का व्याधित्वेन रुपष्ट निदान न हो सकने पर केवल रोगोत्पादक दोष या 
दोषों का विनिश्चय करके चिकित्सा प्रारम्भ की जा सकती हैं, क्योंक्रि सभी व्याधियों का- 
दृष्य-देश-कालादि भेद से एक ही व्याधि की भिन्न सी दिखाई पडने वाली अवस्थाओं 
का--नामकरण संभव नहीं । व्याधि का नामकरण कर सकने या न कर सकने, दोनों ही 
अवस्थाओं में दोषसापेक्ष्य रोगविनिश्वय उपयोगी हँ। विशिष्ट व्याधि के निदान से 
व्याधिशामक विशिष्ट रामबाण औषध का अयोग किया जा सकता है, किन्तु दोषविनिश्चय 
के बिना चिकित्सा करने से समुचित परिणाम नहीं होगा । इसलिए लक्षणों की प्रवरावर- 
मध्यता के आधार पर त्रिदोष होने पर इद्ध-इद्धतर-इद्धतम या क्षीण-क्षीणतर या क्षीणतम 
दोष का और द्विंदोषण या एकदोषज होने पर अचवरावर दोष का ज्ञान अवश्य करना 
चाहिए । यह सारा विवेवन व्याधि को सम्प्राप्ति का चिश्लेषण करते समय किया जाता 


है। सापेक्ष्य निदान करते समय केवल दोषभेद से उन तथ्यों का आक्षठन कर लेना 
आवश्यक हैं ! 


रोगचिनिश्चय---सद्श व्याधियों की संभावना का विवेचन करने के बाद असंदिग्ध रूप 
च.ढ निणय १९ | 
में व्याधि का निणय हो जाता है। रोग का नामकरण करते हुए दोष-दृष्य-अधिष्ठान- 
वल-अवस्था आदि का उल्लेख करना आवश्यक हैं। व्याधि की सभी विशेषताओं को 


स्पष्ट करने के लिए कारणादि के अनुरूप इसके भेदों-स्वरूपों का आगें वणन किया 
रु] 
जाता है । 


साम-निरास तथा जीर्ण--चिकित्सा की दृष्टि से यह भेदकथन बहुत आवश्यक है। 
क्यांकि रोग की सामता में दोषों का पाचन ही मुख्य अतिकर्म किया जाता है। निरामावस्था 





१. विकारनामाकुशलो न जिल्लीयात कदाचन 


लि 000/#०-००---- - 


रोगीपरीक्षा ३१३ 


में व्याधि का शमन करने के लिए संशामक चिकित्सा की योजना कीं जाती है और 
जीर्णावस्था में, जब कि दोष शरीर की भीतरी धातुओं में अड्डा जमा लेता है, अनुकूल 
परिस्थिति आने पर घंटता-बेढ़ता रहता है, ऐसी अवस्था में बिना दोंषा का शोधन किए 
_ शोगोन्मूलन नहीं होता । अतः रोगविनिश्वय करते समय व्याधि सामदोषयुक्त है, निराम है 
या जी हो चुकी है, यह परिज्ञान अवश्य कर लेना चाहिए 

आगे स्वास्थ्य तथा रोगअकरण में वर्णित व्याधियों के वर्ग रोगविनिश्चय तथा 
प्रतिकम में हमेशा. सहायक नहीं होते । किन्तु जटिल व्याधिंयों का विश्लेषण करते समय 
यथावश्यक उन शीर्षकी के अन्तर्गत भी विचार किया जा सकता है । 

लपद्रव--मूल व्याधि के उत्पन्न होने के उपरान्त, मिथ्या आहार-विहार/ अव्यवस्थित 
चिकित्साक्रम और ऋतुकाल के प्रभाव से कुछ दूसरी व्याधियां उपद्रव स्वेरूप 
पेदा हो जाती हैं। यथा मंथर ज्वर में श्लेष्मोल्वण सज्जिपात, अतिसार, अन्श्नभेदु; 
विषम ज्वर में मूर्च्छा, अलाप, रक्तमेह; मधुमेह में प्रमेह-पिडिकायं और अहणी तथा पाण्ड 
में शोफ आदि । उपद्रवों की उपस्थिति रोगी की अ्रतिकारक शक्ति की दुबलता और 
रोग कौ गम्भीरता को व्यक्त करती है। मूल ब्याधि की चिकित्सा करते हुए उपद्रवों की 
चिकित्सा विशेष त्वरा से करनी पड़ती है, अन्यथा व्याधि की गम्भीरता बढ़ जाती है । 
_  अत्येक व्याथि के साथ सम्भाव्य उपद्रवों का उल्लेख आगे यथास्थल किया जायगा । 

शरिए--जिन लक्षणों को उपस्थिति से निकट भविष्य में रोगी के मरने की संभावना. ._ 
का ज्ञान होता है अर्थात्‌ जो लक्षण रोगी के भावी मरण को सूचित कंरते हैं 
उन्हें. रिष्ट या अरिष्ट कहते हें। आतुर के मन व शरीर की स्वाभाविक॑ अकृति में 
अकस्मात अनिंमित्त उत्पन्न होने वाली विक्ृति को अ्रिष्ट कहा जाता है। जिस अकार 
पृष्पोद्धम से फलोत्पत्ति की पूर्व सूचना मिलती है, उंसी प्रकार अरिश्ट से रूत्यु की पूव 
सूचना मिलती है । 

आगे व्याधियों के व्णन के असंग में अत्येक व्याधि की असाध्यता के निदशंक 
लक्षणों का निर्देश. किया जायगा । यहां पर किसी भी रोग में मिल सकने वाले अ्रधान- 
प्रधान अरिश्टो का संक्षिप्त उल्लेख, किया जायगा क्‍ 

श्रवणेन्द्रिय विप्रतिपक्ति--विक्वत सव॒र्रों का अंकस्मात्‌ उत्पन्न होना या एक स्वर का 
अनेक एवं अनेक स्वरों का एकसां श्रवण होना; सिद्ध-किन्नर-गन्धवं आदि के दिव्य 








(तेगिणो मरणं यस्मादवश्यम्मादि लक्ष्यते, तलक्षणमंरिष्ट स्याद्रिष्ट चापि तदुच्यते ।? 
( भा« प्र पूवेखण्ड ) 


' 'शरीरंझीलयोय॑स्य प्रकृतिषिकृतिभंबेत्‌, तत्तरिष्टे समासेन ॥ ( सु. रस... अ. ३० ) 
 हपेन्द्रिय-स्वरच्छाया-प्रतिच्छाया-क्रियादिषु, अन्येष्वपि व भावेषु प्राक्ृतेष्वनिमित्तत> 
. विक्ृतियाँ समासेब रिध्ं तदिति लक्षवेव्‌ँ/ .... (जद. शा. अ. ५ ) 
धयुष्पं यथा पूवरूप फलस्येह भविष्यतः, तथा लिश्षमरिध्यरयं पूवरूप॑ मरिष्यतः।! 


११४ . कायचिकित्सा 


शब्द, समुद्र एवं मेघ के शब्द विद्यमान न होने पर भी सुनाई पड़ना था विद्यमान 
होने पर न सुनाई पड़ना अथवा समुद्रगजना को मेघध्वनि या मेघगर्जना को समुद्र- 
गजना इस श्रकार विपरीत सुनाई पड़ना; ग्राम्य गौ-महिषी आदि पशुओं के शब्दों को 
जंगली व्याप्रादि पशुओं का शब्द और जंगली पशुओं के शब्दों को ग्राम्य पशुओं का सा 
शब्द सुनाई पड़ना एवं श्रवणशक्ति का अकर्मात्‌ नष्ट हो जाना शीघ्र ही दिवंगत होने 
का लक्षण है । 

स्पशनेन्द्रिय विप्रतिपत्ति--शीतल पदार्थ को उष्ण और उष्ण पदार्थ को शीतल 
सममना, शरीर के स्पश में बहुत उष्ण होने पर भी शीत से कांपना, शरीर में कफज 
शीत पिडिका होने पर भी तीव्र दाह का अनुभव होना, श्रभिधात या छेदन करने पर 
भी चोट एवं वेदना का अनुभव न होना गतायु का लक्षण माना जाता है। हमेशा 
स्पन्दित रहने वाले नाडी आदि अज्ञें का अस्पन्दन, नित्य उष्ण रहने वाले अंगों का 
शीती भाव, सझदु अंगों का दारुण होना, 'छच्णण ( चिकने ) अंगों का खरस्पश हो जाना, 
निरन्तर स्वेद का आते रहना और स्पशज्ञेय दूसरी विक्ृतियाँ अधिक मात्रा में अनिमित्त 
उत्पन्न हा तो श्ररिष्ट ही समकना चाहिए । 


रूपेन्द्रिय विप्रतिपत्ति--जिस रोगी का अकस्मात्‌ वर्ण परिवत्तन हो जाय या 
जिसके शरीर पर नील-रक्त वण की रेखाएँ उत्पन्न हो जाएँ या जो मनुष्य अपने शरीर 
को घूलि-रेत॑ आदि से विना लिप्त ही लिप्त हुआ सा समझे, उसको गतायु ही सममना 
चाहिए । शरीर का वर्ण पूरा या आधा अनिमित्त ही नील-श्याव-ताम्र वर्ण का हो, श्राथे 
सुख में स्नेह तथा आधे में रोच्षय की अभिव्यक्ति, उदर में श्याव-ताम्र-नील-हारिद्र या 
_ शुक्ल वण को शिराएं शीघ्र उत्पन्न हों और नख रक्त-मांस रहित से, पके हुए जामुन के 
रम के हो जाए, तो ऐसे व्यक्ति की झूत्यु बहुत शीघ्र हो जाती है । आकाश में पृथ्वी का 
तथा पृथ्वी में आकाश का अ्रम होना, गतिमान रूपरहित वायु का दृष्टि-पथ में आना, 
तथा अ्ज्वल्ति अभि का न दिखाई पड़ना अथवा अप्मि के प्रकृतिस्थ वर्ण को कृष्ण या 
शुक्ल वर्ण का देखना, रात्रि में सूये तथा दिन में चन्द्रमा को देखना, विना अमावाश्या- 
पूर्णिमा के सूय-चन्द्र का ग्रहण दिखाई पढ़ना और जाग्रतावस्था में ही प्रेत-राक्षस आदि के . 
अद्भुत दृश्यो को देखना आदि अनेक अकार का विपरीत या अन्यथा ज्ञान होना शीघ्र 
मृत्यु का सूचक माना जाता है। नेत्रों का प्राकृतिक स्वरूप नष्ट हो जाय, उनका आकार 
बहुत उभडा या घेंसा हुआ हो, उनमें बिषमता या कुटिलता आकस्मात्‌ हो, नेत्रआ्नचालन सीमा 
से अधिक हो रहा हो, उन्मेष-निमेष का अमाव-आधिक्य हो, नेत्रों से निरन्तर खाव हो 
रहा हो तथा दंष्टि में विपयेय हो और नेत्र का वण कृष्ण-पौत-नील-ताम्र-हार्दि आदि 
अस्वाभाविक रूप का हो जाय तो यह भी गम्भौर अरिष्ट का सूचक माना जाता है । 

रसनेन्द्रिय विप्रतिपत्ति--रसों का विपरीत ज्ञान यथा--मधुर को अम्ल तथा अम्ल 

को मघुर आदि, रसज्ञान का पूणतया अभाव, रसों का शरीर पर विपरीत या अन्यथा 
्वीव, अयवा मांसरस एवं दूसरे पोषक रसों का विधिवत्‌ उपयोग करने पर भी शारीर- 


रोगीपरीज्ा ११७५ 


हो जायगा, ऐसा सममना चाहिए । रोगी का शारीररस अत्यन्त मधुर या कढ़ु आदि 
होने का ज्ञान मक्षिका-पिपीलिका आदि के द्वारा किया जाता है। यह परिवत्तंन भी 
अरिष्टसूचक ही माना जातां है । ल्‍ 

घ्राणेन्द्रिय विप्रतिपत्ति--सुगन्ध में दुरगन्‍्ध का ,तथा ढुगन्ध में सुगन्ध का अनुभव 
होना तथा एक स्पष्ट नियत गन्ध वाले द्रव्य में दूसरे को गन्ध का अनुभव होना आदि 
गन्धसम्बन्धी अन्यथा ज्ञान पीनस आदि रोगों के विना ही हो रहा हो तो उस व्यक्ति 
की शीघ्र झृत्यु हो जाती है। जिस व्यक्ति के शरीर से अनेक श्रकार के सुगन्धियुक्त पुष्पो 
की गन्ध निरन्तर आती रहे, उसकी १ वर्ष के भीतर मृत्यु हो जाती है । 

अरिष्ट के दूसरे उदाहरण--- 

( १ ) चाँदनी, दर्पण तथा धूप में प्रतिबिम्बित छाया को जो नहीं देखता या एक 
अंग से हीन, चिकृृतांग या दूसरे आणियों के समान देखता है, वह रोगी शीघ्र मर जाता है । 

( ३२ ) जिसका ऊपर का ओषछ्ठ नीचे लटका हुआ, नीचे का ओछ्ठ ऊपर चढ़ा हुआ, 
दोनों ओछ्ठ पके हुए जामुन के रंग के हों, दाँत अकस्मात्‌ लाल या काले हो जाकें; उसे 
गतायु ही सममना चाहिए। क्‍ 

( ३ ) जिसकी जिह्ा काली, रुक्ष, अत्यधिक मललिप्त, ककंश, शोथयुक्त या स्तब्ध 
हो और उसका वर्ण सफेद या नीला हो गया हो, वह शीघ्र ही दिवज्ञत होता है । 

( ४ ) जिसकी नासिका अतिशुष्क, फटी हुई या टेढ़ी हो जाय, निरन्तर नाक से 
शब्द होता हो अथवा नासिका बेठ जाय, वह व्यक्ति शीघ्र गतायु होता है । 

(५ ) जो मनुष्य मुख में डाले हुए खाद्य-पेय को नहीं निगल पाता, सिर एवं ग्रीवा को 
भी एक आसन में धारंण नहीं कर सकता--गऔचबा एक ओर को लटक जाती हो--या एक. 
ही ओर दृष्टि बांध कर मूढ़ के समान देखता रहे, वह शीघ्र ही म्त्यु को आप्त करता है । 

( ६ ) जो व्यक्ति उठाते ही मूच्छित हो जाय, जो परों को हमेशा मोड़ क़र रकखे, 
फेला न सके अथवा हमेशा फेले रहने वाले पेरों को मोड न सके तथा जिसके हाथ-पर 
और उच्छास शीत हों, वह शीघ्र ही देह त्याग करता है । 

. (७ ) शरीर के सभो छिद्रों, नासा-मुख-कण-नेत्र आदि तथा रोमकूंप-से विषपान 
के बिना ही रक्त आता हो, जिसकी जिह्ा काली हो जाय तथा वाम नेत्र भीतर घेंस जाय 
तथा मुह से सड़ी हुई दुर्गन्ध आती रहे तों उसके शीघ्र ही मरने की अतीक्षा करनी चाहिए। 
. («८ ) जिस क्षीण मनुष्य की छ्षुघा तथा तृष्णा हृय-मघुर तथा हिंतकर अन्नपान से 
भी न शान्त हो, उसकी शाघ्र शत्यु हो जाती है । क्‍ 
( ९ ) शरीर के भ्रू-वत्मं-ओछ आदि अवयवों का अकस्मात्‌ अपने स्थान से नीचे 
या ऊपर होना, नेत्र-नासिका-मुख आदि का टेढ़ा हो जाना, शिर्ञ्रीवा आदि की. 
धारणशक्ति का नष्ट हो जाना, नेत्र-जिहा का बाहर निकल आना या भीतर घेंस जाना, 
शरीर में अवाल वर्ण के अरुण विस्फोट या व्यज्ञ निकल आना, ललाट अदेश पर शिर 
जाल स्पष्ट होना, श्रातःकाल ललाट पर पसीना आना, सिर की बहुत सफाई करने पर 


११६ कायचिकित्सा 


क्षय होना या विना भोजन किए ही सल-मूत्र की इृद्धि होना, स्तनमूल तथा वक्ष के 

मध्य में निरन्तर शूल होना, शरीर के मध्य भाग में शोय तथा हाथ-पेर में कृशता तथा _ 
हाथ-पर में शोथ और मध्य भाग में क्ृशता होना, दन्त-मुखमण्डल तथा नखों पर विकृत 
वर्ण के फल के समान चिह्न उत्पन्न होना आदि परिवत्तन अवश्यम्भावी झृत्यु के सूचक हें ! 


५ १० ) मूत्र-पुरीष-स्वेद-प्लीवन-निःश्वास आदि का रुकना, अकारण शरीर के अवयवों 
का ठण्ढा हो जाना, गरम-स्तिग्ध-रूक्ष हो जाना या वर्ण परिवत्तन होना और शक्ति का नष्ट 
होना अरिष्ट का सूचक है ।* 

साध्य[साध्यता--चिकित्सा प्रारम्भ करने के पूव रोग साध्य, असाध्य या 
दुश्चिकित्स्य है, इस अकार का ज्ञान अपेक्षित है। सामान्यतया साध्यासाध्य विनिश्वय 
करते समय दो प्रश्न विचारणीय होते हैं--- 





१. रोग साध्य है तो सामान्य दृष्टि से कितने समय में ठीक होगा ! कुछ रोग 
काल मर्यादित होते हैं । रोगी एवं परिवार के व्यक्तियों को भी सबसे अधिक जिज्ञासा 
इसी बात को रहती है, अतः इसका निणय बहुत सावधानीपूचक करना चाहिए । संभव 
है, उस रोग में कुछ उपद्रवों की संभावना हो, अतः संभाव्य उपद्रव तथा रोगों के 
पएथायी परिणाम को संभावना का निर्देश, आवश्यक होने पर किया जा सकता है। इस 
प्रकार से ठीक निर्देश न मिलने के कारण रोगी आमचात में पूर्ण बिश्राम नहीं करता और 
परिणाम स्वरूप हृत्कपाट चिक्वति से याचत्बीचन कष्ट पाता रहता हैं। शेशचीय अंगधघात में 
ज्वरावस्था में आयः अंगघात के लक्षण नहीं होते । यदि कुटुम्बियों से अंगघात की 
संभावना का पहले से उल्लेख न॑ रहेगा तो वे उत्तरकाल में होने वाले इस स्थायी परिणाम 
की चिकित्सक कौ ही असावधानी ससमझेंगें। इसी प्रकार दूसरी व्याधियों में भी 
निणय करना चाहिए । 


२. यदि रोग असाध्य है तो रोगी अनुमानतः कितने दिन जीवित रहेगा, क्‍या 
उसके कष्ट की निद्तत्ति के लिए कोई शक्तिदायक लाक्षणिक उपचार हो सकंता है २ 

साध्यासाध्यता की दृष्टि से रोगों के निम्नलिखित भेदोपभेद किए जाते हें । 

१. साध्य--(१) सुखसाध्य (२) कश्टसाथ्य । 

२. असाध्य--(१) याप्य अर्थात्‌ रोग का पूर्ण निमूलनन हो सकने पर भी 
दिकित्सा से उसका उपशम हो सकता है | उचित पथ्यपालन एवं ओऔषध प्रयोग से रोगी 
रोग मुक्त न होने पर भो पर्याप्त समय तक साधारण स्वास्थ्य के साथ जीवन बिता 
सकता है । 

( २ ) अत्याल्येय--कुछ रोग छिसी प्रकार की भी चिकित्सा से साध्य नहीं होते । 
इनको चिकित्सा का स्पष्ट शब्दों में अ्रत्याख्यान कर देना चाहिए। पत्ययाख्यानपूर्वंक 


अल बल नल अनिल वि कन मिलन नि मिलिीन लि कि अल किले 
बममन्मण विषय का विस्तृ विषय का विस्तृत वर्णन सुश्रुत के सतस्थान २८ से ३२ अध्याय तक तथा चरक के 


रोगीपरीज्षा बछ 


चिकित्सा करने से लांस न होने पर चिकित्सक का अपयश नहीं होता और परिवार बाले 
भी किसी अप्रत्याशित घटना से पीडित नहीं होते । 

साध्यासाध्यता निद्शक सामान्य सिद्धान्त--- क्‍ 

१. रोगोत्पादक कारण अल्प बल एवं व्याधि के लक्षण अल्प होने तथा उपद्रवों के 
न होने पर सामान्यतया व्याधि साध्य होती है । 

२. वात ग्रकृति के व्यक्ति को वातप्रधान रोग वर्षा ऋतु में और आनूप देश में हो 
तो सखसाध्य व्याधि भी कश्साध्य या असाध्य हो जाती है, क्योंकि रोग-रोगी-देंश-काल 
सभी में चाताधिक्य होने के कारण दोष की प्रबलता बढ़ जाने से रोग बद्धमूल ही जाता हे । 

३, बाह्य रोग मार्ग की अपेक्षा आन्तरिक रोग मार्गजन्य व्याधियाँ कश्साध्य होती हें। 

४. दोषों का अधिष्ठान ( स्थान संश्रय ) गम्भीर धातुओं-मजा-शुक्र; सर्मांगों- हृदय, 
बस्ति और शिर में होने पर व्याधि की असाध्यता बढ़ जाती है। 

५. कुछ व्याधियों प्रकृत्पा असाध्य होती हैं यथा--कऊुष्ठ, मधुमेह, गुल्म, अशें, 
भगन्दर, उदर, राजयचमा । क्‍ 

६. संयमी, उपदिष्ट आहार विहार का पाछन करने वाला, स्थिरचित्त रोगी; 
स्वामिभक्त, सुशिक्षित, तत्पर परिचारक और उपयुक्त औषध एवं अनुभवी चिकित्सक 
की उपलब्धि होने पर गम्भीर व्याधि भी साध्य हो सकती हे । 

७. बलवान रोगी में सभी व्याधियाँ हीनबल हो जाती हैं । तेजस्वी, निश्वित्त मन) 
प्रदी्त अग्नि, शीतल मस्तक तथा सम नाडी वाला व्यक्ति शौ्र रोगमुक्त होता हे । 
साध्यासाध्यता सम्बन्धी विशिष्ताओं का निर्देशन साथ के कोष्ठक॑ में किया गया है । 


साध्यासाध्यता 








७४४७७॥७७४७४ ॥#क फल 
रोगी चिकित्सा परिचयों 


| “पर 
| |ै | | | [| |] ै 


वय आतुर संपत शरोरनल सत्वबल चिकित्सा कालारब्घ पथ्य विहार 


>> 





० ली मच चलन 


या सम्पत 
| लाउकऋा प्रतिकारक शक्ति 


ऑशककेआर। 
| |... । 
प्रकृति श्बल निदानारब्ध त्रिदोष समुत्य अकृति-दोष-दृष्य- म्म विक्ृति । 
|. काल-देशादि को ह 


| | । समता-विषमता उपद्गव 
सुखसाध्य.. कृच्छुसाष्य असाध्य 


| हआााकाः 


याप्य . प्रत्याख्येय 


३३८ 


कायचिकित्सा 












पथ्यपालन की प्रवृत्ति, ध्पाद्सपत्‌ 





सेपूर् | चाल्य-इद्धा- 
पर्याप्त साधनों की उप- | आदि सेंपूण। | बस्था । 
स्थिति, योग्य परिचारक, 
| | 
ओषधक्षम शरीर । | 
० पर प्रकृति-दोष-दृष्य-देश- अससानता । अन्यतम 
काल के दोषों की समता- समानता । 
विषमता । 
च्र्ः 
प्रतिकर्म विज्ञान 





साध्यासाध्यता-निद्शंक कोष्ठक 


प्रत्याख्येय 


आधार सुखसाध्य.. | कृष्छुसाध्य | याप्य 
१. निदान :-हेतु, पूच॑रूप अल्प ! मध्यम । सभी हेतुओं 
तथा रूपावस्था की स्थिति। | _ उत्पन्न, पू्व- 
रूप-रूपावस्था 
के सभी लक्षणों 
से युक्त व्याधि । 
२. दोष :--दोष, गति । | एकदीषज, एक | द्विदोषज, एक क्‍ मर्म-| त्रिदोषज, 
ल्‍ गति | या हिंगति- | संधि आदि में | सभी अंशी से 
से कुपित दोष। | युक्त, पुराण | स्थितदोष । | कुपित, अनेक 
व्याधिगत गतियुक्त 
दोष । मर्माधिष्ठित । 
३. रोग :-कुछ रोग स्वभा- | १. साधारण | १.साधारण | गंभीर, वहु-। क्रियापथ को 
वृतः अल्पबल, कुछ मध्य- | रोग । किन्तु अप- | धातुस्थ एवं | सीमा से 
बल कुछ प्रबल होते हैं । थ्यादि से नित्यानुपशयी | अतिकान्त, 
। उपहृत रोग। रोगी । | अनेक उप“ 
२. संचय-प्रकोप- २. स्थान- द्रवों से युक्त, 
प्रसारकालारब्ध | संश्रय एवं अरिश्युक्त । 
| चिकित्सा। | उसके बाद 
आरंभ 
ु चिकित्सा । 
४. रोगी की अवस्थाः- | युवावस्था,अबल | त्रष्य साध- | क्षीणावस्था, जीर्णांचस्था, 
प्रतिकारक शक्ति, मनोबल, | मनोबल, चतु- नादिसंपन्न, | साधनहोनता, ओषधि के 


ग्रयोग के लिए अश्षम शरीर । 


स्वसामान्यत्व । 


चिकित्सा के सिद्धान्तस्थिर करते समय दृष्य-देश-काल-वलर-अप्रि-अकृति- 


लक पसुया_ सत्वचल-सात्म्य- गाहारसात्म्यता और व्याधि की अचस्थाओं का एरा 


रोगीपरीक्षा द ११९ 


विवेचन सामने रखते हुए दोषों की अंशांश कल्पना करके, दोष के जिस अंश के दूषित 
होने से रोगोत्पत्ति हुईं हो, उसके उपशय के लिये विशेष उपचार करते हुए ओषधियों 
की योजना करनी चाहिये । आप्त प्रंथो एवं चिकित्सा शात्रों में रोगों की जो चिकित्सा 
वर्णित हे, वह विशिष्ट रोग में व्यवहवत होने वाली सभी ओषधियों और उपक्रमों का 
संग्रह सात्र है । उससे, उस विशिष्ट व्याधि में युक्त हो सकने वाली सभी ओषधियों का 
समष्टि में परिचय मिल जाता है। आतुर में रोग का स्वरूप शाज्नोक्त स्वरूप से प्रायः 
कुछ भिन्न सा ही मिला करता हैं। एक गकार से रोग और रोगी में आदश और यथाथे 
के समान अन्तर मिलता है। क्चित रोगी में ऐसी अवस्थायें भी उत्पन्न हो सकती हैं, 
अप्रत्याशित उपद्रच या विरुद्धोपक्तम के दूसरे लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, जिसमें शाज्न्रोक्त 
व्यचस्था अनुपयोगी, अव्यवहाय या निषिद्ध सी हो जाती है ।* अतः ओषधि-ग्रयोग के 
पहले प्रतिकम सम्बन्धी सिद्धान्तों का निश्चय कर लेने से ओषधियोजना में सुविधा होती है। 

प्रतिकर्म विज्ञान के विषय को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित कर 5यवस्था करनी चाहिये । 

१. चिकित्सा सूच--सामान्यतया चिकित्सा के तीम अंग माने जाते हें-लंघन, 
शमन तथा शोधन । दोष एवं व्याधि की आमावस्था में विकार कारक अंशों का पाचन 
करने के लिये लूंपन, उष्णोदक पान या पाचन औषधियों का अयोग चिकित्सा का 
प्रारम्भिक तथा सर्वोत्तम उपक्रम माना जाता है । क्‍ 

कुछ रोगियों में रोग के कुछ लक्षण बहुत उद्महूप के हो जाते हैं, जिनसे रोगी को 
असह्य कष्ट होने रगता है, ऐसी अवस्था के अतिरिक्त रोग की निरामावस्था में भी कष्ट- 
कारक लक्षणों का अनुबन्ध होने पर व्याधि का शमन करने वाली छाक्षणिक ओषधियों की 
योजना करनी पडती है। इस श्रकार विकारोत्पादक कारणों का शमन या पाचन किये 
बिना ही केवल लाक्षेणिक रूप में व्याधि का शमन करने चाली ओषधियों या उपक्रम _ 
संशामक चिकित्सा में अन्तभूत किये जाते हैं । संशामक चिकित्सा वास्तव में आत्ययिक 
था लाक्षणिक चिकित्सा है, जिससे रोगी को तत्काल लाभ मालूम पडता है, किन्तु रोग 
“निमूलन में इस प्रकार की ओषधियोँ विशेष उपकारक नहीं होतीं। अतः इस श्रेणी 
की ओंषधियों का व्यवहार अत्यावश्यक होने पर ही साबधानी पूचक करना चाहिये । 


ः जीण व्याधियों में क्किरकारक दोषों का संचय शरीर की गंभीर घातुओं में होता हे, 
इसी कारंण लीन दोष बार-बार घटठता बढ़ता रहता है, ऋतु-अहोरात्र आदि में स्वभावतः 
संचित होंने वाले दोषों से उपबंहित होकर यदा कदा रोग का तीव्र स्वरूप भी अकट हो 
जाता है। ऐसी अचस्था में पाचन८व्यवस्था के द्वारा लाभ नहीं होता, क्योंकि पाचन. के 
ह्वास मुख्ययया आमाशयस्थ दोष, रसदुष्टि या महाख्तोत के विकारों में लाभ होता है। 
शरीर की गंभीर धातुओं में भी दोष का संचय होने पर पाचन के द्वारा विशेष उपकार 
नहीं होता । व्याधि की जौर्णावस्था में देखने में तो रोग के लक्षण हीनबल से दिखाई पड़ते 
हैं, पर वास्तव में वे तीत्रावस्था की अपेक्षा अधिक बद्धमूल होते हैं। शरीर की अति- 
कारक शक्ति के दुबल होने पर ही रोग का दीघकाल तक अजुघंध होता है, जीणावस्था 


* उतलपब्ते त सावस्था देश-काल-वलं प्रति । यस्यां कायमकाय स्यात कम मे यो कार्यमकार्य स्यात्‌ कम कार्य च॒ गहितस ॥ 





१२० -: कायचिकित्सा 


उत्पन्न होती है । इसी कारण प्रतिकारक शक्ति के माध्यम से कायशील पाचन योगों के 
द्वारा इसमें दोषों का पाचन होकर व्याधि का निमूलन सम्भव नहीं होता। ऐसी श्रेवस्था में 
संचित दोषों का शोधन करने के बाद ही रोग का शमन या निमूलन हो सकता है । इसके 
झतिरिक्त विकारकारक दोषों का अत्यधिक मात्रा में संचय होने पर भी संशोधन चिकित्सा 
का आश्रय लेना पड़ता है, क्योंकि पाचन के द्वारा दोषों के निर्विषीकरण की सीमा होती 
है। पाचन के द्वारा अतिमात्र दोषों का शमन बहुत देर में होगा तथा शोधन के द्वारा _ 
संखित दोष अल्पकाल में ही शरीर के बाहर. निकल जायगा और कदाचित्‌ थोड़ा बंहुत 
दोष शरीर-घातुओं में कहीं रह भी गया तो बाद में पाचनयोगों के प्रयोग से उसका . 
त्वरित निमुंडन हो जायग़ा । .शोधन चिकित्सा के अनेक अंग होते हैं, जिनका विवेचन 
आगे स्वतंत्र रूप से विस्तारपूचंक किया जायगा ! क्‍ 

चिकित्सासूत्र का निणंय करने के बाद विशिष्ट उपक्रमों के बारे में विवेचन करना 
चाहिएं। जिस रोग का निदान किया गया है, आप्त ग्रन्थों में उसकी चिकित्सा में जिंन 
उपक्रमों का निर्देश आया है, उनका अस्तुत रोगी में प्रयोग किस सीमा तक उचित होगा 
 आश, अतिसार एवं ग्रहणी में तक का प्रयोग; आमचात, प्रमेह, मेदोवृद्धि आदि में रूछ्ष 
अन्न एवं व्यायामादि की व्यवस्था और उन्माद में त्रासन-स्नेहन या उच्चाटन आदि का 
अयोग विशेष उपक्रमों के उदाहरण हैं। अनेक व्याधियों की विशेष-विशेष अवस्थाओं में 
इन उपक्रमों का उल्लेख किया गया है, चिकित्सासूत्र निश्चित करते समय इनका पर्यालोचन 
कर लेना आवश्यक है। 

पंथ्यापथ्य--भारतीय चिकित्सा पद्धति कौ प्रमुख आधारशिला पथ्यापथ्य है। पथ्य- 
पालन मात्र से, औषघ सेवन के विना ही, रोगी रोग मुक्त हो सकता है और पथ्यपालन 
न करने वाले यदि उत्तम से उत्तम सहर्खों ओषधियों का सेवन करें, तो भी उनके आरोग्य- 
लाभ की संभावना संदिग्ध ही रहेगी । यहाँ तक कहा जाता है कि पथ्यपालन न करने 
पर औषधि से लाभ न होगा, अंतः चिकित्सा करना व्यथ है और पथ्य पालन करने से 
स्वतः रोग का उपशस हो जायगा, चिकित्सा की कोई आवश्यकता नहीं है ।* इस 
ऐकान्तिक कथन से रोग तथा स्वास्थ्य के अतिबन्ध-अनुबन्ध के लिए पथ्य का महत्व 
स्पष्ट हों गया होगा ।. क्‍ 

पथ्य के बारे में रोगी को स्पष्ट निर्देश करना चाहिए । किस समय, कितनी . मात्ना 
पें, कब तक, कौन पथध्य दिया जाय--यह परिचारकों को भमली अकार सममा देना 
चाहिए। रोग, साम-निराम-जीण आदि रोगावस्था, देश, काल, दोषों का बलाबल, रोगी 
की पाचनशक्ति, वयक्तिक प्रकृति आदि का ध्यान रखते हुए पथ्य-निर्दश करना चाहिए। 
अभी तक पाश्वात्य चिकित्सा में व्यापक रूप से पथ्य का विश्लेषण नहीं किया गया; 
केवल हृदोग, वृक्कविकार, मधुमेह, सर्वाज्ञणोफ आदि कुछ विशिष्ट व्याधियों में विशिष्ट 


'विनापि भेषजेन्य[पिः पथ्यादेव निवत्तते । न तु पथ्यविदीनानां भेषजानाम झतैरपि॥/? 
जान बातनाप्तस्थ किमोपधिनिषेवणे:। पथ्येप्सति गठालंम्थ न्थिशिीषफिीिके 3 -ह- 






शेगीपरीज्षा . १२१ 


निश्चयपूक रोग के पाचन या उद्दयोपन में सहायक होता है; अतः पथ्य पालन में अनचंधा- 
नता न होनी चाहिए। आमचात, श्लीपद, आमातिसार एवं श्वास में गुरुपाकी-विष्ट म्भी- 
पिच्छिल आहार, शीताभिषेक, विबन्ध और वर्षा ऋतु निश्चय ही कष्टकारक होती है । 
पुराने चिकित्सक पथ्यपालन में जितना जोर देते थे, आजकल उसकी तुलना में तो पथ्य 
की उपेक्षा ही की जप्ती है। किन्तु सम्यक्‌ विवेचन करते हुए यथावश्यक पथ्यपालन 
कराने में ढिलाई न कराना रोगी के लिए बहुत उपकारक होता है। श्रतिकर्म विज्ञान में 
पथ्यापथ्य का स्व॒तन्त्ररूप में महत्व होने के कारण आगे इस विषय का प्रथंक अध्याय में 
वर्णन करने के अतिरिक्त, श्रत्येक रोग के प्रकरण में भी स्पष्ट निर्देश किया जायगा। 
पथ्य के अतिरिक्त चिहदार या शयनासन के बारे में भी मली. अकार समझा कर रोगी 
'तथा परिचारकाो को बताना चाहिए । रोगी को पूण विश्राम या अधेविश्राम करना अथवा 
साधारण कम करते रहना; स्नान-जलू-वायु-सोने-जागने आदि के बारे में भी पथ्य के 
समान ही स्पष्ट निर्देश होना चाहिए । मिथ्याहार-विहार को ही संभी रोगो का मूल कारण 
माना जाता है, अ्रतः इस क्षेत्र में उपेक्षा न करना चाहिए। संक्रामक रोगों में 

मल-मूत्र-प्लीवनं आदि का संशोधन तथा संक्रमण प्रतिषेध - का उपाये भी इसी शौषेक के 
अन्तगत बताना चाहिए 


ओपषध योजना--चिढित्सा सूत्र एवं विशिष्ट उपक्रमों का भली अकार ध्यान रखते 
हुए स्वतोभावैन रोगी के वतेमान कष्ट में हिंतकर ओषधि का श्योग किया जाता है। 
रोगी के लिये उपकारक ओषधि का चुनाव करते समय व्यथाकारक अमुख लक्षणा का ध्यान 
रखते हुये मूल व्याधि अशामक ओषधियों कौ योजना की जाती है। कफ का अधिक 
संचय होने पर कफनिःस्सारक ओषधियों का उपयोग, पित्ताधिक्य होने पर पित्तशामक व 
पित्तविरेचक ओषधियों का उपयोग, वाताधिक्य होने पर वातशामक ओपषधें, उष्णानुपान 
आर वस्ति का प्रयोग उपकारक होता है। अच्छे-अच्छे ओषधियों के योग चिकित्सा ग्रन्थों : 
में संग्रहीत हैं; उनके घटक द्रव्य, भावना, संस्कार आदि का स्मरण रखते हुये यथावश्यक 
उपयोग किया जा सकता है। किन्तु योग रोगी की अवस्था के अनुरूप बहुत 
बार उतने उपयोगी नहीं सिद्ध होते हें । अवस्था, बल और शरीरगत विचित्रताओं के 
कारण केवल योगों के द्वारा चिकित्सा करने से पूरा लाभ नहीं होता" । अतः रोगी को 
प्रकृति, दोष, दृष्य आदि का विवेचन करते हुए लक्षणों का पूण शमन करने वाली ओषधियो 
का स्वतंत्र योग बनाकर यथावश्यक प्रयोग किया जाता है । 


रोगावरुथा के अनुरूप ओषधियों का योग बनाते समय सर्वप्रथम रोगनाशक 
आओषध., की योजना करनी चाहिए । रोग के दूसरे लक्षण या उपद्रचों का ग्रतिकांर करने 
के लिए, सहायक या मुख्य औषघ का गुणचर्घन करने के लिए, योगवाही द्र॒व्यों का 





१. योगेरेब रि/कित्सन हि देशायज्ञोउपराध्यति । वयोबलशरीरादिभेदा हि बहुवः मता ॥ 
च्‌. चि. ३०. 


१२२ कायचिकित्सा 


अन्तर्भाव करना चाहिए । इनकी मात्रा, सेचन का समय तथा उचित सहपान-अनुपान 
का उल्लेख भी विधिवत्‌ करना चाहिए। जिस प्रकार उपसर्गों के प्रयोग से धातुओं का 
अथ बदल जाता है, उसी प्रकार सहपान एवं अनुपान के अन्तर से औषघ का, विशेषकर 
रसौषधियों का गुण भी बदल सकता है, अतः सहपान-अजुपान में प्रयुक्त द्रव्य के रस- 
गुण-विपाक-प्रभाव आदि का असंदिग्ध ज्ञान रहना आवश्यक है । 


हेतु-व्याधिविपरोत रामबाण औषध या योगवाही रसौषधियों के प्रयोग के 
अतिरिक्त ग्रधानतया कष्टदायक लक्षणों एवं उपद्रवों का स्वृतन्त्र रूप में उपचार भी कभी-कभी 
आवश्यक हो जाता है। छक्षणों का शमन करने वाली ओषधियाँ कहीं. मूल व्याधि में 
किसी प्रकार अनुपकारक तो न होंगी, इस बात का विवेचन लाक्षणिक ओषधियों के प्रयोग 
के पूच अवश्य कर लेना चाहिए । अहोरात्र में दोषों के प्रकोप-प्रशम का ध्यान रखते 
हुए तदनुरूप श्रातः, मध्याह्ष एवं सायंकाल के अनुपान में परिवत्तेन भी करना चाहिए । 


सामान्यतया भली अकार निदान करके और चिकित्सा सूत्रों एवं भेषज्य अयोग 
सम्बन्धी विषयों का विवेचन करके ओषधियोजना करने से रोगी को अवश्य लाभ होना 
चाहिए, किन्तु कुछ रोगों में शीघ्र और कुछ में चिलम्ब से दोष-व्याधि का शमन होता 
है, अतः शीघ्र लाभ स्पष्ट न होने पर जल्दबाजी में दवा बदलते रहना श्रेयस्कर नहीं । 
अनुकूल परिणाम के लिए कुछ काल तक अतीक्षा करनी चाहिए। शेगी की प्रतिदिन 
यो तोत्रावस्था में दिन में कई बार परीक्षा करके चिकित्सक को अमन्वीक्षण करते 
हुए आवश्यक होने पर चिकित्साक्रम में आमूल परिवत्तेन या सम्वर्दन अथवा किसी 
ओषधि का परित्याग विश्वासपूवक करना चाहिए । 


उपद्रव तथा उसका ग्रतिकार--अत्येक व्याधि में कुछ विशिष्ट उपद्रवों के अनुबंध 
की सम्भावना उचित व्यवस्था न करने के कारण होती है। अतः सम्भाव्य उपद्रचों 
के अतिबन्धन के लिए पहले से ही आवश्यक व्यवस्था कर देनी चाहिए और उनके 
सम्भाव्य स्थलों का वार-बार परीक्षण करते रहना तथा परिचारकों को उनके विशिष्ट 
लक्षण बता कर उपद्रचों की उत्पत्ति के साथ ही सूचना देने के लिए सावधान कर देना 
- आवश्यक है । आत्ययिक स्थिति में आवश्यक होने पर उपयोगी सभी उपकरण रोगी के 
निकट या चिकित्सक के पास तैयार रखना चाहिए अन्यथा उपद्रव की तीव्रावस्था में 
चिकित्साकाल व्यथ की दौड़्-भाग में ही बीत जाता है । 


देनिक 2 # हर ८ पक ह हम का ह गा 

देनिक अग॒ति--अतिदिन या यथाशक्ति शीघ्र से शीघ्र रोगी की पूण परीक्षा करते 
#"% परिवत्तनों चैक ग्रगति 

हुए नवीन परिवत्तनों तथा ओषधि के अभाव का अध्ययन करके देनिक अगति का 


कर. कप धर. # # # 
लेखा-जोखा तयार करना चाहिए और उसके अनुरूप व्यवस्था में उचित संशोधन करते 
रहना चाहिये।.._ क्‍ का 


पोषक तथा ग्रतिषेघक चिकित्सा--जीर्ण व्याधियों में, चिशेषतया अधिक दिन लद्बन 
करने से शरीर बहुत क्षीण हो जाता है और ग्रतिकारक शक्ति बहुत निबल हो जाती है; 
कक... 


रोगीपरीक्षा १२३ 


जिससे शब्यात्रण, धातुक्षय आदि अनेक उपद्रव हो सकते हैं। इसलिये आमावस्था का 
पाचन होने के उपरान्त रोगी के बल संरक्षण के लिये सपाच्य-पोषक और निरुपद्गुत पथ्य की 
व्यवस्था करनी चाहिये । अनेक बार व्याथि की विशेष स्थिति के कारण अथवा रोगी की 
क्षीणता के कारण पथ्यप्रयोग से रोगी की अनुकूलता नहीं होती । ऐसी अवस्था में कुछ 


धातुपोषक तथा बलव्धेक ओषधियों की योजना मूल व्यवस्था के साथ में ही करनी चांहिये। 


अनेक व्याधियों में पुनरावतंन की प्रश्गत्ति होती हैं और पूचे व्याधि से कर्षित होने 
के कारण नवीन व्याधियों के लिये रोगी का शरीर उबर हो जाता है। अतः व्याधि का 
पुनरावतन या नवीन व्याधियों का आक्रमण न हो, इसके लिये पर्याप्त व्यवस्था करके ही 
रोगी को मुक्त करना चाहिये । 


सामान्य निर्देश--रोगी रोगमुक्ति के बाद भी पर्याप्त समय तक पूर्ण स्वास्थ्य लाभ 
नहीं कर पाता । इसलिये पूर्ण स्वस्थ होने तक पशथ्यापथ्य-आहार-विहार और आवश्यक 
ओपषधियों की पूरी व्यवस्था, रोगी को उसकी उपयोगिता सममाते हुये, करना चाहिये । 
बहुत से रोगों में उनके समूल नाश और तत्सम्बन्धी विशेष जानकारी के लिये रोगी को 
बीच-बीच में चिकित्सक का परामर्श लेते रहना आवश्यक होता है । यदि पुनः परामर्श 
की आवश्यकता हो तो उसका स्पष्ट निर्देश व्यवस्थापत्र में तिथि, समय और उद्देश्य 
के साथ कर देना चाहिये । 


द्वितीय अध्याय 


स्वास्थ्य तथा रोग 


सामान्यतया शारीरिक-मानसिक किसी भी वेदना का अनुभव न होना, शरीर व मन 
का असन्न व अफुल्लित रहना, स्वास्थ्य का मूल लक्षण माना जाता है। स॒स्वास्थ्य शरीर 
के दृढ़ संगठन, पृष्ट अंग, उत्तम बल या प्रवर आहार शक्ति पर नहीं निभर करता। 
व्यक्ति दुबल होते हुये भी स्वस्थ हो सकता है। आज भी स्वास्थ्य का कोई निरपेक्ष 
मानदण्ड नहीं हे । बहुसंख्य स्वस्थ व्यक्तियों को शारीरिक रचना, शरीर भार, पुष्टता, 
स्थूलता आदि का मध्यबिन्दु स्वास्थ्य परीक्षा का आधार माना जाता है। प्राचीन 
आचायों ने स्वस्थ व्यक्ति के शरीर एवं प्रत्येक अंग का परिमाण, विस्तार, भार आदि 
के परिमापन का निर्देश किया है और अंगों के प्रथक-ध्रथक माप का उल्लेख भी किया है, 
किन्तु उनका मानदण्ड व्यक्तिनिष्ठ है। पुरुष को अपने अंग का परिमाण स्वकीय अंगुल- 
मुश्व्याम इत्यादि मार्पों से करना होता है। इसीलिये शरीर की लम्बाई-चौडाई या 
मोटाई को प्राचीनों ने स्वास्थ्य का आधार नहीं माना है। क्योंकि अपने-अपने परिमाण 
से सभौ की लम्बाई-चोड़ाई आ्रायः एक सी होती है। कभी-कभी इसमें अधिक विषमता 
हो जाने पर भार, ऊँचाई, परिमाण आदि भी चिहकृति के निदर्शक माने जाते हैं और 
व्यक्ति अधिक लम्बा और अधिक कृश, छोटा व स्थूल, लम्बे पेर, छोटे वक्ष, बड़ा सिर 
और पतली गदन इत्यादि विषमताओं से युक्त होने पर हीन आयु या अन्य अस्वास्थ्यकर 
भावों वाला माना जाता है। जिस व्यक्ति के शारीरिक दोष--चात-पित्त-कफ, मानसिक 
दोष-- रज व तम, सम हों, जाठरामि अशित-पीत-खादित-लीढ आदि चतुर्चिध आहार 
का सम्यक्‌ रूप से पाचन-शोषण का कार्य कर रही हो और शोषित आहार रस से रस- 
रक्तादि घातुओं का यथेष्ट निर्माण हो रहा हो, शरौर के सभी अंग्र-प्रत्यंग देशकाल 
अवस्था के अनुरूप निर्वाधरूप से अपने कारय कर रहे हों, शारीर-दृष्या वह न्यक्ति 
स्वस्थ माना जाता है । शारीरिक खुख सम्पत्ति के साथ जिस व्यक्ति का मन असन्न हो 
और ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा उपलब्ध ज्ञान को मन विवेक पूचक आत्मा तक संवाहित करता 

रहे; संक्षेप में आन्तरिक और बाह्य इत्तियों से जिस व्यक्ति को पूरी असन्नता हो, वही पूर्ण 
स्वस्थ कहा जाता हें ।* | 
स्वस्थ रहने के नियम--यदि एक वाक्य में स्वस्थ रहने के नियम बताने हो तो 
कहना होगा “दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या का विधिचत्‌ पालन करते रहने से 

व्यक्ति स्वस्थ रहता है ॥*े 

- दिनचर्या--आतःकाल सूर्योदय के कम से कम १ घचण्टा पूर्व विस्तर से उठ कर, 
ताजे पानी से खूब कुल्‍ला कर, अंगुली से दांतों तथा मसूड़ों को भली अकार रगड़ कर, 

मुख की साफ कर लेना चाहिए | इसके बाद उषःपान करना चाहिए। उषःपान के लिए 

१. 'समदोष<: समाश्रिश्व समधातु-मल-क्रियः । 
प्रसन्ात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यमिधीयते ।? ( सु. सू. अ. १५ ) 
सुखसंज्ञकमारोग्य विकार दुःखमेव हि ।? 
२« 'दिनचया-निशाचर्या-मृतुचयो यथोदिताम्‌ । 

22259... सउस्थस्स दा तिघ्नति नान्यथा |? ( भा. ते. एस १ 


स्वास्थ्य तथा शोग १३५ 


दुर्बंछ, पित्तप्रक्ृति वाले व्यक्तियों को सायंकाल का रखा हुआ पयुंषित जल और 
साधारणतया ताजा जल हितकर होता है। इसके बाद कुछ समय तंक टहलते 
हुए मान्यता के अनुरूप कुछ सुख स्कररण या ध्यान करना चाहिए। शौच की आवश्यकता 
होने पर निवृत्त हो लेना चाहिए। यदि संभव हो तो खुली वायु में छुछ दूर तक बाहर 
खेत आदि में जाकर शौचक्रिया करनी चाहिए! शौचालय की सफाई का पूरा ध्यान 
रखना चांहिए. । वास्तव में स्वास्थ्य के लिए रसोईंघर तथा शौचालय की सफाई स्वाधिक 
. महत्व रखती है। शौच के उपरान्त नीम या चबूल की ताजी दातौन की मुलायम कूची 
बना कर शने शनेः दाँतों की सफाई करनो चाहिए । इन नैतिक क्रियाओं में हड़बड़ा 
कर जल्दी-जल्दी करने को श्रवृत्ति होतो है। वास्तव में नींद से कुछ समय कम कर 
और व्यर्थ की गप्प का कोटा घटा कर इन कार्यों के लिए निश्चित्त समय निकाल 
लेना चाहिए। इस अकार मुख, नासिंका, नेत्र आदि की भरी अकार सफाई कर 
लेने के उपरान्त कुछ व्यायाम करना चाहिए । दण्ड-बेठक तथा बिना साधनों का साधारण 
व्यायाम ही नियमित रूप से चल सकता है। जो भी नियमित रूप से चछ सके, उसी 
का अलुष्ठान करना चाहिए। यदि निकट में नदी हो तो तेरना भी अच्छा है । 
बालक तथा इंद्धों के लिए. आतम्काल १) २ मील पृम्म-टहले लेना पर्याप्त होता है * 
व्यायाम के उपरान्त खुली हुई वायु का सेवन सभी के लिए उत्तम हे। इनंसे निदृत्त होकर 
नख-केश का कर्त्तन, तेलाभ्यह् आदि की यथावश्यक व्यवस्था करनी चाहिए । अभय 
के उपरान्त ताजे जल से शरीर को खूब मल कर स्नान करना चाहिए । इस श्रकार शरीर 
का अन्तःपरिमार्जन और बहिःपरिमाजन कर चुकने पर देश-काल के अनुरूप रूघु आहार 
या घारोष्ण अथवा उबाला हुआ गाये का दूध लेना चाहिए । ये सारी अक्रियांएं सूर्योदय 
के वाद एक घण्टा के भीतर पूण हो जानी चाहिए। बाद में अपने देनिक कार्य व्यापार 
में संलम्त हो जाना चाहिए । 
मध्याह में अर्थात्‌ ११ बजे के आसपास ऋतु के अनुकूल भोजन करना चाहिए । 
यदि किसी कारण भोजन की रुचि न हो तो लेघन करना सर्वोत्तम रोग अतिषेधष का 
श्राधार माना जाता है । भोजन सुपाच्य, पोषक, मात्रावत और यथाशक्ति मिच-मसाले 
आदि तीक्ष्ण-विदाही द्रव्यों से रहित होना चाहिए। आहार-रसों का चुनाव करते समय 
अपनो गकृति, ऋतु को विशेषता तथा. शारीरिक श्रम॒पर ध्यान रखना चाहिए । भोजन 
नियमित रूप से, समय पर और सादा हो तथा भोजन को खूब चबाकर खाया जा । 
भोजन करते समय पानी थोड़ा-थोड़ा कई बार लिया जाय तथा उत्त समर मा प्रसन्न 
निश्चिन्त होना चाहिए। भोजन के बाद खूब कुल्ला कर, झुख तदा दन्तों की सफाई कर 
. कुछ समय तक विश्राम करना और मनोविनोदकारक कार्यों को करना चाहिए । सायंकाल 
अपराह में कुछ ऋतु अनुकूल फल या लघु द्॒व्य जलपान के लिए लेना चाहिए । 
पुनः सायंकाऊ शौच-निद्ृत्ति, मुखशुद्धि और भोजन का कम पूर्वंचत्‌ होना चाहिए । 
बस्र सफेद वर्ण के या हेमन्‍त-शिशिर में रंगीन और साफ सुथरे होने चाहिए। ढीले- 


१२६ कायचिकित्सा 


रात्रिचर्या--आहार आदि का क्रम रात्रि के प्रथम श्रहर के अन्तगत ही पूरा हो 
जाना चाहिए । आहार के बाद साधारंण कार्य, कथा-वार्त्ता या दनिक कारय का लेखा- 
जोखा किया जा सकता है । सोने के पूव १-२ वार जल पीकर, मूत्र त्याग कर, सुखशंय्या 
पर शयन करना चाहिए । शयन का स्थान हवादार और ऋतु के अनुकूल होना चाहिए । 
सोने के पूव निश्चिन्त हो, सुखकर भावों का ध्यान करते हुए सोना चाहिए । सुखशय्या, 
पेट का हल्कापन तथा निश्चिन्‍्त मन होने पर नींद खूब गहरी तथा स्वप्न रहित होती है । 
सामान्यतया ६ से ८ घंटा तक सोना पर्याप्त होता है । 

ऋतुचर्या--ऋतुओं के अनुरूप दोषों का संचय-परकोप पहले बताया जा चुका है । 
आहार-विहार में उचित परिवत्तन करते हुए दोषों का संचय न हो, अथवा होने की 
संभावना में उनके निहेरण की व्यवस्था करके व्यक्ति स्वस्थ रह सकता हैं। संक्षेप में 
स्वास्थ्य के निम्न त्रिपाद माने जाते हैं । 

१. आहार, २. युक्तनिद्वा, व्यायाम आदि तथा ३. ब्रह्मचय। इनका युक्ति युक्त पालन 
करते रहने पर व्यक्ति चिरकाल तक स्वरुथ रह सकता है । 

व्याधि का स्वरूप--जिस कारण से या जिसके संयोग से या मन में जिसके उत्पन्न 
होने या रहने से पुरुष को दुःख का अनुभव होता है, उसे व्याथि कहते हैं । व्याधि का 
यह लक्षण बहुत व्यापक है | देश, काल एवं सामाजिक मान्यताओं के आधार पर जो 
लक्षण एक समय व्याघि के रूप में माना जाता है, वही कदादित मान्यता बदल जाने पर 
कृष्टकारक न होने के कारण व्याधि न माना जाय । तिल, मशक, व्यंग्य आदि कुछ 
व्याधियाँ शरीर को प्रत्यक्ष रूप में दुःख देने वालो नहीं होतीं, किन्तु इनकी उपस्थिति से 
शारीरिक कुरूपता जन्य मानसिक दुःख अवश्य होता है अतः इनको भी व्याथि ही कहा 
जाता है। कणवेष, नासावेध, एवं दूसरे सौन्दय प्रसाधनों में स्थूल दृष्या शरीर को कष्ट 
होता है, किन्तु परिणाम में इनसे व्यक्ति को सुखानुबन्ध होता है। संक्षेप में आणिमान्रकों 
जिनकौ उपस्थिति से कष्ट होता है, उन्हें व्याधि कहते हैं । व्याधि का मुख्य परिचायक 
लक्षण दुःख है । 

व्याधि के सेद--व्याधियों की उत्पत्ति एवं उनके आश्रय की प्रधानता के आधार 
पर ४ भेद किये जाते हें :--- 

१. आगन्तुक ३. शारीर ३- मानस ४ स्वाभाविक । 

१. आगल्तुक व्याधियों--वाह्य आगन्तुक कारणों से उत्पन्न होने वाली व्याधियोँ इस 
श्रेणी के अन्तरगत आती हैं । देव, यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि अतिमानव योनियों एवं 
नाना अकार के रोगोत्पादक जीवाणुओं,विष, दूषित वायु, अमरि, विद्युत, अभिधात, नख एवं 
दशजन्य अमिंघात, मारण आदि के निमित्त किया गया तान्त्रिक अभिचार, गुरु, वृद्ध 
एवं सिद्ध पुरुषों का अभिशाप, औपसगिक या संक्रामक व्यक्तियों के साथ सम्पर्क रज्जु 
से वॉवना, सूचिवेघ आदि बाह्य कारणों से, शरीर के आन्तरिक घटकी की विषमता के 
ब्रेना ही तत्काल रोगोत्पत्ति होती है या उक्त कारणों के द्वारा शरीर को कष्ट होता है। 


|“ “€£ सम मी बाल बदला नकल कक 


स्वास्थ्य तथा रोग १२७ 


गया है। शारीरिक दृष्टि से आगन्तुक कारणों तथा अयोग-अतियोग-मिथ्यायोग आदि 
की अनुपस्थिति और दोषचंषम्य का अभाव होने पर भी रोगोत्पादक कारणों की श्रबलता 
के कारण व्याधियों का प्रादुर्भाव होता है । चिकित्सा की दृष्टि से इस अकार की व्साधियों 
का प्रतिकार मुख्यतया निदान परिवजन से होने के कारण इनका स्वतंत्र रूप से 


परिगणन आवश्यक हे । 


२. शारीरिक रोग--हीनयोग, अतियोग व मिथ्यायोग से प्रयुक्त आहार-विहार, काल 
इन्द्रियार्थ एवं मानसिक कम के कारण शारीरिक त्रिधातु ( वात-पित्त-कफ ) में इद्धि-क्षयरूप 
विकृति के कारण उत्पन्न रोग को शारीरिक रोग कहा जाता है । 

व्याधियों की उत्पत्ति मुख्यतया असात्म्येन्द्रयथ संयोग, अज्ञापराध के कारण 
होती हे तथा व्याधियों की उत्पत्ति में वात-पित्त-कफ में विषमता अनिवाय 
पूवेस्थिति होती हे । इस प्रकार रोगोत्पत्ति के कारण एवं परिणाम की दृष्टि से 
शरीर का विशेष महत्व होने के कारण इस श्रेणी की व्याधियों को शारीर या निज 
व्याधि कहते हैं। निज व्याधियों में पहले वातादि दोषों की विक्ृति होती ह॑ तथा चिक्ृत _ 
वातादि दोषों के प्रभाव से शरीर में दोषानुरूप पीड़ा होती ह। आगन्तुक रोगों में विष, 
: दूषित वायु, अभिघात आदि के कारण तत्काल पीड़ा होती हे और वाद में दोषों का 
वैषम्य होकर ये पीडायें अधिक समय तक स्थायी होती हैं या बढ़ती हैं। इस अकार 
निज और आगमन्तुक विकारों में परिणाम की दृष्टि से विशेष अन्तर नहीं होता। निज रोगा में 
प्रथम दोषवेषम्य होता है. और बाद में रोगोत्पत्ति होती ह तथा आगन्तुक म॑ अधान 

कारण के अनुरूप तत्काल वेदनामूलक रोग की उत्पत्ति होती हँ और कुछ. काल बाद 
दोषचृषम्य का अनुबंध होता हैं । 

३. मानस रोग--मन जब तक शुद्ध, सत्वगुणविशिष्ट रहता हे तब तक मानसिक 
अधिष्ठान को केन्द्र मान कर रोगों की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु रज एवं तम, इन दो 
मनोदोषों के प्रभाव से मानसिक क्षोभ या विषमता होकर रोगों की उत्पत्ति हुआ करती है। 
वास्तव में शारीरिक दोषों का प्रभाव मनपर और मानसिक दोषों का अभाव शरीर पर 
अवश्यमेच पडने के कारण इस अकार के विभाजन की विशेष आवश्यकता नहीं है, किन्तु जब 
तक रोग का सही निदान होकर रोगोत्पादक कारण का भली प्रकार निराकरण नहीं 
हो जाता, तब तक रोग का निमूलन नहीं हो सकता। क्रोध-शोक मद-ह-विषाद-हर्ष्या- 
असूया ( दूसरे के गुण को अवगुण सममना )-दन्य-मात्सय ( दूसरे के उत्कषे के , 
प्रति असहिष्णुता )-काम-लोभ-मोह-मान-चिन्ता-उद्वेग_ एवं इच्छित की अग्राप्ति तथा 
अनिच्छित की प्राप्ति से सत्व विक्ंति उत्पन्न होती हे । मानसिक वषम्यकारक सभी भावा 
का अमन्‍्तर्भाव मानस रोगोत्पादक कारणों के अन्तगत किया जाता है। वहुत से शारीरिक 
रोग भी मानसिक कारणों के द्वारा ही उत्पन्न होते हैं तथा चिकित्सा की दृष्टि से भी रोगी को 
मानसिक अवस्था का परिज्ञान एवं तदनुरूप व्यवस्था बहुत महत्व को होती हैं । चास्‍्तव 
में अनेक देनिक विभीषिकाओं से त्रस्त ग्राणियों में, वतेमान समय में मानसिक विषमता 


4२८ कायचिकित्सा 


विशिष्ट अधिष्ठान या आश्रय के द्वारा ही होता है । सुख्य रूप से शरीर का आश्रयण करके 
ज्वर, अतिसार, अश आदि व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं, इनको शारीर व्याधि और काम, 
सीध, शोक, भय, हे, चिघाद आदि के कारण मानसिक वेषम्य होकर जो व्याधियाँ 

उत्पन्न होती दूँ उनको मानसरोग कहते हैं। अपस्मार, अपतन्त्रक, भूर्छा आदि कुछ 
व्याधियोँ शरीर एवं मन दोनों का आश्रयण करके रोगोत्पत्ति करती हैं, इसलिये इनको 
उभयश्रित व्याधियों कहते हें । 

४. स्वाशाचिक रोग--शरीर के दनिक कार्यव्यापार के कारण कुछ न कुछ विषमता 
स्वभावतः उत्पन्न होती रहती है। यथासमय इस विषमता के शमन का उपचार न होने 
पर रोगी को कष्ट होता है और कष्ट ही रोग माना जाता है, इस सिद्धान्त के आधार पर 
क्षुधा, पिपासा, निद्रा, जरावस्था आदि को भी स्वाभांविक या प्राकृत रोग कहा जासकता है । 








आधिदेविक, आध्यात्मिक और आधिभौधिक व्याधियौं-अद््ट एवं कालचक्र के 
अभाव से होने वाली व्याधियों आधिदेविक, मुख्य रूप से आत्मा व मन को अधिष्ठान 
मान कर उत्पन्न होने वाली व्याधियों आध्यात्मिक तथा भौतिक कारणों के प्रभाव से उत्पन्न 


शारीरिक व्याधियों आधिभौतिक मानी जाती हैं.) इन तीन मेदों की भी सात सुख्य 
विशेषताएं होती हैं । 


. $. आदिबल प्रवृत्त--कुष्ठ, अशे, राजयक्ष्मा आदि व्याधियों से दूषित शुक्र या. दृषित 
आतंव द्वारा सन्तान में भी इन व्याधियों के लिए अनुकूलता का संक्रमण होता है, अत 
इनको आनुवंशिक, कुलज या क्षेत्रीय व्याधि कहते हैं। मातृज एवं पितृज ब्याधियों 


को पअ्रबलता के आधार पर सनन्‍्तान में उत्पन्न रोगों का नामकरण मातृज-पिंतृज रूपा 
किया जाता हे । ३ 


२. जन्मबल अवृत्त--गर्भावान होने के बाद साता के अहित आहार-विहार आदि के 
कारण बालकों में जिन व्याधियों की उत्पत्ति होती है, उनकी जन्मबल अशृत्त व्याधि 
कहते हैं । जन्मबल अवृत्त व्याधियों के भी रसकृत अर्थात्‌ गर्भपोषक रस-रक्त के दूषित 
होने के कारण उत्पन्न व्याधियों और दोहदोपचार कृत अर्थात गर्भिणी की नाना प्रकार 
के आहार-विहार की इच्छा को पूर्ति न होने से उत्पन्न व्याधियाँ, इस प्रकार दो मुख्य भेद 
होते हैं । जन्म से ही पहछुता, बाधिये, मूकता, मिनमिनत्व, वामनता ( बौनापन ) आदि 
जन्मबल प्रवृत्त व्याधियों के अ्रमुख उदाहरण हें। 

दोषबल प्रव्ृत्त--रोगाक्वान्‍्त होने पर, आहार-विहार का भली प्रकार पालन 
न करने पर, एक व्याधि से जो दूसरी ब्याथि उत्पन्न होती है; जेसे अतिश्याय से कास, 
ज्वर के अधिक संताप से रक्तपित्त, अतिसार से परिकर्तिका; उनको दोषबल प्रवृत्त व्याथियों' 
कहते हैं । यह व्याधियाँ भी मुख्यतया दो प्रकार की होती हैं। आमाशय-समुत्य अर्थात्‌ 
नाभि के ऊपर के अवयवों में होने वाले कफ-पित्त जन्य चिकार तथा पक्काशय 
समुत्थ--नामि के नीचे के अवयवों में होने वाले चातजन्य विकार। इनके अतिरिक्त 
शोषबल अबृत्त व्याधियों के भी वात, पित्त, कफ या रज और तम दोषों से उत्पन्न होने पर 
न न>ककस99सभ >>. 


ही रन हि. 


स्वास्थ्य तथा रोग १२९ 


आदिबल ग्रब्त्त, जन्मबल गदृत्त और दोषबल प्रवृत्त, तीनों अकार की व्याधियों को 
आध्यात्मिक व्याधि कहते हैं, क्योंकि इनमें व्याधियों का प्रमुख प्रभाव समनस्क शरीर 
पर पड़ता है । 


४. संघातबल प्रवृत्त--दुबल पुरुष वलवान प्रतिद्वेन्द्ी के साथ विग्ह करने से रोग 
ग्रस्त होता है । संघातबल प्रदत्त व्याधियाँ मुख्यतया आगन्तुक एवं आधिभौतिक मानी 
जाती हें ! शत्रक्गषत अर्थात्‌ अख्न-शस्त द्वारा उत्पन्न और कालकृत या हिंसक प्राणियों के 
आक्रमण से उत्पन्न, इस प्रकार इनके दो भेद होते हें । 

५, कालबल प्रद्ृत्त--अत्यधिक शीत, अत्यधिक उष्ण, वर्षा एवं धूप आदि के प्रभाव 
से जो व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं, उनको कालबल प्रवृत्त कहते हैं; क्योंकि काल में विषमता 
उत्पन्न होने के कारण एक समय अनेक व्यक्ति समान व्याधियों से पीड़ित हुआ करते हैं । 
व्यापन्न ऋतुकृत या ऋतुओं में विषमता होने के कारण उत्पन्न हुई व्याधियाँ और 
अव्यापन्न ऋतुकृत या ऋतुओं के स्वाभाविक संचय-प्रकोप आदि के कारण उत्पन्न होने 
वाली व्याधियाँ; इस प्रकार कालबल यवृत्त के भी दो भेद किये जाते हैं। 

६. देवबल प्रवृत्त--देवादि ग्रहों का द्ोह, अभिचार, अभिशाप और जनपदोध्वंसकर 
रोगों से आक्रान्त व्यक्ति से उपसष्ट होना, इन कारणों से उत्पन्न रोगों को दवबल 
प्रवृत्त कहते हे । इनके भी संसगज एवं आकस्मिक दो भेद होते तन । देव, भूत या आप- 
सर्गिक रोगाक्कान्त रोगी के संसग से होने वाले संसगंज और देवादि के दृश्य सम्पर्क के 
बिना अकस्मात्‌ होने वाले आकस्मिक कहलाते हैं । 9 

७. स्वभावबल प्रवृत्त--क्षुधा, तृष्णा, द्द्धावस्था आदि देहस्वभाव से उत्पन्न 
होने वाले परिणाम स्वभाववल प्रवृत्त व्याधियों के उदाहरण हें । काठज और अकालूज 
इनके दो भेद होते हैं । स्वस्थब्ृत्त के नियमों का पालन करते हुये शरीर का संरक्षण 
करने पर भी स्वाभाविक रूप में क्षुधा और तृष्णाजन्य कष्टों का नियत काल पर अनुभव 
होता है, उन्हें कालज कहते हैं । स्वस्थवृत्त का विधिवत्‌ अनुष्ठान न करने पर असमय 
में ही भूख प्यास का उत्पन्न होना या वली, पलित, जरा आदि से ग्रह्त होना अकालज 
कहा जाता है। कालबल शवृत्त, देवबल प्रवृत्त और स्वभाववल ग्रवृत्त तीनों प्रकार के रोग 
आधिदेविक अर्थात्‌ अद्श्य कारण से जायमान या दव( आक्तन कर्म )जन्य कहलाते हैं । 

. औपसर्णिक, ग्राक्केवल और अन्य लक्षण भेद से व्याधियों के ३ प्रकार--- 

१. ओपसर्गिक--इसे औपद्रविक व्याधि भी कहते हैं । प्रथम उत्पन्न व्याधि के अनन्तर 
उस रोग के मूल कारण से ही जो व्याधि पीछे उत्पन्न होती है और प्रथम रोग की 
चिकित्सा से ही जिसका उपशम होता है, वह व्याधि औपसर्गमिक या औपद्रविक कही 
जाती है। जसे अतिसार में उपद्रवस्वरूप परिकर्तिका और ज्वर में समन्ताप - 
जनित तृष्णा । यहां औपसर्गिक शब्द संक्रामक व्याधियों के लिए नहीं ग्रयुक्त हुआ है । 

२. आक्केवल--जो व्याधि प्रारम्भ से ही मूल रूप में उत्पन्न हो, किसी दूसरी व्याधि 
का पूचरूप या उपद्रव रूप न हो, उसको प्राक्केवल कहते हैं ॥ ____ मा 


१३० कायचिकित्सा 


से उत्पन्न हो, उसे दूसरी व्याधि का लक्षण या अन्य लक्षण कहते हैं--जेसे वातज्वर 
के आक्रमण के पूव जुम्भा या पेत्तिक ज्वर के पहले नेत्रदाह। 

स्वतन्त्र और परतन्त्र भेद से व्याधियों के २ प्रकार-- 

3. स्वतन्त्र--जो व्याधि शाज्न्र में कहे हुये कारणों से उत्पन्न तथा शाख्त्रवर्णित र॒पंष्ट 
लक्षणों से युक्त और तदनुरूप निर्दिष्ट चिकित्सा से अच्छी होने वाली हो, उसे स्व॒तन्त्र 
व्याधि कहते हैं । इसी को अनुबन्ध्य भी कहते हैं । 

२. परतन्त्र--जो रोग दूसरे रोग के कारणों से उत्पन्न हो तथा रोग के लक्षण भी 
भली प्रकार स्पष्ट न हो और मूल रोग की चिकित्सा से ही जिसका उपशम हो जावे उसे 
परतन्त्र या अनुबन्ध व्याधि कहते हैं। परतन्त्र व्याधि भी दो प्रकार की होती है । 
पुचरूप और उपद्रच । जो मूल व्याधि के . उत्पन्न होने के पहले लक्षण उत्पन्न हो उनको 
पूवरूप और जो मूलरोग के अनन्तर उपद्रव स्वरूप विशिष्ट लक्षण उत्पन्न हों, उन्हें 
उपद्रव कहते हें । 

दोषज, करमंज और दोष-कर्मजमेद से व्याधियों के ३ प्रकार-- 

१. दोषज--मिथ्या आहार-विहार के कारण उत्पन्न हुये रोग दुशपचारजन्य या 
'हृष्टकमेज अथवा दोषज कहे जाते हैं । 

२. कमंज--जो रोग पू्नजन्स में किये हुये शुभाशुभ कमों के कारण उत्पन्न हुये हो 
तथा जिस व्याधि का सही कारण आहार-विहार जन्य न ज्ञात हो रहा हो, उनको पूर्चा- 
पचारज, कमंज या अदृष्ट जन्य कहते हें-यथा कुष्ठ । 

दोषकर्मज--कुछ व्याधियाँ पूचजन्म के अशुभ कम तथा इस जन्म के अपध्य 
सेवन से उत्पन्न होती हें । उन्हें दोषकर्मज कहते हं-यथा वातरक्त । 

साध्यासाध्यता की दृष्टि से व्याधियों की परीक्षा का आगे यथास्थल उल्लेख 
किया जायगा 


रोगोस्पक्ति के सामान्य कारण-- रोगोत्पत्ति के कारणों का विवेचन पहले किया जा 
चुका है। काल, इन्द्रियाथ तथा मन आदि का अयोग-अतियोग और मिथ्यायोग 
सामान्यतया सभी रोगों का कारण माना जाता है। जो चस्तु शरीर को सात्म्य नहीं- 
अनुकूल एवं उपकारी नहीं, उसका इन्द्रियों या शरीर के किसी अंग से सम्पके होना विकारो- 
त्पादक माना जाता है । कौन सी वस्तु किसको असात्म्य है, इसका निर्णय बुद्धिमान व्यक्ति 
आसानी से कर सकता है । 

रोगोत्पत्ति में दोषों एवं संक्रामक जीवाणुओं का महत्व--- 

दोषों कौ विषमता को ही आचीन आबचार्यों ने रोग संज्ञा दी है। आज के युग मैं 
दोषों की विषमता का वज्ञानिक समीकरण सही रूपों में सामने न होने के कारण रोगोत्पत्ति 
के साथ दोषों का सम्बन्ध स्थापित करने की चेष्टा प्राचीन मान्यंता मानी जाती है । जिस 
तरह पुराने आरसादों के अवशेष पुरातत्व को सौमा में. जाकर पहले से अधिक महत्वपूर्ण 


आदी गये हैँ, उसी अकार विद्वान, गये हे, उसी अकार विद्वान्‌ वज्ञानिक त्रिदोष सिद्धान्त को ऐतिहासिक महत्व की वस्तु 


स्वास्थ्य तथा रोग १३५१ 


व्यक्तिनिष्न महत्व की अर्थात्‌ चिकित्सा विज्ञान में निणय का मानदण्ड प्रकृति-विकृति 
भाव को माना गया है, यह स्पष्ट किया जा चुका है| उसी प्रकार का सम्बन्ध शारीरिक 
दोषों के द्वारा रोगोत्पत्ति में भी होता हे । 


दोष रोगोत्पत्ति में निरमित्त तथा उपादान दोनों रूपों में कारण होते हैं। शरीर में 
अस्वास्थ्यकर स्थिति उत्पन्न कर, धांतुओं को दूषित करके रोगों के प्रति दोषों की निमित्त 
कारणता और स्वयं स्वतन्त्र रूप में दूषित होकर व्याधिं रूप में परिवर्तित हो जाने के 
कारण उपादान कारणता, दोनों ही विशेषताएँ उनमें हैं । व्याधि के निमित्त कारण असंख्य 
हैं; उसमें दोषों, उपसर्गों, अभिघात और दोषग्रकोपक पूर्व वर्णित कारणों आदि 
का समावेश होता है!। अतः दोषों-उपसर्गों आदि सभी कारणों को रोगोत्पत्ति में महत्वपूण 
मानने से आ्राच्य पाश्चात्य-पद्धतियों का विरोध शान्त हो जाना चाहिये । किन्तु औपसर्गिक 
व्याथियों का विश्छेषण या उपसर्ग का उपसग्गण विस्तृत हो गया है और अतिदिन 
नवीन-नवीन अनुसन्धानों के द्वारा अभिनव ओऔपसगिक रोगों के प्रकाश भें आते जाने 
के कारण चिकित्सा का सिद्धान्त ही परिवर्तित होता जा रहा है! संकामक रोगों को 
संख्या-वृद्धि एवं मिथ्याहार विहार जन्य - शरीर-दोषज व्याधियों की सीमा को न्यूनता 
और जीवाणु नाशक द्वव्यों का चिकित्सा में विशेष उपयोग, इन सबका चिकित्सा पर 
सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है| संक्रामक व्याधियों में रोगोत्पादक कारण का संक्रमण बाहर से 
होने के कारण शरीर की प्रतिकारक शक्ति का चिकित्सा में महत्व कम होता जा रहा है । 
आओऔपसर्गिक कारणों का नाश करने वाली ओषधियों से व्यचहार में तात्कालिक लाभ होने 
के कारण सभी के लिये आकर्षक हो गया है। इनसे रोगोत्पादक ओऔपस्िक जीवाणझुआ 
की वृद्धि रुूककर अथवा विनाश होकर व्याधि के लक्षणों की शीघ्र निश्नत्ति हो जाती है । 
किन्तु इस श्रेणी की अधिकांश ओषधियों से शारीरशक्ति की इृद्धि न होने के कारण 
व्याधि के पुनरावतन या नवीन व्याधियों के आक्रमण का सम्भावना बनी रहती है । 
यद्यपि सैद्धान्तिक रूप से सभी चिकित्सा पद्धतियों में शरीर के स्वास्थ्य को व्याधि- 
ग्रतिकार का सर्वोत्तम साथन माना है; किन्तु औपसर्णिक व्याधियों की संख्या ब्रद्धि के 
बाद व्यावहारिक रूप में शरीर की निज विषमताओं का महत्व कम हो गया है। 

जब तक औपसर्गिक जीवाणुओं की बद्धि के लिये शरीर उपयुक्त या दुबंड न हो तब 
तक उनकी ब्रद्धि नहीं हो सकती। ओऔपसर्गिक जीवाणुओं का शरीर में अवेश, अनुकूल 
परिस्थिति होने पर उचित वृद्धि तथा शरीर की असहनशीलता संक्रामक व्याधिया काउत्तात्त स॑ 
समान महत्व के कारण माने जाते हैं । पिछले कुछ वर्षों में अ्तिजीवी वर्ग का अनेक 
महत्वपूर्ण ओपधियों आविष्कृत हुई हैं। उनका व्यवहार विकित्सा में अधिक किया जाता 
हैं। इन ग्रतिजीवी ओषधियों के अयोग के लिये संक्रामक जीवाणु का असादग्धानणय 
आवश्यक होता है। निदान की जटिलता, व्ययसाध्यता और दुलभता के कारण अनेक 
बार इनका अयोग झनिर्णीत व्याधियों में आ्रयोगिक रूप में होता हैं, जिससे इनको विशिष्ट 


शक्ति का क्षय होता जा रहा हैं और उपसर्ग कारक जीवाणुओं में इनके. विपररत,अचचयराद् 


१३२ कायचिकित्सा 


अधिक मात्रा में, लम्बे समय तक व्यवहार करने पर भी सनन्‍्तोष जनक लाभ नहीं होता; 
साथ ही अनेक व्याधियों के व्यावहारिक रूप भी बहुत बदल गये हैं। क्षय, मंथरज्वर, 
विषमज्वर, लेष्मोल्वण सन्निपात, पूयमेह आदि का उत्पत्तिकंम, व्याधिरुवरूप, विक्वति 
निदशक लक्षण और रोग के उपशय में बहुत परिवर्तन हो गया है। चिकित्सक अपने 
अजुभव से उनका निदान करता है और प्रायः निर्णय न कर सकने के कारण अनेक 
संभाव्य व्याधियों के प्रतिकार के लिये बहुमुखी ओषधि का प्रयोग करता है । इस चिकित्सा 
संकरता से रोगी का पर्याप्त अथेव्यय होने के साथ ही शरोर की प्रतिकारक शक्ति के 
निष्किय हो जाने के कारण किसी न किसी व्याधि का अजुबन्ध बना ही रहता है तथा 
होन अतिक्रिया जन्य व्याधियों---क्षय, स्नायुदौब॑ल्य और अनूजता जनित व्याधियाँ बढ़ती 
ही जाती हैं । जहाँ किसी रोगी को दस पन्द्रह दिन ज्वर-प्रतिश्याय-कास इत्यादि का अनु- 

बन्ध हुआ परीक्षण करने पर क्षय की उपस्थिति का आभास मिलने लग जाता है । इन सब 
परिचतनों का कारण कया है, यह आज के चिकित्सक के सामने प्रसुख विचारणीय प्रश्न है । 


आयः सभी औपसर्गिक रोगों में जीवाणुओं का संक्रमण होने के बाद तुरन्त रोगोत्पत्ति 
नहीं होती, कुछ अवकाश रहता है । इसे व्याधि का संचयकाल कहते हैं। इस समय में 
जीवाणु को वृद्धि तथा उनके साथ शरीर का प्रतिकारक युद्ध होता है। यदि शरीर 

रोगोत्पत्ति कण ए #** ९ | 

अबल हुआ तो बिना रोगोत्पत्ति के ही जीवाणुओं का पूर्ण विनाश हो जाता है। रोगी को 
साधारण अवसाद के अतिरिक्त आन्तरिक विकार का कुछ अनुभव नहीं होता । प्रत्येक रोग 
में जीवाणुओं का संचयकाल मर्यादित रहता है। साथ के कोष्ठक में ग्रधान-प्रधान 
ओपसर्गिक रोगों का संचयकाल दिया गया है। जीवाणुओं की संख्या तथा घातकता 


और मनुष्य को प्रतिकारक शक्ति के क्षीण होने पर संचयकाल कम तथा इसके विपरीत 
स्थिति होने पर संचयकाल अधिक होता हे । 


गे या अव्यक्त सभी अकार के औपसर्गिक विंकारों से मुक्त होने के बाद 
शरौर भविष्य के लिये सामान्यतया सभो संक्रामक व्याधियों के और विशेषतया 
उस विशिष्ट व्याधि के अतिकार के लिये पू्ापिक्षा अधिक सबलू हो जाता है। यदि 
उपसग बहुत ग्रम्भीर रहा, विकारकारी जीवाणु अबल शक्ति वाले हुये और देश-काल- 
जल-चायु को अ्तिकूछता तथा आसात्म्येन्दियाथ संयोग के कारण शरीर हीनबर हुआ 
तो रोगोत्पत्ति हो जाती है । फिर सो शरीर ऋपना अतिकारक युद्ध करता रहता है । यदि 
व्याधि की इस तीज्रावस्था में अ्रतिजीवी द्रव्यों का प्रयोग कर अथवा ज्वर्शामक छाक्षाणिक 
ओषधियों का अयोग कर व्याधि शमन को चेश्टा की जाती है, तो इससे तात्कालिकरूप 
में व्याधि की निवृत्ति हो जाने पर भी प्रतिकारक शक्ति की दृष्टि से कोई उपकार नहीं 
होता । इसी अवस्था को व्याधि की आमावस्था ग्चीनों ने कहा है, जिसमें तीव्र ओषधियों 
के प्रयोग का निषेध किया है। इस अवस्था में मल, मूत्र, स्वेर आदि संशोधक मार्गों से 
शरीर-व्याधि संघ में उत्पन्न हुये दोष-मरछों का शोधन तथा उपद्वों की संभाल एवं बल 
संरक्षण किया जाय तो शरीर की अतिकारक शक्ति स्वयं व्याधि का संशमन कर देती है । 





३ बेड 


स्वास्थ्य तथा रोग 





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१३७. 


स्वास्थ्य तथा रोग 


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स्वास्थ्य तथा रोग १३५९ 


इस ग्रकरण के आरम्भ में दोषों की विषमता को ही व्याधि कहा गया था । इसका 
तात्पर्य इतना ही है कि दोषों में विषम परिचतेन होना शरीरस्थ व्याधियों का निदशक माना 
जाता हैं। दोषों में भिन्नता होने के कारण संक्रामक रोगों में समान विकारकारी जीवा- 
णुओं का उपसग होने पर भी रोगियों में व्याधि के लक्षण समान नहीं होते । विषमज्वर, 
आन्त्रिकल्वर तथा शछेष्मोल्वण ज्वरों में सिद्धान्त रूप में कोई समता नहीं होनी चाहिये । 
किन्तु व्यवहार में अनेक वार चिकित्सक इन रोगों का सापेक्ष्य विनिश्वय करने में अपने 
की असमर्थ पाता है। यदि इनके कारण प्रथक-प्र॒थक हैं, तो 'काय कारण के ही अनुरूप 
होता है, इस सिद्धान्त के आधार पर व्याधि के लक्षणों में भी स्पष्टतया प्योप्त पाथक्य होना 
चाहिये। ऐसा न होने के कारण संकामक रोगों में केवल विकारकारी जीवाणुओं का ही महत्व 
नहीं है, शरीर की प्रकृति, देश, काल आदि का भी उतना ही महत्व है, यह अनुमान होता 
है । कष्स प्रधान वर में आने वाली व्याधियाँ-रोमान्तिका, मसूरिका, रोहिणी, कुकास, 
'छेष्मोल्वणसन्निपात, वातशछेष्मिक ज्वर, अनूजता-जनित व्याधियों, राजयदुमा आदि का 
प्राधान्य चसन्‍्त ऋतु में ही क्यों होता है ? आमातिसार, आमवात, श्वास तथा त्वचा के 
रोगों का, जिनमें कछेप्मा-वायु और स्वल्प मात्रा सें पित्त का अनुबन्ध रहता है, प्रकोप वर्षा 
में अधिक क्यों होता है ? व्याधियों की एक रूपता का यह समदोषत्व देंशं-काल के अभाव 
को स्पष्ट करता है। यदि विषमज्वर वसन्‍्त ऋतु में हो, मन्‍्थर ज्वर हेमन्त में हो, 
'छेष्मोल्वण व्याधियाँ ग्रीष्म में हों, तो इनके लक्षणों में पर्याप्र अन्तर दिखाई पड़ता है । 
इससे यही स्पष्ट होता है कि विपरीत देश-काल में संक्रामक रोगों का रूप भी कुछ बदल 
जाता है । 

एक कमरे में समान आहार-विहार वाले चार व्यक्ति रहने पर सभी समान रूप 
. से मशकदंश के शिकार हो सकते हैं । विषम ज्वरोंत्पादक जीवाणु से मच्छरों के दूषित 
होने के कारण चारों व्यक्तियों में मशकदंश से समान रूप में जीवाणुओं का संक्रमण होता 
है । किन्तु सभी व्यक्ति विषमज्वर से नहीं पीड़ित होते और जो पीड़ित होते हैं वे भी 
समान लक्षणों से नहीं शआक्रान्त होते। किसी को अतितीतव्रज्वर शिरःशूल और 
अंगमर्द के साथ तथा किसी को ह॒ल्लास-वेचेनी के साथ शीतपूबक ज्वर होता है । 
कभी विषमज्वर में ही तीज्र प्रवाहिका, आक्षेपक, रक्तमेह या मूच्छां के भी लक्षण व्यक्त 
हो जाते हैं। इतनी अधिक विविधताओं का कारण रोगी का निजी प्रभाव हो माना 
जायगा अर्थात व्याधि के संचय काल में रोगी की प्रकृति के अनुरूप जीवाणुओं को इद्धि 
अधिक या कम हुई तथा व्याधि का अधिष्ठान मस्तिष्क, यकुत्‌ , इक, अन्‍्ध्र इत्यादि अ 
में कोई अंग हो तभी इतनी विविधता हो सकती है । 

उक्त बर्णन से औपसर्णिक व्याधियों में भी लक्षणों की विविधताओं का कारण शरौर 
की भिन्नता है, यह स्पष्ट हो गया होगा। इसीलिए देश-काल और शरीर को मिन्नता के 
कारण व्यवहार में औपसर्मिक व्याधियों के अनेक रूप मिलते हैं । इस वर्णन से व्याधि 
के वीजारोपण में उपसर्ग का और रोगोत्पत्ति में शंरीरगत विशेषता--दोष-का प्रभाव 


ह्रै। अनेक स्थलों में सं गीवाण निम्नित्त कप... दे...%ए-2ं> केक 
्पछ जोता है | आझनेक स्थला में सक्रामक जीवाण 


3 कायचिकित्सा 


स्थलों में प्रकोपक कारण के रूप में तथा कहीं-कहीं परिणामों के रूप में सामने आते हैं । 
बहुत से आच्य विद्वान जीवाणु विज्ञान को शआप्त प्रन्थों की देन नहीं स्वीकार करते । 
इस दृष्टि से आयुर्वेदीय चिकित्सा में संक्रामक व्याधियों का कोई महत्व नहीं--केवल 
दोषों के अनुरूप चिकित्सा व्यवस्था करनी चाहिए--बयही उनकी मान्यता है। किन्तु 
अनेक रोगों में रक्त, ष्ठीवज, मल, मूत्र एवं अन्य धातुओं एवं मल्लों की सूक्ष्म परीक्षा 
विशेष यन्त्रों एवं संवद्धन आदि के द्वारा करने पर विशिष्ट जीवाणुओं की उपस्थिति मिलती 
है । यदि इन जीवाणुओं को परीक्षार्थ अन्य आणियों में अवेश कराया जाय तो आय एक 
निश्चित व्याधि कौ--तत्तत्‌ रोगों की--उत्पत्ति होती है। जहाँ-जहाँ संक्रामक रोग होते 
हैं, वहाँ-चहाँ ये संकामक विशिष्ट जीवाणु पाये जाते हैं और जहाँ यह जीवाणु नहीं होते, 
प्रायः चहा वे संक्रामक रोग भी नहीं पाये जाते । इस अकार अन्वय-व्यतिरेक से संक्रामक 
जीवाणुओं की औपसर्गिक व्याधियों के अति विशिष्ट कारंणता सिद्ध होती है ! कुछ महानुभाव 
उन जीवाणुओं को शरीर के भौतर बाहर से अविष्ट हुआ न मानकर दोष-दृष्य विक्ृति सें, 
विशेष प्रकार की अनुकूल अवस्थाओं में, शरीर के भीतर ही उत्पन्न हुआ मानते हैं । 
इस प्रकार इन जीवाणुआ की रोगों का निमित्त कारण न मानकर, उपादान कारण का 
अश या व्याधि का अवयव ही मानते हैं। वास्तव में इस विषय में दुराग्रह श्रेयर्कर 
नहीं । यद्यपि प्राचीन आचायों ने उपसगंजा ज्वरादिरोगपौडितजनसम्पर्काद्धवन्ति 
( डल्हण ), असंगादू गात्रसंस्पर्शांत्‌ निःश्चासात्‌ सहभोजनात्‌ , सहशब्यासनाञ्वापि वख्र- 
माल्यानुलेपनात्‌ । ओपसगगिकरोगाश्व संक्रामन्ति नरान्नस्म ( सुश्रत ) इत्यादि वाक्यों में 
ओपसर्गिक रोगों की, आगन्तुक न्तुक रोगों को सीमा में, स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की है; किन्तु 
संक्रामक व्याधियां का विस्तृत वर्णन उपलब्ध प्राचीन चिकित्सा ग्रन्थों में नहीं मिलता। इसमें 
कोई संदेह नहीं कि आधुनिक विज्ञान की इस दिशा में बहुत बड़ी देन है। इस क्षेत्र में 
अतंख्य अनुसन्धान हुए हैं और बहुसंख्यक रोगों के कारणभूत विशिष्ट जोवाणुओं का 
प्रत्यक्षीकरण किया जा चुका है। किन्तु रोगोत्पत्ति की दृष्टि से प्राचीनों का क्षेत्र ग्राधान्य 
सिद्धान्त त्याज्य नहीं--जीवाणुओं की कारणता होने पर भी रोगक्रम में शरीर की 
प्रमुखता होती हैं । उसी के अनुरूप लक्षणों की अभिव्यक्ति होती है। रोगोत्पादक निदान 
की दृष्टि से जीवाणुओं को अधान कारण के अन्तगंत लिया जा सकता है । 
उपरोक्त वणन से औपसर्गिक रोगों के सम्बन्ध में प्राचीन समय की संतुलित 
जानकारी का उदाहरण सामने आता हैं। किन्तु जितना अधिक वणन ओऔपसर्गिक 
रोगों, उपसगंकारक विभिन्न जीवाणुओं, उनकी परीक्षा के असंख्य साधनों और अतिजीवी 
चिकित्सा द्वव्यों का आज उपलब्ध है, उस श्रेणी का या उससे बहुत कम भी वर्णन आचीन 
साहित्य में नहीं मिंठता। सम्भव है साधनहीनताकारण के साथ ही क्षेत्र आधान्य 
सिद्धान्त भी औपसगिक रोगों के विस्तृत वर्णन न करने में सहायक रहा हो। क्षेत्र 
आधान्य सिद्धान्त का तात्पय रोगोत्पत्ति में शरीर के महत्व का प्रतिपादन है। मनुष्य 
के चारों तरफ असंख्य सूक्ष्म जीव व्याप्त रहते हैं, उनमें बहुत कम दृश्य, अधिकांश 


भा लन्ड 2....डसपें_ कल अपकारक * कला प्राक्घाजनल सीता अऑ्ॉ---+--- -.- - * 6४ 


स्वास्थ्य तथा रोग १४१ 


कारक होते हैं। वातावरण में व्याप्त इस सृष्टि के संहार का और सच्चे आर्थो में औपसर्थिक 
रोगों के अतिकार का साधन अब तक ज्ञात नहीं हो सका । सम्भव है, इन्हीं व्यावहारिक 
बाधाओं के कारण शरौर को ही ज्ञान का मुख्य आधार मानकर निर्णय करने वाले 
आचीन विद्वानों ने जीवाणु विज्ञान की उपेक्षा की हो। क्षेत्र अधान भारतीय सिद्धान्त का 
अजुकरण समकालोन विदेशी विद्वानों-धमोौचायों आदि ने भी किया हैं। एक धर्मंग्रन्थ 
में इस विषय का स्पष्टीकरण करने वाला वहुत सुन्दर कथोपकथन आया हैं। शिष्य ने 
आचाय से निवेदन किया कि मनुष्य रोगी क्यों होता है ? इसका सोदाहरण समाधान 
आचाये ने इस प्रकार किया । एक खेत से अज्न की वाल लेकर कुछ पक्षी उड़े । कुछ दूर 
उड़ने के वाद उनको चाच से छिटक्रकर थोड़े से दाने रेगिस्तान सें, कुछ पहाड़ी उबड- 
खाबड़ जमीन में, कुछ समुद्र में तथा कुछ उपजाऊ जमीन में गिरे । रेगिस्तान में गिरे 
हुये वोज चहाँ की भयड्भर गर्मी तथा उबरा शक्ति की कमी से अड्भरित न हो सके, वहीं 
जल-भुन गये | पहाड़ी प्रदेश में गिरे हुये वीज अद्भरित हुये, परन्तु चारों तरफ कठीलो 
माडियों के पौधों ने अड्डरों को अधिक बढ़ने न दिया । पोधा मुर्काकर नष्ट हो गया । 
समुद्र में पड़े बीजों को मछलियाँ खा गईं और मेदान में गिरे वीज खूब उगे और एूले- 
फले । इसी अकार यदि शरीर पूण स्वस्थ हो तो व्याधि के लिये अनुकूल ज्षेत्र न होने 
के कारण तथा रोग प्रतिकारक शक्ति की गरमी से रोगोत्पादक कींटाणु रूपी बीजों का 
नाश हो जायगा । अर्थात जीवाणुओं से आक्रान्त होने पर भी रोगोत्पत्ति नहीं होगी । 
कदाचित शरीर में जीवाणुओं की कुछ वृद्धि भी हो तो संयम-नियम-ज्यायाम आदि के 
ग्रभाव से उसकी बृद्धि रोगोत्पज्ञ कर सकने की स्थिति तक न पहुँचेगी और जिस प्रकार 
पहाडी क्षेत्र में अड़्रित वीज कटीली माड़ियों के कारण नष्ट हो गया उसो अकार 
जीवाणुओं का भी विनाश हो जायगा । ज्वर में वमन, अतिसार, तृष्णा और अस्वेद के 
द्वारा शरीर स्वये व्याधियां का शोधन-पाचन करने को तथा भक्षकायाणु उत्पन्न कर 
विकारकारो उपसर्ग को आत्मसात एवं नष्ट करने की चेष्टा करता हैं। जंसा समुद्र में 
गिरे हुये वीजों को मछलियों के द्वारा विनष्ट हो जाने के कारण अंकुरित होने का अवसर 
न मिल सका। किन्त॒ क्षेत्र के उबर होने और परिस्थितियों के अनुकूल होने 
बीज का बहत गसार अर्थात्‌ व्याधि की उत्पत्ति होती हैे। उदाहरण, उदाहरण ही हैं 
वह सर्वाश में व्यापक नहीं होता, किन्तु इससे क्षेत्र आधान्य सिद्धान्त की अधानता तो 
स्पष्ट हो ही जादी है । 

ओऔपसगिक कारणों के द्वारा उत्पन्न व्याधियों में लाक्षणिक विविधता होने पर भी 
नियमित रूप से विकारकारी जीवाणुओं की उपस्थिति से उपसगग को विशेष महत्ता प्रकट 
होती है। विंकारकारी जीवाणुओं का शरीर में प्रवेश, धातु में संक्मण, संचय, ब्रृद्धि 
विषोत्पत्ति के द्वारा शरीर के अज्ञ-प्रत्यज्ञ' घातूपधातुओं में जो पारेणाम होते हैं अथवा 
उपसर्गजन्य विजातीय द्रव्य के साथ शरीर की जो ग्रतिक्रिया होती हैं, वही उपसगंज 
व्याधि मानी जाती है। इसकी सर्वाधिक विशेषता समाज की दृष्टि से एक व्यक्ति के दोष 


१४२ कायचिकित्सा 


योजनापूर्वक करनी पड़ती है, जिससे व्याधित व्यक्ति रोग मुक्त हो सके और दूसरे स्वस्थ 
व्यक्ति संक्रमित न होने पाए । 

उपसग की परिभाषा--रोगोत्पादक संक्रामक जीवाणुओं का शरीर में नियत 
माग से अवेश, संख्यावृद्धि और गहणशील अंगों या धातुओं में अवस्थान होने के बाद 
विषोत्पत्ति, धातुनाश या मार्गावरोध के द्वारा रोगोत्पत्ति होना, औपसर्गिक व्याधियों का 
मूल स्वरूप माना जाता है। विकारी जीवाणुओं का शरीर में प्रवेश या उपस्थिति उपसर्ग 
के लिए पयाप्त नहीं होती । उपसग्ग के कारण रोग उत्पन्न होने में जीवाणुओं की संख्या, 
घातकता या तीवता, प्रवेश माग, निवासस्थान, ऋतु-देश-काल-आहार-विहार तथा क्षेत्र 
( शरीर ) की अनुकूलता, आक्रान्त व्यक्ति की आयु-प्रक्ृति-शारीरिक तथा मानसिक 
स्थिति इत्यादि अनेक अवस्थाओं का सम्बन्ध होता है । क्‍ 

रोगोत्पत्ति में अन्वय-व्यतिरेक से विशिष्ट जीवाणुओं की कारणता होने के कारण 
उपसग का तात्पय विंकारकारी जीवाणुओं का शरीर में प्रवेश माना जाता है । 

ओपसमणिक रोगों कह प्रसार--ओऔपसर्गिक व्याधियों में सभी व्याधियों के 
विंकारकारी जीवाणु पथक-शथक्‌ होते हैं । इनका अत्यक्ष-अप्रत्यक्ष या वाहक कीटों के 
द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संक्रमण होता है । संक्रामक व्याधि के लिये मुख्य 
ओपसर्गिक जीवाणुओं का शरीर में अवेश रोगोत्पत्ति के लिये अनिवाये कारण 


माना जाता है । 
सहायक कारण-.-- 


१. कुलज प्रवृत्ति---अनेक ओपसर्भिक रोगों में कुलज अबृत्ति दिखाई देती है! 
फिरंग, कुष्ठ, राजयक्ष्मा, आमचात आदि व्याधियों इस श्रेणी में आती हैं । 

२. अवस्था--अनेक ओपसर्गिक व्याधियाँ वाल्यावस्था में, कुछ युवावस्था तथा 
कुछ इद्धाचवस्था में विशेषकर उत्पन्न होती हैं । मसूरिका, लघुमसूरिका, रोमान्तिका, 
रोहणी, कास, कुकास, शेशवीय अज्ञघात, गण्डमाला तथा कृमिरोग बाल्यावस्था में 
अधिक होते हैं। युवावस्था में क्षय, कुष्ठ, फिरंग, पूयमेह, विसूचिका और अंथिक 
सज्निपात अधिक हुआ करते हैं.। इद्धांचस्था में श्लेष्मोल्वण सन्निपात, संधिवात आदि 
होते हैं, किन्तु विशिष्ट औपसर्गिक रोगों की संख्या वृद्धावस्था में कम हो जाती है । 

रे- आहार--नियमित सन्तुलित भोजन, आहार में जीवतिक्तिखनिजलवण तथा 
ग्रोभूजिनों का सम्यक्‌ प्रयोग रोग अतिकारकता बनाये रखने के लिये आवश्यक होता 
है। विंषम आहार, अनियमित आहार तथा हीन आहार से शरीर की प्रतिकारक 
शक्ति का हास होकर ओपसर्गिक जीवाणुओं की संख्या वृद्धि के लिये शरीर उदबरे क्षेत्र 
बन जाता है। 

४. अभिघात---आघात और शीतोष्णजन्य स्थानीय दुबलता के द्वारा शरीर का 
सर्वाधिक रक्षक आवरण-त्वचा-छिन्न हो जाता हैं। जिससे विकारी जीवाणुओं का शरीर 

में अवेश सम्भव हो जाता है। विसपे, धलुर्चात, पूययुक्त व्याधियाँ और स्थानीय शोथयुक्त 


मल मिशशिनिनिकिदी.. ७. का जे थक 


स्वास्थ्य तथा रोग 


५. विहार---गन्दे जलवायु वाले कारखाने में कम करना, गन्दी बस्त 
अप्रकाशित, वात प्रविचारहीन स्थान में रहना, शरीर तथा बच्चों को अस्वच्छत 


का अनुपयोग तथा अत्यधिक मानसिक एवं कायिक भ्रम के द्वारा शरीर के दबल हे ] जरा 
से ओपसर्गिक रोगों की उत्पत्ति आसानी से होती है । 









बलहानिकर शारीर ब्याधियाँ---कुछ व्याधियोँ शरीर की 
करके शरीर को निबल बनाती हैं । मधुमेह, वृक्कजन्य व्याधियों, रक्तक्षय 
सम्बन्धी व्याधियाँ और जीण कास इत्यादि से क्षीण होने के कारण राजयद्मा, गल'मो न्य 
सन्निपात. पूयमूलक व्याधियों तथा विद्रधि इत्यादि औपसर्गिक रोग अधिक होते ने है 


७. देश-काल-जल-वायु--विषमज्वर, कालज्वर, श्छीपद, दण्डकज्वर, मन 
अतिसार और कृमिरोग आनूप देश तथा उष्ण एवं क्लेद 












ग्रतिश्याय, श्लेष्मोल्वण सन्निपात, रोहणी, आमचात, इन्फ्लुएज्ञा इत्यादि श्ुसन संस्ध 
के रोग अधिक होते हें । 

८. औपसर्मिक रोग--कुछ औपसर्गिक रोग शरीर को इतना दुबकू बना ने हैं 
जिससे उनसे सज्निवृत्त हुये रोगी दूसरे औपसर्गिक रोगों से आस!/नी से पीड़ित होते हूँ. 
रोमान्तिका, 'छेष्मज्वर, कुकास आदि से पीडित होने के वाद राजयक्षमा, कणविद्रा 
नेत्रसाव तथा श्वुसनप्रणाली की अनेक व्याधियाँ प्रायः पेदा होती हैं । 

संक्रमण के मार्ग-- 

१. प्रस्यक्ष--उपसर्गज व्याधि से पीड़ित व्यक्ति के प्रत्यक्ष संसम से फिरंग, डए्देश, पुच- 
मेह, विसप, कुछ्ठ, मसूरिका आदि का असार होता है। रोगी के खांसने-छोंकने-बीलन 
से छ्लीवन-विन्दुओं के साथ निकट बं& हुये व्यक्तिया 
का संक्रमण हो जाता है । प्रायः चासश्रणाली को सभी ज्या घियां में पर 
होता है। जल्संत्रास और मूषिक दंश ज्वर में कुत्ते-्थ्गाल-चूहै का काटनाः भा इस 
श्रेणी मे. आता हैं । 

२. अप्रत्यक्ष--औपसरिक व्याधि से पीड़ित व्यक्ति से उपश्षिष्ठ खाद्य, पंथ, पात्र ए- 
दूषित चायु के द्वारा प्रसार होने पर, रोगी के साथ साक्षात्‌ सम्बन्ध न होने 
अप्रत्यक्ष घसार माना जाता है ! 

कीटकों हारा---कीटक, पिस्सू , मक्खी, जू किलनों, मच्छुर व भुन 
बहत से संक्रामक रोगों का असार होता हैं। इनमे ऊुछ काडः केवल वि ः 
का संव॒हन, कुछ अपने शरीर में सम्बर्धन तथा इुछ अपनो सम्ततियों में मो जादगरुऊ 
का संक्रमण कर रोग का असार करते रहते हे । 

४. संवाहक मनुष्य--कुछ ध्यक्ति व्याधि निर्मुकत हो जाने के उपरान्त तथा कुछ 
गुप्त रूप से व्याथि से संक्रमित होने पर, रुवय बिना पीड़ित हुये हो, जबाछुआ के 
संचहन करते हैं । इन्हें स्वस्थ तथा व्याधित वाहक कहते हैँ। इनके मलमूत्रदः 































१४४ कायचिकित्सा 


ओपसणिक जीवाणुओं का शरीर में प्रवेश--- 


प्रायः सभी ओऔपसर्गिक रोगों में जीवाणुओं के शरीर में प्रवेश का मार्ग नियत-सा 
होता है। दूसरे माग से उनका अवेश होने पर विकारोत्पत्ति नहीं भी हो सकती । खाद्य- 
पेय द्वारा श्रविष्ट होकर रोगोत्पत्ति करने वाले जीवाणु विन्दृत्त्षेप के रूप में अन्तःश्वसन के 
द्वारा या त्वचा में क्षत होने पर उसके द्वारा शरीर में प्रविष्ट हो जाने पर भी सर्वत्र 
रोगोत्पत्ति नहीं कर सकते । उसी अकार धनुर्वातदण्डाणु का अवेश त्वचा के द्वारा न होकर 
खाद-पेयों के साथ मुखद्वारा होनेपर धनुर्वात नहीं हो सकता । 


मुख, अन्तःश्वसन, त्वचा और श्ल्लेष्मल कला के द्वारा जीवाणुओं का शरीर में 
प्रवेश होता है।* कुछ जीवाणु गर्भावस्‍था में अपरा के द्वारा गर्भ को भी आक्रान्त करते हैं। 
फिरंग, रोमान्तिका, मसूरिक्रा से पीडित माता के गर्भस्थ शिशुको भी ये व्याधियाँ 
हो जाती हें । 


जीवाणुओं के द्वारा रोगोत्पक्ति का कारण--- 


१. विष--सभो ओपसर्गिक जीवाणु मनुष्यों के शरीर में विविध प्रकार का विष 
निर्माण करते हैं। जब विषोत्पादक जीवाणुओं की जीवितावस्था में विष उनके शरीर से बाहर 
निकल कर फेलता रहता है तो इन्हें वहिर्विष कहते हैं। इसमें जीवाणुओं के एक स्थान पर 
मर्यादित रहते पर भी विष का ग्रसार सारे शरीर में हो जाने के कारण सार्वदेहीय लक्षण 
पंदा होते हैं । धनुर्वात तथा रोहणी इसके अमुख उदाहरण है । जो विष जीवाणुओं की 
जीचितावस्था में इनके शरीर के भीतर ही सौमित रहता है और उनके शरीर का नाश होने 
पर चारों ओर फेलता है, वह अन्तर्विष कहा जाता है। जीवाणुओं की आयु बहुत अल्प 
होती है। बराबर लाखों-करोड़ों की संख्या में शरीर के भीतर उनका नाश होता रहता 
हे । जिससे अन्तर्विष नियमित रूप से शरीर की कोषाओं को विषाक्त बनाकर रोगोत्पत्ति 
करता रहता है। यह विष शरीर की कोषाओं में शोथ, अपजनन, भक्षकायाणु नाश, 
रक्तकणद्रावण और श्वेतकायाणु का नाश इत्यादि अनेक रूपों में विकार पेदा करता 
है । औपसर्गिक रोगों में विकारोत्पत्ति का यही प्रमुख कारण है । 


२. सागनिरोध--शरीर के सूक्ष्म ख्ोतसों में विकारकारी जीवाणु-कृमि आदि का 
अधिक संचय हो जाने के कारण मार्गावरोध होकर विशेष कष्ट होता है। श्लीपद के द्वारा 
लसचाहिनियों का अवरोध, विषमज्वर के द्वारा मस्तिष्क केशिकाओं के रक्तग्रवाह का 
अचरोध इसके उदाहरण हैं । 


कायाणूपबृत्ति--( (2ए४०४:०ु४४० ) कुछ जीवाणु शरीर की कोषाओं के भीतर 
प्रचिष्ट होकर उनका भक्षण कर शरीर की धातूपधातुओं का नाश कर विकारोत्पत्ति करते 
हैं । विषमज्वर के जीवाणुओं के द्वारा रक्तकर्णों का नाश इसी श्रेणी में आता है । 





१. “नासारंभानुगतैन वायुना श्रास-कास-प्रतिश्याया+, व्वगित्ियग्तेन ज्वरमसरिकादयः? । 





स्वास्थ्य तथा रोग १.8५ 


उपसगज शारीरिक विकार--- 

स्थानिक--शरीर के जिस स्थान से उएसग का अवेश होता है, चहाँ पर शोथजन्य 
प्रतिक्रिया प्रारम्भ होती है। जिससे वहाँ पर छोटे-छोटे दाने या विस्फोट निकलते हैं अथवा 
विष का आधिक्य होने पर धातुकोषाओं का अपजनन होकर पू2योत्पत्ति होती हैं । दोष का शरीर 
में प्रसार होने पर उस स्थान से सम्बन्धित लसग्रन्थियों में विक्ृति का अवरोध होता हैं । 
अतः विकृति के मुख, तालु या गले से प्रारम्भ होने पर ग्रीवा की लसग्रन्थियों और हरुत-पाद 
से प्रारम्भ होने पर कक्षा या चंक्षण की लसग्रन्थियों चिक्ृत होती हैं । कुछ जीवाणुओं का 
शरीर की विशेष धातु की ओर आकषण होने के कारण व्याधि का सर्वाधिक परिणाम उन्हीं 
स्थलों पर दिखाई पढ़ता हैं।॥ मस्तिष्क गोलाणुओं के द्वारा मस्तिष्कावरण शोथ, गुह्य 
गोलाणुओं के द्वारा पूथमेह, क्षय दण्डाणुओं के द्वारा राजयक्ष्मा, धनुवात दण्डाणु के 
द्वारा वातनाडियों और आमवात के जीवाणुओं के द्वारा सन्धियों की श्लेष्मलकला का 
मुख्यरूप से विकृत होना जीवाणुओं के विशिष्ट स्थान संश्रय का उदाहरण हे । 

सावंदेही विकार--जीवाणुओं के विष का.- प्रसार सारे शरीर में होने के कारण ज्वर, 
अतिसार, अज्मद इत्यादि सावदेहीय लक्षण पेदा होते हैं । किन्तु कुछ अज्नों के ऊपर 
इन विषों का परिणाम अधिक या प्रथम होने के कारण उनमें कार्य चंषम्य प्रथम उत्पन्न 
होता है । मस्तिष्क, रक्तवह संस्थान, इक तथा श्वसन के अज्ञो। पर विशेष परिणाम होने 
पर अधिक व्यापक एवं गम्भीर लक्षण पदा होते हैं । पर्याप्त समय तक. जीवाणुओं के 
विषों का शरीर में प्रभाव होने पर रक्तक्षय, यकृृत-प्लीहा की विक्ृति आदि तथा श्वेत- 
कायाणुओं की संख्या ब्रृद्धि और प्रतियोगी पदार्थों को अधिक उत्पत्ति अथवा रक्षाज्ञों की 
विक्ृति आदि परिणाम होते हैं । 


कझ्रोपसगिक रोगों के प्रकार--- 


१. सौम्य--रोग के सौम्य होने, उपसग की पूृण वृद्धि के पहले ही अतिकार की 
व्यवस्था होने और व्याधि के अनुपद्गुत होने पर ओपसणिक रोग बहुत आसानी से ठीक 
हो जाते हैं। कभी-कभी उपसर्ग सौम्य होता है, जिससे रोगी अपना दनिक काय करता 
रहता है। किन्तु श्रम एवं अनियमितता के कारण सौम्य प्रकार में भी अन्त में उपद्रव 
होकर गम्भीर लक्षण पेदा हो सकते हैं । यदि इस वर्ग के रोगियों में पथ्य-आहार-विहार 
के पालन पर शआारम्भ से ध्यान दिया जाय तो औषध प्रयोग की आवश्यकता नहीं पड़ती । 


२. सामान्य--व्याधि की गम्भीरत्-मदुता के अनुरूप उसके स्वाभाविक लक्षण 
तीव्र या सौम्य रूप में रोगी में दिखलाई परे तो इसे सामान्य या स्वाभाविक रूप कहेंगे । 
इसमें पथ्यपालन तथा सामान्य औषधोपचार से रोग की अवधि बीतने पर स्वाभाविक 
क्रम से उपशम होता है । 

३. गस्भीर या घातक--इसमें प्रारम्भ से ही लक्षणों की तीत्रता रहती है और 
उपद्वों की भी अधिक सम्भावना होती है। व्याधि के इस रूप का अनुमान होने पर आरम्भ 


१४६ कायचिकित्सा 


रक्तल्लावी वर्ग आता है, जिसमें त्वचा-श्लेष्मलकला-अन्त्र-वृक्क इत्यादि अंगों, से रक्त- 
स्राव होकर रोगी की म्त्यु होती है। रक्तक्षयजन्य दुबलता से अल्पोपह्गत रोग में भी हृदय- 
निपात होने के कारण रोग असाध्य होजाता है । आरम्भ से ही सर्वोपकरण युक्त उपचार 
होने पर कदाचित अनुकूल परिणाम की सम्भावना हो सकती है। 

४. जीण--यह दो प्रकार से होता हे। कुछ औपसर्गिक रोग स्वभाव से ही 
मन्दगति से प्रारम्भ तथा मन्दगति से ही प्रसार कहते हें। राजयच्मा, कुछ्ठ, फिरंग इत्यादि 
जीण रोग इसी श्रेणो में आते हैं । अनेक बार प्रारम्भ में व्याधि तीव्र स्वरूप की होती है, 
किन्तु कुछ काल के बाद उसके लक्षणों में सौम्यता होकर जीण रूप उत्पन्न हो जाता है । 
जीण विषम ज्वर, कालज्वर, पुराण आमातिसार, जीण पूयमेह आदि आरम्भ में तीत्र 
होकर अन्त में जीण रूप में परिणत होते हें । 

अनेक बार ओपसर्गिक जीवाणुओं के स्थानसंभ्रय के आधार पर रोगों का 
वर्गीकरण ग्रंथिक, आन्त्रिक, फुफ्फुसगत इत्यादि स्थानिक नामों से भी किया जाता है । 

ओोपसर्िक रोगों के निदान को विशेषताएँ--- 

निज रोगों के समान ही ओपसर्गिक रोगों में भी रोगी का इतिबृत्त रोगविनिश्वय 
में बहुत महत्वपूर्ण योग देता हैं| सामान्य रोगों के अतिरिक्त इन रोगों में कुछ विशेष- 
विशेष अश्न पूछे जाते हैँ, अतः औपसर्गिक रोगों के निदान की विशिष्ट पद्धति जान 
लेना अच्छा होगा । 

१. कुछ-बृत्त--रोगी के संक्रामक रोग से पीडित होने के पहले कुछ एचं परिवार 
में उत्पन्न हुए रोगों के बारे में विवेचन किया जाला है। कुछ रोग आनुवंशिक 
होते हैं अर्थात्‌ कुछ रोगों का संक्रमण मातृ-पितृ दोष से संततियों में होता है अथवा 
उनमें उक्त रोगों के श्रति सहज असहनशीलता या अबृत्ति ( 08000629 ) देखी जातीं 
है, यथा--राजयच््मा, कुष्ठ, उपदंश, फिरंग, विसप, आमवात आदि । पूर्वजों में इनमें 
से किसी रोग से कोई पीडित हुआ हो तो उनकी सन्ततियों में इन रोगों के होने की 
संभावना अधिक होती है । किन्तु कुछ रोग जीवित कुटुम्व में एक ही समय अनेक 
व्यक्तियों को समान रूप से आक्रान्त करते हैं। मसूरिका, रोमान्तिका, लघु मसूरिका, आन्त्रिक 
ज्वर, कालज्वर, कुकास ( १४४०००७०९ 0०८27 ), वातश्लेष्मिक ज्त््र (47स्‍76 775 ) कु 
ग्रंथिक सन्निपात्त ( 282०० » विसूचिका ( (४०6४७ ) आदि संक्रामक व्याधियाँ 
एक समय में कुठुम्ब के अनेक व्यक्तियों को पीडित करती हें । 

२. आत्मदृत्त--रोगी का आत्मद्वत्त पूछते समय निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए । 

आयु--अनेक ओऔपसर्गिक रोग विशेष अवस्था में अधिक उत्पन्न होते देखे 
जाते हैं । बाल्यावस्था में मसूरिका, लघु मसूरिका, रोमान्तिका, रोहिणी, शेशवीय अंगघात» 
कुकास, कण्ठमाला, तुण्डिकेरी शोथ तथा आमवात, श्वसनीफुफ्फुस पाक ( -3707०0- 
एप्र०७घा०००७ ) आदि का अकोप अधिक होता है । युवावस्था में राजयक्ष्मा, कुछ, 


उरस्कोय, विसूचिका, ग्रंथिक सन्निपात, फिरंग, औपसर्गिक पूयमेह तथा मस्तिष्क सुषुम्ना 
कक... कट कम क. हि मा गा हि हा ब आढ 


स्वास्थ्य तथा रोग १४७ 


हैं । फुफ्फुसपाक तथा श्वसनी फुफ्फुसपाक का आक्रमण वृद्धों में पर्याप्त होता है । 
पूवरो ग---कुछ संक्रामक रोगों से एक बार पीडित होने के बाद व्यक्ति प्रायः जीवन 
भर उस रोग से दुबारा पीडित नहीं होता। मसूरिका, रोमान्तिका, कणमूलिक शोथ, 
पीतज्वर, त्वचागत कालज्वर, शेशवीय अंगधात आदि जीवन में अधिक से अधिक 
एक बार ही होते हैं । किन्तु वातश्लेष्मिक ज्वर ( (7गीप७70८&७ ), आमवात, श्वसनी- 
शोथ, फुपफुस पाक, विषमज्वर, अतिसार आदि व्याधियों से एक बार पीडित होने के 
बाद धुनः पुनः आकान्त होने को संभावना बनी रहती है । इस दृष्टि से कभी कभी पूरे 
रोगों का ज्ञान वत्तमान रोग का निदान करने में वहुत सहायक होता है। ' 


मसूरी का प्रयोग ( ४8७००७7&४०7४ & 70०प 8४07 ) :--आजकल 
अनेक रोगों के प्रतिबंधन के लिए मसूरी का प्रयोग. सफलता पूर्वक किया जाता है। 
विशिष्ट रोग की मसूरी का प्रयोग करने का इतिहास मिलने पर उस रोग के आक्रमण की 
संभावना कम हो जाती है । 

जानवरों के काटने का इतिवृत्त--कुछ रोग विशिष्ट जानवरों के काटने से फेलते 
हैं । चूहे के काटने से मूषिक दंशक ज्वर और कुत्ता एवं श्यगाल के काटने से जलसंत्रास 
का उपसग होता है । क्‍ 

सम्पक या संसग--ओऔपसर्गिक रोगियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध रखने चाले 
स्वस्थ व्यक्ति उक्त रोगों से पीडित हो सकते हैं । वातश्लेष्मिक ज्वर एवं ग्रंथिक सन्निपात 
तथा विसूचिका आदि कुछ रोग अल्प समय में हीं स्वस्थ व्यक्तियों को आक्रान्त कर 
सकते हैं, अतः निकट भूतकाल में रोगी किसी संक्रामक रोग से पीडित व्यक्ति के सम्पर्क 
में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में आया है या नहीं, इसकी जानकारी करनी चाहिए । बालकों 
में रोहिणी, कुकास, रोमान्तिका तथा मसूरिका आदि का संक्रमण विद्यालयों से तथा खेल- 
कूद के समय निकट सम्पक होने के कारण बहुत आसानी से व्यापक्र रूप में हो सकता 
है । अतः इस श्रेणी की व्याधियों का प्रकोप होने पर बालकों की सामूहिक रूप से 
स्वास्थ्य-परीक्षा रोग के निदान तथा प्रतिबंधन, दोनों दृष्टियों से आवश्यक होती है । 


प्रवास--कुछ ओपसर्गिक रोग विशिष्ट आरन्तों एवं जनपदों में ही मर्यादित रहते हें, 
दूसरे ग्रान्तों में नहीं होते । कालज्वर, श्लीपद, अंकुश मुख कृमि का प्रकोप उत्तर अदेश, 
बिहार तथा बंगाल एवं आसाम में ही अधिक होता है; राजस्थान, पंजाब और महाराष्ट्र 
आदि में प्रायः नहीं होता । उसी प्रकार स्वायुक रोग ( नहरुआ ) बृम्बद तथा राजस्थान 
में और माल्टाज्वर प्रायः पंजाब और पेप्सू में होता है, दूसरे पूर्वी ग्रान्तों में नहीं होता । 
इन स्थानों में प्रवास करने या कुछ काल तक निवास करने के बाद अपने देश में जाने 
के बाद इन देशों में होने वाले रोगों से पीडित होने पर, प्रवास का इतिहास जाने बिना 
निदान आसानी से नहीं हो सकेगा । 

३. रूत्तण--लक्षणों तथा भौतिक चिह्ों के द्वारा आभ्यन्तरीय विकृृति का पर्याप्त 
लाल होता ह । संक्कलामक गैगों का स्थान-संभ (५ क्‍ क्‍ 





१४८ कायचिकित्सा 


दण्डाणु का क्षुद्रानत्र की श्लेष्मलठकला, विषमज्वर का रुधिरकायाणु, फुफ्फुस गोलाणु 
का फुफ्फुस, रोहिणी का असनिका तथा तुण्डिकेरी के निकट का गले का अ्रंश 
और शेशवीय अंगघात का सुषुम्नागत धूसर केन्द्र मुख्य अधिष्ठान होता है । विशेष 
अंग में जीवाणुओं का स्थानसंश्रय तथा उनके विष से उत्पन्न समषिमूलक लक्षणों एवं 
भौतिक चिह्ों से औपसर्गिक रोग के निदान में प्रमुख सहायता मिलती है। प्रत्येक रोग के 
कुछ लक्षण दूसरे रोगों में मिल सकते हें, किन्तु एक ही व्याधि के अनेक लक्षण तथा चिह्न 
समष्टि रूप में एक रोगी में मिलने पर निश्चित रूप से उसी व्याधि के निदशक होते हें। 


४. आयोगिक परीक्षा--रक्त, मूत्र, पुरीष, छ्लीवन, शुक्र तथा दूसरे धातु एवं मर 
का प्रयोगशाला में रासायनिक विधियों एवं सूछमदशक, सम्वधन तथा प्राणिरोपण श्रादि 
के द्वारा परीक्षण करने से विकारकारों जीवाणुओं का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिचय मिलता 
है, जिससे औपसर्गिक व्याधि का असंदिग्ध निर्णय किया जाता है । 


क. जीवाणुओं का प्रत्यक्ष दुशन :--- 


सूचमदशक यंत्र द्वारा--औपसर्गिक रोग से पीडित रोगियों के रक्त-मल-पूत्र- 
प्लीवन-मस्तिष्कसुषुम्नादव एवं शरौर के दूसरे खाबों में रोगों के कारणभूत जांचाणु 
उपस्थित रहते हैं । रक्त-मूत्रादि को काँच की पटरी पर फेलाकर, विशेष-विशेष 
पद्धतियों से रंजित करके या बिना रंजन के ही सूच्ष्मदशक यंत्र ( /0708000 ) 
के द्वारा परीक्षा करने पर जीवाणुओं का प्रत्यक्ष दशन हो जाने पर रोग का सटीक निग्रय 
हो जाता है । कदाचित्‌ जीवाणुओं की संख्या शरीर में कम हुई या वे गंभीर धातुओं में 
छिपे हुए हो, तो इस पद्धति से उनकी उपलब्धि न होने पर भी व्याधि का नास्त्यात्मक 
निदान नहीं किया जा सकता । कभी-कर्सी गंभीर धातुओं से जीवाणुओं को निकालने 
के लिए ग्रोह्ीपक ( 770700908५6 ) द्रब्यों का व्यवहार किया जाता है, यथा--विषम- 
ज्वर एवं कालज्वर में प्लीहा में छिपे हुए जीवाणुओं को एड्रेनेलीन का अधस्त्वचीय 
सूचीवेध करके रक्त में आने की बाध्य किया जाता है, उसके बाद पुनः रक्त की सूक्ष्म- 
दशक से परीक्षा की जाती है। जहाँ पहले रक्त में जीवाणु नहीं मिले थे, वहाँ इन 
प्रोहीषक ओषधियों के प्रयोग के बाद ग्रायः मिल जाते हैं। औपसगिक व्याधियों में निदान 
की दृष्टि से सूच्रमदशेक यंत्र से अत्यक्ष परीक्षण बहुत आवश्यक तथा महत्वपूर्ण माना जाता है । 


सम्वद्धंन--सूच्मदशक द्वारा जीवाणुओं का निर्णय न हो सकने पर परीक्ष्य द्रव्य 
को सामान्य या विशेष व्धनकां ( (प्रोपए७ 77००७ ) में रोपित किया जाता है । 
उसमें जीवाणुओं की सम्यक्‌ वृद्धि होने के बाद पुनः सूक्ष्मदशक से पू्ववत्‌ परीक्षा 
की जाती है । 


प्राणिरिपण--प्रहणशशील आणियों--मृषक, खरगोश> आदि में परीक्ष्य द्रब्य 
प्रविष्ट किए जाते हे, जिससे उस आणी में विशिष्ट रोग के लक्षण उत्पन्न होते हैं । गुप्त 





स्वास्थ्य तथा रोग १४५९ 


क्षय तथा जलसंत्रास आदि भूढ़-लिंग व्याधियों में कभी-कभी इस परीक्षा की आवश्यकता 
पड़ती है । 
ख. लसिका परीक्षा :-- 

उपसग होने के कुछ काल बाद उपसष्ट व्यक्ति के रक्त में प्रतियोगी ( जीवाणुओं का 
ग्रतिकार करने वाले शरीर के रक्षक तत्व ) पदा्थ उत्पन्न हो जाते हैं। यह अतियोगी 
द्रव्य रक्त या लसिका में घुल्े-मिले हुए रहते हैं। अनेक ओऔपसर्गी रोगों में प्रतियोगी पदाथ 
नियत स्वरूप तथा नियत प्रतिक्रिया वाले होते हैं। इस कारण रोगी की लसिका की 
विशेष परीक्षा कुछ संक्रामक रोगों में संदेह निन्रत्ति के लिए की जाती हैं। आंत्रिक ज्वर 
में विडाल कसौटी ( ४४॥08) (68 ), फिरंग में कान तथा चासरमान को कसौदी 
( 49783 & श४७४४९७४७॥४१8 $6808 ) इस श्रेणी की ऊसिका परीक्षाएं हैं। 


ग. उपसग जन्‍्य सामान्य परिवत्तन!--- 

ऊपर जीवाणुओं के उपसग से होने वाले विशिष्ट स्वरूप के परिवत्तनों का उल्लेख 
किया गया है, किन्तु रक्त-रक्तरस-मूत्र-मल एवं छीवन आदि में उपसग के कारण कुछ 
सामान्य परिवर्तन भी होते हैं । इन सामान्य परिचत्तनों को उपस्थिति से किसी एक 
उपसग का निर्णय नहीं हो सकता किन्तु भौतिक चिह्नों, लक्षणों आदि के साथ में 
इन परिवत्तनों को संतुलित करने से कभी-कभी निदान में सहायता मिलती है। रक्त के 
बैंतकायाणुओं का सकल तथा सापेक्ष परिगणन ( 0०0७ & 4)76९7९४(४9) 00प्रा(६ 
० ५. (8. 0. ), शोण बतुंलि ( 5907702007 ), रक्तकणिकाएं ( 80668 ) 
आदि के परीक्षण से यही अचधिशिष्ट स्वरूप का ज्ञान होता है। इस. विषय का स्पष्टीकरण 
दृष्य परीक्षा के प्रकरण में पहले किया जा चुका है । 

इस प्रकार औपसर्मिक रोगों के निणय में सूक््मदशन, सम्वधन तथा आणिरोपण 
से प्राप्त ज्ञान अचूक या निश्चित होता है। लसिका परीक्षा के द्वारा प्राप्त ज्ञान पर्याप्त रूप 
में विश्वसनीय होता है, किन्तु उसे सभी अवस्थाओं में अचूक नहीं कह सकते । इन 
परीक्षाओं के द्वारा जीवाणु की उपस्थिति का अनुमान या अप्रत्यक्ष ज्ञान होना, रोगनिदान 
में निर्णायक होता है; किन्तु नास्त्यात्मक ज्ञान रोग का निषेधक नहीं होता । जीवाणुओं 
की संख्याल्पता, सावधानीपूर्वक पर्याप्र समय तक सूक्ष्मदशक आदि के द्वारा पूर्ण परीक्षा 
न करना तथा कभी-कभी संयोगवश जीवाणु नहीं मिलते । ऑपसर्गिक रोग का संदेह 
होने पर जब तक निर्णायक ज्ञान. न हो जाय, थोड़े समय के अन्तर से बार बार परीक्षा 
करते रहना चाहिए 

आगे औपसर्गिक रोगों के प्रकरण में इस विषय का आवश्यक स्पष्टीकरण यथास्थल 
किया जायगा । 

रोग क्षमता 

रोग प्रतिरोधकारक शारीरिक शक्ति या औपसर्गिक रोगों का प्रतिकार करने वाली 

चिशिष्ट शक्ति को रोग क्षमता कहते हें? 


याधिक्षमत्वं व्याधिबलविरोधित्व व्याध्युत्पाद दपप्रतिवन्‍्धकत्वभिति यावत” ( (चक्रपाणि मिति यावत्‌” (९ चक्रपाणि 0 


१०७ द कायचिकित्सा 


रोग क्षमता जनित शक्ति के कारण ही व्यक्ति रोगों के आक्रमण से बचा रहता है या 
रोगाक़ान्त होने पर उनसे मुक्त हो पाता है। अभी तक इसके बारे में ठीक ठीक निणय 
नहीं हो सका कि व्याधिक्षमता का स्वरूप क्या है और औपसर्गिक कारणजन्य व्याधियों 
: के अतिकार में इसके द्वारा शरीर की सुरक्षा किस प्रकार होती है? शारीरिक दृष्टि से 
परिपुष्ठ, सुसंगठित और सबल व्यक्ति भी व्याधियों से आक्रान्त हो जाते हैं तथा असात्म्य 
आहार-विहार का सेवन करने वाले और दुबल व्यक्ति इन व्याधियों से बचे रह जाते हैं । 
इसलिए रोग क्षमता केचल शारीरिक स्वास्थ्य-वल-पौरुष-मनल्विता-पृथ्ता आदि पर हो 
निभर नहीं करती । 

क्षमता-उत्पादक साधनों के आधार पर इसके निम्नलिखित भेद किये जाते हैं-- 


रोगक्षमता 
। 
सहज जन्मोत्तर या अर्जित 

[कक ल्‍ 
जातिगत बवंशगत व्यक्तिगत हक 0३ 

असर 

कृत्रिम या मसूरी लब्ध 
| | क्‍ 

स्वाभाविक झद प्रत्यक्षरोगा- सहज जन्मोत्तर कालूज 


माता से ग्राप्त कृत्रिम या लसिका लब्ध 


। 
हज । । 
संस्कारित जीवित मृत जीवाणु लव्घ जीवाणु विष । 
जीवाणु रब्घ या विषाभरूब्ध 


| 

| 

उपसगे लंब्ध क्रमण लब्ध 
द | 

| 


| | | 
प्रतिविष छसिका प्रतिवृणाण्वीय लसिका सन्नितरत्त लसिका 


क. सहज च्षमता--गर्भावस्‍था में अपरा के द्वारा माता के शरीर की रोग अतिक्रा- 
रक शक्ति बच्चे में संवाहित होती है। बहुत सी जातियों में एक प्रकार का रोग नहीं होता, 
शेष में दूसरे प्रकार का नहीं होता । इस सहज क्षमता के जाति-चंश एवं व्यक्तिगत भेद से 
२ विभाग किये जाते हें । 

१. जातिगत--फिरंग-कुष्ठ-चिसूचिका-रोहिणी आदि ओऔपसर्गिक व्याधियों का 
आक्रमण केवल मानव जाति पर होता है । पशु-पक्षियों में होने वाले बहुसंख्यक 


|___> > > अल... आम ०० अधिक 





बेाक.कि 


स्वास्थ्य तथा रोग १५७१ 


संत्रास और रिकेट्सिया आदि थोड़ी सी ही व्याधियों का पशु-पक्षियों एवं मानों पर 
समान रूप से आक्रमण होता है। पक्षियों में घनुर्वात और बकरी में राजयक्ष्मा कभी 
नहीं होता । सम्भव है, इस प्रतिकार के मूल में भिन्न परिस्थितियाँ एवं शरीर का भिन्न 
तापक्रम होना सहायक होता हो; क्योंकि औपसर्गिक जीवाणुओं का संदर्धन एक निश्चित 
तापक्रम पर ही होता है; अतः जिन जातियों में शरीर का ताप इससे भिन्न रहता है, 
उनमें जीवाणुओं की वृद्धि न हो सकने के कारण रोगोत्पत्ति न हो सकती हो । सहज 
रोग क्षमता जीवन भर स्थायों रहती है! प्रायः उत्तरकालीन संतति में भी इसका 
संचरण होता है। 

२. वंशगत--मानव जाति की बहुत सी उपजातियाँ समान रूप से ओऔपसर्गिक 
व्याधियों से नहीं पीड़ित होतीं। यहूदी क्षय से बहुत कम तथा नेपालो बहुत अधिक 
पीड़ित होते हैं । उसी प्रकार पीत ज्वर अफ्रीका के हब्शियों में बहुत कम किन्तु राज- 
यच्मा अधिक, पर वहीं रहने वाले गौरवर्णियों में राजयक्ष्मा कम तथा पीतज्वर 
अधिक होता हे । क्‍ 

३. व्यक्तिगत--माता-पिंता का उत्तम स्वास्थ्य सन्तति में प्रतिकारक शक्ति बढ़ाने 
में सहायक होता है। शरीर रचना का भी रोगोत्पत्ति से सम्बन्ध होता है । लम्बे तथा 
चपटे वक्ष वाले ( 780 ०७७४४ ) व्यक्ति राजयक्मा से अधिक पीड़ित होते हैं) पोषक 
तथा संतुलित आहार-विहार-देश-काल-जल-वायु की अनुकूलता-सात्म्यता तथा शारीरिक 
बल पर भी कुछ अंशों में रोग-प्रतिरोध का भार रहता है। कुछ व्याधियों एक अवस्था 
में अधिक और दूसरी अवस्था में बहुत कम होती हैं । इससे आन्रनस्थिक रोग क्षमता का 
अनुमान होता है। निरन्तर अभ्यास और व्यायाम के द्वारा अक्षम व्यक्ति भी रोग क्षमता 
उत्पन्न कर सकता है। व्यवसाय रौगक्षमता को बढ़ा या घटा सकता है। शरीर में 
प्राकृतिक रूप से अनेक रक्षा के साधन विद्यमान हैं । बाहर से त्वचा का दृढ़ आवरण 
ओपसर्गिक रोगों के प्रतिरोध के लिये किले की दीवार का काम करता है। श्लेष्मल कला 
दूसरा मार्ग है, जिससे जीवाणुओं का प्रवेश शारीरिक धातुओं में हो सकता है, किन्तु 
श्लेमल खाच के द्वारा निरन्तर संलम दोषों को शोधित करते रहने के कारण यह मार्ग भी 
सुरक्षित माना जाता है। जबतक किसी जीण व्याधि के अभाव से इन आवरणों की 
शक्ति क्षीण न हो जाय, रोगोत्पत्ति नहीं हो पाती; अन्यथा मानव के चारों तरफ से असंख्य 
रोगोत्फदक जीवाणुओं से आइत्त रहने के कारण जीचन-घारण ही असंभव हो जाता ! 
त्वचा, मुख, नासिका, श्वास-प्रश्वास के साथ निरन्तर शरीर से इन जीवाणुओं का सम्बन्ध 
होता रहता है । फिर भी रोगोत्पत्ति विशिष्ट स्थितियों में ही होती है, हमेशा नहीं । पाचक 
रस की अम्लता एवं मूत्र की अम्लता बहुत से जीवाणुओं का विनाश करती रहती है । 
इसी ग्रकार शरीर की सभी कोषाएँ किसी न किसी रूप में रोग अतिरोध करती हैं । संक्षेप 
में व्यक्तिगत क्षमता को सहज एचं व्यक्तिगत प्रकृति का ग्रतिरूप कह सकते हैं । 

सहज क्षमता में हास के कारण--- 


अति शीत या अति उष्ण जलवाय में रहने से शरीर कोषाओं का स्वाभाविक शरीर कोषाओं का _ स्वाभाविक 


१७३ . कायचिकित्सा 


संतुलन बिगड़ जाता है, अतः अकस्मात शीतोष्ण चिपर्यय से संक्रमण की सम्भावना 
बढ़ सकती हैं। अनियमित समय में, विषम या हीन मात्रा में अथवा दूषित भोजन करने 
से भी सहज अ्रतिकारक शक्ति अव्यवस्थित हो जाती है। दृषित वायु में निवास करने 
से, मद्यपान, रक्तक्षय और मधुमेह सरीखी जीण व्याधियों से पीड़ित होने पर भी स्वाभा- 
विक शक्ति में हास हो जाता है। यदिं सहज प्रतिकोारक शक्ति अल्पमात्रा में हो और 
ओऔपसर्णिक जीवाणुओं का विष अधिक मात्रा में हो तो स्वाभाविक रोगक्षमता के द्ब 
जाने से रोगोत्पत्ति हो जाती है । 


ख. जन्मोत्तर या अजित रोग तक्षमता--औपसर्गिक रोगों का आक्रमण 
तथा कृत्रिम क्षमतोत्पादक द्वव्यों के अयोग से शरीर में प्रतिकारक शक्ति का उद्धव होता 
है । जिस अकार व्यक्ति देनिक व्यायाम करके शारीरिक शक्ति को बढ़ा सकता है, मादक 
द्रव्यों का अभ्यास करते हुए अन्त में उनकी घातक मात्रा से भी आनन्द उठा सकता 
है, उसी प्रकार सौम्य रूप के उपसर्गों से आकान्त होने पर अथवा कृत्रिम रूप से मत 
ओऔपसर्गिक जीवाणु या उनके विष का शरीर में शनेः शनेः वर्द्धमान मात्रा में प्रवेश होने 
पर भी सहन कर लेता है और भविष्य के लिये इस प्रकार सक्षम हो जाता है, जिससे 


अधिक मात्रा में उपसर्ग होने पर भी रोगाकान्त नहीं होता । यही अर्जित क्षमता का 
मूल आधार है। 


जन्मोत्तर क्षमता निम्न लिखित वर्गों में बांदी जाती है-- 


१. सक्रिय कज्षमता--जब स्वयं शरीर कोषाओं में रोग ग्रतिकारक क्षमता का 
निर्माण होता है अर्थात्‌ शरीर सक्रिय रूप में क्षमतोत्पत्ति में भाग लेता है तो इसे 
सक्रिय क्षमता कहते हैं । यहं स्थायी तथा अस्थायी, दोनों प्रकार की हो सकती है । 


(क) सौम्य उपसर्ग  जन्य--बा! ल्याचस्था से हीन मात्रा में औपसर्गिक 
जीवाणुओं का शरीर में अ्वेश होता रहता है। यद्यपि बाह्म दृष्टि से शिशु व्याधि से 
पीड़ित नहीं होता अर्थात्‌ व्याधि लुप्त या अव्यक्त रहती है, किन्तु शरीर में उक्त लुप्त 
उपसर्य जन्य व्याधि अतिकार के लिये क्षमता उत्पन्न हो जाती है। कुछ व्याधियाँ 
बाल्यावस्था में अधिक और युवावस्था में बहुत कम क्यों होती हैं, इसका कारण यही 
. है कि सभी शिशु समान रूप से इन व्याधियों से पीड़ित होते हैं, किन्तु उपसर्ग की 
सौम्यता और सहज क्षमता के कारण कुछ रोगाकान्त होते हैं और शेष रोग ग्रसित 
न होकर भविष्य के लिये रोग-क्षम हो जाते हैं । इन सभी बालकों में ( रोग झसित तथा 
सौम्य उपसगे जन्य क्षमता वाले ) भविष्य के लिये पर्याप्तमात्रा में रोगक्षमता उत्पन्न हो जाती 
है, अतः युवावस्था में इन व्याधियों से पुनः वे नहीं पीडित होतें। इसीलिये बाल्यावस्था में 
रोहिणी, क्षय, तुंडिकेरी शोथ, कुकास, कर्णमूल शोथ, रोमान्तिका इत्यादि का श्रकोप 
अधिक होता है और युवावस्था में नहीं होता । क्‍ 


(स्व) अत्यक्ष रोगाक्रमणजन्य--बाल्यावस्था में कुछ व्याधियों का आक्रमण हो जाने 


स्वास्थ्य तथा रोग... १४३ 


रोग-पीडित होने के बाद लम्बे समय तक शरीर में क्षमता उपस्थित रहती है और कुछ 
में बहुत थोडे समय तक । मसूरिका, रोमान्तिका, कणमूलशोथ, रोहिणी, कुकास आदि 
से आक्रान्त एवं मुक्त होने के बाद प्रायः जीवन भर या कम से कम दस-बारह साल 
तक पुनः पीडित होने का अवसर नहीं आता । आमन्त्रिक ज्वर, 'छष्मोल्वण सन्निपात 
और सजग में क्षमता जीवन भर स्थायी नहीं रहती, केवल १-२ वर्ष रहती है । इसलिए 
बाल्यावस्था में इनसे पीडित होने के बाद भी आगे व्यक्ति पुनः पीडित हो सकता हे! 

(ग) सक्रिय कृत्रिम क्षमता--विकारकारी जीवाणुओं का संस्कारित रूप में शरीर में 
प्रवेश कराने पर रोगोत्पत्ति के बिना क्षमता उत्पन्न हो जाती हैं। उपयोग की दृष्टि से 


4७ नी 


इसके निम्नलिखित विभाग किये जाते हैं-- क्‍ 

१. संस्कारित जीवित जीवाणुजन्य ( 8707्रपक्ष80 ए778 980:०७४४७ )--- 
जीवाणुओं की तीव्रता मर्यादित कर या विपरीत परिस्थितियों में उनका सम्व्धन कर 
तथा दूसरे संस्कारों के द्वारा उनकी रोगोत्पादक शक्ति नष्ट कर दी जाती है, जिससे शरीर 
में उनका अन्तर्रोपण होने पर रोगोत्पत्ति तो नहीं होती, किन्तु रोग क्षमता पंदा हो 
जाती है । जलसंत्रास, मसूरिका तथा तन्द्रिक ज्वर की मसूरी ( ५४००९ ) का प्रयोग 
इस रूप में होता है । 

२. मृतजीवाणुजन्य--सम्वर्धित जीवाणुओं को ५४ से ६० सेन्टीग्रेड तापक्रम पर 
३० मिनट तक गरमं करते हैं। बाद में इनको फार्मेलीन, फेनाल आदि के धोल में सुरक्षित 
कर अयुक्त किया जाता है। ज्ञेंग, चिसूचिका, आन्त्रिक ज्वर और कुकास के जीवाणुओं का 
इस रूप में उपयोग होता है। जिन जीवाणुओं का विष उनके शरीर में केन्द्रित रहता 
है, उन्हीं की मस्‌री इस रूप में उपयोगी होती है । 

३. जीवाणु विष--विकारकारी कुछ जोवाणुओं का विष उनके शरीर में मर्यादित 
नहीं रहता । ऐसे जीवाणुओं के अतिरोध के लिये क्षमता उत्पन्न करने में जीवाणुओं का 
प्रयोग न होकर उनके विषषों का अयोग होता हैं। धलुर्वात तथा रोहिणी इस श्रेणी की 
प्रमुख व्याधियाँ हैं, जिनके अतिकारार्थ रोगक्षमता उत्पन्न करने के लिये जीवाणुविषों या 
उनके विषाभ द्वव्यों का ( "ी0शांए8 ०7 05008 ) प्रयोग होता है। इनके अयोग से 
शरीर में प्रतिविष का निर्माण होता है, जिससे विषजन्य औपसर्गिक व्याधियों की लाक्षणिक 
निवत्ति होती है। इसी क्रम से घोड़े में जीवाणु-विषा का शने: शनेः प्रयोग कराकर 
प्रतिविष उत्पन्न किया जाता है और पतिविष युक्त घोड़े की लसिका का घनु्वात तथा 
रोहिणी की चिकित्सा में प्रयोग होता है । 


२. निष्क्रिय क्षमता--शरीर के रोगाक़ान्त होने पर सक्रिय क्षमतोत्पादक द्र्व्यों 
के प्रयोग से लाभ त़हीं होता । क्योंकि सक्रिय क्षमता में मसूरी के अन्तर्रोपण के बाद 
कुछ समय तक शरीर में सामान्य अस्वास्थ्य कर लक्षण उत्पन्न होते हैं तथा शरीर को 
क्षमता स्वाभाविक से भी कुछ कम हो जाती है, जिसके कारण संकान्तावस्था में सक्रिय 
क्षमता के प्रयोग से व्याधि के बढ़ जाने की सम्भावना होती है । ऐसी स्थिति में व्याधि 
का शमन करने के लिये बनी-बनाई क्षमता का अ्रयोग किया जाता है । शरीर. की...कीपाए, 








१७४७ कायचिकित्सा 


इसकी उत्पत्ति में सक्रिय भाग नहीं लेतीं, इसीलिये इसे निष्किय क्षमता कहते हैं । इसके 
भी पूववत्‌ सहज व जन्मोत्तरकालजन्य दो वग किये जाते हैं-- 


(१) सहज--माता के शरीर में रोमान्तिका, रोहिणी और लोहित ज्वर के लिये 
जो सहज क्षमता विद्यमान रहती है, उसका संचरण गर्भस्थ शिशु में भी हो जाता है। 
इसलिये श्रसव के बाद भी कुछ समय तक शिशु के रक्त में सक्षम लसिका होती है । 
किन्तु इस ग्रकार की क्षमता अल्पकालस्थायी होती है। ६ मास के बाद शनेः शनः: 
इसका हास हो जाता है । 

(२) जन्मोत्तर कालज--श्राणियों के शरीर में प्रविष्ट हुए जीवाणुओं के विष के 
विनाश के लिए क्षमलसिका ग्रविष्ट कराकर तात्कालिक क्षमता उत्पन्न की जाती है । इसके 
निम्नलिखितं २ प्रकार चिकित्सा में अयुक्त होते हैं--- 

१. ग्रतिविष लसिका--इस प्रकार की लसिका में वहिविंष द्वारा उत्पन्न हुआ 
प्रतिविष विद्यमान होता है । बहिर्विष उत्पन्न करने वाले तृणाणुओं से आक्रान्त होने पर 
रोग शमन के लिये प्रतिविष लसिका का व्यवहार होता है। धनुवात तथा रोहिणी में 
इसका अमुख़ उपयोग होता हे । 

२. अतितृणाण्वीय ( 07 80097) )--अन्तर्विष तृणाणुओं से उपसष्ट रोगों 
के शमनाथ इस प्रकार की लसिका का अयोग होता है। यह लसिकायें विषनाशक नहीं; 
तृणाणुनाशक होती हैं । मस्तिष्क सुघुम्ना ज्वर, श्लेष्मोल्वण सन्निपात, आन्चन्रिक ज्वर, 
क्लेंग इत्यादि अन्तर्विष उत्पादक जीवाणुओं के उपसग से उत्पन्न व्याधियों में इनका 
प्रयोग होता है । 


३. सन्निवृत्त लसिका--रोगी के शरीर में क्षम-लसिका उत्पन्न होने के कारण ही चह 
संक्रामक रोगों से मुक्त हो पाता है। विषाणु ( ४]7७८७ ) जनित रोगों में रोग-सन्निद्ृत्तों 
की लसिका में क्षमताजनक गुण अधिक रहता है। रोमान्तिका तथा शेशवीय अंगघात से 
मुक्त रोगियों की लसिका इन्हीं रोगों से पींडित बालकों में उपकारक होती है । 


सक्रिय ओर निष्क्रिय क्षमता में चिकित्सा की दृष्टि से सेद-- 


१. सक्रिय क्षमता में प्रतियोगी उत्पन्न होने की क्रिया उसी व्यक्ति के शरीर में होती 
है। किन्तु निष्किय क्षमता में प्रतियोगी दूसरे के शरीर से, रोग शान्ति के लिये 
' व्याधित व्यक्ति में, प्रयुक्त किये जाते हैं । अतः सक्रिय क्षमता अधिक समय तक स्थायी 
आर निष्किय क्षमता अल्पकाल स्थायी होती है । 

२. सक्रिय क्षमता में मसूरी अयोग के बाद शरीर में स्थानिक एवं सावेदहिंक 
अतिकिया जन्य अत्यक्ष रोग के समान सौम्य स्वरूप के लक्षण पेदा होते हैं । निष्किय 
क्षमता में प्रतियोगी बने-बनाये प्रविष्ट होते हें और शरीर में कोई अतिक्रियाजन्य 
कष्ट नहों होता । 

२* सक्रिय क्षमता की उत्पत्ति मसूरो' अ्रयोग के ८-१० दिन बाद धीरे धीरे होती 





स्वास्थ्य तथा रोग थु "१ 


की अपेक्षा अधिक ग्रहणशील हो जाता है । यदि रोगी इस बीच में उपसर्गाक्रान्त हो 
जाय तो तीव्र स्वरूप के लक्षण उत्पन्न होते हैं । निष्किय क्षमता में क्षम लसिका का शरीर 
में प्रवेश करने पर, प्रयुक्त मात्रा के अनुरूप, तुरन्त क्षमता उत्पन्न हो जाती. है । 

४* सक्रिय क्षमता दीधकाल तक शरीर की रक्षा करती रहती है। निष्क्रिय क्षमता 
की अवधि बहुत कम होती है । प्रवेश कराने के वाद निष्क्रिय क्षमता की मात्रा शरीर 
में पर्याप्त होती है। शनः शनेः प्रतियोगियों की मात्रा घटने लगती है और ३ सप्ताह से 
६ सप्ताह के भीतर पूणतया नष्ट हो जाती है । इसलिये सक्रिय क्षमता का प्रयोग मुख्यतया 
प्रतिबन्धन या जीण दीघकालानुवन्धी मद स्वरूप के रोगों की चिकित्सा में किया 
जाता है और निष्क्रिय क्षमता का प्रयोग उग्न व्याधि के संशमन के लिये होता है । 
कदाचित्‌ किसी व्यक्ति के बारे में ओपसगिक व्याधियों से आक्रान्त होने की 
सम्भवनीयता का अमान हो तो क्षम लसिका के अयोग से छाम हो सकता है। 
रोमान्तिका से पीडित व्यक्ति के सम्पर्क में आए हुए बालक में सन्निज्गतत या सक्षम 
लसिका का प्रयोग करने पर, उसके उपसष्ट होने पर भी, रोमान्तिका की उत्पत्ति 
न होगी तथा दुघंटनाजनित व्रणों में धनुर्वात के जीवाणु का संक्रमण अनुमानित होने 
पर, धनुर्वात रूसिका का प्रयोग करने से रोगोत्पत्ति नहीं होती । 


प्रतिज़न तथा प्रतियोगी 


जो द्रव्य शरीर की कोषाओं में प्रतियोगी पदाथ उत्पन्न करने में प्रेरक होते हैं, उन्हें 
प्रतिजन कहते हैं । विजातीय द्रव्य और विजातीय प्रोभूजिन आदि के प्रयोग से शरीर 
में व्यापक प्रतियोगी द्रव्यों की उत्पत्ति होती हैं । “यदि अतिजन विशिष्ट श्रेणी के होते हें 
अथांत्‌ किसी एक व्याधि के ही प्रेरक होते हैं, तो उनसे विशिष्ट प्रतियोगी द्वव्यों की 
उत्पत्ति होती है, अन्यथा सामान्यरूप से शरीर की अतिकारक शक्ति बढ़ती है । 

प्रतियोगी द्वव्य--प्रतिजनों की क्रिया के फलस्वरूप आक्रान्त व्यक्ति के शरीर में 
कोषाओं के द्वारा जो रक्षक द्रव्य उत्पन्न होते हैं तथा जो प्रतिजनों के साथ संयुक्त होकर 
उनके विषेले परिणाम को नष्ट कर देते हैं, उन्हें प्रतियोगी द्रव्य कहते हैं । 

पहले विजातीय द्व॒व्यों के प्रयोग से व्यापक रूप से ग्रतियोगी निर्माण का उल्लेख 
किया जा चुका है। इनका चिकित्सा में पर्याप्त प्रयोग होने के कारण आवश्यक वर्णन 
दिया जा रहा है । 


व्यापक क्षमतोत्पादक द्रव्य-- 

(.१ ) प्रोभूजिन वर्गं--- 

१. दुग्ध प्रोभमूजिन---( | 7700978 ), पेप्टोन ( 0 ०[79076 ), रुसिका- 
प्रोभूजिन ( 567"पा7 [7000॥8 ), मसूरी ( ४७००॥७४७ ), रक्त ( 000 )। 

२. धातु तथा उपधातु ( 6७8एए 706॥9]8 )--मंगनीज ( .४8॥97686 ), 


रजत # ४७७ ) सवण ((+00)., आयोडीन (00॥7 ०) कल्सियम (६) , केल्सियम | (_80प्रा] ) । 


१७०६६ कायचिकित्सा 


२. तेलजातीय ह्व्य-क्षीभमक तेल (()8 जप परंडडप [07%&॥0 070007/४68) 
यथा तारपीन का तेल, कपूर, जतून के तेल में मिला क्रियोजोट, तुवरक तेल इत्यादि । 


वास्तव में इस श्रेणी की औषधियों में विजातीय ओभूजिनों का ही आधान्य होता 
है | सुवण, रजत आदि धातु तथा तेल द्रव्यों का प्रयोग किये जाने पर शरीर को 
प्रतिकारक शक्ति सामान्यतया पूवपिक्षा प्रबल हो जाती है, इसीलिये इनका उल्लेख यहाँ 
पर किया गया है । 

प्रयोगजन्य परिणाम--इनके ग्रयोग से साधारण ज्वर, स्थानीयत था सर्चांग वेदना 
और अवसाद के लक्षण पेदा होते हैं। धीरे-धीरे अनुकूलता ( ./0)67०706 ) उत्पन्न 
होने के कारण मात्रा बढ़ाने पर भी उत्तरोत्तर लक्षणों की तीत्रता कम होती जाती है। 
क्रम से अधिक मात्रा में प्रयोग करने पर भी गअतिकूलता नहीं होती। अनेक बार 
इस-श्रेणी की ओषधियों का प्रयोग शारीर ताप की इद्धि के लिये किया जाता है। 
बढ़ा हुआ सनन्‍्ताप जीवाणुओं का नाश करके रोग को शान्त करता हैं। उपदेश 
और पूयमेह में इससे अधिक लाभ होता है । 

इनकी मात्रा प्रारम्भ में कम और बाद में शनः शनः बढ़ानी चाहिये । प्राय 
दस से बीस सूचिकाभरण पर्याप्त होते हैं। इनका प्रयोग त्वचा के विकारों में 
अन्तस्त्वचीय ( [707906778) ) तथा अधस्त्वचीय ( 9प्रॉ०0परां॥78008 ) मांगे 
से किया जाता है। सर्वाज्ञ व्याधियों की निदृत्ति के लिये पेशी (078॥7780777) मार्ग 
से इनका अयोग किया जाता है। कभी कभी तीव्र स्वरूप की गतिक्रिया उत्पन्न करने के 
लिये अत्यल्प मात्रा में प्रोभूजिनों का अयोग शिरा द्वारा भी होता हे “यथा टी- ए. बी. 
( ॥', 80. 3. ) मसूरी का छीपद या पूयमेह में । 

निम्नलिखित अमुख व्याधियों में इस उपचार से लाभ होता है-- 

१. जीण स्वरूप का अज्ञात कारणजन्य मन्द ज्वर, जीण शोथयुक्त व्याधियों 
यथा--सन्धिशोथ, मांसपेशी शोथ, गर्भाशय शोथ तथा जीण स्वरूप के पूत्तिकेन्द्र 
( 56900 60०78 )। 

२. त्वचा के रोग---गजचम, अपरस, पामा, विस्फोट, विवणता आदि त्वचा 
के जीण विकार । 

३. शछीपद तथा पूयमेह । 

निम्नलिखित व्याधियों से पीडित व्यक्तियों में इनके अ्रयोग का निषेध है-- 


क्षीणता, हीन रक्तमार, हृदय के रोग, वक्त के रोग, राजयक्ष्मा, मधुमेह, अनूजता 
जनित व्याधियों तथा सगमांवसथा । 


मसूरी-चिकित्सा 
उपयोग--मसूरी का अयोग व्याधिनिमूलन तथा अतिषेध दोनों कार्यों के लिये 
होता है । आन्त्रिक ज्वर, विसूचिका, ज्लेग, ज्वरातिसार इत्यादि के ग्रतिषेध के लिये इनका 
प्रयोग होता है । कुकास तथा जीण प्रतिश्याय और अपरस की चिकित्सा में इनसे पर्याप्त 
बल मत है । उठम के मिलती हे । उद्गम केन्द्र की दृष्टि से मसरी ढो ग्रकाण क्री कोती जे » 


स्वास्थ्य तथा -रोग १७७ 


१. जाव्मजनित मसूरी ( ७.7502०7078 ४&७००7०6 ) :--इनका ग्रयोग 
विशिष्ट रोगक्षमता उत्पन्न करने के लिये किया जाता है। रोगी के दूषित केन्द्र से 
जीवाणुओं को ग्रहण कर, संवर्धन में संवर्धित कर, विंजातीय दोषों को प्रथक कर, 
मात्रा, संख्या इत्यादि का परिमापन किया जाता हैं। जीण अतिश्याय, तुण्डिकेरी शोथ, 
पूयदन्त, पय्मेह इत्यादि व्याधियों में इसका वधमान क्रम से अयोग होता है । 

२. संग्रह मसूरी--इसमें अनेक जीवाणुओं का एक साथ प्रयोग होता है । इनसे 
विशिष्ट क्षमता नहीं उत्पन्न होती, किन्तु मिश्र उपसग जनित व्याधियों में, जहाँ विकारकारी 
जीवाणुओं का निर्णय न हो सका हो, इसका प्रयोग किया जाता है और रोग के अतिकार 

लिये भी इनका प्रयोग होता हैँ । 

प्रयोग मार्ग--सामान्यतया मसूरी का अधस्त्वचीय मार्ग से सप्ताह में दो बार प्रयोग 
होता है । तीत्र प्रतिक्रिया के लिये छीपद और ओऔपसर्गिक पूयमेह में सिंरा द्वारा भी 
प्रयोग किया जाता दे । 

मात्रा--आत्मजनित मसूरी की मात्रा कम तथा संग्रह मसरी की मात्रा अधिक होती 
है। प्रारम्भ में ५० छात्र से २ करोड़ तक जीवाणुओं का आत्मजनित मस्री में अ्रयोग 
होता है | उत्तर मात्राओं में क्रम से द्विगुण करते जाते हैं । मात्रा का यह निणय स्थिर 
नहीं है, व्याथि की तीव्रता-जीणंता, परिणाम के स्थानिक या सावदेहिंक अभिग्नाय या 
तीत्र प्रतिक्रिया इत्यादि की दृष्टि से इसकी मात्रा स्थिर की जाती है । तीब्रावस्था में 
अल्पतम ग्रतिक्रिया हों, इतनी ही मात्रा देनी चाहिये । बच्चों में ६ वर्ष के नीचे साधारण 
मात्रा का 3, १० वष के नीचे है, १5 वर्ष तक # देना चाहिये । 


व्रद्ध और दबल व्यक्तियों में बच्चों के समान मात्रा का निणय करना चाहिय ! 

स्थानीय परिणाम--सचीवेध स्थान में शोथजन्य अतिकिया उत्पन्न होती है, इससे 
पूयोत्पत्ति की सम्भावना नहीं करनी चाहिये। यह शोथ एकदो दिन में स्वतः या 
साधारण सेंक आदि से ठीक हो जाता है । 

विकेन्द्रीय परिंणाम--शरीर के विक्ृत केन्द्रों में विशिष्ट मसूरी के प्रयोग से साधारण 
शोथजन्य प्रतिक्रिया होती है, जिससे व्याधि के लक्षणों में वृद्धि का अनुभव होता हे । 


सावदेहिक ज्वर, शिरःशूल, बेचनी, सवाज्नवेदना, अरुचि तथा अवसाद आंद लक्षण पदा 
होते 


मसूरी का चिकित्सा में प्रयोग करते समय निम्नलिखित सिद्धान्तों पर ध्यान 
रखना चाहिये :--- | 

१. रोग तथा कारणभूत जीवाणु का निणंय करके ही मसूरी का ग्रयोग करने से 
सफलता मिलती हे । 

२. आम्मजनित मसूरी संग्रह-मसुरी से अधिक हिंतकर होती हूँ । मस्ूरो 


बहत शुद्धता अपेक्षित है । 
१७ का? (७ 


किया. 


निंमाण 





१३८ कायचिकिस्सा 


ध. 


२. ६ मास से अधिक समय की बनी मसरी हीनगुण होने लगती है। अतः 
निर्माणतिथि देखकर ही प्रयोग करना चाहिये । 

४. मसूरी तीव्र प्रकाश, उच्च ताप आदि से भी हीनवीये हो जाती हैं, अतः उण्ढे 
एवं अधेरे स्थान में सरक्षित मसूरी का ही व्यवहार करना चाहिये । 

५. शरोर में आगन्तुक उपद्रव होने पर, यात्रा की स्थिति में, ल्लियों में मासिक 
के समय, अधिक परिश्रम करने के बाद, क्लान्त व्यक्ति में, म सूरी का प्रयोग न 
करना चाहिये । 

९. प्रारम्भ में अल्पतम मात्रा दी जाय और क्रम से इस प्रकार बढाया जाय 
जिससे अधिक प्रतिक्रिया न उत्पन्न हो । जीण रोगों में सप्ताह में दो बार से अधिक 
न देना चाहिये | 

७. मसूरी चिकित्सा के द्वारा अनुकूल परिणाम धीरे-धीरे होता है अतः शीघ्रता 
में मात्रा को बढ़ाना या औषध परिंवतन करना अनुपयुक्त होता है 

“४- मसूरा के द्वारा शरीर म॑ सक्रिय क्षमता उत्पन्न होती हे। अतः क्षमता बड़ि में 
सहायक सन्‍्तुलित पोषक आहार-विहार के उपयोग के लिए रौगी को भली प्रकार समझा 
देना चाहिए ! 

९. मसूरी-चिकित्सा प्रधान चिकित्सा नहीं हैं। इसका विशिष्ट उपयोग जीण 
व्याधियां में होता हैं। रोग के अनुरूप दूसरी ऑंपषधों का प्रयोग तथा आवश्यक 
होने पर शल्य चिकित्सा का प्रयोग करने में विलम्ब न होना चाहिये । 


लसिका 


रोगक्षमता के वणन में लूसिका का व्याधिशामक उपयोग बताया जा चुका है । 
उत्पन्न व्याथिं के विनाश तथा सम्भाव्य व्याधि-प्रतिषेध के लिये सक्षम लसिका का 
अ्रयोग होता है। निम्नलिखित व्याधियों में सक्षमलसिंका का प्रयोग होता हैँ । रोहिणी, 
धनुवात और वातकदंम ( (४88 287727876 ) में श्रतिविष छसिका का अयोग: 
मलाशयी दण्डाणुजन्य उपसगं ( 3. ०० १7४९०४४०४७ ) में प्रति तृणाण्वीय. रूसिका; 
विसप, विसूचिका, मस्तिष्क-सुषुम्नाज्वर और श्लेमोल्वण सन्निपात तथा दण्डाण्वीय 
अतिसार इत्यादि में मिश्रित लसिंका का प्रयोग; रोमान्तिका एव शंशवीय अंगघात 
में सन्निवृत्त लसिका का अयोग और रक्तल्ावी व्याधियों में रक्तस्तम्भक लसिका का ग्रयोग 
किया जाता हैं। सपंदश में भी श्रतिविष ( “707 ए०ए्णा ) रूसिका का व्यवहार 
किया जाता है ! 

प्रयोग मागे--लसिका का प्रयोग पेशी के द्वारा अधिक होता हैं। आवश्यक होने 
पर सिरा द्वारा भी देते हें । 

मात्रा>व्याधि की तीव्रता पर इसकी मात्रा निभेर करती है। सामान्यतया अत्यल्प 
मात्रा देकर सहनशीलता की परीक्षा करके प्रारम्भ से ही उच्च मात्रा का अयोग अधिक 


स्वास्थ्य तथा रोग १५७९ 


लाभदायक होता है । घनुर्वात एवं रोहिणो में प्रारम्मिक मात्रा २० हजार से १ लाख 
तक दी जाती है । 

परिणाम--लसिक्रा के प्रयोग से रोगी को तुरन्त रोगक्षमता की उपलब्धि होती 
है, जिससे शरीर में संचित विषों का विनाश होकर रोंग की तत्काल लाक्षणिक निदत्ति 
होती है । इसलिये लसिका की उपयोगिता अनुमानित होने पर रोग की अधिक बढ़ने न 
देना चाहिये । तुरन्त पर्याप्त मात्रा में लसिका का प्रयोग प्रारम्भ कर देना चाहिये। रोग 
के बढ जाने पर लसिका के प्रयोग से जीवाणु-विषों का नाश होने पर भो, उनके द्वारा 
उत्पन्न शारीरिंक विकृति का परिंष्कार नहीं हो पाता । रोहिणी में अंगघात, हृदयनिपात 
तथा धनुर्चात में स्तब्बताजनित त्रण मूलब्याधिं के ठीक होने पर भी बहुत समय तक 

देते रहते हैं । 

लसिकाप्रयोग से अनेक बार गम्भीर असहनशीलता के लक्षण उत्पन्न हो जाते हें । 
अतः प्रयोग के पहले अधोनिदिष्ट आधार पर सावधानी रखनों चाहिय । 


१. अनूज॑ताजनित व्याधियाँ, यथा--श्वास, शीतपित्त, तृणाणुज्वर, नासारपरिख्ताच 

था अपरस आदि के बारे में भली प्रकार पूछकर निर्णयात्मक ज्ञान करना चाहिय: 

क्योंकि इन अनूजताजनित व्याधियों स पीड़ित रोगियों में सूह्म वंदनता होती है, 
अतः इनमें लसिंका प्रयोग यथाशक्ति न करना चाहिये । 

२. जिन रोगियों को क्रिसी व्याधि की शान्ति के लिये पहले लऊूसिका प्रयोग कराया 
गया हों उनमें पुनः लसिका देने पर स॒क्ष्म बेंदनता के लक्षण पंदा हो सकते हैं, अतः 
पहले कभी लसिंका प्रयोग हुआ है, इसका ज्ञान अथवा लसिंकासाध्य व्याधियों से 
पीडित॑ होने का इतिदृत्त जानना चाहिए । 
अधस्त्वचीय एवं पेशी की अपेक्षा सिरान्तर माग से अतिकिया होने को सम्भावना 
अधिक होती | 

४. जिन रोगों में बार-बार लसिका देने की आवश्यकता हो, यथा रोहिणी या 
धनुर्वात, उनमें प्रारम्म करने के पूच नेत्र एवं त्ववा कसोटियों के द्वारा सूक्ष्म व॑ंदनता 
का निणय कर लेना चाहिये ! 

नेत्र कसौटी-- रोगी के नेत्र में १ बूँद लसिका डालने पर ३० मिनट के भीतर 
कण्डू, अश्रुस्ताव और रक्तिमा उत्पन्न होकर सृक्त्म वेदनता को पुष्टि होती हैं । यदि एक 
घण्टे तक कोई नेत्रकष्ट न पेदा हो तो सचीवेध किया जा सकता हैं । 


शा 


व्वक कसौटी--१ बूँद लसिका अधस्त्वचीय मार्ग से देने पर ५» से २० मिनट के 
भीतर सचीवेध के स्थान पर शीतपित्त सद्श चकत्ता उत्पन्न हो जाता है। यादें चकत्ता 
न उत्पन्न हो ती पूण मात्रा में केवल ऋजु लचण जल ( सतिए00०0०7० 8७४०6 ) में 
मिलाकर प्रविष्ट करना चाहिये। सूकछ्म वेदनता होने पर भी तथा छासेका रोग के प्रतिषेध 
के लिए आवश्यक होने पर निम्नलिखित क्रम से रसिका का अयोग. करना चाहिए-” 


१६० कायचिकित्सा 


. रोगी को अल्पतम मात्रा--१ बूद रूसिका, १० बूद लूवणजल में मिलाकर, 
अधस्त्वचीय माग से देकर धीरे-धीरे अतिक्रिया शान्त होने पर क्रम से १ घण्टे बाद 
१-१ बूँद बढ़ाना चाहिये । अमिश्र रूसिका के ग्रयोग से ग्रतिक्रिया न उत्पन्न होने पर भी 
मात्रा बहुत सावधानी से ही बढ़ानी चाहिये । 

२. यदिं सम्भव हो तो प्रतियोगी संकेन्द्रित लसिका ( 0]0०5पॉंए॥ 87४७००ए 
0०070९7(7:86 ) काम में लाई जाय, इसमें अल्पलसिका में ही अधिक शक्ति होती हे 
तथा इससे लसिका रोग अपेक्षाकृत कम होता है। 

२. लसिका रोग में प्रारम्भिक प्रयोग के ७-१० दिन बाद प्रतिक्रियां होती है। 
अतः जिन रोगों में केवल एकमात्रा अ्रयोग से ही चिकित्सा पूर्ण हों जाती हो उनमें भी, 
आवश्यकता के बिना ही, सात दिन के पूव एक बार और लूसिका का प्रयोग करना 
चाहिये । इससे अनवधानता की स्थिति नहीं उत्पन्न होगी । 

४. लसिका प्रय्ेग के पहले २-३ दिन तक निम्नलिखित योग देते रहने से प्रतिकिया 
को सम्भावना कम हो जाती है । 


रि। 
(..8 ]80(8(८ 275५5. |0 
50760 7 ॥५9070०॥[07 8. ५. 
?0[95 ०079८ 2९75, 20 
?0645 97077 9० 875. [0 
॥7. 820800 909 ]05. 5 
47, ॥9050 ए॒क्ता$ 75. 0 
०५7०७ ०8९० एए०9॥05 775. 60 
20(४९ १65६ ()7. ! 


मिश्र १ मात्रा । दिन में ३ बार 

इसके अतिरिक्त कामदुग्धा रसायन १॥ माशा की मात्रा में दिन में ३ बार अथवा 
हारिंदरा खण्ड का १ तोला की मात्रा में दिन में २-३ बार प्रयोग ५-७ दिन पूव से करने 
पर भी लरूसिका रोग का ग्रतिवंधन होता है । 

*- सूच्म संवेदनशीलता होने पर-भी लसेका अनिवार्य हो तो हे सो. सी. से 
) सी. सी. तक एड्रिनेलिन ( 407०78]76 ) लसिंका में मिंछाकर देने से विकारोत्पत्ति 
नहीं होती । 

लसिका रोग :-- 

लसिका का चिकित्सा में उपयोग करते समय विजातीय प्रोभूजिनों की भ्रतिकिया के 
न असात्यता था असहनशीलता के लक्षण उत्पन्न होते हैं, इसे लसिका रोग कहते हैं । 


सूछ्म संवेदनशील व्यक्तियों में ऊपर बताये हुये नियमों का पालन न करते हुये 
लंसेकाप्रयोग होने पर निम्नलिखित दुष्परिणाम होते हँं--- 


स्वास्थ्य तथा रोग क्‍ १६१९ 


(के ) तार ऋालि क 4 [एक छे 0]8 ९० )--जिनमें पहले लासका का व्यवहार हो 
चुका हैं या अनूज॑ंताजानत व्याधियां से जो पीड़ित हैं उनमें पहले से ही असहनशीलता 
वतमान रहती है । ऐसे रोगियों में ओऔषधप्रयोग के २-४ मिनट बाद से आधे घण्टे के 
भीतर तक निंम्न स्वरूप के भयानक लक्षण होते हैं-- क्‍ 

श्वासकच्छू, आणावरोध, श्यावाह्ता, श्लेष्मककाओं का शोथ, प्रचुर शौतपित्तज्ञ 
विस्फोट, आज्ञषेप, निपात तथा मूर्च्छा की उत्पत्ति होती है । यद्यपि इस प्रकार. के लक्षण 
बहुत कम होते हैं, किन्तु उत्पन्न हो जाने पर घातक परिणाम ( २०१ मृत्यु तक ) 
ही सकते हैं । 

( ख ) त्वरित ( .3.000।67960 )--यदि शतिक्रिया तत्कार न उत्पन्न होकर 
२४ घण्टे से ७२ घण्टे के बीच उत्पन्न हो और लक्षण पूचेचत्‌ मिंछें तो उसे भी लसिंका- 

' जनित प्रतिक्रिया ही माना जाता है। अतः छरूसिकाप्रयोग के बाद रोगी को त्वरित 
प्रतिक्रिया अ्रतिषेध के लिये कुछ ओषधियाँ पहले से दे देनी चाहिये । 

( ग ) बिलम्बित या सामान्य रूसिका रोग ( 56777 अ0;270०88 )---लसिका- 
अयोग सिरा द्वारा करने के ३-१४ दिन के भीतर होता है । पहले लसिका प्रयुक्त 
व्यक्तियों में पुनः प्रयुक्त होने पर, जिस अकार श्रतिकिया होती है, उसी प्रकार सहज 

: सूच्मवेदी व्यक्तियों में भी एक सप्ताह बाद स्वतः तीजत्र प्रतिक्रिया हो सकती है ! 

छक्षण--ह्॒लास, वमन, सन्धिपीडा, सन्धिशोथ, शीतपित्त, ज्वर, लसग्रन्थिशोथ, 
मूत्राल्पता, शिरःशूल, प्रारम्भ में श्वतकायाणुओं की वृद्धि किन्तु अन्त में अपकर, मस्तिष्क- 
क्षोभ के लक्षण तथा हृदय की अतालबद्धता और रक्तस्कन्दन की शिथिलता--जिससे 
रक्तल्लावी प्रवृत्ति बढ़ती है--इत्यादि लक्षण पेदा होते हैं । 

चिकित्सा---१. एटोपीन ( ६7076 ) ददैठ्में., एड्रिनेलिन (.007९78॥76) 
३-१ सी- सी- या एपीनेफ्रिन (००7007४79) ३-१ सौ-सी. मिलाकर तुरन्त पेशीगत 
सूचीवेध के रूप में । ५ 

२. अनूजतानाशक ( 707॥8877708-.0770867 ०९४७०07ए]., ०६०. ) 
योग तथा जीवतिक्ति सी के साथ केलसिंयम के योगों का पेशीमार्ग से उपयोग प्रथम 

प्रयोग के आधा घण्टा बाद करना चाहिये । 

रे. केल्सिमय ग्लूकीनेट ( (/8/. 8!प7०07&06 ० ४। (४) १००८ १० सौसी का 

सिरा द्वारा अ्योग नम्बर एक के चार घण्टे बाद करना चाहिए । 
४. निपात में बताई हुई व्यवस्था के "अनुरूप हृदयोत्तेजक व्यवस्था करनी चाहियें ! 


परमसूक्ष्मवेदनता ( .मए००४९॥आंधए0॥०8७ ) 


बहुत से व्यक्तियों में आहार-विंहारमत कुछ विशिष्ट विजातीय ग्रोमूजिन द्रव्य सेवन 
करने पर प्रतिक्रियाजन्य अतिकूल परिणाम होते हैं । अण्डे की सफेदी, शंख का कीडा; 
मास-मछली खाने वाले असंख्य ग्राणी हैं । उनको कोई कष्ट नहीं होता । किन्तु कुछ लोगों 


१६२ काय चिकित्सा 


मां 


को विशिष्ट चस्तु का सेवन करते ही प्रतिक्रिया उत्पन्न हो जाती हैं। इसे ही परम- 
सूच्मवेदनता कह सकते हैं । यह आणियों की वह अवस्था है जो समजाति के सबंसाधारण 
व्यक्तियों में कुछ भी प्रतिक्रिया न करने वाले द्र॒व्यों का सेवन करने से होती है । 

लक्षणों की तीत्रता-रदुता की दृष्टि से असहनशीलता कई वर्गों में 
जाती हैं । 


विभक्त की 


१. वेयक्तिक असहनशीलता ( 4009ए70/8७ए )--कुछ व्यक्ति गक्वृत्या अनेक 
द्रव्यों के लिय असहनशील होते हैं । कोन व्यक्ति किस द्रव्य के प्रति असहनशौल होगा 
यह बिना प्रयोग के नहीं जाना जा सकता हैं । एक्रग्रेन क्किनीन का सेवन करने से ही 
कान में भनभनाहट, बेचेनो, वमन आदि विपेले लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं । किसी भी 
आहार या ओंषध के लिये व्यक्ति असहिष्णु हो सकता हैं, अतः नवीन औषध का प्रयोग 
करते समय प्रारम्भ अल्प मात्रा से ही करना चाहिये । क्‍ 

२. अनवधानता ( 079 [077ए]48578 )--रोगक्षमता के समान ही कृत्रिम रूप 
में कुछ प्रोभूजिन-ग्रतिजन द्रव्यों का प्रयोग होने पर शरीर में सृद््म वेदनता उत्पन्न 
' होती हैं। यदि कुछ समय बाद पुनः उसों द्रव्य का प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाय 
तो लसिका रोग के तात्कालिक लक्षणों के समान तीत्र ग्रतिक्रिया उत्पन्न होती है । एक 
बार अनवधानता उत्पन्न हो जाने पर गआगी के शरीर में प्रायः जीवन भर यह अनवधानता 
स्थायी रहती हैं । यदि उसके शरीर से लसिका लेकर स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रविष्ट 
करायोजाय तो उस स्वस्थ व्यक्ति को भी विशिष्ट द्रव्य के गति अनवधानता उत्पन्न दो जायगी । 
किन्तु क्षम लसिका के समान इसका प्रभाव अल्पकाल स्थायी होगा । रक्तरस या रक्त 
का सिरा द्वारा अवेश कराते समय इन बातों पर भी ध्यान रक्खा जाता हैं। संक्षेप 
में प्राथमिक मात्रा से असहिष्णु व्यक्ति के शरीर में सृक््मवेदनता ओर पृवपिक्षया अधिक 
मात्रा के सेवन से अनवधानता के लक्षण उत्पन्न होते हैं । हीनरक्तनिपीड, मांसपेशियों 
में उद्देंध्न, रक्तल्नाव की प्रवृत्ति, श्रेत्तणापकर्ष, उद्देप्यता (.777080०)0ए ) श्वासकृच्छ 
तथा निपात सदृश लक्षण अनवधानता होने पर ओपधघ-सेंवन के कुछ सेकण्ड बाद ३० 
मिनट तक हो सकते हैं । कभी-कभी चोंबीस घण्टे बाद भी इस अकार के लक्षण होते 
देखे गये हें । वयक्तिक असहिष्णुता में असात्म्य वस्तु के अल्प मात्र सेवन से ही वियेले 
लक्षण उत्पन्न होते हें । अनवधानता में असात्म्य वस्तु का सेवन करने से सूच्म संवेदनता 
पंदा होती हें किन्तु जब तक पुनः अधिक मात्रा में उसी वस्तु का सेवन न किया जाय तब 
तक अतिक्रिया नहीं उत्पन्न होगी । 

चिकित्सा--ओऑपथ के रूप में प्रोभूजिन द्वव्यों का प्रयोग करते समय निम्नलिखित 
बातों का ध्यान रखने से अनवधानता का प्रतिबन्ध हो सकता है । 

१. ययाशक्ति प्रोभूजिन द्रन्यों के श्रयोग के पूर्व नेत्र या त्वक्‌ कसौंटी द्वारा 
सहिष्णुता की परीक्षा कर लेनी चाहिये | 


स्वास्थ्य सथा रोग १६३ 


२. प्रारम्भिक मात्रा अल्प देकर उत्तरकालीन मात्रा धीरे-धौरे बढ़ानी चाहिये । 
२. लासका, रक्त या रक्तरस का चिक्रित्सा में प्रयोग आवश्यक होने पर एक बार 


4#% पक. 


प्रयोग करने के बाद एक सप्ताह के भीतर दुबारा लगा देना चाहिये । 


४. अनवधानता के लक्षण उत्पन्न होने पर पृ्ववत्‌ एड्रिनेलिन, एटोपीन आदि 
( पूवंचरणित रसिका रोग के समान ) का सूचीवेध देना चाहिये । 


अनूजता ( 2०४27 ) 

खाद्य-पेय आदि द्र॒ब्यों से असहिष्णुता होने पर अनूजता की अ्रवस्था उत्पन्न होती 
हैं। अथात्‌ अनूजता भी व्यक्तिगत असहनशीलता का ही परिणाम हैं। अनूजता के 
सम्बन्ध में निम्नलिखित विशेषतायें ध्यान देने योग्य हैं-- 

१. अनूजता में कुलज़ प्रवृत्ति होती है । इसे सहज ग्रकृनतिनिष्ठ दुबछता कह सकते 
हैं । यह कुलज त्रत्रत्ति अनूजंता के उत्पन्न करने में सहायक होती हैं। सन्‍्तति में उसकी 
अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न अनेक लक्षणों में हो सकती है । यदि माता-पिता नासापरिस्राव 
या अपरस से पीडित ये तो उनकी सन्‍्तति श्वास से पीडित हो सकती है अथांत द्वोनों 
की व्याधि में भिन्नता भी हो सकती है । 

०... ७. अर ए्‌ 

२. व्यक्ति के शरीर में रोगक्षमता के समान सक्रिय तथा निक्रिष्य रूप में अनूजता 
की उन्पत्ति की जा सकती हैं। विषम मात्रा में असात्म्य द्रव्यों का सेवन करने से 
अनूजता उत्पन्न हों सकती है तथा क्रमश्रद्धि से असात्म्य द्रव्यों का सेवन करने से 
सक्रिय क्षमता के समान सात्म्यता बड़ सकती हैं । 

३. सभी श्रनूज व्यक्तियों में अनूजता के लक्षण समान नहीं होते । अधिकांश में 
विंकार एक स्थान में ही केन्द्रित रहता हैं । जेसे अनवधानता में व्यापक परिणाम होते 
न चर च्+ गे ' बक 4". | हि र्‌ः 
हैं, वेसे अनूजता में नहीं होते | एक ही व्यक्ति में समय-समय पर अनूजंता के लक्षण 
भिन्न रूपों में भी मिल सकते हैं । 

४. ग्रतिक्रिया होने पर त्वचा-श्लेष्मलकला में साधारण क्षोभ या शोथ के लक्षण 
उत्पन्न होते हें । 

च का] 

५. त्वचा, श्वसनमाग, महास्नोत माग से या सूचीवेध के द्वारा असात्म्य द्रव्यों का 
शरीर में प्रवेश होने पर प्रतिक्रिया उत्पन्न होती हैं। वसन्‍्त तथा शरद ऋतु में इसका 
प्रकोप अधिक होता है । 

अनूजतामूलक व्याधियाँ-- 

सम्पकजन्य त्वकशोथ, शीतपित्त, अपरस, नासापरिज्लाच.या क्षवधु, तृणगन्धज्वर, 

१०७. क (्‌ का... #"९, # प्रमुख 
बास और लसिंका-औषध तथा आहार द्वारा उत्पन्न अनूजता इस श्रेणी की प्रमुख् 
१. याँ ब्क्‌ ब्कछ क्फ़ज्क पे 
व्याधियोँ हैं । इस शेणी के व्यक्ति में समय-समय पर अनूजेता जन्य व्याधियों का आवतंन 


१६४ कायचिकित्सा 


होता रहता हैं। जो व्यक्ति अपरस से पौडित हो वह उससे निद्ृत्त होने पर श्वास स 
पीडित होते देखा जाता हे । 

अनूज॑ता-वर्धन--- 

१. जान्तव वच्चों का-गिलहरों की रोयेंदार खाल रेयन, रबर आदि के विभिन्न 
उपयोग: पक्षियों के पंखों का गद्यू-तकिया; ऊन आदि का प्रयोग; जन्तुओं--अंथा 
बिल्ली-कुत्ता-गिलहरी-घोड़ा के साथ सम्पक--इन सबसे अनूजता की बृद्धि होती है । 

२. कुलज ग्रवृत्ति--अनूजतारूपी असहिष्णुता की कुलज श्रब्ृत्ति का पहले उल्लख 
किया जा चुका हैं 

३. शीतोष्ण विपयेय, प्रस्वेदन, धूल तथा धूम्रयुक्त वातावरण में निवास और 
कुकास-रोमान्तिका-इन्फ्लुएज्ञा इत्यादि से आक्रान्त होने के बाद भी अनूजता की 
वृद्धि होती है । 

४. आहार में जीवतिक्तियों को कमी होने पर इसकी बृद्धि होती हैं । 


अनूजता की चिकित्सा-- 


त्वक कसोंटी के द्वारा असात्म्य वस्तु के निणेय के उपरान्त, अल्पमात्रा में उसका 
सेवन प्रारम्भ कराना। धीरे-धीरे सात्म्यता उत्पन्न करने से विशिष्ट द्रव्यों के अति सहिष्णुता 
उत्पन्न हो जाती है । 


तजहतीय अध्याय 
चिकित्सा के सिद्धान्त 
चिकित्सा का स्वरूप :--प्रतिंकम द्वारा दोषों एवं दूषित धातुओं कौ समता 

चिकित्सा का अ्रथम एवं अन्तिम उद्देश्य भाना जाता है|? दूषित हुए दोषों के प्रभाव 
से शरीर की विशिष्ट धातुओं की दुष्टि तथा दोषों का स्थान-संश्रय हो कर व्याध्युत्पत्ति 
होने का उल्लेख प्रथम अध्याय में किया जा चुका है । जिस अक्िया के द्वारा उत्पन्न 
व्याधि का शमन तथा विषम दोषों का प्रकृत्यनुवत्तन होता है, वही आदश चिकित्सा 
मानी जाती है | आदर्श चिकित्सा के प्रयोग से व्याधि एवं दोष का शमन होने के 
अतिरिक्त उसे शारीर-धातओं के लिए हिंततम होना और व्याधि के प्रभाव से उत्पन्न 
घातक्षय एवं दौंबल्य का अतिकार करते हुए स्वास्थ्य-अनुवतंक होना भी आवश्यक हैं | 
ऐसा न हो कि एक व्याथिं का शमन होने के बाद दूसरी व्याधि की उत्पत्ति हो जाय 
अथवा शरौर सामान्यतया इतर विकारों के लिए उबर क्षेत्र बन जाय ।' 


इस श्रकार आदश चिकित्सा में निम्नलिखित गुण होना आवश्यक है-- 

१. विंकृत दोष का शमन करते हुए व्याधि का उन्मूलन करना । 

२, उत्पन्न व्याधि का शमन करने के अतिरिक्त शारीरिक धातुओं के लिए हिंततम 
होना और किसी चिंकार को न उत्पन्न करना । 

३. दोष एवं व्याधि के प्रभाव से कर्षित शारीर धातुओं का श्रक्ृत्यनुवत्तंत करना ' 

प्रतिकर्म के उल्लिखित उद्देश्यों की सिद्धि के लिए व्यापक चिकित्सा के दो प्रमुख वर्ग 
किए जाते हैं--दोषप्रत्यनीक तथा व्याधिप्रत्यनीक । दोनों का चरम लक्ष्य एक होने पर 
भी प्रक्रिया एवं विधान में अन्तर होने के कारण ए्थक-ध्थक वर्गीकरण किया गया 


दोषप्रत्यनीक चिकित्सा ः:--व्याधि के बाह्य लक्षणों पर विशेष लक्ष्य न करते 
हुए, जिस दोष का ग्रकोप होने के कारण व्याधि एवं उसके लक्षण उत्पन्न हुए हां उस 
मूल हेतु का शमन करते हुए दूर्षित घातुओं को सम स्थिति में लाना, दोषप्रत्यनीक या 
दोष-विरुद्ध चिकित्सा का मूल आधार है । जिस अकार शरोर की किसी शाखा या अच् 
का छेदन रूप शल्य कम करते संमय रक्तप्रवाह के अचरोध के लिए सम्बद्ध मूल रक्त- 
चाहिनी का अवरोध आवश्यक होता है, उसी प्रकार रोगा के शमन के लिए रोगीत्पादक 


: निहारमदाकमार अपर --यू सके प:मरर 








१, धाभिः क्रियासिजोयन्ते शरोरे धातवः समा: । 
सा चिकित्सा बिकाराणां कर्म तद मिपषजां मतम्‌ ४? ( चरक ) 

२. प्रयोग: शमयेद्‌ व्याधिमेक॑ योइन्यमुदी स्येत्‌ । 
ना:सौ विशुद्धः शुद्ूरतु शम्येद्यों न कोपयेत्‌ ॥? ( वा. सू. *३ ) 





१६६ कायचिकित्स! 


मूल दोषों का शमन आवश्यक हैं। मूल स्लोौत के नष्र हो जाने पर व्याधथि के अनुबन्ध 
के लिए आवश्यक दोष-प्रवाह न मिलने पर कुछ काल बाद व्याधि का स्वतः पूर्ण शमन 
हो जाता है । 


सिद्धान्त की दृष्टि से दोषप्रत्यनीक चिकित्सा सचश्रेष्ष मानी जाती है। किन्तु 
व्यावद्रारिक दृष्टि से इसमें कुछ जटिलता होती है। यदि प्रारम्भ से ही मनोग्रोगपूर्चक 
इसका अभ्यास किया जाय तो अवश्य सुकर हो जाती दोष-विरुद्ध चिकित्सा की 
पूण सफलता के लिए दोषपग्रकोपक कारणों का सम्यक ज्ञान अनिवाये है। कौन दोष 
अपने किस अंश से दूषित हुआ है? दोष का सच्चय-प्रकोप-स्थान-संश्रय आदि का 
स्वरूप क्या है? इसके उपरान्त प्रयोज्य भेषज द्रव्य के बारे में भी इसी प्रकार का 
ज्ञान होना चाहिए | अमुक ओषध के रस-गुण आदि का क्या स्वरूप हैं? ऋतु-देश- 
काल आदि के प्रभाव से व्याधि एवं ओषध दोनों की प्रकृति में कुछ अभिसंस्क्रार हो 
सकते हैं, इसका भी ध्यान रखना आवश्यक है । रोग-लक्षणों तथा भेषज द्रन्यों का 
अनुशोलन-परिशोलन करते रहने पर इस प्रकार का असन्दिग्ध ज्ञान हो सकता हैं। 
शोत अश के प्रकोप से उत्पन्न वातिक विकार में उष्ण गुण युक्त आद्रक़ का प्रयोग 
हितकर हूँ, किन्तु लघु-सूच्म-चल-विशद-खर आदि अंशों में अन्यतम के प्रकोप से 
उत्तज्ञ वातक विकार में आदक से लाभ न होगा। कहीं एरण्ड, कहीं गुग्गुल या 
रसोन का प्रयोग करना होगा और कहीं पर केवल स्नेह से खरता-परुपता का शमन 
हो जायगा । रूक्ष-शीत, चल-शीत, शीत-रूक्ष या रुक्ष-शीत-चल आदि वायु के एकाधिक 
अचाशा का युगपत्‌ प्रकोप होने पर भेषज-योजना में अधिक कुशलता की अपेक्षा होती 
है ओर स्थूल दृष्टि से परस्पर विरुद्धोपकम दोषों ( यथा-वायु और श्लेप्मा ) का 
प्रकोप होने पर अथवा त्रिदोषज विकारों में दोषप्रत्यनीक चिकित्सा का सिद्धान्त 
चिकित्सक के सामने बीजगणित के जटिल प्रश्न के समान आता हैं। आए इस विषय 
का यथास्थलू सोदाहरण विवेचन 'किया जायगा । 


इस श्रेणों की चिकित्सा से व्याधियों की तीत्रावस्था में त्वर्ति छाभ नहीं होता । 
खोत न रहने पर भी पहले का दोषसब्यय कुछ काल तक रोग का अनुबन्ध रखने में 
कारण होता हैँ । इसी कारण दीषप्रत्यनीक चिकित्सा की मुख्य उपयोगिता मन्द अकोपी 


चिरकालानुबन्धी एवं जीण विकारों में होती है, व्याधि की तीजावस्था में व्याधिप्रत्यनीक 
चिकित्सा ही अधिक हिंतावह होती है । 


व्याधिप्रस्यनीक चिकित्सा--प्रत्येक व्याधिं का प्रधान लक्षण उसका आपत्मछिद्ञ 
होता है। जेसे अतिसार में धातु एंवं मलों का अतिसरण, ज्वर में संताप, कास में 
कसन ओर प्रमेह भ महन आाद । इन लक्षणों या आँपदविक लक्षणा का उग्र स्वरूप 
होने पर व्याधि के शमनाथ तत्काल उपचार करना पड़ता है । इसे लाक्षणिक्र या 
आपद्रविक चिकित्सा भी कह सकते हैं । परम ज्वर होने पर संताप का शमन करने 
कक... 


चिकित्सा के सिद्धान्त १६ ७ 


के लिए शीतोपचार किया जाता हैं ओर विसूचिका या अतिसार में अत्यधिक चिरेचन 
हो जाने पर गंभीर स्थिति के अतिकार के लिए सद्यः स्तम्भक व्यवस्था गावश्यक होती 
हैं तथा मूच्छित रोगी में दोष-दृष्यों का बिना विवेचन किए हो संज्ञास्थापक उपचार 
किए जाते हें । इस प्रकार लाक्षणिक रूप में व्याधि का शमन करने वाले ग्रतिकर्मों को 
व्याधिप्रत्यनीक चिकित्सा कहा जाता हैं । यदि आत्ययिंक अवस्था के निवृत्त होने के 
बाद दोषप्रत्यनीक व्यवस्था का सम्प्रयोग किया जाय तो कोई दोष शेष नहीं रहेगा, 
अन्यथा दोष का पूरा पाचन एवं शोधन न हो सकने से कालान्तर में पुनः उसी व्याधि 
का पुनरावत्तन या दोष का संचय होने के कारण क्िंसी दूसरी व्याधि का उसके अनुकूल 
अवसर आने पर प्रकोप हो सकता है। 

उक्त विवेचन से दोषप्रत्यनीक व्यवस्था की श्रेष्ठता स्पष्ट हो गई होगी । इस प्रकार के 
_ उपचार के लिए रोगामिधान, संख्या-सम्प्राप्ति तथा दूसरे विशिष्ट लक्षणों या परीक्षणों 
का विशेष महत्व नहीं है; केवल दोष-दृष्य एवं दृष्यावस्था ओर अधिष्ठान का परिज्ञान ही 
आवश्यक होता है । 

प्रतिकर्म में पृण सफलता प्राप्त करने के लिए आचाये वाग्भद् ने दृष्य, देश, बल, 
कांछ, अनल, प्रकृति, वय, सत्व, सात्म्य तथा आहार एवं रोग की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं 
का सूक्ष्म विवेचन करने क आवश्यकता, दोष तथा ओषध-विनिश्वय करते समय, 
प्रतिपादित की है! । इनका संक्षेप में स्पष्टीकरण किया जाता है । 

दृष्य--रस-रक्त-मांस-मेद-अस्थि-मजा तथा शुक्र रूप धातुए मुख्यतया तथा धातु- 
मल, उपधात॒यें और मल-मूत्र-प्रीष गोण रूप से दृष्य होते हैं । रंस-रक्त एवं मांस की 
दुष्टि होने पर प्रारम्भिक धातु होने के कारण लंघन-पाचन आदि क्रियाओं से शीघ्र दोष 
निव्तत्ति हो सकती है । किन्तु शुक्र-मजा-अस्थि एवं मेद आदि गंभीर धातुओं के दूषित 
होम पर दृष्य का निराकरण सुकर नहीं होता । अतः दृधष्य की मिज्ञता होने पर समान 
मिथ्या आहार-विंहारजन्य एवं तुल्यदोषोत्पन्न होने पर भी व्याधि के स्वरूप एवं 
साध्यासाध्यता में पर्याप्त अन्तर होता है । 

देश--देश-विभेद से व्याधियों का स्वरूप तथा ओषधियों का गुणधर्म बहुत बदल 
जाता है। आनूपदेश कफप्रधान तथा जाह्नलदेश वातग्रधान होता हैं । ताप की 
न्यूनाथिकता के आधार पर उष्ण तथा शीतदेश का एक दूसरा वर्ग होता हैं। एक 
देश या जनपद में जो व्याधियाँ अधान रूप में उत्पन्न होती हैं, वे इतर देशों में कम 
या नहीं होतीं; व्याधियों की तीव्रता तथा लक्षणों में भी पर्याप्त भिन्नता मिलती है। 
स्थानीय व्यक्तियों को उस विशिष्ट जलवायु की अनुकूलता रहने के कारण आगन्तुका को 








१. दृष्यं देश बल कालमनलूं प्रकृति वयः। 

स्व सात्म्य तथा55हारमवस्थाश्व एथरिवधा: ॥ 

सृक्ष्म-सूक्ष्मः समीक्ष्येधां दोषोषधनिरूपणें ! 
यो वत्तंते चिकित्सायां न स स्खलति जातुचित्‌ ॥ ( अ. ह. सू. १२ ) 


१६८ कायचिकित्सा 


कष्ट अधिक होता है । राजस्थान में घी तथा लाल मिर्च का ओर दक्षिण में इमली का 
आहार में अधिक अ्रयोग किया जाता है । यदि इन जनपदों के निवासी दूसरे आन्तों 
था देशों में जाकर तदनुकूल आहार-विहार-कम में परिंवत्तन नहीं करते तो संग्रहणी, 
अतिसार, शोफ एवं त्वग्विकार आदि की उत्पत्ति हो सकती है । 


काल अवस्था, ऋतु एवं अहोरात्रादि भेद से दोबों की प्रधानता या स्वाभाविक 
क्षय-त्रेद्धि का उल्लेख किया जा चुका है। दोष तथा व्याथि के निरूपण में इसका 
भली श्रकार विश्लेषण करना चाहिए । देश-काल भेद से ओपधियोें का गुण भी 
बहुत परिचित हो जाता है । बागी तथा जंगली भेद से क्रेंचाच, मुद्रपर्णी-माषपर्णी 
आदि का गुण और स्थान भेद से व्राह्मी-शतावरी-अश्वगंधा आदि का गुण कितना 
बदल जाता है, यह कहने की आवश्यकता नहीं । जब पंजाब का चना-मटर तथा इख 
का रूप दूसरे आन्तों में जाकर स्थिर नहीं रह पाता तो रस-गुण-विपाक् उससे 
सूक्ष्म होते हैं, इनमें तो अल्पतम परिवर्त्तन का प्रभाव पड़ता होगा । 

बल--दोष-व्याधि तथा रोगी का प्रथक-प्रथक बलाबल निर्णय करने- के अनन्तर 
आओषध के बलाबल का अनुसंधान करते हुए उपयुक्त योजना करनी चाहिए । 


अग्रि--जाठरामि, पद्चमहाभूतामि तथा धात्वम्नि की प्रचरता-हीनता का निर्णय करके 
भैषज द्रव्य की सुपाच्यता-सुसात्म्यता आदि का पर्यालोचन करना आवश्यक हैं । रोगी 
के अत्यधिक क्षीण होने पर भी जाटराम्मि की मंदता के कारण पोषक आहार उपकारक 
नहीं होता । धात्वप्नि की क्रिया समुचित न होने पर रक्त-मांस-मेदादि विशिष्ट धातुओं के 
पोषणाथ अयुक्त आहार सुपाचित होने पर भी धातुओं की पुष्टि या वृद्धि नहीं कर पाता । 
: अक्वति-वय-सत्त्व एवं सात्म्य तथा आहार आदि की व्याधि एवं ओषधि निरूपण की 
विशिष्टता का आवश्यक स्पष्टीकरण किया जा चुका है । 

दोष-दूष्य सम्मूच्छेना से उत्पन्न सूक्ष्म-सच्तम अवस्थाओं का निरन्तर अन्वीक्षण 
करते रहना आवश्यक है। सहसा इस ग्रकार की अवस्था उत्पन्न हो सकती है, जिसमे 
निर्दिष्ट किया हानिकर हो सकती है और उस व्याथि में हानिकारक उपचार लाभकारक 
हो सकते हैं ।१ इसलिये सतत पर्यवेक्षण करते रहना आवश्यक है । 

सेद्धान्तिक दृष्टि से दोष प्रत्यनीक तथा व्याथि ग्रत्यनीक चिकित्सा की विशेषताओं 
का उल्लेख किया गया है। उपयोगक्रम के आधार पर कुछ क्रिया भिन्नता होती 
है--जिसका आगे स्पष्टीकरण किया जा रहा हे । ु 

पहले अध्याय में व्यावहारिक सुगमता के लिए साम-निराम तथा जी भेद से 
चिकित्सोपयोगी व्याधि की तीन अवस्थाओं का उल्लेख किया गया है । दाशनिक ज्षेत्र में 
मुख्यतः त्रिवर्गीय भेद पद्धति अचलित हैं। आ्य॑ः सर्चत्र जिल्‍्व का -77_-  अचलित है। प्रायः सत्र ज्रित्व का साम्राज्य दीखता है। 

१. उत्पच्यते तु सावस्था देश-काल-बलूं प्रति 

यस्यां कायमकारये स्यात कम कार्य च वर्जितम्‌ । (च. सि. २ 


चिकित्सा के सिद्धान्त १६५९ 


सत्व-रज-तम, उत्पत्ति-स्थिति-विनाश; बाल-युवा तथा ब्रढ्ठ आदि । सवंत्र समान वर्गीकरण 
होने के कारण बड़ी छुगमता होती है । आयुर्वेद में तो जीवन एवं स्वास्थ्य का आधार 
तक त्रिपाद ( आहारिद्वा-बरद्यवय ) माना है। अतः व्याधियों के विविध भेद होने 
पर भी साम-निराम एवं जीण की विशिष्ट महत्ता होती हैं । वास्तव में यह कोई व्याधि के 
भेद नहीं हैं, केवल क्रिया-क्रम की दृष्टि से भिन्न परिलक्षित होने वाली अचस्थाएं हैं । जिस 
प्रकार वाल्य, थवा एवं ब्रद्भधावस्था में व्यक्ति नहीं बदलता किन्तु उसकी आकृति, अक्ृति- 
बल-पौंरुष आदिं में पर्याप्त मिन्नता हो जाती है, उसी प्रकार साम, निराम एवं जीणे रोग 
में भी चिकित्सा की दृष्टि से मिन्नता होती है । 

दोष-दृष्य सम्मूच्छेना के समय कुछ काल तक शरीर की सम्पूर्ण कियायें अस्त-व्यस्त 
हो जाती हैं । इस. अवस्था में रोग के निराकरण की चेथश्वा न करके इस अव्यवस्था 
का संस्कार आवश्यक होता हैं। जिस अकार सिर या किसी मम पर आघात छगने 
पर सग्रथम रोगी कुछ समय के लिए मूच्छित हो जाता हैं। कुछ काल बाद सचेतन 
होने पर आधात के स्थानीय परिणामों ( वेदना-्रण-अस्थिभज्ञ आदि ) का अनुभव 
होता है । उसी प्रकार रोग के आरम्भ में शारीर-कियाओं में अव्यवस्था या शिथिलता 
होने से आमावस्था के लक्षण उत्पन्न होते हैं। शरीर की गतिंकारक शक्ति एवं बल 
मुख्य रूप से पित्त एवं पित्तजन्य रक्त में निहित होता है। रोगाक्रमण के बाद पित्त का 
प्रमुख काय दोष-पाचन एव व्याधि का ग्रतिकार होता है । इसीलिए व्याधि के प्र तिकाराथ 
अपनी उग्नता व्यक्त करने के लिए अपनी सारी सश्चित शक्ति को व्याधि-संघष में प्रयुक्त 
करने के लिए सन्‍्ताप एवं ज्वर के रूप में पित्त प्रकट होता है । मर्यादित रहने पर ज्वर 
के शमन का उपचार अष्वश्यक नहीं होता । वह दोष का प्राचन-शमन होने पर स्वतः 
शान्त हो जाता है । 


पित्त के ऊष्म रूप में परिवर्तित होने पर जाठराप्ि के अल्पबल होने के कारण 
आहार का सम्यक परिपाक नहीं होता । आमाशयगत अपरिपक आहाररस की 
ही आम संज्ञा है । आम रस से युक्त अवस्था को साम कहा जाता है | यह सामता 
व्याधि एवं दोष के लिए कवच का काय करती है । समता की बृद्धि का परिणाम पित्त 
तथा शारीरिक प्रतिकारक शक्ति के हास ओर दोष-व्याधिबल एवं उनकी सुरक्षा की 
वृद्धि के रूप में होता हैं । जब तक सामता का यह आवरण नष्ट न कर दिया जाय, 
व्याधिजनक दोष का शमन या शोधन सभच न- होगा । 


ओषधि का मुख्यतया मुख द्वारा अयोग होता है । आमाशयं में आमांश का संचय 
होने के कारण ओषधि का उपयुक्त विपाक न होने से कोई विशेष अभाव नहीं होता । इसी 
कारण आरंभिक ९-४ दिनों तक व्याधिशामक या शोघक किसी प्रकार की ऑषध के 
हे । 


प्रयोग का निषेध किया जाता हैं 
दोषों की प्रकृति के अनुरूप सामता की यह मर्यादा न्यूनाधिक होती है । अप्नि, वायु 


१७० कायचिकि व्घा 


[ 


एवं आकाश तत्व की प्रधानता वाले वायु एवं पित्त की सामता क्रम से ३ तथा ५ ढ़िन 
में शान्‍्त होती है। पिच्छिल, गुरु, मघुर आदि स्थूलताकर गुणों की विशेषता तथा 
पथ्वी एवं जल तंत्व की प्रधानता वाले श्लेप्मा की सामता का पाचन ७-४ दिन के पहले 
नहीं हो पाता । आमदोष तथा श्लेष्मा की सजातायता होने के कारण (ृद्धिः समानेः 
सर्वेधाम' इस शिद्धान्त के अनुसार कुछ अधिक समय लग सकता हैं। यह मर्यादा 
व्याथि की प्रकृति तथा रोग़ीं की प्रकृति, देश-काल, आयु, अप्नि, आहार आदि के 
आधार पर घटती-बढ़ती रहती है । 

उक्त वर्णन से व्याधि की आमावस्था में आहार के निषेध का ओचित्य स्पष्ट हो 
गया होगा । जब तक व्याधित पूर्ण रूप से रोगमुक्त न हो जाय, तबतक पोषक आहार 
का प्रयोग नहीं किया जाता। रोगमुक्ति के बाद पोषक आह 7र-चिंहार-ओषध की 
व्यवस्था की जाती हैं । इस प्रकार चिकित्सा के दो वर्ग सामने आते हैं--- 

( १ ) रूंघन या अपतपण चिकित्सा । 

( २ ) ढंंहण या संतपण चिकित्सा । 

प्रथम का सम्बन्ध रोग के निराकरण तथा रुग्णावस्था में संचिंत शारीर दोषों का 
निहरण करने से है । दूसरे का अमुख गुण शरीर को स्वस्थ रखने तथा रुग्ण होने 
पर व्याधि से मुक्ति मिलने के बाद, व्याधि तथा दोष के संघ पं के कारण उत्पन्न शारीरिक 
दुर्बछता के निराकरण, बल-संजनन एवं शरीर की सर्वांग-भाव से पुष्टि है। बहुत सी 
व्याधियाँ केवल हीन पोषण तथा अपर्याप्त आहार के कारण उत्पन्न होती हैं। इस 
श्रेणी की व्यावियों में प्रारंभ से ही संतपण कराना आवश्यक होता है--इनकी चिकिंत्सा 
ही पोषण है ! 

यहाँ पर संतर्पण या बूंहण का संक्षिप्त वणन किया जाता है । बूंहण किया में आषध 
की अपेक्षा आहार-विहार तथा मानसिक तुष्टिकारक भावों का बहुत महत्त्व होता है । 


कि | 


बृंहण की योजना प्रायः रूंघन के उपरान्त की जाती है । 


बृंहण के अधिकारी-- 

जीर्ण व्याधियों से कर्षित, सुरुंधित, तीवन्लीय वाली ओषधियों का सेवन करने के उपरान्त, 
सद्मपान, ग्राम्यधर्म, चिन्ता, श्रम एवं प्रवास के कारण रूक्ष-अशक्त एवं निबल शरीर वाले 
व्यक्ति, क्षय एवं बात व्याधि से पीड़ित व्यक्ति, सगर्भा ओर असूता र््री, बालक तथा 
वृद्ध बृंहण चिंकित्सा के विशिष्ट अधिकारी माने जाते हैं। इस प्रकार के व्यक्तियों को 
लंघनसाध्य ज्वर-आमवात इत्यादि विकार होने पर भी अल्पमात्रा में संत्तपणप्रधान 
ओषधियों की योजना करनी चाहिये । ग्रीष्मऋतु में लंघन कराने से वातप्रकोप अधिक 
होता है, अतः अधिंक लंघन न कराकर संतपण का क्रमिंक प्रयोग करना चाहिये । 


सुबंहित के रत्षण--शरीर की स्तोभावेन पृष्टि, बलबृद्धि, उत्साह, कान्ति इत्यादि 
पी संक्षेप फर्क 2 का. ॥० मी . &. भ्५ 
पी ग्बलता, संक्षेप में साधारण स्थिति से रोगी का स्वास्थ्य बहुत उत्तम हो जाता हैं | 


चिकित्सा के सिद्धान्त १७१ 


क्षय, क्षत-क्षीण, व्यायाम-शोषी इत्यादि के लिये बृंहण चिकित्सा अस्त हैं । इसका उचित 
प्रयोग होने पर शरीर पूवपिक्षा बल-वीय-ओज से अधिक परिपूर्ण हो जाता हैं । 


बुंहण के द्ृब्य--गुरु, शीत, मदु, घन, स्निग्ब, मन्‍्द, स्थिर, छदण, मधुर, अम्ल 
स्थूल, पिच्छिल इत्यादि कफवर्धंक पोषक द्रव्य शंरौर का वरृहण करते है । छ्त-मिष्ठान्न, 
मांसरस, दग्घ, विश्राम, निद्रा, सुखी-शान्त एच सतुष्ट जीवन के द्वारा घातुआ का 
पष्टि होती है। गेहूँ, उड़द तथा जीवनीय गणोक्त ओषधियों संतर्पणकारक होती 
वातप्रधान तथा वात-पित्त-प्रधान भ्याधियों में बृंहण का विशेष फल दिखाई पड़ता है । 


अत्यधिक सन्‍्तर्पण के परिणाम--स्थूलता, मेदोबृद्धि, प्रमेह, उदर, भगन्दर, अपची, 
आमवात, कुष्ठ,ज्वर, कास, श्वास इत्यादि कफप्रधान व्याधियाँ अत्यधिक बूंहण से पंदा 
होती हैं । शरीर में देनिक उपयोग से अधिक पोषक आहार की मात्रा हो जाने पर उद्र, 
त्वचा, यकृत आदि अंगों में संचय होता है । अत्यधिक संतपण होने पर सभी धातुआ 
की मात्रा स्वाभाविक सीमा से अधिक हो जाती है, जिससे अंग-प्रत्यंग को गति में 
शिथिलता आ जाती है, शरीर स्थूल हो जाता है ! परिणामस्वरूप शरीर में अम्निमांग 
होकर आमांश का संचय होता हैं। अतः संतपंण कराते समय अतियोग न ही जाय 
ऐसा ध्यान रखना चाहिये । संतपंण का मुख्य सिंद्धान्त है वृद्धि: समाने: सवषाम्‌ अथात्‌ 
समानजातीय द्रव्यों के उपयोग से धातुओं की ब्रद्धि होती ह। शरीर म रक्त का क्षय 
होने पर रक्तसजातीय द्रव्य, मांस का क्षय होने पर मांसजातीय एवं अस्थि का क्षय 
होने पर अस्थिजातीय या अस्थि के मूलघटकी से युक्त द्रव्यों का उपयोग करने से श्षय 
की पूर्ति होती हे । एक धातु का क्षय होने पर दूसरी धातु पर भी उसका श्रभाव होता 
है । उसी प्रकार एक धातु की बइड्धि होने पर दूसरी धातु का भी कुछ पोषण होता हैं । 
किन्तु धातुओं का नवनिर्माण सजातीय द्वव्यों के व्यवहार से ही होता हैं। शरीर में 
रस एवं मांस का क्षय हो जाने पर स्नेंहभूयिष्ठ मेदवधेक द्रव्यों के सेवव से अधिक लाभ 
नहीं होता ! शरीर बाहर से ख्रिग्ध एवं पुष्ट परिलक्षित होने पर भी रक्त एवं मांस की दृष्टि 
से हीनबल ही होता है । इसलिए विशेष धातु या अंग का क्षय होने या उसकी पुष्टि या 
वृद्धि की विशेष अपेक्षा होने पर समान वर्ग के द्रव्य या औषध का अभ्यास करना चाहिए। 


लघन चिकित्सा--- 


जिन उपकर्मों से शरीर में लघुता, स्वच्छता एवं प्रसन्षता का अनुभव होता हैं, 

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उन्हें लंघन कहते हैं ।* रोग क्री सामावस्था में गुरुता, अवसाद, क्लान्ति, शेथिल्य, अरुचि, 
लालाप्रसेक, स्तब्धघता आदि लक्षणों की प्रधानता रहती है। इस अवस्था में गुरुता- 
अचसादादि लक्षणों का निराकरण अर्थात्‌ लघुता की उत्पत्ति करने वाले आमांश-पाचन- 
कारक औषध तथा विहार कौ योजना की जाती हैं । लाघवकर उपक्र॒मों में अम्रि, वायु 








२, 'यत्किचिलाधवकरं देहे तलंघन स्मृतम्‌? | चरक 


१७२ काय चिकित्सा 


तथा आकाशीय तत्वों की ग्रधानता होती हे । अतः इसक प्रयोग से शरीर में लघुता, 
> ० ५ 4 न >. न हल ७ 

क्षीणता, प्रसन्नता एवं दुबंठता की उत्पत्ति होती हे । इसी कारण लंघन या अपतपंण 

कराने के बाद संतपण आवश्यक होता है । 


लघनकारक ञो प्रधान विहार--सूछ्म » रूक्ष, लघु, उष्ण, विंशद, तीदण, खर, सर, 
चल तथा कठिन गुणों से युक्त द्रव्य लंघनकारक होते हैं । कुलत्थ, बाजरा, चना, जो, 
साँवा, कोदो, सत्तू , मूंग आदि रुक्ष अन्न; परवर, करेला, खेखसा आदि कटु-तिक्त-रस- 
प्रधान तरकारियाँ; गोमूत्र, मधु, छाछ, आदि अपतर्पक पदाथ; बृहत्‌ पंचमूल, त्रिफला, 
त्रिकटु, पंचकील, गुग्गुलु, शिलाजतु, गुड़ची आदि कफ तथा मेद का शोषण करने वाली 
ओपषधियों; प्रजागरण, चिन्ता, व्यायाम, अनशन, तृषा-निश्रद, आतप-सवन, वायु-सेवन 
आदि विहार लंघन॑कारक माने जाते हैं । लरूंघन की उपयोगिता निदिष्ट होने पर व्याधित 
के दृष्य-देश-काल-प्रकृत्यादि का परीक्षण करके यथोचित योजना करनी चाहिए । 


लंघन-चिकित्सा के अधिकारी--मेदोबद्धि, प्रमेह, आमचवात, अतिसार, प्रवाहिंका, 
ग्रहणी, अतिल्लरिग्धता, शोफ, कुष्ठ, विंसप, विद्रधि, श्लीपद, ऊरुस्तम्भ, तरुण ज्वर, 
प्रतिश्याय, ड्लीहोदर तथा कण्ठ-नेत्र और मस्तिष्क के विकारों से पीडित व्यक्ति को लंघन- 
चिकित्सा लाभप्रद होती है । स्थूल शरीर वाले रोगियों को सामान्यतया लंघन हिततम 
होता है । हेमन्‍त तथा शिशिर ऋतु के अतिरिक्त सभी ऋतुओं में आवश्यकतानुसार 
लंघन कराना चाहिये । 


लंघन का निषेध--निराम वातज्वर, क्षयानुबंधी ज्वर, श्रम तथा मुखशोष-पीडित 
जींणे ज्वर तथा आगमन्तुक ज्वराक्ान्त रोगियों में लंघन न कराना चाहिये। बाल-बड- 
गर्भिणी तथा सुकुमार ग्रकृति वाले दुबंल रोगियों में भी लूंघन का निषेध किया जाता है। 
काम-क्रोध-श्रम-यात्रा जनित तथा शोकज विकारों में लंघन लाभ नहीं करता । 


लंघन का परिणाम--शुरुता-तन्द्रा तथा अवसाद का नाश, दोष तथा व्याधि का 
शमन, असहा क्षुषा तथा पिपासा की प्रवृत्ति, इन्द्रियों के बल तथा उत्साह की बृद्धि, 
प्रस्वेद-ऊध्वं-अधोवायु और मलू-मूत्र की शुद्धि, गात्रलघुता, अन्तरात्मा की निव्यंथता, 
स्वच्छता एवं प्रसन्षता तथा क्षीणता का अनुभव उचित मात्रा में लंघन कराने से होता हे । 


अतियोगजन्य परिणाम--तृष्णा, चक्कर तथा कृशता की अत्यधिक वृद्धि, शुष्क 
कास, अरुचि, अत्यधिक दौबल्य का अनुभव, निद्वानाश, इन्द्रियों की दुबंलता, शारीरिक 
ल्लिग्धता-शुक्रओज तथा क्षुघा का नाश या हीनता, हृदय-मस्तक-बछ््तिग्रदेश-पाश्वे-जंघा- 
ऊरु ओर कटि में ऐंठन या पीडा; उदर में अपान वायु का अवरोध; ज्वर तथा अलाप 
की द्रद्धि; ग्लानि-हल्लास तथा वमन, मल-मूत्रावरोध, संधियों-अस्थियों तथा विशेषतया 
शाखाओं में उद्देशन या दण्डाहत की सी वेदना आदि वातिक विक्रार लंघन का अतियोंग 
होने पर उत्पन्न होते हें । 





चिकित्सा के सिद्धान्त १७३ 


इन परिणामों के शमन के लिये संतपक आहार-विहार एवं ओषधियों का प्रयोग 
व्याध्यवस्था का विचार करके करना चाहिये । 

अतियोग-प्रतिकार क सामान्य नियम -- 

१. वात-पित्त प्रकृति वाले ठुबंछ शरीर के रोगियों में लूंघन बहुत सावंधानींपूचक 
कराना चाहिए। बालक, ब्रद्ध तथा गर्भिणी ख्री लंघनाह नहीं होतीं। इनकी चिकित्सा 
मदु लंघनोपचार तथा सुपाच्य लघु दीपक आहार की व्यवस्था करके करनी चाहिये । 
ख,._२. स्थूल एवं मेदस्वी व्यक्ति तथा कफ एवं आमांशप्रधान व्याधियों में प्रोड 
लंघनयोजना करनी चाहिए । 

२. मध्य .शरीर वाले रोगियों में, विशेषकर ज्वराक्रात्त अवस्था में, प्रारंभ में 
दीपन-पाचन कराकर आवश्यक होने पर अन्त में सशोवन कराना चाहिए । 

४. हीन बल वाले रोगियों तथा अल्प श्लेष्म-पित्तयुक्त व्याधियों में केबल तृषा- 
क्षवा-निंग्रहरूप लंघन कराना चाहिए । 

५, त्वक-रक्तसार एवं कोमल शरीर वाले व्यक्ति लंघनसह नहीं होते । 

६. लंघन चिकित्सा के समय सावधानीपूवकक आमांश के पाचन के चिह परिलक्षित 
करना तथा छलघुता का अनुभव होने पर मद संतपक् आहार-विहार की योजना 
करनी चाहिए । 


लंघन के भेद--लंघन चिकित्सा के शोधन तथा शमन दो प्रमुख भेद होते हें । 
शोधन चिकित्सा को दोषप्रत्यनीक तथा शमन चिकित्सा को व्याधिप्रत्यनीक चिकित्सा 
के अथ में कुछ अंशों तक लिया जा सकता हैं । 


शोधन चिकित्सा--शारीरिंक दोषों की विष्मता से उत्पन्न, दोष-दृष्य-संमूच्छना से 
उत्पन्न तथा औपसर्गिक विकारों में उपसगजनित विजातीय विषाक्त द्व्यों को शरीर से 
बाहर निकाल कर शरीरकोषाओं--धातुसमूहों को स्वच्छ तथा परिशोधित करने वाले 
उपक्रमों को संशोधन चिकित्सा कहा जाता हे । शमन चिकित्सा में केंवल विषम दोषों एवं 
उग्म लक्षणों को शान्त क्रिया जाता हे | विक्ृतिजन्यं मलों का निराकरण न हो सकने के 
कारण संशामक चिकित्सा से पूर्ण लाभ नहीं होता । व्याधि का निर्मेलन करने के कारण 
शोधन चिकित्सा सर्वोत्तम मानी. जाती हे ।” जिन रोगियों में शोधन संभव नहीं होता, 
उन्हीं में संशमन का आश्रय लिया जाता हैं। संशोधन चिकित्सा का विस्तृत वर्णन आगे 
क्रिया जायगा । 
शमन चिकित्सा---शारीरिक धातुओं की समता में बिना बाधा पहुँचाये, केवल 
विषम दोषों का शमन करते हुये व्याधि की निव्रत्ति करना शमन चिकित्सा का मुख्य गुण 
माना जाता हे। रोगों की प्रारम्भिक अवस्था में जब आमदोष सारे शरीर में असरितः 
१. 'दोषा: कदाचित्‌ कुप्यन्ति जिता लंघनपाचनंः । 
ये तु संशोधनेः .शुद्धा न तेषां पुनरुद्धवः ॥? चरक 
१४ का० (ज. 





१७ छ कायचिकित्सा 


होकर रस-रक्तादि धातुओं में लीन रहता हैं, तब शोधन चिकित्सा द्वारा बलपूबक उसे 
बाहर नहीं निकाला जा सकता । आमाशय या पक्काशय आदि वमन-विरेचन-वस्तिसाध्य 
अंगों में सश्चित स्थानीय दोष ही शोधन द्वारा निकल सकता हे । पाकोन्मुख विद्रधि में 
जब तक पाचन प्रयोगों से सामावस्था का पाचन होकर पूय केंद्रित न हो जाय, तब तक 
शोधनाथ शख््रकर्म करने से पूथ न निकल कर उलटे कष्ट बढ़ जायगा । ठीक यही स्थिति 
शमन तथा शोधन की हे । सेद्धान्तिक दृष्टि से संशोधन श्रेष्ठ होने पर भी आमयुक्त विकारों 
की तीत्रावस्था में शमन का ही सहारा लेना पड़ता हैं । इस प्रकार चिकित्सकों को 
तीव्र व्याधियों में संशामकोपचार ही यश देते हैं, रोग का निमुं डन करने के लिए 
संशोधक चिकित्सा का महत्त्व तो हैं ही । 


संशमन के भेद-- 

पाचन, दौीपन, छ्ष॒धानिग्रह, तृषानिग्रह, व्यायाम, आतप-सेवन तथा वायु का सेवन--- 
शमन के यह ७ अंग होते हैं । पाचन-दीपन आदि सभी संशामक कर्म लंघन के अंग हें, 
किन्तु सबत्र सभी का उपयोग नहीं किया जाता। व्यायाम तथा वातातप-सेचन 
ऊरुस्तम्भ या तत्सव्श दूसरी व्याधिया में हिंतकर होगा, किन्तु आमज्वरों में पाचन 
दीपन क्षुधा-तृषानिग्रह से ही लाभ होगा--व्यायामादिक से हानि होगी । 

पाचन---आमाशय में स्थित आम दोष तथा रोगोत्पादक दोष का निविषीकरण 
पाचन है । पाचन के प्रभाव से दोष की उगद्मता का शमन होता है तथा शोधन साध्य 
रूप में उसका अवस्थान्तर हो जाता हैं। अल्पमात्रा में उष्णोदक बार-बार पीते रहने 
से पाचन में बहुत सहायता मिलती है। अनशन भी पाचन का ही एक अंग है । 
उष्णोदक पान तथा अनशन से पित्त की वृद्धि होकर आमांश का पाचन होता है और 
स्वेदगप्रशत्ति तथा मल-मूत्र का शोधन होकर दोषों का बिलयन तथा निहरण भी कुछ 
मात्रा में हो जाता हैे। पाचन किया का अ्रमुख केन्द्र पक्काशय होता है। विशिष्ट 
व्याधियों तथा दोषों के पाचन में सहायता देने चाली ओषधियों का उल्लेख यथास्थल 
किया जायगा । 


दीपन--अमे को प्रदीध्त करने वाले उपक्रमों को दीपन कहते हैं| जाठरामि के 
बढ़ जाने से सथित आमांश का पाचन-तथा नूतन आमांश का निरोध हो जाने पर 
व्याथि एवं दोषों का स्वतः शमन होने लगता है। दीपन ओषधियों का कार्यक्षेत्र मुख्य- 
तया आमाशय होता है । 

कुधा-तृषा-निग्रह--जाटरामि को मनन्‍्दता के कारण अनशन की आवश्यकता कां 
उल्लेख किया जा चुका है। अधिक जल पीने से भी आमाशयस्थ पिंत्त की तरलता 
बढ़कर कायशक्ति का हास होता है । अतः तृष्णा के शमन के लिए शीतल जल का 
सेवन न करना चाहिए । कदुष्ण जल थोड़ी-थोड़ी मात्रा 'में लेते रहने पर यद्यपि तष्णा 
का शमन नहीं होता किन्तु दीपन-पाचन में सहायता मिलती है । 





चिकित्सा के सिद्धान्त 


१७५ 

व्यायाम--अमेह, मेदोग्द्धि एवं अतिन्लिग्यवता आदि विकारों में शाखाओं तथा 
हे सन्ध्यास्थयाों आदि गम्भीर अंगों में आमांश एवं दोष का सवय होने के कारण 
कंवल दोपन-पाचन क्षुधा-तृषानिश्रह से लाम नहीं होता । जीर्ण आमांझ वाल रोगों 
में रोगी की सहाय मर्यादा के अनुकूल व्यायाम की योजना करनी चाहिए । आमचात 
एवं पुराण आमातिसार के रोगियों में व्यायाम से बहुत लाभ होता है। व्यायाम रा 
स्वसू्प तथा मात्रा आदि का निर्धारण रोग की श्रकृति तथा व्याधित की सामध्य के 
अनुपात में नियत किया जाना चाहिए । 

वातातप सेवन--खुली वायु तथा आतप का सेवन शरीर में सब्चित आम श का 
द्रावण करने में सहायक होता है। रस-रक्त-मांस-मेदादि का पर्ण परिपक्त शद्ध 
( >&प"७४९१ ) रूप वातातप सेवन से उत्पन्न होता हैं। भेदोव्द्धि, प्रमेह एवं 
अप्रिमांद्यादि विकारों में इस लाघवकारक उपक्रम से विशेष राम होता है । 

यहाँ पर संशमन चिकित्सा के मूल सिद्धान्तों का आधार बताया गया है। 
व्यवहार में शमनाथं औषध-अयोग करते समय इनका ध्यान रखना चाहिए। आगे 
शोधन-चिकित्सा का व्यावहारिक रूप स्पष्ट किया जा रहा हैं । 











शोधन-चिकित्सा 

इसके पूच रोगों में संशमन-चिकरित्सा की उपयोगिता का निर्देश क्रिया जा चुका है । 
शरीर में दोषों का अधिक सच्चयय होने पर पाचन या संशामक चिकित्सा के प्रयोग से 
दोषों की पूर्ण शान्ति और रोग का समूलोन्मूलन नहीं होता है । लंघन-पाचन के 
द्वारा शान्त हुये दोष निमेल न होने के कारण मिथ्याह्ार-विहारजन्य अनुकूल परिस्थिति 
आने पर पुनः रोगोत्पत्ति कर सकते हैं । किन्तु संशोधन-व्यवस्था के द्वारा दोषों का पूर्ण 
निहरण हो जाने पर व्याधि के पुनरुद्धव की सम्भावना नहीं रहती हैं। यहाँ पर संशोधन 
चिकित्सा का प्रयोग-क्रम स्पष्ट किया जायगा । 

वमन, विरेचन. और वस्ति को मुख्य संशोधन तथा रक्तावसेंचन, नस्य, धूम्रपान, 
शिरोविरेचन आदि को गौण कम माना जाता है | स्नेहन और स्वेदन शोधन चिकित्सा 
में अनिचाय प्वक्रम हैं । बिना इनके पयोग के संशोधन चिकित्सा के द्वारा पूर्ण छाभ 
नहीं होता । स्नेहन-स्वेदन का विना प्रयोग किये संशोधन करने पर शरीर की घातओं 
का क्षय होकर उपचार की व्यथता हो जाती है । जिस प्रकार किसी लकडी को इच्छित 
रूप देने के लिये स्नेहम-स्वेदन के द्वारा मुखायम कर मोड़ना होता है, अथवा किसी 
ओऔषध का विष निकालते समय स्व्रेदन अनिवाये होता है, उसी अकार शरीर के दोष 
को निकालने के लिये स्नेहन-स्वेदन अपेक्षित हें । 
द ः स्नेहन 

सस्‍्नेहन द्वब्य--शात्त्रों में. स्‍्नेहन के लिये स्थावर-जंगम भेद से घृत, वसा, मजा 
और तेल के श्रयोग का विधान है। किन्तु व्यवहार में औषदसिद्ध छ॒तों का प्रयोग 











१७ दै कायचिकित्सा 


सस्‍्नेहन कार्य के लिये सर्वाधिक होता है । कुछ वातप्रधान व्याधियोँ में तेल का प्रयोग 
भी किया जाता है। घूृतों में गोच्चत, तेलों में तितल और ल्िग्ध विरेचन के ल्थि 
एरण्डतेल उत्तम माना जाता है। गोघृत में अनेक गुणों के साथ संस्कारानु वर्तन एक 
हत््व का गुण है अर्थात्‌ जिन द्वव्यों का संस्कार घी के साथ किया जाय उन सबका 
गुण उसमें आ जायगा | घ्ृत अपने स्नेह गुण से वायु को, माधुय और शेत्य से पित्त को 
तथा कफप्त औषधों से संस्कारित होने पर श्लेष्मा का संशमन करता है। रस, शुक्र 
और ओज के लिप पोषक होने के कारण घृत वृष्य माना जाता है। तेल वातशामक, 
कफवर्घधक, बलकारक, त्वचा के लिये उपयोगी तथा शरीर को दृढ़ बनाने वाला है ।* 
किसी अज्ज में गहराई तक पहुँचने के लिये स्नेहन का माग सर्वोत्तम माध्यम होता 
है। घृत में अपने गुण के साथ ही संस्कारक ओषधियों के गुण .पूण रूप में विद्यमान 
रहते हैं, जो शरीर के सूच्मातिसूक्ष्म अवयवों में छत के साथ व्याप्त हो जाते हें । 
संस्कारक द्रव्यों के मोलिक गुणों को स्वाभाविक रूप में संवाहिंत करने के कारण घुत का 
स्नेहपान के रूप में अमुख उपयोग होता है । चित्रक, शुण्ठी इत्यादि उष्ण-रूक्ष गुण विशिष्ट 
द्रव्यों के साथ संस्कारित होने पर भी छत अपने शेत्य-ख्निग्धता इत्यादि गुणों से 
संयोजित द्रव्यों के उष्ण-रुक्षादि गुणों को न तो नष्ट करता है और न अपने ही ग्ुर्णों को 
छोड़ता हैं । इसीलिये विरुद्ध रस-गुण-वीयादि की विविध ओषधियों का गरुणाधान अपने 
स्वाभाविक रूप में घछृतयोगों में सुरक्षित रहता है जो शरीर की प्रत्येक फोषा में--निगूढ़ 
अज्ञों में--ल्लेहन के माध्यम से पहुँच कर सश्वित दोषों के निर्लेखन ओर शोधन में उपकारक 
होता है । तैलों में संस्कारानुवर्तित्व गुण घृत की तुलना में न्यून होने के कारण ओषधियों 
के माध्यम रूप में वह कम प्रयुक्त होता है ।.. द 
सस्‍्नेहन की उपयोगिता--जीण व्याधियों में शरीर की प्रत्येक कोषा में विकारकारक 
दोषों का सश्चय होता है। इन पर किसी भी औषध का व्यापक रूप में प्रत्यक्ष प्रभाव 
नहीं हो पाता । गम्भीर अज्जों में अत्यन्त सूकच्म खोतसों के भीतर हृढ़ता के साथ 
चिपककर बेठे हुये इन दूषित मर्लों एवं दोषों या विषों को निकालने के पहले झूदु करना, 
जिंससे क्लित्त होकर दोष उस स्थान से सुविधापूचक निकल सकें, यही स्नेहन का मुख्य 
उपयोग है । किसी यन्त्र में सच्चित हुये मलांश को निकालने के लिये स्नेहन प्रयोग के द्वारा' 
पहले उसे मदु कर लिया जाता है तभी शोधन द्व॒व्यों के प्रयोग से सच्चित मल यन्त्र के 
भीतरी भागों से बाहर निकल सकता है (* इसीलिये अत्येक शोधन कम के पूव स्नेहन 


१. 'रुक्षक्षतविषात्तोनां वातपित्तविकारिणाम्‌ । हीनमेधास्मृतीनाशञ्व सफिष्पानं प्रशस्यते ॥ 
कृमिकोष्ठानिलाविष्टाः प्रवृद्धौफमेैदसः । पिवेयुः तेलसात्म्याश्र तैले दा्याथिनश्र ये ॥? 
क्‍ ( यो० र० स० ) 
२. ख्रेहक्िन्ना: कोष्ठगा धातुगा वा स्नोतोलीना यें च शाखास्थिसंस्थाः । 
दोषाः स्वेदेस्ते: द्रव्ीकृत्य कोष्ठे. जीताः सम्यक्‌ शुद्धिमिनिर्डियन्ते |” ( चिकित्सातिलक ) 





चिकित्सा के सिद्धान्त १७७ 


सामर्थ्य होती हे । जो द्रव्य जल में घुलनशील न हों, वे स्नेह में विना घुले हुये भी 
ज्लिग्धता के कारण चिपके रहते है, अतः शरीर की गम्भीर धातुओं-सून््म ख्रोतर्सो- 
कोषाओं आदि में अपनी प्रवेश्य सामथ्य तथा दोषों को आत्मसात्‌ या आइत करने की 
शक्ति के कारण स्नेहन शोधन चिकित्सा की पहली सीढ़ी माना जाता हँ । स्नेहन के 
साथ सम्पक्त दोष स्वेदन प्रक्रिया से पिघलकर सूच्ठम खतोतसों से महास्नोत में आ जाते 
हैं, जहाँ से वमन-विरेचन आदि के द्वारा उनका निराकरण सुकर हो जाता है। 

सस्‍्नेहन के अधिकारी--- क्‍ 

घृतप्रयोग--रूक्ष क्षीण शरीर वाले वातपित्त प्रकृति के व्यक्ति, दूषी विषों से 
पीडित, दाह, नेत्ररोग ओर क्षय से पीडित, मन्द स्मृति वाले रोगियों में स्नेहन के 
लिये ध्वत का प्रयोग कराया जाता है । 

तलप्रयोग--कृमिरोग, उदररोग,. कफ-मेदोइद्धिजन्य रोग, वात व्याधि तथा क्रूर 
कोष्ठ और कफप्रकृति वाले रोगियों में स्नेहन के लिये तिलतेल का प्रयोग करना 
चाहिये | व्यायाम, मद्य, ग्राम्यधर्म इत्यादिं के अतियोग से रूक्षता उत्पन्न होकर जिन 
रोगियों में वायु की वृद्धि हो गई हो, उनमें शोधन के पूर्व पर्याप्त समय तक स्नेहपान 
कराना चाहिये । 


बसा प्रयोग--व्यायामकर्षित एवं शुष्क शरीर के व्यक्तियों में, अत्यधिक शुक्र- 
क्षय होने पर, वातविंकार से पीड़ित तीत्राभि वाले रोगियों में स्नेहन के लिये बसा के 
प्रयोग का विधान है। इससे अभिघात, अस्थिभम्त, विद्वत्वण, योनिश्रश, कर्ण तथा 
नेत्ररोगों में विशेष लाभ होता हैं । 

मज्या प्रयोग--क़्रकोष्ठ के दीप्ताग्नि एवं क्लेशक्षम रोगियों में वातविकार होने 
पर मज्ापान कराया जाता है । 

स्‍्नेहन से अस्थियों की सबलता, शुकर-श्लेष्मा-मेद और मन्जां की पुष्टि होती है। नस्य, 
अभ्यज्ञ, गण्डष, मूर्धा-कण-अक्षि तपंण के लिये स्नेहन के रूप में केवल छत या तेल का 
ही प्रयोग दोष बलाबल को दृष्टि में रखते हुये किया जाता है । 


प्रयोगविधि-- संशोधन, संशमन ओर इंहण के भेद से ल्लहन तीन प्रकार का होता 

हैं। शोधन कार्य के लिये ल्लह का प्रयोग उत्तम मात्रा में रात्रि का भोजन जीण हो जाने 

पर प्रातःकाल कराना चाहिए । संशमन के लिये मध्यम मात्रा में क्षधा लगने पर 
मध्याह के समय ज्लहन का प्रयोग करने से अभि की तीव्रता के कारण वह सारे शरीर 

में फुंडकर कुपित दोषों का शमन करता है । यदि आहारपरिपाक और रसनिंमाण 

के बाद पित्त के मंद हो जाने पर स्रहपान कराया जायगा तो खोतसा में शंष्मा का 
सन्नय होने के कारण ल्ेह का अवरोध हो जायगा, सारे शरीर में उसका प्रसार न 

!2 हो सकने से संशमन सम्भव न होगा । बूृंहण कार्य के लिये ज़ेहपान की अपेक्षा होने 


१७८ कायचिकित्सा 


पर घृत का प्रयोग मांसरस, मद्य तथा चावल के माँड या भात के साथ लघु मात्रा 
में पर्याप्त समय तक कराना चाहिये ! 


सात्रानिदेश--मात्रा की दृष्टि से उत्तम मात्रा « तोछा तक, मध्यम मात्रा ६ तोला 
ओर हौन मात्रा ४ तोला की होती है । इसी प्रकार लेह की जो मात्रा दिन-रात यानी 
२४ घण्टे में जीण हो वह उत्तम, बारह घण्टे में जीण हो सकने वाली मध्यम ओर 
६ घण्टे में जीण होने वाली मात्रा हीन मानी जाती हैं। गुण की दृष्टि से हीन मात्रा 
जाठरामि को प्रदीप्त करने वाली, मध्यम मात्रा वृष्य और बृहण तथा उत्तम मात्रा दोष 
शामक मानी जाती हैं। उत्तम मात्रा में ल्लेह का प्रयोग ग्लानि, मूच्छों, मदात्यय की शान्ति 
के लिये और मध्य मात्रा का अयोग उनन्‍्माद, अपस्मार, कुष्ठट और विष रोग का शोधन 
करने के लिये किया जाता हैं। वास्तव में ल्लेह की मात्रा का निणय रोगी कौ सहन 
शक्ति, जाठराप्मि की स्थिति ओर संशमन, बृंहण या शोधन उद्देश्य के आधार पर किया 
जाता हैं। प्रथम दिन हीन मात्रा से आरम्भ कर क्रम से मध्य-उन्तम मात्रा का व्यवहार 
करने से उत्तरोत्तर अनुकूलता होती हैं । सामान्यतया ३ से ७ दिन तक ख्लेहपान का 
विधान हैं । यदि सात दिन तक पूर्ण त्नेहन के लक्षण व्यक्त न हो जाँय तो एक दो दिन 
अधिक भी ज्लेहन कराया जा सकता हैं। शौतकाल में ल्लेहन का अयोग दिन में तथा 
उष्णकाल में रात्रि में करने से उसका परिपाक अच्छा होता है। इसी प्रकार वात-कफ 
प्रधान रोगों में दिन में तथा वात-पित्तप्रधान रोगों में रात्रि में ल्ेहपान विशेष उपकारक 
होता है। शरीर की ल्लिंग्धता एवं पृष्ता के उद्देश्य से घृतपान तथा शरीर की दढ़ता 
एवं बल बृद्धि के लिए तेलपान उपयोगी होता. है। 

पत्तिक व्याधि एवं पित्तल व्यक्ति में शुद्ध गोष्चत का तथा वात विकार एवं वातल 
व्यक्ति में गोघ्चत के साथ सेंघा नमक मिलाकर तथा कफ प्रकृति एवं कफप्रधान रोग 
में त्रिकुद्ठ ओर यवक्षार मिलाकर घृतपान कराना चाहिये । 

सस्‍्नेहपान का समय--हेमन्त शिशिर में ल्लेंह का प्रयोग दिन में, ग्रीप्म में सायकाल, 
वात-पित्ताधिक्य होनें पर रात्रि में, वात-कफ के आधिक्य में प्रातःकाल, वात-पित्तप्रधान 
व्यक्तियों को शीत ऋतु में ओर वात-कफप्रधान व्यक्तियों को ग्रीष्म ऋतु में लेहपान 
करान्य चाहिये । आढंट ऋतु में ल्लेहन के लिए तेल, शरद्‌ में घत ओर वसन्‍्त ऋतु में 
वसा तथा मज्जा के अयोग का विधान है । 


सहपांन तथा अनुपान--घ्रत को उष्णोंदक के साथ और तेल को यूष के साथ 
पिंलाना चाहियें । पत्तिक रोगों में केवल गोछृत को गुनगुने पानी में मिलाकर, वातिक 
रोगों में २ माशा से ८ माशा तक पिसा हुआ सेंधानमक. घी में मिलाकर तथा कफज 
रोगों में शुण्ठी, मिचे, पिंप्पलो का चू्ण ६ माशा तथा यवक्षार १-३ माशा मिंछाकर 
पिलाना चाहिए | ऊपर से अनुपान के रूप में उष्णोदक देना चाहिए | वसा एवं मज्जा 


का खेहन के लिए अयोग करने पर अनुपान रूप में साठी चावल का मंड पिलाया 


चिकित्सा के सिद्धान्त १७५९ 


जाता है। सामान्यतया सभी ल्लेहों को उष्णोदक के साथ पिलाया जा सकता हे । 
बीच-बीच में भी रुचि होने से अल्प मात्रा में उष्णोदक पीना चाहिये | ख्लेह का पाचन 
होते समय तृष्णा, दाह, भ्रम, अरुचि, वेचेनी और आल्स्य उत्पन्न होता हैं। इनसे 
चिन्तित होने का कोई कारण नहीं, ल्लेहपाचन हो जाने के उपरान्त इनकी स्वत+ 
शान्ति हो जाती है । उष्णोदकपान से शुद्ध उद्ार प्रवतित होने पर ल्लेह के परिपाचन 
का निणय कर गुनगुने जल से स्लान कराकर रुचि के अनुकूल चावलों की यवागू 
पिंछानी चाहिये। वृद्ध, बालक, कर्शित, कोमल ग्रकृति वाले व्यक्तियों तथा ग्रीष्म 
ऋतु में, तृष्णा से अत्यधिक पीड़ित रहने वाले रोगियों को भात में मिला कर बल्लरहपान 
कराना चाहिये । अथवा इस ग्रकार का स्नेह मिला भात भो रुचिकर न होने पर दूध 
में घी-मिश्री को भली प्रकार मिलाकर पिलाने से भी सद्रः स्नेहन होता है। श्वास तथा 
श्वसनयन्त्र की जीण व्याधियों से पीड़ित तथा शरीर में श्लेष्मा का अतिमात्र सच्चय होने 
पर स्नेह का प्रयोग अत्यल्प मात्रा में १ तोला घी में ११ दाना काली मिच मिलाकर 
अधिक समय तक ( ४० दिन ) पिलाना चाहिये | इससे दूषित कफ का वलेदन-शोधन 
होकरं पाचन शक्ति तथा शरीर के बल की वृद्धि होती हैं । 

सम्यक स्नेहन के गुण--शरीर कोमल, हलका, पृष्ठ ओर ख्िग्ध तथा मुख ग्रिय- 
दशन हो जाता है। मल की ख्िग्वता ओर झढुता, आर्न की दीप्ति, वायु का अनुलोमन 
तथा स्नेहपान की अनिच्छा होने पर स्नेहन का अयोग पूरा समझकर बन्द कर 


देना चाहिये । 

अतिस्नेहन के लक्षण--भत्तद्वेंष, लालाखाव, बेचनी, अ्रवाहिंका, गुदा में दाह और 
शरीर में आलस्य आदि लक्षण पेदा होते हैं । ऐसी स्थिति में वमन कराने के पश्चात्‌ लघु 
कोष्ठ हो जाने पर पुनः स्वेदन या संशोधन क्रम प्रारम्भ करना चाहिये, यदि अति स्नेहन 
के कारण स्वेदनादि का अयोग करने में असुविधा हो तो चना, जो, बाजरा आदि रुक्ष 
अन्न तथा व्यायाम, जागरण आदि रूक्ष विहार की व्यवस्था करने के अनन्तर स्वेदन- 
शोधन का आरम्भ किया जा सकता हैं 

हीन स्नेहन के लक्षण--हीन मात्रा में अपर्याप्त स्‍्नेहपान होने पर मर की शुध्कता, 
भमलोत्सजन और आहार पाचन में कष्ट का अनुभव, वायु का अतिलोमन, हृद्दाह, हीन 
कान्ति और शरीर की अशक्ति के लक्षण पंदा हो जायेँगे । 

स्नेहन प्रतिषेध--कफ एवं मेदाधिक्य के रोग, ऊरुस्तम्भ, अतिसार, अजीणे, उदरं, 

तरुण ज्वर, श्रमेह, मूच्छा, अति क्षीण रोगी, चिरेचन एवं वस्तिश्रयोग के उपरान्त, 

तृष्णा-वमन एवं क्ृत्रिंम विष से पीड़ित व्यक्ति को स्नेहपान नहा कराना चाहिय । 

सस्‍्नेहपान करने वाले व्यक्तियाँ को व्यायाम, शीतल प्रयोग,वेगविधारण, दिवाशयन, 
रात्रे जागरण, रूक्ष और गुरु द्रव्यां का त्याग करना चाहिय । 

साम पित्तदोष या केवल पित्त में छृतपान दोब का संशोधन नहीं कदर सकता, किन्तु 


१८० कायचिकिस्सा 


संशमन के लिए सभी पत्तिक रोगों में केवछ शत का प्रयोग किया जा सकता है। 
शोधन के उद्देश्य से स्‍्नेहपान कराना हो तो पित्तप्न एवं संशोधक द्वव्यों से संस्कारित 
घृत का ही प्रयोग कराना चाहिए । अन्यथा केवल घृत का अयोग कराने पर पित्ताशय 
में सच्चित पित्त घ्त के साथ मिलकर सारे शरीर में व्याप्त होकर कामला की उत्पत्ति 
भी कर सकता है। आज भो पित्ताशयशोथ आदि विकृतियों में घछृतप्रयोग निषिद्ध 
माना जाता है, किन्तु संस्कारित होने पर यह दोष नहीं होता । 


स्नेहपान के नियमी का पालन न करने से, जिस स्नेहन का प्रयोग जिस ऋतु, 
कालऊ-दोष में निदिष्ट है, उसमें न करने से, रोगी के बलाबल कोषप्ठ तथा सहन शक्ति 
हिताहिंत आदि का बिना विचार किए अधिक या अल्प मात्रा में सेवन करने था 
उचित समय से कम या अधिक काल तक स्नेहग्रयोग करने से अनेक उपद्रव 
उत्पन्न होते हैं । 

स्नेह का विधिपू्वेक सेवन न करने से तन्द्रा, उत्क्रेश, आनाह, ज्वर, स्तब्धता, 
मूच्छा, कुछ-कण्डु आदि त्वचा के रोग, पाण्डुता, शोथ, अशे, अरुचि, तृष्णा, उद्ररोग, 
संग्रहणी-अलसक-विंस॒चिका, शूल एवं मूकता आदि विकार उत्पन्न हो सकते हैं । 

इन उपद्रवों की सम्भावना होने पर वमन कराकर स्नेंहन का शोधन कराना, 
यदि स्नेहपान के बाद अधिक समग्र बीत गया हो तो स्वेदन तथा झदु विरेचक द्रब्यों 
के द्वारा स्‍्नेहपान. के रे दिन बाद विरेचन कराना चाहिए | रूक्ष अज्ञनगान तथा 
तक्रारिष्ट का प्रयोग भी इन उपद्रवों की शान्ति करता है । सुकुमार, 'कृश, इड्ध, शिशु 
एवं घृतपान में अरुचि वाले व्यक्तियों में स्नेहन कराने के लिए युक्तिपूवक विचारणा 
करनी चाहिए । ऐसे रोगियों को स्‍्नेहन अयोग रुचिकारक बनाकर ही करना चाहिए, 
अन्यथा वमनादि होकर अनुकूलता नहीं होती । 

'शकरा तथा घृत मिलाकर इडुहने के पात्र में रखकर दूध दुहना चाहिए | दूध की 
धार से शकरा तथा चृत सारे दूध में मिल जायगा, इसे धारोष्ण ही पीने से बहुत 
थोड़े दिनों में ही स्नेहन हो जाता हैं। भोजन के पूच तिल-राब तथा घी मिलाकर 
तिलकूट बनाकर खाने से भी शीघ्र स्नेहन हो जाता है । लवण के साथ स्नेह का प्रयोग 
करने से उसका शीघ्र पाचन तथा सारे शरीर में प्रसार होकर अति शीघ्र स्नेहन होता 
है, अतः सस्‍्नेहन में लवण का उचित अयोग करना चाहिए" । 

सामान्यतया स्नेहाथ थ्युक्त होने वाले द्रव्यों का उल्लेख यहाँ किया गया हैं। 
वातशामक ओषधियों से संस्कारित घत, साधारण घृत की अपेक्षा अधिक लाभकारी होता 
है। उसी प्रकार पित्त एवं कफ के लिये भी योजना की जा सकती है। स्नेहपान रुचिकारक 
तथा मनोनुकूल हो, इसके लिए इलायची-केशर-कालीमिंच-नमक आदि का प्रयोग 
ययथावश्यक किया ज़ा सकता है। जिन रोगों में स्‍्नेहन की उपयोगिता होती है, उनके 


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१. ल्ब्रणोपहिताः खेहाः खेहयन्त्यचिरान्नरम्‌? ( यो० र० स॒० ) 





चिकित्सा के सिद्धान्त ९८१ 


प्रकरण में छत तथा तेल के बहुत से योग शाज्रों में वर्णित हैं, स्नेहनाथ उनका व्यवहार 
अधिक गुणकारी होता है । 

स्नेहनकाल के कत्तंव्य - पान, स्नान, हस्त-पादप्रक्षाऊन आदि सभी कार्यों में केवल 
कदुष्ण जल का ग्रयोग करे। ब्रह्मचय का पूर्ण परिपालन करते हुए केवल रात्रि में सोना 
चाहिये । दिन में न सोना चाहिये। मल-मूत्रादि के वेगों को थोड़े काल के लिये भी न 
रोके । व्यायाम, कोघ, शोक, शीत तथा धूप से बचाव रखे । पेदल या सवारी से यात्रा, 
वायु का सेवन, अधिक बोलना, देर तक बेठे या खड़े रहना, सिर को अधिक काल तक 
: ऊँचे या नीचे रखना आदि का त्याग करते हुए धूम तथा धूल के सम्पक से बचाव रखना 
चाहिये | जिंतने दिन सस्‍्नेहपान कराया गया है कम से कम उतने दिन तक इन नियमों का 
अवश्य पालन करे । 

स्वेद्न 

स्‍्नेहंन प्रक्रिया के उपरान्त शरीर के आम्यन्तर ओर बाह्य दोनों भागों से स्लिंग्ध 
हो जाने पर स्वेदन कराना चाहिये । 

जिस क्रिया से शरीर के अन्दर गर्मी पहुँचा कर भ्रस्वेद के द्वारा आभ्यन्तरिक 
दोषों का प्रविकायन एवं शोधन किया जाय वह किया स्वेदन कहलाती है । स्नेहन 
प्रक्रिया से क्लिन्न हुये दोष स्वेदन द्वारा द्रवित होने पर दूषित स्थानों से भ्रथक होकर दोष 
के प्रधान अधिष्ठानों में सच्चित हो जाते हैं, जहाँ से वमन-विरेचन-अनुवासन के द्वारा 
सुखपूवक निकाले जा सकते हें । क्‍ 

स्वेदन के भेद---अग्नि की ऊष्मा के द्वारा तथा बिना अम्रि, की सहायता से वस्रो 
आदि से शरीर को ढककर भी स्वेदन किया जाता है । इस प्रकार इसके अमिस्वेद ओर 
अनभिस्वेद दो भेद होते हैं । वात अक्ृति वाले को झ्लिग्य, कफ प्रकृति वाले को रूक्ष 
तथा वातपित्त प्रकृति वाले को रूक्ष-ह्लिग्धमिश्रित स्वेदन कराया जाता है। यदि 
वातस्थान में कफ का संघ्यय हो या कफस्थान में वायु का अर्थात्‌ श्लेष्मा के स्थान 
आमाशय में वायु का सश्चय. हो या वातस्थान पक्काशय में श्लेष्मा का सश्य हो 
तो स्थानस्थ दोष के अनुरूप शोधन पहले करके तब सश्चित दोष का शोधन करना 
चाहिये । आमाशयगत वात में पहले रुक्ष स्वेदन करके स्थानीय दोष श्लेष्मा का 
विलयन हो जाने पर वायु की शान्ति के लिये ख्रिंग्ध स्वेदन का प्रयोग किया जायगा । 

अप्निस्वेदून---इसके ४ भेद हैं। तापस्वेद, ऊध्मस्वेद, उपनाहस्वेद और द्वचस्वेद ' 

तापस्वेद--हाथ, कांस्य-पात्र अथवा किसी धातु का पात्र, मिट्टी के बरतन का 
डुकड़ा, इंट, उत्तप्त बालुका या निधूम खदिराज्ञार से शरीर को सेकते हुए उत्ताप 
देना तापस्वेद कहलाता है । इसमें रोगी का शरीर उत्तप्त वस्तु-धातु-मिट्टी आदि के 
निंकट रहता है, जिससे विकिरण प्रक्रिया से निकटस्थ द्र॒ब्यों का ताप शरीर में 
स्वेदोत्पत्ति करता है। क्‍ ््ि 

ऊष्मस्वेद्‌--इंट, पत्थर, खपर, लोहपिण्ड इत्यादि को अग्नि में खूब उत्तप्त कर 


१८२ कायचिकित्सा 


अम्लद्गव, गोमूत्र या जल के छींटे डालकर अथवा इन द्वव्यों में बुझाकर या गीले कपड़ों 
में लपेट कर इनकी उत्तप्त वाप्प से शरीर का जो स्वेदन किया जाता है, वह ऊष्मस्वेद 
कहलाता है । शरीर को कम्बल से ढककर, नीचे गरम कड़ाही में कॉँजी, मांसरस या 
वातहर द्रव्यों का क्राथ भरकर उसकी वाष्प से शरीर को स्वेदित करने से भी प्रस्वेद 
होता है। ऊध्मस्वेद के शंकर-प्रस्तर-अश्मघन-नाडी-कुम्भी-जेन्ताक-कृप-कुटी-कष-होलाक 
ओर भूस्वेद आदि भेद होते हें । 


चरकसहिंता में ऊधष्मस्वेद् के उक्त ११ प्रकार बताए गए हैं। कोमल प्रकृति के 
व्यक्तियों के लिए कुटीस्वेद उत्तम हैं । चारों तरफ से बन्द कमरे में आग जलाकर तप्त हो 
जाने पर निधूम अम्ि को साफ करके या कमरे में ही रखकर रोगी को उसमें कुछ समय 
तक रखते हैं, इससे उसके सारे शरीर का स्वेदन हो जाता है । इसी प्रकार की अनेक 
कल्पनायें ऊष्मस्वेद की हैं, यहाँ पर उनका संक्षिप्त निदेश किया जाता है। 


१. शंकर स्वेद--तिल, उड़द, कुलथी, भात आदि को मांसरस एवं कांजी में भली 
प्रकार सिद्ध करके पिण्ड सा बना लेना चाहिये। विशिष्ट व्याधि-दोषहर ओषधियों का 
काथ बनाकर या पकाते समय ओषधियोाँ चूण करके पिंण्ड स्वेद के द्॒व्यों में मिंलाकर 
प्रयुक्त क्रिया जा सकता है । उस पिण्ड को वस्त्र में लपेट कर अथवा बिना लपेटे हुए 
ही उसकी ऊष्मा से रुणण स्थान का स्वेदन करना चाहिए.। यह छिग्ध स्वेदन हैं, इसका 
प्रयोग वातप्रधान विकारों में किया जाता हैं। बालू, मिट्टी, राख, भूसी, गोबर आदि 
रूक्ष द्रव्यों को कांजी में उबालकर पोट्टली में बॉँधकर अथवा इट-पत्थर का टुकड़ा, कच्ची 
मिट्टी का ढोका, लोहे का गोला आदि को अंगारों पर उत्तप्त करके, चिमटे से पकड कर 
बाहर निकालने के बाद कांजी, अम्लद्गव, गोमूत्र या व्याधिहर क्वाथ में बुझाकर गीले 
ऊनी या जूट के व्र से लपेट कर कफ-मेदः प्रधान वेदनायुक्त अंग का स्त्रेदन करना 
चाहिए । यह रुक्ष गुण वाला शंकरस्त्रेद हैं। शंकरस्त्रेद को पिण्डस्वेद भी कहते हैं । 

२. प्रस्तर या ससस्‍्तर स्वेद--सन के बीज, उड़द, कुलथी, जो, चावल, तिल आदि 
द्ृव्यों को कांजी आदि. अम्ल द्रव्यों के साथ मिलाकर हांडी में पकाकर भली प्रकार सिद्ध 
कर लेना चाहिए । निर्वात स्थान में तखत या चारपाई पर पतला पुआल या चटाई 
बिंछाकर, ऊपर से उबाले हुए द्वव्य २ अंगुल मोटाई में रोगी की लम्बाई-चोडाई के 
अनुरूप परिमाण में फेला देना चाहिए। इसके ऊपर एरण्ड के पत्तेया ऊनी चच््र 
विंछाकर रोगी को ब्लिग्ध तेंलादि का मदन करने के बाद लिटा देना तथा ऊपर से मोटा 
कम्बल अच्छी तरह से ओढ़ा देना चाहिए । इससे मेदोब्रद्धिजन्य ग्रंथियाँ आदि चात- 
श्लष्मिक व्याधियाँ ठीक हो जाती हैं । 

३. नाडी स्वेद--रोगी को बिस्तर-रहिंत चारपाई पर लिटाकर या कुर्सी पर 
बंठाकर ऊपर से गल पयन्त मोटे कम्बल से ढक देना चाहिए। कम्बल खाट या कर्सी 
के नाच भूस तक लटकता हुआ होना चाहिंए। नाडीयंत्र में ओषधियों का क्वाथ, 





चिकिस्सा के सिद्धान्त १८ हे 


कांजी, दूध, गोमूत्र, मांसरस आदिं स्वेब्द्रव्य डालकर अँगीठी पर गरम करना चाहिए । 
नाडी के द्वारा वाष्प कम्बल के नीचे रोगी के सारे शरीर में पहुँचाना चाहिए। यह 
नाडीस्वेद है । 

४. जेन्ताक स्वेद---जलाशय के निकट कूटागार ( गर्भगृद् ) के भीतर दीवाल 
में चारों ओर तल से कुछ ऊंचे भित्ति बना देना चाहिए | कूंटागार के बीच में तन्दूर 
के समान अनेक छिद्र युक्त भट्ठी बनानी चाहिए। उस भटडी में खद्रि-पछास को 
लकड़ी को जलाकर नि्धुम अंगार रहने पर लिग्ध दृढ़ एवं सहनशील रोगी को गभंगृह में 
प्रवेश कराकर स्वेदन कराना चाहिए । यह भी एक अकार से कुटीस्वेद का ही रूप है । 

५, अश्मधन स्वेद--रोगी की लम्बाई-चोडाई के अनुरूप एक पत्थर को शिला 
पर वातनाशक खदिर, देवदारु, निंग्ण्े आदि को जलाकर, पत्थर के उत्तप्त हो 
जाने पर राख तथा अंगारे आदि साफ कर देने चाहिए। गरम पानी या वातन्न 
दब्यों के क्राथ को शिला पर अच्छी तरह छिड़क कर कम्बल बिछा देना चाहिए । 

सैल-लिग्ध रोगी को उस पर लिटाकर ऊपर से मोटी चददर या कम्बल से ढक दैना 
चाहिए । इससे सुख पूर्वक स्त्रेदन हो जाता है। 

६. भूस्वेद--अश्मघन के समान हो निर्वात स्थान की समतऊ भूमि पर अमि 
जलाकर ' पूर्वोक्त क्रम से स्वेदन किया जाता हैं। इसमें पाषाणशिला न होंगी, शेष 
पूचवत है। पत्थर शीघ्र उष्ण तथा शीघ्र ही शीत हो जाता है, भूमिं बहुत अधिक 
उत्तप्त न होगी किन्तु पर्याप्त समय तक गरम बनी रहेगी । 

७. कर्षूं स्वेद--रोगी की शय्या के नीचे निर्वातस्थल में एंक गड्ढ़ा डुदवां कर, 
उसमें निर्धूम अंगारे भर देने चाहिये | गड्ढे को चौड़ाई भीतर अधिक किन्तु ऊपर की 
तरफ कम ( चौडे मुँह के घड़े के समान ) होगी। शय्या पर एराउपत्र बिंछाकर 
लिग्ध शरीर वाले रोगी को लिंटा कर ऊपर से कम्बल से ढक देना चाहिए । 

«, कुटी स्वेद--रोगी की लम्बाई-चौडाई-ऊँचादे के अनुरूप मोटी दौवाल की 
गोलाकार कुटी बनानी चाहिए । कुटी में खिड़की, रोशनदान न होने चाहिए । चारों ओर 
वायु निंकलने के लिए सूच्म छिंद्र छत के पास छोड़ देने चाहिए। कुटी के भीतर 
बीच में रोगी की शय्या बिछाकर, कुटी की भीतरी दीवाल में उध्णवीय एवं सुगंधियुक्त 
कूठ आदि द्रव्यों का लेप करलेना चाहिए। शय्या पर मृगचर्म या कम्बल बिछाकर 
चारों ओर निधूम अभि से युक्त अंगीठियाँ रखनी चाहिए । रोगी को शय्या पर लिटाकर 
पूर्चचत्‌ कम्बल आदिं से ढकने की आवश्यकता नहीं | सुखपू्वक रोगी बेठ या लेट 
सकता है। कुटी के चारों ओर दरवांजे रहने पर बाहर से अंगीठी जलाकर या यों 
ही अंगारे रख कर कुटी को तप्त कर देने के बाद, अंगारे हटा कर, गरम पानी छिडिकने 
से भी पर्याप्त उत्तप्त वाष्प पैदा होती है, जिससे कुटी के भीतर लेटा हुआ रोगी भली 
प्रकार स्वेदित हो जाता हैं । इस विधि से भी कुटीस्वेद का विधान हैं । 


१३८४ कायचिकित्सा 


९. कुस्भी स्वेद--वातप्न ओषधियों के क्वाथ से कुम्भी या बड़ी हॉडी को आधा 
भर कर आधा भाग भूमि में गाड देना चाहिए । ऊपर से चारपाई रख कर रोगी की 
बठा या लिटा देना चाहिए । यरम किए हुए लोहे के गोले तथा इंट-मिद्दी-पत्थर के दुकड़ 
धीरे-धीरे कुम्मी में डालने से पर्याप्त ऊष्मा उत्पन्न होती है, जिससे रोगी का सुखपूचक 
स्वेदन हो जाता है । गरम-गरम काथ-मांसरसादि कुम्भी में भर कर, उसके चारा ओर 


बस्र से लपेट कर, सहता-सहता सारे शरीर में कुम्भी कल स्पश कराते हुए स्वेदन करना 
भी कुम्भीस्वेद का ही एक प्रकार हैं । 


१०, कूप स्वेद--चारपाई की लम्बाई-चोडाई के बराबर लम्बा-चोडा तथा हिंगुण 
गहरा अण्डाकृतिक गडढा ( कृप ) खोद कर, हाथी-घोडा-गाय-बेल आदि के शुष्क 
गोबर को उसमें भर कर आग लगा दें। ज्वालारहित तथा निधूम हो जाने पर 
कृप के ऊपर खाट बिछा कर उस पर मोटा कम्बल डार कर रोगी को सुलाकर ऊपर 
सें भी कम्बल से ढंक देना चाहिए । कषृस्वेद में गड्ढे की गहराई कम तथा उसे अंगारों 
से भरने का विधान हैं और इसमें अधिक समय तक सम मात्रा में ऊष्मा पहुँचाने के 
लिए यहरा-चौंडा गत्त तथा उसमें गोबर आदि भरने का निर्देश क्रिया गया हैं। वास्तव 
में दोनो में विशेष अन्तर नहीं । 


११. होलाक स्वेद---चारपाई के अन्दर के प्रमाण के अनुरूप हाथी-घोड़े आदि 
की सूखी लीद चारपाई के नीचे ( बिना चारपाई रकखे हुए केवल अन्दाज से ) रख कर 
जला दें। निधूम एवं ज्वालारहिंत होने के उपरान्त चारपाई उसके ऊपर रख कर 
कम्बल बिछाकर ल्लिग्य रोगी को लिटाकर ऊपर से कम्बल से ढक कर स्वेदन कराने से 
सुखपूचेक स्वेदन होता हें । 

इन विविध ऊध्मस्वेदन के प्रकारों का यहाँ निदेश किया गया है, अधिकांश-- 
कपृ-कुम्भी-कृप-होल्ञक प्रस्तर-भू आंदि प्रकारों में आपस में विशेष अन्तर नहीं हैं । 
रोगी की सहनशक्ति तथा विशेषतया स्वेद्य अंग को ध्यान में रखते हुए, इनमें से किंसी 
का उचित ग्रयोग कियां जा सकता है । 

१२. उपनाह स्वेद--वातनाशक ओषधियों को कॉजी, गोमूत्र आदि में पीस कर 
नमक मिलाकर तेल वा घी में गरम करके पृल्टिस की तरह बनाकर शरीर पर मोटा 
प्रलेप लगाना या किसी विशेष अंग में विकृति होने पर उसे बॉवधना ( कपड़े में रख कर 
या बिना कपड़े में रखे हुए ) उपनाहस्वेद कहलाता हैं। स्वेद के अन्तर्गत वर्णित 
शंकरस्वेद का उपयोग उपनाहस्वेद के रूप में भी किया जा सकता है । 

१३- द्वव स्वेद--द्रव स्वेद २ अकार कां होता है--परिषिेक तथा अचगाह । 

परिषेक--पित्तान॒ुबंधी वातव्याधियों में परिषेक विशेष गुणकारी होता हे। 
सहजन, वरुण, आमड़ा, शिरीष, बाँस, एरण्डपत्र, दशमूल आदि द्॒व्यों का या चिकित्स्य 
व्याधि में वरणित क्राथ को काँजी, सिरका, पानी, दूध आदि किसी द्रव में यथानिर्देश 





चिकित्सा के सिद्धान्त १८६ 


पका करे, छान कर हजारा ( सहखधारा, जिससे माली फूल के पोधे सींचता हैं ) या 
कमण्डल, गेंडुआ आदि में भर कर रोगी को सलिग्धाभ्यक्त करके कम्बल से ढक कर 
परिषेक कराना चाहिए। क्वाथ स्पश में सुखोष्ण होना चाहिए। रोगी यथावश्यक बेठा 
या लेटा हुआ रहेगा । ै 
अवगाह--वातप्न कषाय, तेल, घृत, मांसरस या गरम जल को कटाह या द्रोणी 
( टब पर ) में भर कर अवगाहन कराना चाहिए। कटाह या द्वोणी में दव इतना होना 
चाहिए कि पलथी मार कर सुखासन पर बंठा हुआ रोगी कण्ठ तक ड्बा रहे और 
लेटने पर ग्रीवा के ऊपर का भाग ऊपर निकला रहे अर्थात्‌ नाभि के ऊपर ३-४ 
अंगुल द्रव की मात्रा होनी चाहिए । आजकल ऊणकटित्लान ( जि०४ ४9 ०७४४ ) के 
ढेंग पर भी अवगाहन कराया जा सकता है। तापस्वेद और ऊषप्मस्वेद विशेषतः 


कफनाशक तथा उपनाहस्वेद वॉतनाशक एवं द्रवस्वेद पित्त-कफप्रधान व्याधियों में 
उपयोगी होता हे । 


अ्निस्वेदन के साधारण नियम 


कह ९ ४ 


,१. आशभ्यन्तरिकर ख्नेहन के अतिरिक्त स्वेदन कराने के पूच तेल इत्यादि का मदन 
कर शरीर की बाह्य ल्िग्धता कराना आवश्यक होता हैं । 


२. स्वेदन रोगी की ग्रीवा के नीचे सारे शरीर में जितना सह्य हो उतनी मात्रा में 
कराना चाहिए । क्‍ 

३. रोगी के सिर पर पानी में मिंगो कर निन्नोड़ा हुआ कपड़ा रखना चाहिये । 

४. स्वेदन का स्थान निर्वात, शान्त तथा ऋतु के अनुकूल होना चाहिये । 

५. स्वेदन करने के पूच प्रवर-मध्य-हीन क्रम से रोगी की सहनशक्ति का निणय 
कर स्वेदनकाल का निश्चय कर लेना चाहिये । 

६. ब्रृषण, हृदय और नेत्र पर बहुत भदु स्वेदन होना चाहिये अथवा स्वेदन करते 
समय इन अगा पर कमल की पत्ती या मुलायम कपड़ा रखना चाहिये ! 

७. स्वेदन के समय कोमल प्रकृति वाले रोगियों को वेचेनी होने पर कमलपुष्प 
अथवा मोतियाों की माला पहनानी चाहिये । 

.. ८. स्वेदन के समय मुठायम साफ कपड़े से ग्रस्वेद को बार-बार पोंछना चाहिये । 
स्वेदन समाप्त होने के बाद कुछ समय तक निर्वात स्थान में बेठ कर उष्णोदक से 
हस्त-पाद-नेत्र-प्रक्षाउऊन कर शरीर को वस्त्रों से ढक कर बाहर निकलना चाहिये । 

९, वाष्पस्वेदन के लिये रोगी को मेंज या बेंत की खाट पर, यथावंश्यक एरण्डपत्र 
बिछा कर, लिटा कर ऊपर से मोटे कम्बल से गलूपयल्‍त ढक देना चाहिये, मस्तक 
दूसरे कपडे से ढ का रहेगा । खाट के नीचे कम्बल के भीतर से धीरे-धीरे रोगी सहन 
कर सके, इस तरह वाष्प देना चाहिये। 


१८६ कायचिकित्सा 


१०. एक ही दिन में अधिक मात्रा में स्वेदन न कर, क्रमनद्धि से ३-५ दिन तक 

स्वेदन करना चाहिए । 
अनशिस्वेदन 

म्रढु-सुकुमार-असहनशील व्यक्तियों में, मधुमेह आदि व्याधियों में, श्लेष्मा की 
प्रधानता एवं मेदोवद्रद्धें की स्थिति में शरीर को बिना अभि की सहायता के स्वेदित 
किया जाता हे । नीचे इस प्रकार की क्रियाओं का चणन है--- 

निर्वात स्थान--रोगी को बन्द कमरे में कुछ समय तक बठाने से स्वतः स्वेदन 
होता है ! क्‍ 

वर्खाच्छा दन--मोटा कम्बल या कोई दूसरा भारी वच्नर शरीर के ऊपर डालने से 
भीतर-भीतर अस्वेद हंता है, जिससे संचित श्लेष्मा और मेद का द्वावण-शोधन हो 
जांता है। | 

आतप या धूप स्वेदन-- कुछ समय तक रोगी को धूप में बेठाने से अमिस्वेदन के 
समान ही लाभ होता है । यदि शरीर में हल्का कपड़ा डाल कर धूप में बेठाया जाय 
तो अधिक लाभ होता है । 

व्यायाम--शारीरिक श्रम से स्वतः ऊष्मा की उत्पत्ति होकर संचित दोषों का 
विलयन एवं स्वेंद की प्रवृत्ति होती है । 

अमण या यात्रा--मेदस्वी व्यक्तियों को काफी दूर चलाने से स्वेदनजन्य पूर्ण 
लाभ होता है । 

मद्यपान--शरीौर में संचित आवश्यकता से अधिक खाद्यांश के प्रज्वलन में मात्रावत्‌ 
मद्यपान बहुत सहायक होता है । 

इसके अतिरिक्त भारवहन कराना, कोघित करना, भयभीत करना और क्षुधित या 
लंघित स्थिति में भी शरीर के भीतर ताप की बृद्धि होती है। परिणाम में स्वेदनवत्‌ लाभ 
होता है। यह स्वेदन के दस अकार बिना अप्नि की सहायता के ही स्वेदन का कार्य करते 
हैं किन्तु इनके द्वारा अनुकूछ परिणाम की आप्ति कुछ समय के बाद ही होती है। सामान्य- 
तया पंचकम के पू् अप्रिस्वेदन--विशेषकर वाष्प, उपनाह और द्रव स्वेदन--का ही 
प्रयोग किया जाता है । तापस्वरेद एवं अनमिस्वेद को विशिष्ट व्याधियों में सहायक उपकम 
के रूप में निर्दिष्ट किया जाता है । 


स्वेदन द्ब्य--दूध, मांस-रस, तेल, कॉँजी, घृत, गोमूत्र, वातप्न द्रव्यों का क्राथ, 
वातन्न द्रव्यों का कल्क तथा ऊपर तेरह विधियों में वर्णित अस्तर इत्यादिक स्वेदन में 
आवश्यक होते हें । 

मात्रा--स्नेहन के समान स्वेदन की मात्रा शरीर की दृष्टि से प्रवर, मध्य और 
हीन शक्ति के आधार पर एक अहर, दो घड़ी या एक घड़ी होती है। सामान्यतया 
स्वेदन तीन दिन कराया जाता है । 


चिकित्सा के सिद्धान्त १८७ 


पश्चात्‌ कमं--स्त्रेदन के बाद व्याधि-शामक वातन्न लघुपाकी पथ्य का सेवन तथा 
पूर्ण विश्राम कराना चाहिए । 


..._ सम्यक्‌ स्वेदित के लक्षण--स्वेद की अबृत्ति, शरीर की लघुता, वेदना की शान्ति 
शीतोपचार की इच्छा, जड़ता एवं शूल का प्रशम होकर शरीर मद हो जाता हूँ। 
पाचकाम्म की तीव्रता, मन की प्रसन्नता, त्वचा की ल्लिग्वता एवं मदुता, ख्रोतसों के 
अवरोध का अभाव, तन्द्रानाश, उचित निद्रा तथा जकड़े हुए सन्धिस्थलों की लघुता 
पूर्ण स््रेदन के मुख्य लक्षण होते हैं । 


अतिस्वेदन के रक्षणफ--स्वेदन का आधिक्य हो जाने पर रक्तदुष्टि, पित्तमकोप, 
विस्फोट, तृष्णा, उन्माद, मूच्छों, श्रम, दाह, क्लान्ति एवं सन्धिस्थलों में बेदना होती है। 
इनको शान्ति के लिए पित्तशामक शीतल उपचार तथा अग्रेदग्धवत्‌ चिकित्सा 
ऋरनी चाहिये । 

हीन स्वेदन के रक्षण--शरौर की जड़ता, गुरुता, निन्द्रा, तन्द्रा, स्वेद की अग्रव्ृत्ति 
एवं आल्स्य इत्यादि लक्षण पंदा होते हैं । मूल व्याधि के लक्षण शान्त नहीं होते, शरीर 
लघु एवं शुद्ध नहीं होता। द 

स्वेद्य व्याधिया--प्रतिश्याय, कास, हिक्का, श्वास, कणशूल, शिरःशूल, मन्यास्तम्भ, 
स्वरभेद, गलग्रह, अदित, एकाज्ञवात, सर्वाजवात, पक्षाघात, अन्तरायाम, बाह्यायाम, 
आनाह, विबन्ध, शुक्राघात, गृप्नसी, पाश्च-पृं्ठ-कटिग्रह, मूत्रकृच्छ, मुष्कब्नद्धि, अक्ञमद, 
पाद-जंघा वेदना, श्वयधु, खजल्ली, वातकण्टक, श्रकम्प, पवसंकोच, शूल, स्तम्भ, स॒प्तता 
' इत्यादि बातपग्रधान व्याधियों में स्वेदन प्रमुख रूप से कराया जाता है । 

अस्वेद्य व्याधियाँ--गर्भिणी, रक्तपित्ती, मद्यपी, अतिसारपीडित, रूक्ष शरीर वाले, 
मधुमेही, विष एवं मद्य के विकारों से पीड़ित, शान्त-मूच्छित, स्थूलछ, तृषित, क्षुधित, 
क्रोाघधित, शोकपीडित, कामला, उदररोग, क्षत, पित्तप्रमेह से पीड़ित, ऊरुस्तम्भग्रस्त एचं 
दुबल-क्तीण, तिमिर से पीड़ित व्यक्तियों को स्वेदन नहीं कराना चाहिये । 

सामान्यतया स्वेदन का विधिवत्‌ प्रयोग संशोधन चिकित्सा के पर्च किया जाता है । 
किन्तु शोधन के अतिरिक्त वात-श्लेष्मप्रधान स्थानसंश्रित सभी व्याधियों में स्वेदन 
गुणकारी होता है, दोषों के अनुकूल रूक्ष या ल्लिग्ध स्वेदन की कल्पना करके उचित 
व्यवस्था करनी चाहिये । स्वेदन से त्वचा के नीचे संचित दोष का शोधन होता है, तथा 
स्थानीय रक्तप्रवाह की वृद्धि हो जाने के कारण दोष का विनाश एवं आन्तरिक संशोधन 
भी रक्त के द्वारा होता है। शोथयुक्त एवं पूयानुबंधी सभी व्याधियों में स्वेदन परम 
हितकारी माना जाता है। जीण रोगियों में सर्वाज्ञस्वेदन तथा तीज्र रोगों में विकृति- 
स्थान का स्वेदन अ्रमुख रूप में किया जाता है ! 


१८८ कायचिकित्सा 


बमन 


साधारणतया वमन, विरेचन, निरूहवस्ति, अनुवासनवस्थि तथा नस्यक्रम संशोधन 
के पाँच अंग होते हैं । पूच वर्णित स्नेहन और स्वरेदन प्रत्येक क्रिया के पूर्व में कराये 
जाते हैं। अतः इनको पूचंकम या सहायक कर्म भी कहते हैं । ऊपर लिखे पंचकर्मों में 
कफप्रधान दोष के लिये वमन, पित्तप्रधान के लिये विरेचन, वातप्रधान रोगों के लिये 
वस्ति की उपयुक्तता होने के कारण इन्हीं तीन कर्मों की प्रधानता है। कफ का स्थान 
वक्ष एवं आमाशय होने के कारण वमन के द्वारा वहाँ के दोषों का शोधन, पित्त 
का स्थान नाभिप्रदेश या लघु अन्त्र होने से वहाँ के दोषों का शोधन विरेचन के द्वारा 
तथा वात का स्थान पक्काशय होने से वातजन्य विकार्से में वस्तिकम हिंतकारी होता 
हैं। किन्तु कोई भी जीण रोग केवल एक दोष की दुष्टि सें नहीं होता, अतः वमन- 
विरेचनादि सभी कम क्रम से स्नेहन-स्वेदन से सम्पुटित किए जाते हैं । 

पूर्व कम--स्नेहन-स्वेदन के उपरान्त माष, दूध, गुड, मछली, मांसरस, यवागू 
इत्यादि कफव्धघंक भोजन कराकर संचित दोष को क्षुब्ध करना चाहिये, जिससे वामक 
द्रव्यों के द्वारा बिना उत्ललेश के शोधन हो जाता हैं। वामक ओषधियों के प्रयोग के 
पहले रोगी को भली अकार शारीरिक ओर मानसिक दृष्टया आश्वस्त कर निश्चिन्त कर 
देना चाहिये अन्यथा भय के कारण जल्दी घबड़ा कर रोगी आधे ही में प्रयोग छोड़ 
देता हे । यदि रोगी को क्षुधा हो तो चावल के माँड में घी मिला कर पिंला देना चाहिये । 


वमन की विधि--रोगी की अनुकूल चारपाई या कुर्सी आदि पर बेठाकर वामक 
ओषध का पान कराना चाहिये और अप्नि पर हाथों को गरम कर थोड़ा थोडा उदर पर सेंक 
करना चाहिंये । उत्क्लेश होने पर परों के बल उत्कटुकासन में बेठाकर वमन करने के 
लिये कहना चाहिये ! यदि वमन-प्रत्नत्ति न हो रही हो तो गले में अगुली या कमलनाल या 
मुलायम पंख के सहलाने से आसानी से वमन होने लगता है । पेट और पीठ में गरम 
पोटलियों के द्वारा सेंक करते रहने से वमन की अबृत्ति सुखपूवक होती है तथा आमा- 
शयस्थ दोष द्रविंत होकर आसानी से निकल जाता है । वमन के आरम्भ के पूव रोगी 
को मस्तक पर या कभी-कभी सर्वाज्ञ में पसीना आता है, उसे स्वच्छ कपड़े से पोंछ देना 
चाहिये । आमाशयस्थ दोष वामक ओषधि के साथ जब ऊध्वंगामी होता है, तब पा»श्व 
कुछ फूछ जाते हैं, रोगी /को रोमाश्व का अनुभव होता है, हत्मदेश पर भार-सा 
मालूम पड़ता है और मुख से पानी निकलने लगता है। ऐसी स्थिति में मुख को जाँच 
से नीचे कर उत्कलेश के विना ही वमन की चेष्टा करनी चाहिये । रोगी को वमन के 
लिये श्रम, वमन के वेग का अवरोध या वमन-अबृत्ति की चेष्टा नहीं करनी चाहिये । 
परिचारकों को पीठ ओर पेट की ओर नीचे से ऊपर की ओर धीरे-धीरे सहलाते हुए 
मदन करना चाहिये । 


चिकित्सा के सिद्धान्त १८९ 


वामक द्रव्यों में मछु और सेंधानमक का अ्योग स्देव होना चाहिये। कफप्रधान 
विकारों में पीपछ, काली मिचे, राई, इन्द्रयव इत्यादि तिक्त एवं तीदण गुण विशिष्ट तथा 
ऋफयक्त पित्तविकारों में इख का रस, मिश्री, दग्ध आदि मधुर द्वव्यो का अयांग 
और कफयुक्त बातविकारों में तक, कांजी, नीबू का रस आदि अम्ल पदाथ तेल से स्लिग्ध 
करके देना चाहिये । 


वामक औषध--मदनफल, देवदाली, कठ॒तुम्बी, कुटजत्वक्‌ , नीम, इन्द्रायण, मूर्चो, 
करज्ञ, सेंघानमक, सरसों आदि ओषधियों का प्रयोग चमन के लिए किया जाता हैं। 
कफाधिक्य होने पर मदनफल, पीपल, सेंघानमक् गरम जल के साथ तथा पित्तशोधन 
के लिए परवल के पत्ते, नीम की छाल और अइसे का चूण ठण्डे पानी के साथ देना 
चाहिये । नीचे वामक ओषधिंयों के तीन योग लिखे जा रहे हैं-- 

१. मदनफल, कट तुम्बी के बीज, कूठ, मुलहठी, सेंघानमक सम भाग में मिलाकर 
३ माशा से १ तोला तक पर्याप्त मधु के साथ चाटकर ऊपर से २ तोला नीम के पत्तों 
का क्राथ पीना चाहिये । 

२. इन्द्रयय, वच, सेंघानसक, अड्डसा इनके सम भाग का ६ माशा चूण लेकर 
मुलेठी के क्राथ में मिलाकर मधु के साथ पिंलाना चाहिये । 

२. कटु तुम्बी की छाल १ तोला चूर्ण कर, कुटजकषाय म सवा नमक, सु, काला 
मिच मिलाकर पिलाना चाहिये । 


सम्यक वमन के लक्षण--यदि उक्त प्रक्रिया से पर्याप्त मात्रा में दोषा का शोधन 
हुआ हो तो बमन में ओषधि के साथ प्रारम्भ में पतला कफ गिरता हैं। उसके उपरान्त 
अम्ल, कटु तथा पौले रंग का पित्त निकलता है । अन्त में वमन से कंवछ